Monday, January 13, 2014

थार साइकिल यात्रा- सानू से तनोट

इस यात्रा वृत्तान्त को शुरू से पढने के लिये यहां क्लिक करें
25 दिसम्बर 2013, जब आधी दुनिया क्रिसमस मनाने की खुशी से सराबोर थी, हम पश्चिमी राजस्थान के एक छोटे से गांव में सडक किनारे एक छप्पर के नीचे सोये पडे थे। यहां से 45 किलोमीटर दूर जैसलमेर है और लगभग इतना ही सम है जहां लोग क्रिसमस और नये साल की छुट्टियां मनाने बडी संख्या में आते हैं। आज वहां उत्सव का माहौल बन रहा होगा और इधर हम भूखे प्यासे पडे हैं।
आठ बजे जब काफी सूरज निकल गया, तब हम उठे। दुकान वाला दुकान बन्द करके जा चुका था। ताला लटका था। हमने कल पांच कप चाय पी थी- कम से कम पच्चीस रुपये की थी। हमें टैंट उखाडते देख कुछ ग्रामीण आकर इकट्ठे हो गये। उन्होंने सूखी झाडियां एकत्र करके आग जला ली। उन्होंने बताया कि यह दुकान केवल रात को ही खुली रहती है, दिन में वह सोने घर चला जाता है। घर हालांकि इसी गांव में था, हम आसानी से जा सकते थे। जब हमने उसके घर का पता पूछा तो ग्रामीणों ने बताया कि वह ऐसा अक्सर करता रहता है। लोगों को फ्री में चाय पिला देता है। वैसे भी अब वह सो गया होगा, उठाना ठीक नहीं। ऐसा सुनकर हमने उसके घर जाने का विचार त्याग दिया।
ज्यादातर लोगों को सुबह सुबह शौचालय जाने की आदत होती है। अगर किसी कारण से ऐसा नहीं हो सकता तो वे परेशान हो जाते हैं। नटवर बडा परेशान हुआ। कहने लगा कि प्रेशर तो नहीं बन रहा लेकिन जाना जरूर है। मैंने भी उसे रोकने के लिये कोई दबाव नहीं डाला। उसने ग्रामीणों से पूछा तो उन्होंने बताया कि गांव से निकलते ही एक ट्यूबवेल है, वहां कर लेना। नटवर ने हालांकि यहीं झाडियों के पीछे जाने की बात कही लेकिन कौन ग्रामीण अपने ही गांव के अन्दर ऐसा करने देगा?
जैसलमेर और तनोट के बीच में रामगढ मुख्य स्थान है। यहां ठहरने के लिये होटल भी हैं और खाने-पीने के लिये रेस्टॉरेंट भी। सानू से रामगढ बीस किलोमीटर दूर है। डेढ घण्टे का अन्दाजा लगाया रामगढ पहुंचने का। नाश्ता और लंच आज रामगढ में ही करेंगे। सानू से खाली पेट चलना पडा। बायें हाथ एक ट्यूबवेल मिली। इस गांव और आसपास में पानी यहीं से पहुंचाया जाता है। मैं आगे था, नटवर कुछ पीछे। फिर भी मेरा ध्यान नटवर पर ही लगा रहा। जब मेरी देखा-देखी वह भी ट्यूबवेल पर नहीं रुका तो मैंने भी रुकने का इरादा छोड दिया, नहीं तो सोच रखा था कि जब तक नटवर फ्रेश नहीं हो जाता, मैं कुछ आगे चलकर रुक जाऊंगा और उसकी प्रतीक्षा करूंगा। पूछने पर उसने बताया कि रामगढ में करूंगा।
साढे दस बजे रामगढ पहुंचे। यहां एक और आवश्यक काम करना था- लोंगेवाला के लिये बीएसएफ से आज्ञा-पत्र लेना था। आज हम तनोट पहुंच जायेंगे और कल लोंगेवाला जायेंगे।
एक रेस्टॉरेंट पर रुके। यह काफी साफ सुथरा था और कई कारें भी यहां खडी थीं। हमने दो दो समोसे चाय के साथ खाये व गाजर का हलुवा भी। खा-पीकर नटवर फिर से परेशान हो गया। मैंने कहा कि यहां से चार किलोमीटर आगे एक नहर है, वहां कर लेना। कहने लगा कि बिल्कुल नहीं। जैसलमेर में संजय ने अपने एक मित्र अरविन्द खत्री का नम्बर दिया था। नटवर ने उनसे बात की तो कुछ ही देर में वे हाजिर हो गये। समस्या सुनकर वे हमें एक रेस्ट हाउस में ले गये, नटवर को यहां ‘जीवनदान’ मिला। मेरी भी एक बार नहाने की इच्छा हुई, लेकिन अत्यधिक ठण्डा पानी देखकर इरादा बदल लिया।
यहां तीन घण्टे तक रुके रहे। मोबाइल चार्ज हो गये, मैंने भी एक नींद ले ली। नटवर ने अपनी साइकिल में मामूली मरम्मत की। चलने से पहले भरपेट भोजन भी हो गया।
रामगढ से तनोट की तरफ सडक के चौडीकरण का काम चल रहा है। इसमें वर्तमान सडक पर भी नई सडक बनेगी, इसलिये सडक की चौडाई में ढाई ढाई फीट की दूरी पर ढाई ढाई इंच चौडी नालियां बना दी हैं ताकि नई सडक पुरानी सडक में अच्छी तरह जम जाये। यह रामगढ से एक किलोमीटर पहले ही शुरू हो जाता है। मरुस्थल होने के कारण सडक से नीचे साइकिल नहीं उतार सकते और सडक पर नालियों की वजह से बुरी तरह उछलते हुए चलना पड रहा था। अरविन्द ने बताया कि ऐसी सडक बीस किलोमीटर तक है। सुनते ही होश उड गये। यानी बीस किलोमीटर तक इसी तरह धम-धम उछलते हुए चलना पडेगा। इससे हमारी स्पीड तो कम होगी ही, साइकिल को भी नुकसान होने की आशंका है, खासकर नटवर की पतले पहियों वाली को ज्यादा। और हां, शरीर के एक खास हिस्से पर भी काफी झटके लगेंगे।
रामगढ से चार किलोमीटर आगे एक नहर है। यह है थार की जीवन रेखा इन्दिरा गांधी नहर। यह पंजाब में फिरोजपुर में सतलुज और ब्यास नदी के संगम के पास हरिके बांध से निकलती है और थार को जीवन देती चलती है। रामगढ से भी कम से कम सौ किलोमीटर आगे तक यह नहर जाती है। रेत में कच्ची नहर तो किसी काम की नहीं, इसलिये यह पक्की है। इसी नहर की वजह से रामगढ के आसपास का इलाका काफी हरा-भरा है।
सडक पर बनी नालियों की वजह से शुरू में तो सावधानी से चले धीरे धीरे लेकिन बाद में जब इनकी आदत पडने लगी तो उसी रफ्तार पर आ गये जिस पर इनसे पहले चल रहे थे। नटवर भी उसी स्पीड से चलने लगा। यहां एक और समस्या आई। यातायात के लिये सिंगल लेन ही खुली हुई थी। बराबर में दूसरी लेन में मिट्टी और पत्थर डले हुए थे नई सडक के लिये। ट्रैफिक काफी कम था लेकिन फिर भी इधर पर्यटन का पीक सीजन होने के कारण तनोट आने-जाने वालों का तांता लगा हुआ था। बेहद तेज रफ्तार से गाडियां आतीं और सर्र से निकल जातीं। सडक से नीचे रेत होने के कारण हम उनसे बचने के लिये नीचे भी नहीं उतर सकते थे। और उतरते भी तो रुकना पडता और लय बिगड जाती। जब ऐसा ही होता रहा तो एक तरीका अपनाया। हम सडक के बीचोंबीच चलने लगे। गाडी वाले दूर से ही हॉर्न बजाते आते और पास आकर जब पर्याप्त धीमे हो जाते, तब हम उन्हें साइड देते।
ठेठ मरुस्थल होने की वजह से यहां कोई बडा पेड नहीं है, बस झाड-झंगाड ही हैं। चारों तरफ क्षितिज स्पष्ट दिखता रहा।
बीस किलोमीटर बाद जब अच्छी सडक आ गई तो हमारी आगे बढने की रफ्तार भी बढ गई। अब धीरे धीरे भू-दृश्य में परिवर्तन आने लगा। रेत के धोरे मिलने लगे। हालांकि रेत पर हर जगह झाडियां थीं इसलिये ये छोटी छोटी पहाडियों की तरह लग रहे थे। फिर बीआरओ ने सडक भी बिल्कुल नाक की सीध में बना रखी है। इससे सडक सीधे धोरे पर चढ जाती और उसे पार करके उस तरफ नीचे उतर जाती। यह चढाई आखिरी दस पन्द्रह मीटर बडी तीखी होती। उस तरफ नीचे उतरने में जो आनन्द आता, उससे चढाई का सारा तीखापन भूल जाते।
इसी तरह के एक ऊंचे धोरे पर चढे तो सामने नीचे रणाऊ गांव दिखने लगा। रणाऊ तक लगभग दो किलोमीटर तक बडी तेज ढलान थी। गांव के आसपास की भूमि पर झाडी का एक भी तिनका नहीं था, इसलिये शुष्क रेत स्पष्ट दिख रही थी। यह गांव रामगढ से करीब तीस किलोमीटर दूर है, इसलिये हमारी यहां कुछ खाने पीने की इच्छा थी। गांव में दो चार ही घर थे और चाय की दुकान तो बिल्कुल नहीं, मैं आगे बढ गया। नटवर उस धोरे पर पैदल चढ रहा होगा। मैं गांव से एक किलोमीटर आगे जाकर सडक पर ही बैठ गया और नटवर के आने की प्रतीक्षा करने लगा। पन्द्रह मिनट बाद वो आया। उसकी साइकिल के ब्रेक कम लगते थे, इसलिये ढलान पर वह ओवरस्पीड हो जाता था। ऐसे में सन्तुलन भी बिगड जाया करता है। नटवर ने बताया- मेरी साइकिल के आगे ढलान पर दो तीन गायें आ गईं, मैंने पूरी ताकत से ब्रेक लगा दिये लेकिन साइकिल नहीं रुकी। गायें भी इतनी हठी थीं कि रास्ते से नहीं हटीं। आखिरकार एक गाय में टक्कर मार दी।
रणाऊ में सेना का एक पडाव भी है। एक फौजी घूमता घामता हमारे पास आया। हालचाल पूछा। साइकिल यात्रा की प्रशंसा की और बैरक में चलकर चाय पीने का आग्रह भी किया जिसे हमने आदरपूर्वक नकार दिया। हालांकि चाय की इच्छा तो थी लेकिन बैरक में बनी बनाई चाय नहीं मिला करती। फौजी को जाकर खुद ही बनानी पडती, हम उसका काम नहीं बढाना चाहते थे। इसकी बजाय वहीं सडक पर ही बैठ गये। बिस्कुट व नमकीन खाकर पानी पी लिया। शरीर में कुछ ऊर्जा आई और चाय की इच्छा भी मिट गई।
रणाऊ से तनोट बीस किलोमीटर है। पूरा रास्ता ऊंचे नीचे धोरों से भरा पडा है, फिर भी डेढ घण्टे में पहुंच जाने का लक्ष्य बनाया।
आज भी उतना अच्छा सूर्यास्त नहीं देख सके। धोरों की वजह से आज क्षितिज भी नहीं दिख रहा था और हर जगह झाडियां उगी पडी थीं, इसलिये ढलते सूरज को नहीं देख सके।
साढे छह बजे जब अन्धेरा होने लगा तो सिर पर हैड लाइट लगानी पडीं। अभी भी हमें दस किलोमीटर और जाना था। एक ऊंची जगह पर साइकिल रोककर मैं यह काम करने लगा। साथ ही हैलमेट हटाकर मंकी कैप लगानी पडी। मरुस्थल में सर्दियों में जबरदस्त ठण्ड पडती है। इस दौरान नटवर आगे निकल गया था। जब सारा तामझाम करके मैं आगे बढा, नटवर मिला तो उसने कहा- कहां रह गया था तू? मैंने सोचा कि कहीं गिर विर तो नहीं पडा। अगर तेरी यह हैड लाइट न दिखती तो मैं तुझे ढूंढने निकलने ही वाला था।
राजस्थान परिवहन की जोधपुर- तनोट बस निकल गई। यह बस दोनों तरफ से सुबह को चलती है और शाम तक अपने गन्तव्य पर पहुंच जाती है।
बीआरओ ने जगह जगह बडे अच्छे अच्छे स्लोगन लिख रखे हैं। इनमें से एक था- तवांग से तनोट तक भारत एक है। कश्मीर से कन्याकुमारी और कच्छ से कछार तो पढा था, आज तवांग से तनोट भी पढ लिया।
तनोट से करीब चार किलोमीटर पहले एक मन्दिर मिला। नाम ध्यान नहीं। अन्धेरा तो हो ही चुका था। बस यहीं खडी थी और सवारियां मन्दिर में दर्शन करने जा रही थीं। नटवर मुझसे आगे था। मैंने सोचा कि नटवर भी ऐसा ही करेगा लेकिन वह नहीं रुका। मैं भी नहीं रुका। बाहर से ही देवी को प्रणाम कर लिया।
तीन किलोमीटर पहले ही तनोट मन्दिर में बज रहे भजन सुनाई देने लगे। हम कुछ सांस लेने रुक गये। पिछले कई किलोमीटर हम बडी तेजी से आये थे इसलिये काफी थक गये थे। अब जब मंजिल सामने दिखने लगी तो रुकने की इच्छा हो गई। घुप्प अन्धेरा था, मेरी हैड लाइट ही इस अन्धेरे को आंशिक तौर पर भंग कर रही थी। कुछ देर में भजन भी बजने बन्द हो गये। अब जो निबिड सन्नाटा हुआ, उससे आनन्द आ गया। इस आनन्द को और बढने देने के लिये मैं साइकिल से उतर गया, साइकिल एक तरफ खडी कर दी, हैड लाइट बन्द कर दी और नटवर से भी मौन रहने को कह दिया। एक बार तो मन में आया कि यहीं टैंट लगा लें और सन्नाटे का भरपूर आनन्द लें। लेकिन भूख लगी थी, खाना तीन किलोमीटर दूर ही था, इसलिये यहीं रुकने की इरादा त्यागना पडा।
आधे घण्टे यहां रुकने से शरीर ठण्डा हो गया। कुछ देर पहले जो पसीना आ गया था, अब वह शरीर को और भी ठण्डा करता जा रहा था। यहां से जब चले तो हवा लगने से भयंकर ठण्ड लगने लगी। इससे बचने का एक ही तरीका था कि जबरदस्ती तेज तेज पैडल मारे जाये, जिससे शरीर में गर्मी आयेगी। जब तक गर्मी आई, तब तक हम बुरी तरह कांपते रहे। और हां, गर्मी आते ही तनोट भी आ गया।

सानू में सुबह को


रामगढ से दूरियां

अरविन्द खत्री के साथ

तनोट की ओर

इन्दिरा गांधी नहर



इन्दिरा गांधी नहर से थार में खेती सम्भव हुई है।


रामगढ से आठ किलोमीटर आगे और दूर दिखता रामगढ स्थित टीवी टावर।


बीस किलोमीटर तक ऐसी नालीदार सडक पर चलना पडा।




आखिरकार नालीदार सडक खत्म हुई।



सामने दिखता रणाऊ गांव








यह मेरे सिर पर लगी हैड लाइट का प्रकाश है। इसमें पीछे जलती-बुझती लाल बत्ती भी है।

View Larger Map

अगले भाग में जारी...

थार साइकिल यात्रा
1. थार साइकिल यात्रा का आरम्भ
2. थार साइकिल यात्रा- जैसलमेर से सानू
3. थार साइकिल यात्रा- सानू से तनोट
4. तनोट
5. थार साइकिल यात्रा- तनोट से लोंगेवाला
6. लोंगेवाला- एक गौरवशाली युद्धक्षेत्र
7. थार साइकिल यात्रा- लोंगेवाला से जैसलमेर
8. जैसलमेर में दो घण्टे

11 comments:

  1. राम राम भाई, यह यात्रा भी रोमांच से भरपूर है

    ReplyDelete
  2. Very good pics.From Tanot to Bikaner there are 12 temples of Godess.It will be great to see Bhadriya ji near Pokhran.

    ReplyDelete
  3. बढिया यात्रा चल रही है, राम राम

    ReplyDelete
  4. मरुस्थल की अति सुंदर चित्रावली और यात्रा वर्णन - अच्छा लगा।

    ReplyDelete
  5. और हां, शरीर के एक खास हिस्से पर भी काफी झटके लगेंगे।

    ReplyDelete
  6. बाप रे बाप हम तो यहाँ जरा सी रेत पर सायकिल चलाते थे तो झट से गिर-गिर जाते थे ..अब तो सालों-साल हो गए सायकिल चलायें ...बहुत हिम्मत वाले हो भैया ...
    बहुत सुन्दर चित्रण और वृतांत ...

    ReplyDelete
  7. यात्रा तो मजेदार है पर क्या तुम्हे वो रेत वाले कीड़े नहीं मिले जो रेत से बहार आते ही मर जाते है -- मुझे ऐलनाबाद से जयपुर जाते समय ऐसे कीड़े मिले थे जो छोटे काकरोचो जैसे दीखते है और उनके आगे दो सूंड सी होती है काले रंग के होते है --

    ReplyDelete
  8. ये होता है एडवेंचर
    मस्त

    ReplyDelete
  9. neeraj ji.. thar se mera purana rishta hai.... .or ye jo Indira
    Gandhi Nahar hai.. usko m har teen mahine baad paar krta hoo....thar ki jeewandayini ye nahar Humare Fatehabad (Haryana) Distt. ke Tohana Tehsil niwasi Ek Engineer ne banwayi thi...

    baut achha laga apko waha dekh kar......

    ReplyDelete