Skip to main content

छत्तीसगढ यात्रा- डोंगरगढ

27 फरवरी 2013
दुर्ग स्टेशन पर मैंने कदम रखा। जाते ही राजेश तिवारी जी मिल गये। गाडी दो घण्टे लेट थी, लेकिन तिवारी जी दो घण्टे तक स्टेशन पर ही डटे रहे। ये भिलाई में रहते हैं और वहीं इस्पात कारखाने में काम करते हैं। कारखाने की तरफ से मिले ठिकाने में इनका आशियाना है। तुरन्त ही मोटरसाइकिल पर बैठकर हम भिलाई पहुंचे। कल जैसे ही तिवारी जी को मेरे छत्तीसगढ आने की सूचना मिली, तो इन्होंने आज की छुट्टी ले ली मुझे पूरे दिन घुमाने के लिये।
कल सुबह ठीक समय पर दिल्ली से गाडी चल दी थी। सोते सोते झांसी तक पहुंच गया। कुछ खा पीकर आगे बढे। बीना तक ट्रेन अच्छी तरह आई। उसके बाद रुकने लगी। पता चला कि आगे किसी स्टेशन पर कुछ दंगा हो गया है, आगजनी भी हो गई है। क्यों? पता नहीं।
गुलाबगंज स्टेशन पर भी तकरीबन आधे घण्टे तक खडी रहने के उपरान्त गाडी आगे बढी। विदिशा में हालांकि इस ट्रेन का ठहराव नहीं है, लेकिन रुकी तो ठसाठस भर गई। लोग यह कहते सुने गये कि पता नहीं, अगली गाडी कब आये। भोपाल तीन घण्टे लेट पहुंची।
दुर्ग जाकर समाचार पत्र देखा तो पता चला कि गुलाबगंज स्टेशन पर निजामुद्दीन जाने वाली समता एक्सप्रेस से दो बच्चों की कटकर मौत हो गई है, इसलिये गुलाबगंज वालों ने स्टेशन फूंक दिया। स्टेशन मास्टर और बाकी स्टाफ जान बचाकर भाग गये, नहीं तो बच्चों के साथ वे भी कहीं जन्नत में जश्न मनाते मिलते। यह गाडी गुलाबगंज स्टेशन पर काफी देर तक खडी रही, अगर पहले से पता होता तो मैं भी आगजनी के अवशेषों को देख आता।
भीड में दिमाग तो होता ही नहीं है।
कल रेल बजट घोषित हुआ। आज अखबार में पढा तो देखा कि दुर्ग में हाहाकार मचा हुआ है। दुर्ग से छपरा जाने वाली सारनाथ एक्सप्रेस गोंदिया तक बढा दी गई है। गोंदिया में जश्न मन रहा होगा।
मेरी यह यात्रा डब्बू मिश्रा द्वारा आयोजित थी। एक दिन हम दोनों फेसबुक पर चैटिंग कर रहे थे। तभी तय हो गया कि छत्तीसगढ यात्रा की जाये। वैसे मैने छत्तीसगढ यात्रा के लिये मानसून या उसके बाद का समय सोच रखा था, लेकिन डब्बू के अति आग्रह के कारण जाना पडा। इतना होने के बाद डब्बू भूल गये कि जाटराम किस ट्रेन से आ रहा है। उन्होंने सोचा कि महाराज राजधानी से आ रहा है, जो यहां नौ बजे पहुंचेगी। इसलिये साढे आठ बजे फोन करके पूछा कि गाडी कहां तक पहुंच गई। मैंने कहा भिलाई तो चिहुंक उठे। बोले कि उतर जाओ वहीं, मैं दो मिनट में आता हूं। तब मैंने बताया कि समता से आया हूं, अब तिवारी जी के यहां भिलाई में हूं।
कुछ देर बाद डब्बू मिश्रा भी तिवारी निवास पर पहुंच गये।
मैंने इस यात्रा की कोई तैयारी नहीं की थी। सबकुछ डब्बू के भरोसे था। तिवारी जी का फोन तो तब आया, जब मैं कल भोपाल में था। आज बिना सोचे समझे ही उन्होंने छुट्टी ले ली। उधर डब्बू का आज का दिन भी मेरे ही लिये था। तिवारी और डब्बू की बातचीत हुई। आखिरकार तय हुआ कि तिवारीजी आज मुझे घुमायेंगे, आज के बाद डब्बू।
तिवारीजी की योजना थी आज डोंगरगढ चलने की।
डोंगरगढ में रेलवे स्टेशन है, दुर्ग और रायपुर से लोकल ट्रेनें काफी संख्या में डोंगरगढ और आगे गोंदिया तक जाती हैं। दूरी तकरीबन अस्सी किलोमीटर है। लेकिन तिवारीजी को रेल-भय था, इसलिये मोटरसाइकिल से चलने को कहने लगे। मैंने भी खूब कहा कि ट्रेन से चलो, लेकिन नहीं माने।
रास्ते में राजनांदगांव के बाद बायें हाथ एक मन्दिर पडा। प्रसिद्ध मन्दिर ही है, तभी तो तिवारीजी ले गये। मन्दिर पुराना तो नहीं है, लेकिन मजे की बात थी कि यहां भगवान को कैमरे से परहेज नहीं है। मन्दिर तीन मंजिलों का बना है, सबसे नीचे भूमिगत मंजिल पर काली जी विराजमान हैं। दूसरी मंजिल पर शिवजी हैं। सबसे ऊपर पता नहीं कौन है। इसके सामने बडा ही विचित्र नजारा है। एक छोटी सी कोठरी है जिसमें हनुमान विराजमान हैं, उनके ऊपर कोठरी की छत पर नन्दी जी खडे हैं। मन्दिर के आसपास जमीन की कमी नहीं है। लेकिन इस तरह हनुमान और नन्दी को ऊपर नीचे बैठाना मुझे अच्छा नहीं लगा। नन्दी का सारा गोबर हनुमान के ही ऊपर चढ जाता है।
यहां से निकले तो सीधे डोंगरगड ही जाकर रुके। डोंगर कहते हैं पहाडी को। यहां एक छोटी सी पहाडी के ऊपर माता बम्लेश्वरी का मन्दिर है। बम्लेश्वरी को छत्तीसगढ की वैष्णों देवी भी कहते हैं। कुछ घण्टे पहले मैं रेल से यहीं से गुजरा था। तब पहाडी के शीर्ष पर स्थित मन्दिर को देखा था। तब क्या मालूम था कि थोडी ही देर बाद यहां पुनः आना पडेगा।
यहां पर एक चीज बडी अच्छी लगी कि पहाडी की चढाई शुरू करने से पहले एक बहुत बडा हॉल है जहां सैकडों आदमी विश्राम कर सकते हैं। देखने में यह एक मामूली सी बात ही लगती है, लेकिन बडे मन्दिरों में मैंने विश्रामालय नहीं देखे हैं।
यहां असल में बम्लेश्वरी के दो मन्दिर हैं। एक नीचे और दूसरा ऊपर। ऊपर वाले को मुख्य मन्दिर कहा जाता है। नीचे वाले का पुनर्निर्माण हो रहा है जिसमें दस करोड की लागत आयेगी। लागत की भरपाई के लिये पचास रुपये से लेकर दस हजार रुपये तक दान लिया जाता है। मुझे इसी चीज से चिढ है।
दूसरों की देखा-देखी हमने भी नीचे विश्रामालय के पास ही चप्पलें निकाल दीं। इसका खामियाजा हमें भुगतना पडा जब धूप मे पक्की गर्म सीढियों पर चढना पडा।
डेढ बजे मन्दिर में माता के दर्शन बन्द हो जाते हैं। घण्टे भर तक माता आराम करती हैं। हम डेढ बजने से मात्र दस मिनट पहले ही सबसे ऊपर पहुंच चुके थे। पता नहीं था कि दस मिनट बाद मन्दिर घण्टे भर के लिये बन्द हो जायेगा। ऊपर से डोंगरगढ कस्बा और रेलवे स्टेशन बडे शानदार लग रहे थे। हम फोटो खींचते रहे, उधर मन्दिर बन्द हो गया।
मन्दिर में साफ सफाई थी। संगमरमर के फर्श पर बैठने में जरा भी झिझक नहीं हुई और न ही धूल उडाने के लिये फूंक मारनी पडी। ऊपर पंखे चल रहे थे। अच्छा हवादार वातावरण था, पता ही नहीं चला कि कब एक घण्टा गुजर गया।
घण्टे भर बाद ढाई बजे जब पुनः माता के दर्शन होने लगे, तब तक ठीक ठाक भीड हो गई। हम तीन बजे यहां से उठे और दो मिनट में दर्शन करके बाहर निकल गये।
फोटो खींचने की मनाही है, लेकिन मैंने एक फोटो खींच लिया। मन्दिर में एक सीसीटीवी कैमरा भी लगा दिखा लेकिन उसकी दिशा आम लोगों की तरफ न होकर मन्दिर में रखी माता की प्रतिमा की तरफ थी। भला माता पर कैमरा लगाने से क्या लाभ?
नीचे उतरने लगे। अब तक सीढियां और भी गर्म हो गई थीं, बडी परेशानी हुई नंगे पैर चलने में।
लंगूर काफी संख्या में हैं। लेकिन शान्त स्वभाव के कारण वे अखरते नहीं।
उडनखटोले की सुविधा भी है यहां। हमें इसकी कोई आवश्यकता नहीं थी।
नीचे पहुंचे। विश्रामालय के बराबर में एक ताल है। इसमें बोटिंग की सुविधा भी है।
करीब आधा किलोमीटर दूर बम्लेश्वरी का नया बन रहा मन्दिर है। यहां पत्थरों का इस्तेमाल हो रहा है। पत्थरों पर कलाकारीपूर्ण कार्य हो रहा है। मैं इसे पैसे की बर्बादी ही मानता हूं, इसलिये मुझे उतना अच्छा नहीं लगा।
शाम अन्धेरा होने तक तिवारीजी के साथ मैं वापस भिलाई लौट आया।
सूर्यास्त होते समय जब हम दुर्ग में प्रवेश के समय शिवनाथ नदी के पुल से गुजर रहे थे, तो सूर्यास्त का बडा शानदार नजारा दिखा। यहीं बराबर में एक गुरुद्वारा भी है।
आज पाबला जी के साथ गप्पे मारने का समय निर्धारित था। शाम छह बजे जब हम डोंगरगढ से वापस लौट आये तो डब्बू से पता चला कि पाबला जी बीमार हो गये हैं, इसलिये गप्प के लिये समय नहीं दे सकते। तय हुआ कि कल उनके घर चलेंगे और वहीं बातें करेंगे।
पिछले साल 27 अगस्त को जब मुझे लखनऊ में सर्वोत्तम यात्रा ब्लॉगर का पुरस्कार मिला था, तो वहां पाबला जी भी उपस्थित थे। उन्होंने मुझसे प्रतिज्ञा कराई थी कि छह महीने के अन्दर छत्तीसगढ की यात्रा करनी है। मैं भूल गया उस प्रतिज्ञा को। डब्बू की वजह से ही सही, मेरी प्रतिज्ञा बची रही। आज छठे महीने का आखिरी दिन था।
शाम को तिवारी जी के साथ भिलाई देखने निकला। पता नहीं क्यों दुर्ग में मुझे इन्दौर का एहसास हो रहा था। बार बार यही लगता कि मैं इन्दौर में हूं। जबकि भिलाई हरिद्वार स्थित भेल जैसा लगा। लगा क्या बल्कि है ही। एक कारखाने के चारों तरफ आवासीय कालोनी। सुनियोजित ढंग से बना शहर।
यह कारखाना रूस के सहयोग से आजादी के बाद बनाया गया। आजादी से पहले भारत-रूस के सम्बन्ध थे ही नहीं। कारण थे अंग्रेज। रूस से उनकी जातीय दुश्मनी थी। भारत में उस समय रूस का राजदूत भी नहीं होता था। अफगानिस्तान या ईरान में जरूर रूसी राजदूत होता था। आजादी के बाद भारत-रूसी मित्रता शून्य से शिखर पर पहुंची।
दो मन्दिर दक्षिण भारतीय शैली में देखे। अच्छे लगे।
रात को तिवारी जी के यहीं सो गया।



राजनांदगांव के पास वाले मन्दिर में काली की प्रतिमा



तिवारी जी

हनुमान के ऊपर नन्दी



कलकत्ता- मुम्बई हाइवे

डोंगरगढ रोड

ऑनलाइन दान


बम्लेश्वरी मन्दिर की तरफ जाती सीढियां


ऊपर से दिखती रेलवे लाइन

जय मां बम्लेश्वरी





विश्रामालय

वापस दुर्ग चलते हैं। शाम के समय को इसी वजह से गोधूलि बेला कहते हैं।



फेसबुक रेस्टॉरेंट

शिवनाथ तीरे

भिलाई आवासीय परिसर में बना दक्षिण भारतीय शैली का मन्दिर

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत। 
अगला भाग: छत्तीसगढ यात्रा- मूरमसिल्ली बांध

छत्तीसगढ यात्रा
1. छत्तीसगढ यात्रा- डोंगरगढ
2. छत्तीसगढ यात्रा- मूरमसिल्ली बांध
3. छत्तीसगढ यात्रा- सिहावा- महानदी का उद्गम
4. छत्तीसगढ यात्रा- पुनः कर्क आश्रम में और वापसी

Comments

  1. बहुत बढिया यात्रा वृतांत, होली की हार्दिक शुभकामनाएं.

    रामराम

    ReplyDelete
  2. वादा निभाया आपने
    हम ही चूक गए :-(

    ReplyDelete
  3. १. रास्ते में राजनांदगांव के बाद बायें हाथ एक मन्दिर पडा। प्रसिद्ध मन्दिर ही है, तभी तो तिवारीजी ले गये।
    शायद यह "बर्फानी बाबा का मंदिर है ". मैं भी एक बार गया था ...
    २. मन्दिर में एक सीसीटीवी कैमरा भी लगा दिखा लेकिन उसकी दिशा आम लोगों की तरफ न होकर मन्दिर में रखी माता की प्रतिमा की तरफ थी। भला माता पर कैमरा लगाने से क्या लाभ? "यह शायद माता के मुकुट कि सिरक्षा के लिए लगाया गया है..."

    ReplyDelete
  4. "नन्दी का सारा गोबर हनुमान के ही ऊपर चढ जाता है।" मजेदार है जवाब नहीं हा हा हा यही हमारे यहाँ की विशेषता है जहाँ थोड़ी सी जगह मिल गई वही भगवान् विराजमान----शिवजी के निचे क्या था नीरज यह नहीं बताया ?
    माता पर कैमरा माता की हिफाजत के लिए लगा हुआ था ..कितने गहने पहनी थी माँ ...नास्तिक लोग वहां भी अपनी करनी से बाज नहीं आते .. खेर, यात्रा मजेदार चल रही है कल तक पाबला जी भी ठीक हो जायेगे ..
    दुर्ग अब देखना पड़ेगा ताकि मालुम हो की वो इंदौर जैसा लगता है की नहीं ?

    ReplyDelete
  5. हरा भरा, रंग बिरंगा छत्तीसगढ़..

    ReplyDelete
  6. आज पढ़ा है इसे। अच्छा लगा वृतान्त।

    ReplyDelete
  7. प्राचीन भारत में विशाल भूखंड होते थे .....गोचर .......गाँव के गायें चरने जाते थीं ....बछड़े सब घर पे ही रहते थे ....शाम होते ही गायों को बछड़ों की याद आती ....वो लौटतीं ......एक साथ इतनी गायें चलतीं तो धुल उठती थी शाम को .....इसीलिए नाम पड़ा ....गोधूली ....अब ये सब पुरानी बात हो गयी .....

    ReplyDelete
  8. मन्दिर में एक सीसीटीवी कैमरा भी लगा दिखा लेकिन उसकी दिशा आम लोगों की तरफ न होकर मन्दिर में रखी माता की प्रतिमा की तरफ थी। भला माता पर कैमरा लगाने से क्या लाभ?

    For security reason....

    Agar choree ho to ......Jewelery kee ..

    Neeraj BOSS.

    ReplyDelete
  9. बहुत अच्छा लगा डोंगरगढ़ यात्रा वृतांत

    ReplyDelete

Post a Comment

Popular posts from this blog

लद्दाख बाइक यात्रा-5 (पारना-सिंथन टॉप-श्रीनगर)

10 जून 2015 सात बजे सोकर उठे। हम चाहते तो बडी आसानी से गर्म पानी उपलब्ध हो जाता लेकिन हमने नहीं चाहा। नहाने से बच गये। ताजा पानी बेहद ठण्डा था। जहां हमने टैंट लगाया था, वहां बल्ब नहीं जल रहा था। रात पुजारीजी ने बहुत कोशिश कर ली लेकिन सफल नहीं हुए। अब हमने उसे देखा। पाया कि तार बहुत पुराना हो चुका था और एक जगह हमें लगा कि वहां से टूट गया है। वहां एक जोड था और उसे पन्नी से बांधा हुआ था। उसे ठीक करने की जिम्मेदारी मैंने ली। वहीं रखे एक ड्रम पर चढकर तार ठीक किया लेकिन फिर भी बल्ब नहीं जला। बल्ब खराब है- यह सोचकर उसे भी बदला, फिर भी नहीं जला। और गौर की तो पाया कि बल्ब का होल्डर अन्दर से टूटा है। उसे उसी समय बदलना उपयुक्त नहीं लगा और बिजली मरम्मत का काम जैसा था, वैसा ही छोड दिया।

लद्दाख बाइक यात्रा- 1 (तैयारी)

बुलेट निःसन्देह शानदार बाइक है। जहां दूसरी बाइक के पूरे जोर हो जाते हैं, वहां बुलेट भड-भड-भड-भड करती हुई निकल जाती है। लेकिन इसका यह अर्थ नहीं है कि लद्दाख जाने के लिये या लम्बी दूरी की यात्राओं के लिये बुलेट ही उत्तम है। बुलेट न हो तो हम यात्राएं ही नहीं करेंगे। बाइक अच्छी हालत में होनी चाहिये। बुलेट की भी अच्छी हालत नहीं होगी तो वह आपको ऐसी जगह ले जाकर धोखा देगी, जहां आपके पास सिर पकडकर बैठने के अलावा कोई और चारा नहीं रहेगा। अच्छी हालत वाली कोई भी बाइक आपको रोहतांग भी पार करायेगी, जोजी-ला भी पार करायेगी और खारदुंग-ला, चांग-ला भी। वास्तव में यह मशीन ही है जिसके भरोसे आप लद्दाख जाते हो। तो कम से कम अपनी मशीन की, इसके पुर्जों की थोडी सी जानकारी तो होनी ही चाहिये। सबसे पहले बात करते हैं टायर की। टायर बाइक का वो हिस्सा है जिस पर सबसे ज्यादा दबाव पडता है और जो सबसे ज्यादा नाजुक भी होता है। इसका कोई विकल्प भी नहीं है और आपको इसे हर हाल में पूरी तरह फिट रखना पडेगा।

स्टेशन से बस अड्डा कितना दूर है?

आज बात करते हैं कि विभिन्न शहरों में रेलवे स्टेशन और मुख्य बस अड्डे आपस में कितना कितना दूर हैं? आने जाने के साधन कौन कौन से हैं? वगैरा वगैरा। शुरू करते हैं भारत की राजधानी से ही। दिल्ली:- दिल्ली में तीन मुख्य बस अड्डे हैं यानी ISBT- महाराणा प्रताप (कश्मीरी गेट), आनंद विहार और सराय काले खां। कश्मीरी गेट पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन के पास है। आनंद विहार में रेलवे स्टेशन भी है लेकिन यहाँ पर एक्सप्रेस ट्रेनें नहीं रुकतीं। हालाँकि अब तो आनंद विहार रेलवे स्टेशन को टर्मिनल बनाया जा चुका है। मेट्रो भी पहुँच चुकी है। सराय काले खां बस अड्डे के बराबर में ही है हज़रत निजामुद्दीन रेलवे स्टेशन। गाजियाबाद: - रेलवे स्टेशन से बस अड्डा तीन चार किलोमीटर दूर है। ऑटो वाले पांच रूपये लेते हैं।