रोहांडा से कमरुनाग

June 18, 2014
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12 मई 2014, सोमवार
बताते हैं, पांच हजार साल पहले कोई रतन यक्ष था। उसने भगवान विष्णु को गुरू मानकर स्वयं ही प्रचण्ड युद्धकला सीख ली थी। उसे जब पता चला कि महाभारत का युद्ध होने वाला है, तो उसने भी युद्ध में जाने की ठानी। लेकिन वह चूंकि प्रचण्ड योद्धा था, उसने तय किया कि जो भी पक्ष कमजोर होगा, वह उसकी तरफ से लडेगा। यह बात जब कृष्ण को पता चली तो वह चिन्तित हो उठे क्योंकि इस युद्ध में कौरव ही हारने वाले थे और रतन के कारण इसमें बडी समस्या आ सकती थी। कृष्ण एक साधु का रूप धारण करके उसके पास गये और उसके आने का कारण पूछा। सबकुछ जानने के बाद उन्होंने उसकी परीक्षा लेनी चाही, रतन राजी हो गया। कृष्ण ने कहा कि एक ही तीर से इस पीपल से सभी पत्ते बेध दो। इसी दौरान कृष्ण ने नजर बचाकर कुछ पत्ते अपने पैरों के नीचे छुपा दिये। जब रतन ने सभी पत्ते बेध दिये तो कृष्ण ने देखा कि उनके पैरों के नीचे रखे पत्ते भी बिंधे पडे हैं, तो वे उसकी युद्धकला को मान गये। जब उन्होंने उसके गुरू के बारे में पूछा तो यक्ष ने भगवान विष्णु का नाम लिया। चूंकि कृष्ण स्वयं विष्णु के अवतार थे, तो उन्होंने उसे अपना विराट रूप दिखाया। यक्ष अपने गुरू के सामने नतमस्तक हो गया। कृष्ण ने अपनी चाल चली और गुरूदक्षिणा में रतन का सिर मांग लिया। रतन ने ऐसा ही किया। लेकिन उसकी इच्छा थी कि वह भी महाभारत का युद्ध अपनी आंखों से देखे, तो कृष्ण ने उसके सिर को वर्तमान कमरुनाग स्थान पर रख दिया।

तरुण भाई ने बताया कि ऐसी कथा तीन पात्रों की है- एक तो घटोत्कच के पुत्र की, दूसरी खाटू श्याम की और तीसरी यह। अब वे यह पता लगाना चाह रहे हैं कि इन तीनों में क्या सम्बन्ध है। खैर, जो हो।
रोहाण्डा से कमरुनाग की दूरी छह किलोमीटर है। रोहाण्डा समुद्र तल से 2140 मीटर की ऊंचाई पर है जबकि कमरुनाग 2860 मीटर पर। इससे ही अन्दाजा लगाया जा सकता है कि चढाई काफी तेज है। दो-दो बडे-बडे आलू के परांठे खाकर हम साढे नौ बजे रोहाण्डा से चल पडे। मैंने यहीं से अपनी ट्रैकिंग पोल निकाल ली थी। उन दोनों को भी कहीं से किसी डण्डे का इंतजाम करने को कह दिया। रास्ते में कहीं मिलेगा, ले लेंगे। पैदल यात्रा शुरू करते ही एक स्कूल है। यहां काफी बच्चे थे। एक बार बच्चों से रास्ता पूछा, उन्होंने तुरन्त बता दिया। सचिन ने कहा कि ये बच्चे गलत रास्ता बता रहे हैं। क्यों? तुझे कैसे पता कि गलत रास्ता है? बोला कि ये चढाई वाला रास्ता बता रहे हैं। मैंने कहा कि चढाई ही तो है। बोला कि हे भगवान!
पचास मीटर ऊपर पानी की एक टंकी मिली। यहां सभी बैठ गये। सचिन काफी मोटा है, कम से कम नब्बे किलो वजन रहा होगा। इतने में ही उसकी हालत खराब हो गई थी। बोला कि नीरज भाई, ट्रैकिंग ऐसी ही होती है क्या? मैं तो सोच रहा था कि सीधे-साधे रास्ते पर चलते जाना होगा। मैंने कहा कि यह तो बडा आसान ट्रैक है। पूरा रास्ता अच्छा बना हुआ है, लोगबाग भी आते जाते हुए मिल रहे हैं। फिर जहां हमें जाना है, वहां के बारे में भी हम निश्चिन्त हैं कि हमें रुकने को मिल जायेगा व खाना भी मिल जायेगा। हर जगह ऐसा नहीं होता। बोला कि हे भगवान!
एक घण्टे बाद यानी 2400 मीटर की ऊंचाई पर फिर एक टंकी मिली। यहां कई परिवार बैठे भोजन कर रहे थे। ये लोग भोजन अपने साथ लाये थे। यह एक खुली जगह थी और नीचे का नजारा शानदार दिख रहा था। साथ ही ऊपर वह स्थान भी दिख रहा था, जहां हमें जाना है। यहां हवा बडी तेज लग रही थी लेकिन बैठे रहने में आनन्द इतना आ रहा था कि आधे घण्टे यहां बैठे रहे और फोटो खींचते रहे। वास्तव में फोटो खींचने के लिये यह एक उत्तम जगह है।
जैसे जैसे समय बीतता जा रहा था, मौसम भी खराब होने लगा था। दूर कहीं गडगडाहट भी सुनाई दे रही थी। सचिन को चलना बहुत मुश्किल हो रहा था। वह दो कदम चलता, रुक जाता। बार-बार कहे जा रहा था कि अब चलना बसकी नहीं है। मैं उसकी बात समझ रहा था क्योंकि जब हम थक जाते हैं और चढाई खत्म नहीं होती तो कतई मन नहीं करता चलने का। लेकिन चलना तो पडता ही है। मैंने कहा कि तू अच्छा चल रहा है। बस, थोडी हिम्मत और बढा। मौसम खराब होने लगा है, बारिश होने लगी तो मुसीबत हो जायेगी।
जब हम 2720 मीटर की ऊंचाई पर थे यानी कमरुनाग से डेढ-दो किलोमीटर पहले, बूंदाबांदी शुरू हो गई। सचिन के पास रेनकोट नहीं था। फिर हवा भयंकर तेजी से चल रही थे। यह अत्यधिक ठण्डी भी थी। मैंने अपना ट्रैकिंग पोल सचिन को दे दिया था ताकि उसे कुछ आराम हो। बर्फ नहीं थी, इसलिये मैं बिना इसके चल सकता था। सचिन ने बताया कि ट्रैकिंग पोल के कारण उसकी स्पीड दोगुनी हो गई थी। इतनी ठण्ड के बावजूद भी वह पसीना-पसीना हो रहा था।
बूंदाबांदी हुई तो सचिन ने बडी ही करुण सी गुहार लगाई- हे भगवान कमरू, बस कुछ देर बारिश रुक जाये, मैं तुझे पांच रुपये चढाऊंगा। और बारिश रुक भी गई। सचिन खुश तो हुआ लेकिन सर्दी से बहुत परेशान था। मैंने उसे अपनी मंकी कैप दी, मोटे दस्ताने दिये और जुराबें दीं। उसने बताया कि उसकी उंगलियां सुन्न पडने लगी थीं।
एक बजे मन्दिर से करीब एक किलोमीटर पहले जहां कमरुनाग क्षेत्र का प्रवेश द्वार बना था, पहुंच गये। ऊंचाई है 2780 मीटर। यहां से मन्दिर तक पक्का कंक्रीट का रास्ता बना है। बादलों की गडगडाहट काफी बढ गई थी, तूफान चल ही रहा था। लग रहा था कि अब बरसा, अब बरसा। बल्कि माहौल ऐसा था कि बरस ही जाना चाहिये था, एकाध बूंद गिरती और फिर बन्द हो जाती। सचिन खुश था कि उसकी पांच रुपये की पुकार कमरू ने सुन ली है। मैंने कहा कि ज्यादा खुश मत हो। हम अभी भी नहीं पहुंचे हैं। अगर अभी भी बारिश शुरू हो गई तो मिनट भर के अन्दर दोनों भीग जायेंगे। देखना, हमारे वहां पहुंचते ही जोर की बारिश होगी।
और ऐसा ही हुआ। लग रहा था कि बारिश का देवता हमारी की प्रतीक्षा कर रहा था। जैसे ही हमें झील दिखी, मन्दिर दिखा, बारिश शुरू हो गई। कुछ ही देर पहले यहां स्थानीय श्रद्धालुओं ने बकरे की बलि चढाई थी और प्रसाद बना रहे थे। सुरेन्द्र मूल रूप से गढवाली है, वह मीट खा लेता है। उसने प्रसाद चखा भी। हम दोनों शाकाहारियों ने नहीं चखा। एक से पूछकर हम मन्दिर की तरफ भागे। हमें कम्बल लेने थे। लेकिन बारिश में हम बदहवास ही रहे। आखिरकार जब बताई जगह पर कोई नहीं दिखा तो वापस भागे और एक दुकान में शरण ली। यहां चाय थी, पकौडियां थीं, जलेबियां थीं और कुछ देर बाद खाना भी बनेगा।
अब तक भयंकर बारिश शुरू हो गई थी। तूफान चल ही रहा था, जल्दी ही ओले भी पडने लगे। हम चाय पर चाय पीते रहे, पकौडियां खाते रहे और चूल्हे के पास आग सेंकते रहे। दुकान वाला अपनी दुकान की कमजोर छत से ओले हटाने में ही लगा रहा।
बारिश नहीं रुकी लेकिन घण्टे भर बाद जब कुछ कम हुई तो हम फिर भागे। यहां झील के चारों ओर कई धर्मशालाएं बनी हैं। सभी में कई-कई कमरे हैं और बिजली भी है। एक कमरे में हमने शरण ली और बारिश में ही मन्दिर कमेटी के यहां से बीस कम्बल ले आये। प्रति कम्बल बीस रुपये किराया लगता है। कुछ बिछाये, कुछ ओढ लिये। धर्मशाला के कमरों में रुकने का कोई किराया नहीं। इन कमरों के फर्श लकडी के बने थे जिससे नीचे से ठण्ड नहीं लगती। लेकिन पिछले दिनों कुछ मूर्ख लोगों ने सर्दी भगाने के लिये कमरे के बीचोंबीच आग जला ली थी जिससे फर्श का कुछ हिस्सा जल गया था।
शाम को अन्धेरा होने से पहले कुछ समय के लिये मौसम खुल गया जिससे हमने झील का एक चक्कर लगा लिया और कुछ फोटो भी खींच लिये। कमरुनाग का मन्दिर पूरी तरह लकडी का बना है, जैसे कि हिमाचल के ज्यादातर मन्दिर होते हैं।
यह स्थान एक और वजह से भी प्रसिद्ध है। इस झील में बहुत सोना-चांदी भरा पडा है। यहां कोई दानपात्र नहीं है, देव कमरू की आज्ञा के अनुसार यह झील ही दानपात्र है। लोग मन्नतें मांगते हैं तो अपनी हैसियत से अनुसार कीमती आभूषण इसमें चढा देते हैं। झील से इन्हें निकाला नहीं जाता। बताते हैं कि कुछ लोग सर्दियों में झील के जम जाने पर बर्फ तोडकर चुराने की कोशिश करते हैं, तो देव कमरु उन्हें तत्काल दण्डित भी कर देते हैं। गौरतलब है कि सर्दियों में यहां कोई नहीं रहता और ठण्ड के कारण झील जम जाती है।
फिर भी कम्बल आदि किराये पर देने से मन्दिर समिति का खर्च चलता है। इसी आमदनी से यहां इतनी सारी धर्मशालाएं हैं। इन्हें देखकर एकबारगी तो लगता है कि वन विभाग के रेस्ट हाउस होंगे।
हिमाचल में देवता मनुष्यों से बात करते हैं; तो मैं चाहता हूं कि किसी दिन कमरू का मन बदले और वह झील की सफाई करने का आदेश दे दे। जो भी इसमें से मिलेगा, उससे कुछ अच्छा काम किया जा सकता है।

कमरुनाग की चढाई पर सचिन

यह अशक्त श्रद्धालुओं को ले जाने वाली कुर्सी है। इसे चार लोग मिलकर उठाते हैं। (फोटो: सुरेन्द्र)

(फोटो: सुरेन्द्र)

(फोटो: सुरेन्द्र)





(फोटो: सुरेन्द्र)

(फोटो: सुरेन्द्र)

(फोटो: सुरेन्द्र)

(फोटो: सुरेन्द्र)

गेहूं के खेत (फोटो: सुरेन्द्र)

फोटो: सुरेन्द्र)

(फोटो: सुरेन्द्र)






मन्दिर से एक किलोमीटर पहले मन्दिर क्षेत्र का प्रवेश-द्वार

आखिरी एक किलोमीटर पक्का रास्ता बना हुआ है।

कमरुनाग में बारिश

सुरेन्द्र खच्चर पर सवार

यहां कई धर्मशालाएं हैं। रुकने के लिये किसी से नहीं पूछना पडता। हम सबसे ऊपर वाली में रुके थे।


अरे, सचिन तो रह ही गया था। एक फोटो उसका भी हो जाये। (फोटो: सुरेन्द्र)


अगला भाग: कमरुनाग से वापस रोहांडा

चूडधार कमरुनाग यात्रा

1. कहां मिलम, कहां झांसी, कहां चूडधार
2. चूडधार यात्रा- 1
3. चूडधार यात्रा- 2
4. चूडधार यात्रा- वापसी तराहां के रास्ते
5. भंगायणी माता मन्दिर, हरिपुरधार
6. तराहां से सुन्दरनगर तक- एक रोमांचक यात्रा
7. रोहांडा में बारिश
8. रोहांडा से कमरुनाग
9. कमरुनाग से वापस रोहांडा
10. कांगडा रेल यात्रा- जोगिन्दर नगर से ज्वालामुखी रोड तक
11.चूडधार की जानकारी व नक्शा

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11 Comments

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Anonymous
June 18, 2014 at 7:12 AM delete

chalo tarun bhai ki muskil ka samadhan nikalte h
ghatotchak ka beta aur khatu shayam ek hi h kyu ki maabharat ka yudh khatam hone k bad us k bete ki jyoti krishan ji me vilin ho gyi to vo khatu syam k nam se puje jane lage jin k matra sir ki puja hoti h aur ghatotchak k bete ka hi nam ratan v tha sayad alag alag tarike se kahani k patra badal gye.

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June 18, 2014 at 8:44 AM delete

बहुत बढ़िया नीरज। फोटो बहुत ही अच्छे हैं। हाँ,घटोत्कच का पुत्र बर्बरीक और खाटू श्याम एक ही हैं।

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sachin
June 18, 2014 at 1:13 PM delete

Ha ha ha ha hum be hai.....

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June 18, 2014 at 2:14 PM delete

बहुत ही खूबसूरत फोटो, आप लोगों ने खूब आनंद लिया.

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June 18, 2014 at 3:27 PM delete

photo dekhkar anand aa gaya neeraj bhai.ati sunder..jai kamru naag.

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June 19, 2014 at 5:59 PM delete

यह कहानी तो हमने भी कई बार सुन रखी है पर रतन का नाम नही सुना,हां बर्बरीक जो बाद मे खाटू श्याम जी के नाम से जाने जाते है उनके बारे मे सुना हुआ है

इस यात्रा के फोटो जो सुरेन्द्र ने खिचे है वह भी शानदार आए है
क्या सुरेन्द्र जी भी एक प्रोफ्रेन्शनल केमरा मैन है

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June 25, 2014 at 3:28 PM delete

किसी दिन इस झील पर डकैती डालनी पड़ेगी नीरज --हा हा हा हा मोटे होने के कारन मुझे भी चढाई में परेशानी होती है वरना मैं भी ट्रेक पर जाती ---

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July 1, 2014 at 5:51 PM delete

नीरज जी,
आपके यात्रा वृत्तांत पड़ने में आनंद आ जाता है. लेकिन एक समस्या आ रही है, की फोटो कट कर आते है. जो यात्राओं के लेबल्स की स्लाइड किनारे तरफ रहती है उसके कारण फोटो पूरा नहीं दिखता ,जिस तरफ आप का नाम फोटो पर लिखा रहता है वो लगभग आधा काट जाता है. मैं गूगल क्रोम प्रयोग करता हूँ, क्या करें की फोटो पूरे दिखें ?

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January 15, 2018 at 11:39 AM delete

Yaha pe chori karna possible nai hai .

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