Monday, December 30, 2019

दूसरा दिन: पोखरण फोर्ट और जैसलमेर वार मेमोरियल




12 दिसंबर 2019...
अपने आप सुबह सुबह ही आँख खुल गई। और खुलती भी क्यों न? हमने खुद ही कल ऐलान किया था कि सुबह 8 बजे हर हाल में सबको गाड़ी में बैठ जाना है। रेस्टोरेंट में पहुँचे, तो देखा कि सबने नाश्ता कर लिया है... बस, हम ही बाकी थे।

गाड़ी में चढ़ा, तो सामने गुप्ता जी दिखे, फिर भी मैंने आवाज लगाई... "गुप्ता जी आ गए क्या??" गुप्ता जी ने हँसते हुए कहा... "हाँ जी, आ गए।"

असल में कल सभी लोग गाड़ी में बैठ जाते और गुप्ता जी को फोन करके बुलाना पड़ता। कई बार ऐसा हुआ। हो सकता है कि एकाध बार किसी को खराब लगा हो, लेकिन यह सबसे युवा जोड़ी थी और फिर गुप्ता जी को आवाज लगाना हमारा नियमित क्रियाकलाप बन गया।

पहले तो ओसियाँ के रास्ते जाने का विचार था, लेकिन अब गाड़ी जैसलमेर वाले सीधे रास्ते पर दौड़ रही थी। बाहर धूप निकली थी, लेकिन रात बूँदाबाँदी हो जाने के कारण ठंडक बढ़ गई थी, इसलिए किसी ने भी खिड़की नहीं खोली। आधे घंटे के अंदर सब के सब सो चुके थे। मैं खुद गहरी नींद में था।

दो-ढाई घंटे बाद आँख खुली। गाड़ी एक होटल के सामने रुकी हुई थी। अभी हम पोखरण पहुँचने वाले थे और यहाँ हमें लंच करना था। भूख तो नहीं थी, लेकिन आलू की सब्जी और छाछ देखकर भूख लग आई।

मैं एक बार पहले भी पोखरण आ चुका था - ट्रेन से। जैसलमेर से जोधपुर वाली पैसेंजर पकड़ी थी। ट्रेन पोखरण में लगभग आधा घंटा रुकी थी और इंजन भी इधर से उधर हुआ था। स्टेशन पर मिर्ची-बड़े बिक रहे थे और मैंने नहीं खाए थे। जबकि आज अगर मुझे कहीं मिर्ची-बड़े दिख जाते हैं, तो मैं फटाक से ले लेता हूँ। मारवाड़ की शान है मिर्ची-बड़ा।

Thursday, December 26, 2019

जोधपुर में मेरा मन नहीं लगा



मैं अनगिनत बार जोधपुर जा चुका हूँ, लेकिन कभी भी यहाँ के दर्शनीय स्थल नहीं देखे। ज्यादातर बार अपनी ट्रेन-यात्राओं के सिलसिले में गया हूँ और एक बार दो साल पहले बाइक से। तब भी जोधपुर नहीं घूमे थे और एक रात रुककर आगे बाड़मेर की ओर निकल गए थे। इस बार भी हम जोधपुर नहीं घूमने वाले थे, लेकिन मित्रों के सुझाव पर जोधपुर लिस्ट में जोड़ा गया। यह यात्रा जैसलमेर और थार मरुस्थल की होने वाली थी, लेकिन सभी के लिए जोधपुर पहुँचना ज्यादा सरल है, इसलिए जोधपुर जोड़ना पड़ा - जोधपुर से शुरू और जोधपुर में खत्म। मैं भूल गया था कि हमारे सभी मित्र हमारे एक आग्रह पर कहीं भी पहुँच सकते हैं। मैंने सभी मित्रों को सुविधाभोगी समझ लिया था और मान लिया था कि अगर हम इस यात्रा को जोधपुर से जोधपुर तक रखेंगे, तो ज्यादा मित्र शामिल होंगे।

हम आजकल दो तरह की यात्राएँ करते हैं - अपनी निजी यात्राएँ और कॉमर्शियल यात्राएँ। यह यात्रा एक कॉमर्शियल यात्रा थी - 11 से 15 दिसंबर 2019... सभी को 11 की सुबह जोधपुर में एकत्र होना था, पूरे दिन जोधपुर के दर्शनीय स्थल देखने थे और रात जोधपुर में रुककर अगले दिन टैक्सी से जैसलमेर के लिए निकल जाना था। यात्रा के लिए 14 मित्रों ने रजिस्ट्रेशन कराया। हमें उम्मीद थी कि दिल्ली से भी कुछ मित्र जाएँगे और वे मंडोर एक्सप्रेस का प्रयोग करेंगे, इसलिए तय किया कि सुबह 8 बजे निर्धारित स्थान पर सभी एकत्र होंगे और आगे बढ़ेंगे।

लेकिन दिल्ली से कोई भी नहीं आया। कुछ लखनऊ से, कुछ रायबरेली से और कुछ मित्र इंदौर से आए। ये सभी एक दिन पहले ही अर्थात 10 को ही जोधपुर पहुँचने वाले थे। कुछ का आग्रह आज भी उसी होटल में ठहरने का था, जिसमें सभी लोग 11 को ठहरेंगे... और कुछ ने अपने ठहरने की व्यवस्था अपने-आप कहीं और कर ली।

Sunday, December 22, 2019

हिंदुस्तान... फुरसत... रविवार... 22 दिसंबर 2019


एक यात्रा स्कूली बच्चों के साथ



जब से हम Travel King India Private Limited कंपनी बनाकर आधिकारिक रूप से व्यावसायिक क्षेत्र में आए हैं, तब से हमारे ऊपर जिम्मेदारी भी बढ़ गई है और लोगों की निगाहें भी। कंपनी आगे कहाँ तक जाएगी, यह तो हमारी मेहनत पर निर्भर करता है, लेकिन एक बात समझ में आ गई है कि यात्राओं का क्षेत्र असीमित है और इसके बावजूद भी प्रत्येक यात्री हमारा ग्राहक नहीं है। अपनी सरकारी नौकरी को किनारे रखकर एक साल पहले जब मैं इस क्षेत्र में उतरा था, तो यही सोचकर उतरा था कि प्रत्येक यात्री हमारा ग्राहक हो सकता है, लेकिन अब समझ में आ चुका है कि ऐसा नहीं है। मैं अपनी रुचि का काम करने जा रहा हूँ, तो यात्राओं में भी मेरी एक विशेष रुचि है, खासकर साहसिक और दूरस्थ यात्राएँ; तो मुझे ग्राहक भी उसी तरह के बनाने होंगे। जो ग्राहक मीनमेख निकालने के लिए ही यात्राएँ करते हैं, वे हमारे किसी काम के नहीं।

खैर, मैं बहुत दिनों से चाहता था कि दस साल से ऊपर के छात्रों को अपनी पसंद की किसी जगह की यात्रा कराऊँ। छात्रों को इसलिए क्योंकि इनमें सीखने और दुनिया को देखने-समझने की प्रबल उत्सुकता होती है। इनके माँ-बाप अत्यधिक डरे हुए लोग होंगे और अपने बच्चों को मेरी पसंद की जगह पर भेजना पसंद नहीं करेंगे, इसलिए अगर कोई स्कूली ट्रिप कराने का मौका लग जाए, तो मजा आ जाए। ज्यादातर माँ-बाप को खुद भी नहीं पता होता कि सेफ्टी क्या होती है और वे बच्चों को ‘ये मत करो, वो मत करो’ कह-कहकर सेफ रहना सिखाते हैं।

और जैसे ही एक स्कूल ने अपने 100 बच्चों की यात्रा के लिए संपर्क किया, तो मैंने सबसे पहले तीर्थन वैली का चुनाव किया। यात्रा जीभी-घियागी क्षेत्र में होनी थी, जो तीर्थन वैली नहीं है, लेकिन तीर्थन वैली से सटा होने के कारण पर्यटन की दृष्टि से इस वैली को भी तीर्थन वैली कह दिया जाता है। इसी कारण से मैं आगे भी जीभी वैली को तीर्थन वैली ही कहूँगा।

मैं बहुत दिनों से ऐसी कोई यात्रा कराना चाह रहा था और नवंबर में मुझे यह मौका मिला... 100 बच्चे... 9वीं और 11वीं कक्षा के...

Saturday, December 21, 2019

एक दिन रीठाखाल में


मुझे तीन दिन बाद दिल्ली पहुँचना था और मैं आज खिर्सू के पास मेलचौरी गाँव में था। यूँ तो समय की कोई कमी नहीं थी, लेकिन अनदेखे पौड़ी को देखने के लिए यह समय काफी कम था। पौड़ी गढ़वाल उत्तराखंड के 13 जिलों में से वह जिला है, जो पर्यटन नक्शे में नहीं है। पौड़ी गढ़वाल जिले का सबसे प्रसिद्ध पर्यटन स्थल लक्ष्मणझूला है, जो आधा टिहरी के साथ साझा हो जाता है और आधा देहरादून के साथ और नाम होता है हरिद्वार का। बद्रीनाथ और केदारनाथ जाने वाले यात्री श्रीनगर से होकर गुजरते हैं, जो पर्यटक स्थल कम, सिरदर्द ज्यादा होता है। अब ले-देकर पौड़ी में लैंसडाउन बचता है और थोड़ा-सा खिर्सू, जो प्रसिद्धि पा रहे हैं। जबकि पौड़ी बहुत बड़ा है और मध्य हिमालय में स्थित होने के बावजूद भी यहाँ 3000 मीटर से भी ऊँची चोटियाँ विराजमान हैं। 2000 मीटर से ऊपर के तो कई स्थान हैं, जो बिल्कुल भी प्रसिद्ध नहीं हैं। और सबसे खास बात - 1500 मीटर ऊँची अनगिनत ‘खालों’ से हिमालयी चोटियों का जो नजारा दिखता है, वो अविस्मरणीय है।

आज मुझे 2400 मीटर ऊँची चौंरीखाल नामक ‘खाल’ से होते हुए थलीसैंण जाना था। कल थलीसैंण से लैंसडाउन की सड़क नापनी थी और परसों दिल्ली पहुँचना था।

तभी सत्य रावत जी का फोन आया - “सुना है तुम खिर्सू में हो?”
“हाँ जी, सही सुना है।”
“आगे का क्या प्लान है?”
“आज थलीसैंण रुकूँगा।”
“हम्मम्म... इसका मतलब चौंरीखाल से होकर जाओगे।”
“हाँ जी।”
“तो एक काम करो... थलीसैंण जाने की बजाय रीठाखाल आ जाओ।”
“उधर कौन है?”
“अरे, मैं ही हूँ...”
“अरे वाह... तो फटाफट फोन काटो... मैं पहुँच रहा हूँ रीठाखाल।”
“कैसे-कैसे आओगे?”
“गूगल मैप से।”
“गूगल तो तुम्हें मेन रोड से लाएगा... तुम ऐसा करो... कि चौंरीखाल से चोबट्टाखाल पहुँचकर फोन करो... आगे का रास्ता तुम्हें तभी बताऊँगा।”

मैंने फटाफट गूगल मैप खोला। दूरी और समय का अंदाजा लगाने लगा। मुझे पहाड़ों में रात में बाइक चलाने में कोई दिक्कत नहीं होती है, लेकिन नवंबर के आखिर में मैं इस क्षेत्र में रात में बाइक नहीं चलाना चाहता था। और 2000 मीटर से ऊपर तो कतई नहीं। कारण - ब्लैक आइस का डर।

Friday, December 20, 2019

उत्तराखंड की जन्नत है खिर्सू



18 नवंबर 2019
मैं बीनू के यहाँ जयालगढ़ में पड़ा हुआ था और पड़ा ही रहता, अगर टैंट पर धूप न आती। धूप आने से टैंट ‘ग्रीन हाउस’ बन गया और अंदर तापमान तेजी से बढ़ गया। आँख खुल गई। नाश्ते के लिए आलू के पराँठे बने हुए थे। गुनगुनी धूप में बैठकर तिवारी जी के साथ आलू के पराँठे खाने का अलग ही आनंद था।

बाइक की सर्विस करानी थी और धुलाई भी। बल्कि अगर सर्विस न होती, तब भी बात बन जाती... लेकिन धुलाई जरूरी थी। पास में ही धुलाई सेंटर था और उसके पास सर्विस सेंटर। लेकिन मैं धुलाई वाले से सर्विस की बात करने लगा और उसने मुझे आगे भेज दिया। आगे सर्विस वाले से धुलाई की भी बात की, तो उसने सुझाव दिया कि पहले सर्विस करा लो, वापसी में जाते हुए धुलाई कराते चले जाना।

एक घंटे बाद वापस आया, तो धुलाई वाले का शटर गिरा हुआ था। इस प्रकार आज बाइक की सर्विस तो हो गई, लेकिन धुलाई फिर भी न हो सकी।

लगता है कहीं नाले में घुसाकर खुद ही धोनी पड़ेगी।

दोपहर बाद मैं खिर्सू के लिए निकल पड़ा। खिर्सू इसलिए क्योंकि वहाँ अपना एक मित्र आदित्य निगम भी पहुँच चुका था। आदित्य ने अभी-अभी आर्किटेक्ट की पढ़ाई पूरी की है और घुमक्कड़ तो एक नंबर का है। हम दोनों की अच्छी बनती है, इसका अंदाजा इस बात से ही लगाया जा सकता है कि हम बात-बात में एक-दूसरे को नीचा दिखाने की कोशिश करते हैं और बुरा भी नहीं मानते।

Thursday, December 19, 2019

बीनू कुकरेती का The Jayalgarh Resort



16 नवंबर 2019
आज मैं करोड़ों वर्ष बाद ऋषिकेश से देवप्रयाग वाली सड़क पर बाइक चला रहा था। इससे पहले तब गया था, जब चारधाम परियोजना का काम शुरू नहीं हुआ था। अब चारधाम परोयोजना का काम जोर-शोर से चल रहा था, लेकिन ज्यादातर सड़क बन चुकी थी। बाइक फर्राटे से चलती गई। हाँ, कहीं-कहीं ज्यादा जोर-शोर से काम होता, तो कई जगहों पर गाड़ियों की एक-एक किलोमीटर लंबी लाइन मिली। ऐसे में बहुत सारे ड्राइवर रोंग साइड पर चलकर अपनी गाड़ी को सबसे आगे ले जाते हैं और सामने से आने वाली गाड़ियों का रास्ता बंद कर देते हैं। मैं ऐसे सभी ड्राइवरों को गालियाँ देता हुआ रोंग साइड में चलकर अपनी बाइक को सबसे आगे ले जाकर खड़ी कर देता।

आज मैं जा रहा था बीनू कुकरेती के यहाँ। वह पौड़ी गढ़वाल जिले के बरसूड़ी गाँव का रहने वाला है और कई सालों से दिल्ली में ट्रांसपोर्ट का धंधा कर रहा था। पूरा परिवार दिल्ली में ही रहता है, लेकिन बीनू का मन पहाड़ों में लगता है, तो वह अपना धंधा छोड़कर पहाड़ में आ गया और श्रीनगर के पास जमीन खरीदकर एक रिसोर्ट बना लिया। मैं भी कई दिनों से हरिद्वार-देहरादून क्षेत्र में ही मंडरा रहा था, तो बीनू कई बार श्रीनगर आने को कह चुका था। आज मैं वहीं जा रहा था।

श्रीनगर से दस किलोमीटर पहले जयालगढ़ नामक स्थान है। यहीं पर The Jayalgarh Resort नाम से बीनू का ठिकाना है। उसने पहले ही बता दिया था कि सड़क के किनारे नीले रंग का बोर्ड लगा मिलेगा, लेकिन मेरा भरोसा गूगल मैप पर ज्यादा होता है और हमेशा यह मेरे भरोसे पर खरा उतरता है। अंधेरा हो चुका था और नीले रंग का बोर्ड मुझे नहीं दिखा। अगर गूगल गर्ल न चिल्लाती, तो मैं श्रीनगर पहुँच गया होता।

Wednesday, December 4, 2019

आप अपनी नौकरी कब छोड़ रहे हो?

“अनदेखे पहाड़” किताब के विमोचन के समय नरेंद्र से मुलाकात हुई... मैं उससे मिलने की बड़ी प्रतीक्षा कर रहा था... खासकर कुछ बड़े और जिम्मेदार लोगों के सामने...
“नरेंद्र, आज तुम यहीं रुक जाओ...”
“नहीं नीरज भाई, मन तो है रुकने का, लेकिन कल मुझे ड्यूटी जाना है..."
“मन है, तो छुट्टी मार लो...”
“नहीं, बिल्कुल भी छुट्टी नहीं मार सकता..."

मैंने डॉक्टर सुभाष शल्य जी को आवाज लगाई... “सर, इधर आना जरा... नरेंद्र का ब्रेनवाश करना है..."
वे एकदम लपककर आए... “हाँ हाँ, करो... मैं इसका ब्रेनवाश करने में फेल हो चुका हूँ... अब तुम कोशिश करो..."

“नरेंद्र, तुम्हारे हिस्से कितनी जमीन आएगी गाँव में?"
“तकरीबन 30 बीघे..."
“पिछले साल कितना तेल बेचा था??" पीली सरसों का तेल बेचने के कारण मैं कभी-कभार नरेंद्र को तेली भी कह देता हूँ...
“1500 लीटर"
“और इस साल?”
“3000 लीटर..."
“और तेल के अलावा गुड़ व आसाम की स्पेशल चाय भी बेच रहे हो.."
“हाँ...”
“नौकरी से सैलरी कितनी मिलती है??”
“यही कोई 15-16 हजार...”
“यानी 500 रुपये रोजाना"
“हाँ..."
“बस्स?? 500 रुपये रोजाना??... वो भी दिन और रात की शिफ्ट ड्यूटी??... यह तो तुम बहुत बड़ा घाटा उठा रहे हो..."