Latest News

आप अपनी नौकरी कब छोड़ रहे हो?

“अनदेखे पहाड़” किताब के विमोचन के समय नरेंद्र से मुलाकात हुई... मैं उससे मिलने की बड़ी प्रतीक्षा कर रहा था... खासकर कुछ बड़े और जिम्मेदार लोगों के सामने...
“नरेंद्र, आज तुम यहीं रुक जाओ...”
“नहीं नीरज भाई, मन तो है रुकने का, लेकिन कल मुझे ड्यूटी जाना है..."
“मन है, तो छुट्टी मार लो...”
“नहीं, बिल्कुल भी छुट्टी नहीं मार सकता..."

मैंने डॉक्टर सुभाष शल्य जी को आवाज लगाई... “सर, इधर आना जरा... नरेंद्र का ब्रेनवाश करना है..."
वे एकदम लपककर आए... “हाँ हाँ, करो... मैं इसका ब्रेनवाश करने में फेल हो चुका हूँ... अब तुम कोशिश करो..."

“नरेंद्र, तुम्हारे हिस्से कितनी जमीन आएगी गाँव में?"
“तकरीबन 30 बीघे..."
“पिछले साल कितना तेल बेचा था??" पीली सरसों का तेल बेचने के कारण मैं कभी-कभार नरेंद्र को तेली भी कह देता हूँ...
“1500 लीटर"
“और इस साल?”
“3000 लीटर..."
“और तेल के अलावा गुड़ व आसाम की स्पेशल चाय भी बेच रहे हो.."
“हाँ...”
“नौकरी से सैलरी कितनी मिलती है??”
“यही कोई 15-16 हजार...”
“यानी 500 रुपये रोजाना"
“हाँ..."
“बस्स?? 500 रुपये रोजाना??... वो भी दिन और रात की शिफ्ट ड्यूटी??... यह तो तुम बहुत बड़ा घाटा उठा रहे हो..."

“देखो नरेंद्र, तुम्हारे पास गाँव में अपना घर है... बहुत बड़ा घर... और तुम नोयडा में एक गंदे-से मकान के एक गंदे-से छोटे-से कमरे में रहते हो... कमरे के एक कोने में छोटी-सी किचन है...
तुम एक नंबर के मेहनती इंसान हो... अगर तुम्हें कहा जाए कि लद्दाख जाकर दो दिनों में फलां काम करके लौट आना है, तो तुम तय समय पर काम पूरा कर दोगे... फिर क्यों 500 रुपये रोजाना की दिहाड़ी पर अपनी जिंदगी खपा रहे हो??...
अभी तुम्हारी एक छोटी-सी बच्ची है... इसका कोई खर्चा नहीं है... तुम नौकरी छोड़ सकते हो... और यह प्राइवेट नौकरी है... अगर गाँव रास नहीं आएगा, तो तुम फिर से दो-चार साल बाद फिर से नौकरी पकड़ सकते हो...
500 रुपये रोजाना की दिहाड़ी से तुम्हें साल में 2 लाख रुपये भी नहीं मिलते... क्या तुम्हारी 30 बीघे जमीन तुम्हें इतने पैसे भी नहीं दे सकती??...
देखो नरेंद्र, तुम 5000 रुपये रोजाना कमाने वाले इंसान हो... 500 रुपये की नौकरी करके तुम अपना रोज का 4500 रुपये का नुकसान कर रहे हो...”

“लेकिन..."

“लेकिन कुछ नहीं... कुछ साल पहले तुम गाँव से बड़ा आदमी बनने के लिए शहर आए थे... अब तुम बड़े आदमी बन चुके हो... गाँव लौट जाओ... लोग क्या कहेंगे, इसकी चिंता ही है ना??... तो कहने दो...”
“लेकिन नीरज भाई, मुझे इंग्लिश नहीं आती... और यह सब काम करने के लिए इंग्लिश जरूरी है..."
“अबे, इंग्लिश की प्रशंसा किसके सामने कर रहे हो??... मेरे सामने??... इंग्लिश कहीं भी जरूरी नहीं है... खेत में ट्रैक्टर चलाने के लिए किसी इंग्लिश की आवश्यकता नहीं है... और इंग्लिश बोलने से भैंसे भी दूध कम देती हैं... भैंसों से भी हिंदी ही बोलनी पड़ती है..."
“लेकिन मुझे इंटरनेट और ऑनलाइन की भी कोई जानकारी नहीं है..."
“क्या कहा??... इंटरनेट और ऑनलाइन की जानकारी नहीं है??... तो इस साल 3000 लीटर तेल कैसे बेचा??... तुमने सारा तेल ऑनलाइन ही बेचा है... अब तुम झूठे बहाने बना रहे हो... तुम असल में पूरी जिंदगी उस गंदे कमरे में ही रहना चाहते हो... कुछ दिन बाद तुम होम-लोन लोगे, ताकि तुम नोयडा-दिल्ली की गंदी हवा में स्थायी रूप से बस सको... और अगर एक बार लोन ले लिया, तो इसे जिंदगी में कभी नहीं उतार पाओगे... फिर तुम अपनी 500 रुपये की दिहाड़ी को 600 रुपये तक पहुँचाने के लिए और ज्यादा काम करोगे... गधे की तरह..."

“देखो, अब तुम नोयडा से सबकुछ समेटकर गाँव लौट जाओ... अभी तुम तीन भाइयों का एक साझा घर है... लेकिन तुम्हारे हिस्से में वह पूरा घर आया है... तुम्हारे भाई अपने-अपने घर अलग स्थान पर बना भी रहे हैं... जल्दी ही वे चले जाएँगे और तुम अपने घर में राजा बनकर रहोगे... अकेले तुम्हारे हिस्से 30 बीघे जमीन आएगी... अगर तुम कुछ भी नहीं करोगे... मतलब कुच्छ भी नहीं करोगे... तब भी यह जमीन तुम्हें नोयडा की गंदी नौकरी से ज्यादा पैसे दे देगी...
और अगर तुम नोयडा में ही रहना चाहते तो तुम्हारी खुशी... रहो... लेकिन उसमें से एक तिहाई खेत मुझे दे दो... चाहो तो बेच दो या लीज पर दे दो... लेकिन ध्यान रखना, दो साल बाद जब मैं उन खेतों से करोड़पति बन जाऊँगा, तो तुम यह नहीं कहोगे कि चालाक नीरज ने सीधे-सादे नरेंद्र को ठग लिया..."

खैर, नरेंद्र चला गया... उसने हमारी हर बात पर सहमति में गर्दन हिलाई... देखते हैं अब वह कब 500 रुपये की नौकरी का मोह छोड़ पाता है...
...
रात साढ़े बारह बजे मोबाइल बजा... गोलू का फोन था... उसने दिल्ली शास्त्री पार्क स्थित हमारी कालोनी के पहरेदार से बात कराई और कालोनी में प्रवेश कर गया... गोलू मेरा भतीजा है... पिछले साल वह बारहवीं में फेल हो गया था... इस साल उसने 66% अंकों के साथ फर्स्ट डिवीजन से बारहवीं पार कर ली... घर की आर्थिक स्थिति उतनी अच्छी नहीं है... उसके पिताजी यानी मेरे भाई गाँव से 10 किलोमीटर दूर एक फैक्टरी में शिफ्ट में काम करते थे और वे हमेशा साइकिल से आना-जाना करते थे... जाड़ा, गर्मी, बरसात, दिन, रात...
आगे पढ़ने के लिए गोलू ने प्राइवेट फार्म भर दिया... स्कूल-कॉलेज जाना बंद हो गया, तो दिल्ली में कोई नौकरी ढूँढ़ी... नौकरी मिल भी गई और फिलहाल वह हमारे यहाँ रुका हुआ है... वह कभी भी घर से बाहर नहीं निकला है... कभी भी किराये पर नहीं रहा है... कभी भी खुद भोजन बनाकर नहीं खाया है... एक बार सैटल होने और शहर की जिंदगी में रमने के बाद वह अपना कोई ठिकाना ढूँढ़ लेगा... वह सुबह 8 बजे जाता है और रात 9 बजे लौटता है... लेकिन आज उसे ज्यादा देर तक काम करना पड़ा और अब साढ़े बारह बजे लौटा...

“गोलू को बैठकर समझाना पड़ेगा...” मैंने दीप्ति से कहा...
“हाँ..."
दिल्ली आते ही गोलू से पूछा... “ये बता, तुझे नौकरी करने को किसने कहा?"
“किसी ने नहीं..."
“तो मेरठ में भी कोई नौकरी ढूँढ़ सकता था तू..."
“नहीं चाचाजी, उधर कुछ नहीं है... गाँव में भी अब कुछ नहीं रहा..."
“अच्छा??... जमीन कितनी है तेरे पापा के हिस्से में??"
“कुछ भी जमीन नहीं है..."
“अबे, जो मैं पूछ रहा हूँ, सीधे-सीधे बता...”
“होगी यही कोई पाँच-छह बीघे..."
“और यह सारी जमीन तेरे ही हिस्से आएगी..."
“हाँ जी..."
“अभी क्या बो रखा है?”
“कुछ में गन्ना बो रखा है और कुछ में गेहूँ और कुछ में हरा चारा..."
“गाय-भैंस??”
“दो गायें हैं।”
“दूध देती हैं?”
“हाँ जी।”
“कितना?”
“यही कोई 10-12 लीटर..."
“यहाँ सैलरी कितनी है?”
“18000 है, लेकिन कट-कुटाकर 16000 मिला करेंगे..."
“यानी 500 रुपये रोज के..."
“हाँ जी..."
“गन्ना कितने का बिक जाएगा??”
“दो-ढाई लाख का..."
“यानी तेरी पूरे साल की सैलरी से ज्यादा।”
“..."
“फिर कुछ न कुछ गेहूँ भी बिकेगा... कुछ चावल भी बिकता होगा... हरा चारा भी बेचते होंगे... दूध तो रोज का 8 लीटर जा ही रहा होगा... 30-35 रुपये लीटर... यानी 250 रुपये रोजाना...”
“हाँ जी..."
“अब तेरे कंधों पर इन सब चीजों को मेनटेन करने की जिम्मेदारी आ चुकी थी और तू शहर आ गया... वहाँ तेरे न होने से उत्पादन पर बहुत बुरा असर पड़ेगा... गाँव में तुझे रोज के 1000 रुपये मिल रहे थे... और तू उसे छोड़कर 500 रुपये कमाने शहर आ गया...”
“लेकिन चाचाजी... खेतों को नीलगाय और जंगली सूअर बहुत नुकसान पहुँचा रहे हैं..."
“शहर में तुझे किराये पर कमरा लेना पड़ेगा..."
“आँधी-तूफान, ओले-बारिश से भी नुकसान होता है..."
“शहर में तुझे पानी भी खरीदकर पीना पड़ेगा..."
“...”
“नीलगाय का इलाज है कुछ??”
“हाँ जी... है..."
“ओले-बारिश का इलाज है कुछ?”
“..."
“फसल का उचित रेट नहीं मिल रहा... उसका इलाज है कुछ??”
“नहीं है..."
“है... सबका इलाज है..."

“अमेजन पर कभी कुछ खरीदा है??”
“हाँ जी... खरीदा है..."
“तो सर्च कर... गुड़..."
उसने सर्च किया... 150 रुपये किलो...
“और अगर गुड़ बनवाते समय इसमें मुट्ठी भर मूंगफली के दाने मिला देगा, तो देख, यह 280 रुपये किलो बिकेगा... रेटिंग भी बहुत अच्छी है..."
“अब सर्च कर गोबर...”
“कर लिया... 100 रुपये का है...”
“नहीं... 100 रुपये में 10 उपले हैं हथेली-भर साइज के... रेटिंग भी बहुत अच्छी है... तू अगर 90 कर देगा, तो सब तुझसे खरीदेंगे... और घर बैठे पैक करना है और डाकखाने जाकर पार्सल कर देना है...”

“आजकल बाजार में क्या भाव है गुड़?”
“40 रुपये किलो..."
“मेरा एक दोस्त है नितिन काजला... तेरे गाँव से एक घंटे दूर भटीपुरा का है... जैविक खेती करता है... जैविक गन्ना उगाता है... फेसबुक और यूट्यूब पर लगातार उपस्थित रहता है... गुड़ 100 रुपये किलो और शक्कर 120 रुपये किलो बेचता है... और पता है??... उसके पास हमेशा एडवांस ऑर्डर आते हैं... एडवांस पेमेंट आते हैं... अप्रैल में जो गेहूँ निकलेगा, वो सारा का सारा बिक चुका है और उसके पास पेमेंट भी आ चुका है... अब उसे नीलगायों से बचाने का भी बंदोबस्त करना पड़ेगा और ओलों से बचाने का भी और बीमारियों से भी बचाने का भी...”

“और सुन... तेरे गाँव में दस साल पहले एक-लेन की पतली-सी सड़क थी... तब इसे सरधना रोड कहते थे... चार-पाँच साल पहले टू-लेन की सड़क थी... अब फोर-लेन की सड़क है... अब इसे मेरठ-शामली रोड कहा जाता है... और सिक्स-लेन की प्लानिंग चल रही है... मेरठ से करनाल सिक्स-लेन बनते ही यह एक बहुत बड़े महत्व का हाईवे बन जाएगा, जो पूर्वी भारत और पंजाब को सीधा जोड़ेगा... तब इसे मेरठ-करनाल हाईवे कहा जाएगा... सोलह-लेन का दिल्ली-मेरठ एक्सप्रेस हाईवे बन रहा है... दिल्ली-मेरठ रीजनल रेल का काम चल रहा है... गाँव से 3 किलोमीटर दूर गंगनहर है, उसकी पटरी पर फोर-लेन की सड़क बनाई जाएगी... गाँव से 10 किलोमीटर दूर रेलवे स्टेशन है और 4 किलोमीटर दूर से डेडीकेटिड फ्राइट कोरीडोर की रेलवे लाइन निकलेगी... 5 किलोमीटर दूर से शहर की सीमा शुरू हो जाती है और 12 किलोमीटर दूर मेरठ का सिटी सेंटर बेगमपुल और आबू लेन है... अगर आज भी तुम अपने घर को किरायेदारों के लिए खोल दोगे, तो तुम्हारी पसंद के रेट पर किरायेदार आने लगेंगे... आज भी...
और तू कह रहा है कि गाँव में कुछ नहीं है... अबे, कुछ मत कर... जमीन पे कुंडली मार कर बैठ जा... तू अगर शहर चला जाएगा, तो जमीन बिकेगी... करोड़ों-अरबों की जमीन है तेरे पास...
जितनी तेरी सैलरी है, उससे ज्यादा तो अभी भी जमीन दे रही है... वो भी तब, जब तुम लोग वही परंपरागत तरीके से काम कर रहे हो... अगर आधुनिक तरीके से काम करने लगोगे, तो जमीन सोना उगलेगी... नितिन के पास भटीपुरा जा... दो महीने उसके खेत में फावड़ा चला... उसके डंगरों की सेवा कर... दो महीने में तू वो सब सीख जाएगा, जिसकी आज के बदलते दौर में किसी भी किसान को आवश्यकता होती है...”

“लेकिन चाचाजी, फसल के रेट भी तो ठीक नहीं मिलते... गन्ने का पिछले साल का भी भुगतान नहीं हुआ है..."
“सोशल मीडिया का इस्तेमाल करना सीख... आज का दौर सोशल मीडिया का है... नितिन का उदाहरण मैंने दिया... एक और मित्र है नरेंद्र... उसने पिछले साल 1500 लीटर पीली सरसों का तेल केवल सोशल मीडिया पर बेचा... इस साल पता है उसने कितना तेल बेचा?... 3000 लीटर... तीन हज्जार लीटर... केवल तेल... वो भी केवल फेसबुक के माध्यम से... अगर उसे एक लीटर पर 50 रुपये का भी लाभ हुआ होगा, तो बता पूरे साल में कितना लाभ हुआ??..."
“पंद्रह हजार रुपये..."
“तेरी ऐसी की तैसी... डेढ लाख रुपये का लाभ हुआ... वो आसपास के गाँवों से भी सरसों इकट्ठी करता है और उसकी पिराई करके तेल निकलवाता है... वो भी तेरी तरह पौने दो लाख सालाना की नौकरी करता है... अगर वो नौकरी न कर रहा होता, तो उसका यह रोजगार बहुत आगे बढ़ चुका होता...”

“जिस दिन सोशल मीडिया के माध्यम से तेरी पहली बिक्री हो गई, उस दिन समझ जाना कि अब तुझे साँस लेने की भी फुरसत नहीं मिलने वाली... तुझे अपनी फसल लेकर बाजार जाने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी... बाजार खुद तेरे पास आएगा... बस, तुझे एक रेपूटेशन बनानी पड़ेगी..."

“अच्छा, एक बात बता... अब अगर तू गाँव वापस जाता है, तो तेरे सामने क्या-क्या दिक्कतें आएँगी?..”
“सबसे पहली दिक्कत तो यही आएगी कि शुरू कहाँ से करना है..."
“तो उसके लिए नितिन के पास जा... दो महीने... उसकी उम्र भी ज्यादा नहीं है... मुझसे भी छोटा है वो... अच्छी नौकरी थी उसकी... छोड़कर गाँव आया... घरवालों ने जैविक खेती करने में साथ नहीं दिया, तो अपना हिस्सा अलग किया और जैविक खेती शुरू की... आज हालत ये है कि बाकी सबकी फसल खेतों में खड़ी रहती है और उसकी फसल कई महीने एडवांस में बिक जाती है... उसके पास जाने से तुझे रास्ता मिल जाएगा... अभी तुम्हें पैसों की उतनी सख्त आवश्यकता भी नहीं है... दो साल करके देख... अगर काम रास न आया, तो शहर आ जाना... अभी भी प्राइवेट नौकरी है... तब भी प्राइवेट नौकरी मिल जाएगी...”

“लेकिन गाँव वापस जाने पर तेरे सामने सबसे बड़ी समस्या कुछ और ही होगी..."
“क्या होगी??”
“कि तू नीरज के कहने पर दिल्ली की नौकरी छोड़कर आ गया है, यह सुनते ही तुझे लठ पड़ेंगे... क्योंकि असामाजिक होने, हमेशा अपनी मनमानी करने, हमेशा घूमते रहने और प्रेम विवाह करने के कारण गाँव में और घर-परिवार में मेरी कोई इज्जत नहीं है... उन्होंने तुझे मेरे पास इसलिए भेजा था ताकि तू कुछ दिन आराम से रहकर दिल्ली के माहौल के अनुकूल हो जाए और फिर कहीं किराये पर अपना कमरा ले ले... इसका अगर कोई विकल्प होता, तो वे तुझे मेरे पास कभी नहीं भेजते... अब अगर उन्हें पता चलेगा कि दो दिन मेरे साथ रहकर तू भी ‘बिगड़’ गया है, तो लठ से तेरा स्वागत होगा...
सब लोग तेरे विरोध में होंगे और तू अकेला पड़ जाएगा... तुझे समझ नहीं आएगा कि अब क्या करूँ और कैसे करूँ... रास्ता मैंने बता दिया... चलना या न चलना तुझे है... कितनी मजबूती से डटता है... या नहीं डटता है.. यह तेरा डिसीजन है...
और हाँ... अगर तुझे शहर में ही नौकरी करनी है, तो गाँव वाली जमीन मुझे दे देना... चाहे तो बेच देना... या लीज पर दे देना... लेकिन दो साल बाद जब मैं करोड़पति हो जाऊँगा, तो ये मत कहना कि चालाक नीरज ने सीधे-सादे गोलू को ठग लिया...”

...
आज की कहानी ये है कि नरेंद्र अपने बच्चों को अकेला उस गंदे-से कमरे में छोड़कर नाइट शिफ्ट करने गया है... गोलू अभी अभी साढ़े दस बजे लौटा है और सुबह सात बजे का अलार्म लगाकर सो गया है... मैंने अमेजन पर आए सभी ऑर्डर निपटा दिए हैं... कुछ भेज दिए हैं, कुछ पैक कर दिए हैं... 11 दिसंबर से जोधपुर-जैसलमेर की ट्रिप शुरू होने वाली है, तो दीप्ति ने सब गर्म कपड़े धो दिए हैं...

इस पोस्ट को पढ़कर कुछ लोग मुझे शाबाशी देंगे, कुछ नाराज भी होंगे, कुछ गरियाएँगे, कुछ चढ़ाएँगे... और मैं इन सबसे तटस्थ रहकर सबके कमेंट्स पढ़ता रहूँगा...

15 comments:

  1. कोई हल नहीं निकला

    ReplyDelete
  2. आप तो गढ़वाल घूमे हो, वहां के बारे मे बता दीजिए कुछ, मै भी दिल्ली से जाना चाहता हूं

    ReplyDelete
    Replies
    1. बीनू कुकरेती से मिल्जिए एक बार...
      https://www.facebook.com/vijay.kukreti.5

      Delete
  3. सलाह तो सही दिया है आपने। लेकिन युवाओं का शहरों में आना सिर्फ़ बेरोजगारी या खेती के झंझटों से नहीं कुछ सामाजिक आकांक्षाओं के कारण भी है। पढ़ें लिखे लड़के-लड़कियों को शहरों की चकाचौंध खींचती है। जिसके लिए शहर के 10*10 के कमरे में 10साल बिता कर 10बिमारियों का तोहफा ले कर गांवों की जमीन बेचने आप्शन दिमाग में पाले जिंदगी काटने का क्रम चलता रहेगा।

    ReplyDelete
  4. बहुत अच्छा और उज्जवल भविष्य का सुझाव। लेकिन अनेक कारणों से इसे इम्ल्पीमेंट नहीं किया जा सकता है।

    ReplyDelete
  5. बिल्कुल सही बात बोली आपने, उन लोगो को,

    ReplyDelete
  6. नीरज जी कोई भी रिस्क लेने को तैयार नहीं है जिसने रिस्क लिया वो तो समझो बस निकल लिया। मैं भी जैविक खेती करना चाहता हूं पर वाराणसी शहर में रहता हूं और खेत नहीं है पर लिज पर लेकर करना है लेकिन अभी जिन्दगी में बहानों (excuse) का दौर चल रहा है,कड़ा निर्णय तो लेना ही पडे़गा?

    ReplyDelete
  7. बहुत ही सुन्दर लिखा नीरज भाई, बिलकुल ऐसा लग रहा है मेरे विचरों को आपने शब्दों में पिरोया है. मैं हमेशा अपने आसपास के लोगों को यही बोलता रहा हूँ. कई लोगों को तो मेरी बात समझ नहीं आती और कई को एक-दो साल के बाद मेरी बात का मतलब समझ आता है जब वो नौकरी के चक्कर में कोल्हू का बैल बन चूका होता है.

    बात यह है कि लोग प्लानिंग तो बहुत करते हैं, पर पहला कदम उठाने की हिम्मत नहीं कर पाते जिससे जिन्दगी नरक बना डालते हैं. एक अनजाना सा डर हर किसी के दिलोदिमाग में होता ही है, पर उससे आगे बढ़कर पहला कदम बढ़ाना ही सबसे मुश्किल काम है. और पहला कदम उठा लिया तो बस आसमां के आगे जहां और भी है.

    ReplyDelete
  8. सोचो प्यारों सोचो वर्ना यूँ ही बीत जाओंगे तुम भी और यह जीवन भी

    ReplyDelete
  9. नीरज जी के बताये राह पर चल कर अब कई लोगों की नौकरी छूटने वाली है या वे खुद नौकरी छोड़ने वाले हैं। मेरा सुझाव है कि फेसबुक पर नीरज जी एक " नीरज की खेती किसानी" नाम का एक ग्रुप बनायें। उस पर जानकारी शेयर करें और खेती किसानी छोड़कर शहर भागने वाले युवा को एक नया फोरम दें। एक दम पर्यटन वाले ग्रुप की तरह। हाँ वह बात अलग है कि लोग सोचेंगे कि नीरज जी के बात में आकर घुमक्कड़ी करें या खेती करें। शायद इससे कुछ किसान आत्महत्या करने से बच भी जाएं। मेरा यह आईडिया कठिन तो है। सचमुच में नीरज जी के बात में आकर बहुत सारे लोग नौकरी छोड़ देंगे और गाव की तरफ लौटने लगेंगे।����������

    ReplyDelete
  10. यही करना पड़ेगा, आज नहीं करेंगे तो पिछड़ जाएंगे।

    ReplyDelete
  11. नीरज भाई, बात तो सौ टके शुद्ध है पर पहला कदम ही सबको रोक लेता है यह सब करने को।

    ReplyDelete
  12. सहमत हूँ॥ मेरी ज़िंदगी मैं भी गोलु और नरेंद्र जैसे बहुत लोग है.... उनको सारा हिसाब तो नहीं समझा पाया लेकिन बहुत कोशिश की की समझ जाए। खैर, ये बताइये अगर किसी के पास जमीन न हो और दिल्ली के अलावा कहीं कोई घर ही न हो तो क्या विकल्प होगा ?
    वैसे तो काम कुछ भी कर सकता हूँ.... लेकिन अब शौक ऐसे पाल लिए है की उनको छोड़ नहीं पा रहा हूँ। आपकी तरह बनना बहुत कठिन है। सोच तो रहा था की उत्तराखंड मैं ही कहीं जमीन खरीद लूँ और उसपर कोई छोटा मोटा होटल खोल लूँ पर पाँव आगे नहीं बढ़ पा रहे।
    वैसे ब्लॉग भी लिखते रहिए और हो सके तो किताब के कुछ अंश भी डाल दिया करे ।

    ReplyDelete

मुसाफिर हूँ यारों Designed by Templateism.com Copyright © 2014

Powered by Blogger.
Published By Gooyaabi Templates