Monday, January 20, 2014

लोंगेवाला- एक गौरवशाली युद्धक्षेत्र

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लोंगेवाला- एक निर्णायक और ऐतिहासिक युद्ध का गवाह।
1971 की दिसम्बर में जैसलमेर स्थित वायुसेना को सूचना मिली कि पाकिस्तान ने युद्ध छेड दिया है और उसकी सेनाएं टैंकों से लैस होकर भारतीय क्षेत्र में घुस चुकी हैं।
वह 3 और 4 दिसम्बर की दरम्यानी रात थी। पूर्व में बंगाल में अपनी जबरदस्त हार से खिन्न होकर पाकिस्तानियों ने सोचा कि अगर भारत के पश्चिमी क्षेत्र के कुछ हिस्से पर कब्जा कर लिया जाये तो वे भारत पर कुछ दबाव बना सकते हैं। चूंकि उनके देश का एक बडा हिस्सा उनके हाथ से फिसल रहा था, इसलिये वे कुछ भी कर सकते थे। उन्होंने जैसलमेर पर कब्जा करने की रणनीति बनाई। उस समय भारत का भी सारा ध्यान पूर्व में ही था, पश्चिम में नाममात्र की सेना थी।
जब पता चला कि पाकिस्तान ने आक्रमण कर दिया है तो कमान मेजर कुलदीप सिंह चांदपुरी के हाथों में थी। उन्होंने ऊपर से सहायता मांगी। चूंकि यह रात का समय था, जवाब मिला कि या तो वहीं डटे रहकर दुश्मन को रोके रखो या रामगढ भाग आओ। चांदपुरी ने भागने की बजाय वही डटे रहने का निर्णय लिया। सहायता कम से कम छह घण्टे बाद मिलेगी अर्थात सुबह को।
मेजर चांदपुरी ने सारी परिस्थियों का अवलोकन करते हुए युद्ध का सामना किया। पाकिस्तान को न केवल रोके रखा बल्कि उसके 12 टैंक ध्वस्त भी कर दिये। सुबह जब उजाला हो गया तो वायुसेना सहायता के लिये आ गई। वायुसेना के पास रात्रि में देखने वाले उपकरण नहीं थे। उसके आते ही सबकुछ बदल गया। पाकिस्तानी वायुसेना यहां नहीं आने वाली थी इसलिये भारतीय वायुसेना ने यहां पाकिस्तानी जमीनी फौज पर जमकर तांडव किया। इस पूरी लडाई में मात्र दो भारतीय शहीद हुए जबकि पाकिस्तानी न केवल सैंकडों की संख्या में मरे बल्कि उनके सारे टैंक व वाहन भी नष्ट हो गये। कुछ घण्टे पहले जो जैसलमेर पर कब्जा करने की योजना बना रहे थे, वे अब अपने इलाकों की फिक्र करने लगे थे। सीमा से पाकिस्तान के अन्दर पाकिस्तान की जीवनरेखा लाहौर-कराची रेलवे लाइन व सडक ज्यादा दूर नहीं है। भारतीय वायुसेना को बस एक फूंक मारने भर की देर थी।
तो यह कहानी थी लोंगेवाला की जिसने थार की इस छोटी सी जगह को अमर कर दिया। आज भी यहां पाकिस्तानी टैंक व वाहन रेत में इधर उधर बिखरे पडे हैं। अब यहां इस युद्ध की याद में एक स्मारक भी बना दिया गया है। दुनिया में ऐसी कोई जगह नहीं है जहां इतने कम समय में दुश्मन के शक्तिशाली टैंकों को इतनी संख्या में ध्वस्त किया गया हो। कुल मिलाकर 34 टैंक ध्वस्त किये- 12 थलसेना ने और 22 वायुसेना ने। यह उस समय की बात है जब अमेरिका पाकिस्तान को आंख मीचकर दिल खोलकर सहायता दिया करता था। ये टैंक व वाहन भी अमेरिका द्वारा ही दिये गये थे। लोंगेवाला को टैंकों की कब्रगाह भी कहते हैं।
लोंगेवाला जाने के लिये किसी भी परमिट की आवश्यकता नहीं होती। यह जानकारी हमें तनोट पहुंचकर पता चली। इससे पहले हम सोचते थे कि लोंगेवाला के लिये परमिट चाहिये। नटवर ने मुझसे कुछ पहले जैसलमेर आकर परमिट के लिये डीएम व एसडीएम के चक्कर लगाये थे। लेकिन वह सरकारी मशीनरी है, अपनी गति से चलती है। वहां से हाथों-हाथ परमिट कैसे मिल सकता था? फिर किसी ने बताया कि रामगढ से बीएसएफ परमिट जारी करती है। हम रामगढ गये तो पता चला कि परमिट तनोट से भी मिल जाता है। रामगढ से तनोट व लोंगेवाला के रास्ते अलग-अलग होते हैं। वहां से तनोट 55 किलोमीटर व रामगढ 43 किलोमीटर है। रामगढ के ही रहने वाले अरविन्द खत्री को भी नहीं पता था कि लोंगेवाला बिना परमिट के जाया जा सकता है। उन्होंने कहा था कि तनोट से परमिट मिल जायेगा। अगर तनोट से नहीं मिलेगा तो मुझे बता देना, मैं यहां रामगढ से अपने प्रभाव का इस्तेमाल करके बीएसएफ द्वारा तनोट फोन करवा दूंगा ताकि तुम्हें लोंगेवाला का परमिट मिल सके।
हम तनोट पहुंचे तो मन्दिर द्वार पर तैनात सन्तरी से परमिट के बारे में बात की। उसने बताया कि वो सामने जो रास्ता जा रहा है, लोंगेवाला ही जा रहा है। वहां जाने के लिये किसी भी परमिट की आवश्यकता नहीं है। हां, अगर आपको सीमा देखनी है तो परमिट चाहिये। लोंगेवाला के लिये कोई परमिट नहीं।
बहरहाल, मैं लोंगेवाला पहुंचा। यहां एक चौराहा है जहां से एक रास्ता रामगढ, एक असूतार, एक सीमा पर और एक तनोट जाता है। एक बडा सा गोल चक्कर है। मैंने गोल चक्कर की दीवार पर साइकिल टिका दी तो यहीं तैनात सेना के दो जवानों ने बताया कि वहां सामने पार्किंग में चले जाओ। पार्किंग में गया तो बीएसएफ का एक जवान रजिस्टर लिये बैठा था और हर आगन्तुक के नाम दर्ज कर रहा था।
बीएसएफ के जवान ने बडे आदर से मुझे एक बेंच पर बैठाया। पूछने लगा कि कल जो साइकिल वाला आया था, वो तुम्हारा ही दोस्त था क्या? गौरतलब है कि कल नटवर यहां तक आ चुका था और मेरी साइकिल की चेन टूट गई थी जिसके कारण मुझे वापस तनोट जाना पड गया। इसके बाद इन्होंने बताया कि तुम्हारा दोस्त कह रहा था कि तुम्हारी साइकिल की चेन टूट गई है, इसलिये तुम नहीं आ सके। यही बात चौराहे पर तैनात सेना के दोनों जवानों ने भी कही। यह सुनकर मुझे नटवर पर फिर क्रोध आने लगा। कल की सारी घटनाएं आंखों के सामने आने लगीं कि किस तरह मेरी साइकिल की चेन टूटी थी, मैं इसे लेकर कुछ दूर पैदल चला था, नटवर ने चढाई पर मुझे भी पैदल आते देख मेरी हंसी उडाई थी, मैंने कहा था कि चेन टूट गई है। इसके बाद मैं रुककर चेन ठीक करने लगा और नटवर अदृश्य हो गया था। सबकुछ जानते हुए भी वह 22 किलोमीटर लोंगेवाला तक अकेला आ गया था। जवानों से भी चेन टूटने की घटना का जिक्र किया था। इन्हीं जवानों ने ही उसकी साइकिल को तनोट जाने वाली एक टूरिस्ट बस पर रखवाया था। मैंने तनोट में नटवर से पूछा था कि तू सबकुछ जानते हुए भी कैसे चला गया जबकि साइकिल की अतिरिक्त कडी तेरे पास थी तो उसने गोलमोल जवाब दिया था और मुझे ही दोषी ठहरा दिया था।
खैर, इतना होने के बावजूद भी मैं अब लोंगेवाला में था। भू-दृश्य तो ऐसा ही था जैसा मैं पिछले कई दिनों से देखता आ रहा था। लेकिन यहां होने का एहसास ही अलग था। मैं महसूस कर रहा था कि किस तरह सीमा चौकी की रक्षा करने वाले मुट्ठी भर सैनिकों ने रातभर लोहे के समुद्र को रोके रखा था। टैंकों की फौज लोहे का समुद्र ही कही जायेगी। उजाला होते ही हमारी वायुसेना उस समुद्र पर कहर बनकर टूट पडी थी।
मैं स्वयं एनसीसी कैडेट रह चुका हूं तो सेना के तौर तरीकों से परिचित हूं। मुझे पूरा यकीन था कि मैं यहां खाना हासिल कर सकता हूं। मैंने सेना के जवानों से कहा कि जब सुबह मैं तनोट से चला था तो कैंटीन में सिवाय चाय के कुछ भी नहीं था। भूखा हूं। कुछ खाने को मिल जाये तो आनन्द आ जाये। उन्होंने पहले तो यही कहा कि लोंगेवाला में कोई होटल नहीं है, कुछ भी खाने को नहीं मिलेगा लेकिन जल्दी ही कहने लगे कि साढे बारह बजे हम लंच करने जायेंगे, तुम भी चलना। अभी बारह बजे थे, इसलिये मैं इस युद्धक्षेत्र को देखने निकल पडा।
यहां से सीमा की तरफ जाने वाली सडक पर सौ मीटर भी नहीं चला कि एक खाली मैदान में एक टैंक व टूटी फूटी क्रेन खडी थी। यह पाकिस्तानी टैंक एक ऊंचे चबूतरे पर था, इसके पास ही एक सूचना पट्ट भी था जिस पर यहां का इतिहास लिखा था। क्रेन चबूतरे पर नहीं थी इसलिये समय बीतने से यह रेत में धंसने लगी है। हालांकि कोई दूसरा टैंक मुझे नहीं दिखाई दिया लेकिन पक्का यकीन है कि दूसरे टैंक भी इधर उधर पडे होंगे। या फिर बाकी ध्वस्त टैंकों को यहां से हटा दिया गया हो और यह एक टैंक प्रदर्शनी के लिये रखा हुआ हो।
चौराहे पर जो गोल चक्कर है, यह भी एक स्मारक बना दिया गया है। यहां कुछ पेड भी हैं, जिनसे छाया रहती है। एक स्मारक यहीं चौराहे से थोडा सा हटकर भी है। क्रिसमस व नववर्ष की छुट्टियों के कारण जैसलमेर में यह पर्यटन का पीक सीजन होता है जिससे यहां लोंगेवाला में भी काफी पर्यटक आ जाते हैं।
इतना देखकर मैं फिर चौराहे पर जा पहुंचा सेना के जवानों के पास। जब उन्हें पता चला कि मैं मेट्रो में कार्यरत हूं तो पूछने लगे कि वहां पूर्व सैनिकों के लिये भी कोई मौका है या नहीं। मैंने बता दिया कि योग्यता के अनुसार आप समय समय पर निकलने वाली भर्तियों में आवेदन कर सकते हो। पूर्व सैनिकों के लिये सरकारी नियमानुसार निर्धारित कोटा होता है।
साढे बारह बजे उनके साथ मैं बैरक में जाने लगा। वे बडे खेद के साथ मुझे बता रहे थे कि हमारे यहां आपको उतना अच्छा खाना नहीं मिलेगा, उतने अच्छे तरीके से भी नहीं मिलेगा। हम अपने अपने बर्तन लेकर खाना लाने जाते हैं और जहां मन किया वहां बैठकर खा लेते हैं। कभी वहीं बैठकर तो कभी अपनी बैरक में ले जाते हैं। मैं हालांकि इन सब से परिचित था लेकिन मैंने यह जाहिर नहीं होने दिया। यही कहा कि जैसे आप लोग खाते हो, जो आप लोग खाते हो, वही मैं भी खा लूंगा।
बैरक में और भी कई सैनिक थे। शीघ्र ही उन्हें पता चल गया कि मैं मेरठ से हूं और जाट हूं। कुछ तो दिल्ली की तरफ के ही थे, कुछ जाट भी थे। सबका व्यवहार मेरे प्रति विशेष हो गया। कुर्सी लाकर दी। धूप में बैठ गया। एक नहा रहा था, दूसरा नहाने की तैयारी कर रहा था। अब तक मेरे और उनके बीच सारी औपचारिकताएं समाप्त हो चुकी थीं। एक कहने लगा कि यहां सर्दियों में पानी बहुत ठण्डा हो जाता है, नहाने को भी मन नहीं करता। मैंने जैसे ही हां कहा तो पता नहीं उनके दिमाग में क्या आया कि अपने साथी से पानी गर्म करने को कह दिया। बिजली से पानी गर्म होने लगा। कहने लगे कि आपके लिये पानी गर्म होने के लिये रख दिया है। मैंने खूब कहा कि नहीं नहाऊंगा, नहीं नहाऊंगा लेकिन वे कहां मानने वाले थे? गर्म पानी आ गया, बाहर खुले में नहाना पडा। पानी भले ही गर्म हो लेकिन हवा बडी ठण्डी थी और तेज भी, गर्म पानी का उतना फायदा नहीं हुआ। आज मैं चार दिन बाद नहाया था, कभी दिल्ली से ही नहाकर चला था। खैर, जो भी हुआ, अच्छा ही हुआ। नहीं तो अगले तीन दिन मैं नहाने वाला नहीं था, दिल्ली जाकर ही नहाता।
खाना खाकर बैरक से बाहर निकला तो एक फौजी एक गधे के सिर पर हाथ फेर रहा है। आसपास और भी फौजी थे। उन्होंने बताया कि इसकी मां तब मर गई थी जब यह तीन दिन का था। हमने इसे पाला। इसलिये यह हमारे पास आ जाता है, दूसरे नहीं आते। हम इसे रोटी भी खिलाते हैं। यह दूसरे गधों से ज्यादा तंदुरुस्त है। जाहिर था कि यहां इस वीराने में यह गधा इन सैनिकों की मनोरंजक की वस्तु था। मैंने इसका नाम पूछा तो बताया- इसका नाम.... इसका नाम.... कुछ नहीं, बस गधा ही है। फिर इसके भविष्य की बातें होने लगीं- इसके लिये ऐसी पटडी बनवायेंगे जैसी साइबेरिया में कुत्ते खींचते हैं। यह रेत पर खींचा करेगा, हमें कम चलना पडेगा।... इसे पानी ढोने की ट्रेनिंग देंगे। यह हमारे लिये पानी लाया करेगा।... इसे फौज में भर्ती करेंगे।...
ढाई बजे मैं यहां से चल पडा- रामगढ के लिये, जो यहां से 43 किलोमीटर दूर है।


लोंगेवाला

लोंगेवाला से जैसलमेर और रामगढ की दूरियां



पाकिस्तानी क्रेन

ध्वस्त पाकिस्तानी टैंक




स्मारक






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अगले भाग में जारी...

9 comments:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
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    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा आज रविवार (20-01-2014) को चर्चा कथा में चर्चाकथा "अद्भुत आनन्दमयी बेला" (चर्चा मंच अंक-1498) पर भी होगी!
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    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. हमारी अदम्य वीरता की दृश्यस्थली।

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  3. Bharat ki thal sena aise hi misal kayam kerti rehti hai. Is desh ki mitti me hi kuchh aisa hai jo aise jawanon ko janm deti hai jo desh k liye bali hona apna gaurav samajhte hai or kabhi peechche nahin hat te.
    Salute for Indian Soldiers
    Neeraj Bhai bahut achchha lekh hai lage raho

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  4. यह जगह उस वीरता भरी जंग की गवाह हे जिसमे हमारी सेना ने रात भर उनसे जूझते हुए उन्हे करारी मात दी जो इतिहास मे भी दर्ज है

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  5. बहुत अच्छी पोस्ट !!

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  6. चलो इस बहाने तुम नहाये तो ?

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  7. Darshn kaur ji ko ab bhi vishwaas nahi ho raha!! Ha! Ha! Ha!

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