Skip to main content

पिण्डारी यात्रा का कुल खर्चा- 2624 रुपये, 8 दिन

1 अक्टूबर से 8 अक्टूबर तक हम पिण्डारी ग्लेशियर की यात्रा पर थे। कुल मिलाकर 8 दिन बनते हैं और खर्च आया 2624 रुपये। शुरू से लेकर आखिर तक हमने क्या-क्या खर्चा किया, इसे पूरे विस्तार से आगे बताया गया है। यह खर्च बाद में जाने वाले घुमक्कडों के बहुत काम आयेगा।

1 अक्टूबर 2011


दिल्ली से जाट महाराज के साथ अतुल भी था। हमारा तीसरा साथी नीरज सिंह यानी हल्दीराम हमें हल्द्वानी में मिलेगा।
दिल्ली से मुरादाबाद ट्रेन से बेटिकट (50 रुपये के आसपास किराया लगता है।)
लंच- मुरादाबाद= 100 रुपये
पानी की बोतल- मुरादाबाद= 10 रुपये
मुरादाबाद से हल्द्वानी बस से= 150 रुपये
अब बस अड्डे पर ही हमें हल्दीराम भी मिल जाता है। यात्रियों की संख्या तीन हो गई और खर्चे को व्यक्तिगत बनाने के लिये अब कुल खर्चे के तीन हिस्से करने पडेंगे।
हल्द्वानी से अल्मोडा शेयर आल्टो कार से= 600 रुपये
रास्ते में कहीं चाय= 10 रुपये
अल्मोडा से बागेश्वर शेयर आल्टो कार से= 700 रुपये (750 मांग रहा था)
बागेश्वर में कमरा= 300 रुपये (साढे नौ बज चुके थे। लगभग पूरा बागेश्वर सो चुका था। कमरा कार में बैठे बैठे ही ड्राइवर ने बुक करा दिया था इसलिये मोलभाव की गुंजाइश नहीं थी।)

1 अक्टूबर का कुल खर्च= 260+1610= 1870 रुपये
1 अक्टूबर का मेरा खर्च= 260/2 + 1610/3= 130 + 537 = 667 रुपये

2 अक्टूबर 2011


चाय- बागेश्वर = 10 रुपये

केले- बागेश्वर = 35 रुपये
बागेश्वर से भराडी जीप से= 105 रुपये
समोसे- भराडी = 65 रुपये
भराडी से सौंग जीप से = 90 रुपये
अब हमारी पिण्डारी ग्लेशियर के लिये पैदल यात्रा यानी ट्रैकिंग शुरू होती है। सौंग से तीन किलोमीटर आगे लोहारखेत में 60 रुपये प्रति व्यक्ति इको चार्ज काटा जाता है।
लोहारखेत में इको चार्ज = 180 रुपये
झण्डीधार में मैगी, चाय, आमलेट = 70 रुपये
शाम होने तक धाकुडी पहुंच गये। यहां पचास रुपये प्रति व्यक्ति के हिसाब से सोने की जगह मिल गई। तीनों ने भरपेट डिनर किया। इसका भुगतान अगले दिन सुबह किया इसलिये यह खर्च अगले दिन के खाते में लिखा जायेगा।

2 अक्टूबर का कुल खर्च= 555 रुपये
2 अक्टूबर का मेरा खर्च= 555/3 = 185 रुपये

3 अक्टूबर 2011

धाकुडी में सोना, कल का डिनर, आज का ब्रेकफास्ट= 550 रुपये
वाछम (खाती से पहले) में चाय बिस्कुट= 50 रुपये
खाती में लंच= 160 रुपये
खाती से 11 किलोमीटर आगे द्वाली में रात्रि विश्राम किया गया। रात का डिनर और रुकने का चार्ज अगले दिन में जोडा गया है।

3 अक्टूबर का कुल खर्च= 760 रुपये
3 अक्टूबर का मेरा खर्च= 760/3= 253 रुपये

4 अक्टूबर 2011


द्वाली में कल का डिनर, रुकना, ब्रेकफास्ट= 700 रुपये
फुरकिया में चाय बिस्कुट= 50 रुपये
वापसी में भी फुरकिया में चाय बिस्कुट= 30 रुपये

4 अक्टूबर का कुल खर्च= 780 रुपये
4 अक्टूबर का मेरा खर्च= 780/3= 260 रुपये

5 अक्टूबर 2011


हल्दीराम कल पिण्डारी ग्लेशियर के पास ही रुक गया था। इसलिये आज का खर्चा केवल मैंने और अतुल ने ही किया।

द्वाली में कल का डिनर, रुकना और ब्रेकफास्ट= 410 रुपये
खटिया में आमलेट= 50 रुपये
वापसी में खटिया में चाय= 20 रुपये
रात को हम खाती में रुके थे। जिसका खर्च अगले दिन दिया गया।

5 अक्टूबर का कुल खर्च=480 रुपये
5 अक्टूबर का मेरा खर्च= 480/2= 240 रुपये

6 अक्टूबर 2011


खाती में रुकना, कल का डिनर और आज का ब्रेकफास्ट= 250 रुपये
खाती से पैदल यात्रा करके हम सूपी पहुंचे। सूपी के पास मुनार तक सडक बन गई है और जीपें भी चलती हैं।
मुनार से भराडी जीप से= 80 रुपये
भराडी से बागेश्वर= 70 रुपये
बागेश्वर में चाऊमीन= 30 रुपये
बागेश्वर से अल्मोडा= 360 रुपये
अल्मोडा में कमरा= 200 रुपये
अल्मोडा में डिनर= 180 रुपये

6 अक्टूबर का कुल खर्च= 430 + 740 = 1170 रुपये
6 अक्टूबर का मेरा खर्च= 430/2 + 740/3 = 462 रुपये

7 अक्टूबर 2011


हालांकि पिण्डारी यात्रा हमारे हल्द्वानी पहुंचते ही खत्म हो जाती लेकिन अभी भी हमारे पास दो दिन और थे इसलिये अपने एक जाने पहचाने ठिकाने भागाद्यूनी गांव जा पहुंचे।
अल्मोडा में नाश्ता= 55 रुपये
अल्मोडा में बाल मिठाई= 180 रुपये
अल्मोडा से शहरफाटक बस से= 100 रुपये
शहरफाटक से मोतियापाथर ट्रक से= 10 रुपये

7 अक्टूबर का कुल खर्च= 345 रुपये
7 अक्टूबर का मेरा खर्च= 345/2= 173 रुपये

8 अक्टूबर 2011

मोतियापाथर से हल्द्वानी बस से= 150 रुपये
हल्द्वानी में आमलेट= 60 रुपये
हल्द्वानी से दिल्ली बस से= 368 रुपये
गजरौला में डिनर= 100 रुपये
आनन्द विहार से शाहदरा ऑटो से= 90 रुपये

8 अक्टूबर का कुल खर्च= 768 रुपये
8 अक्टूबर का मेरा खर्च= 768/2= 384 रुपये

पूरी यात्रा का कुल खर्च
1 अक्टूबर= 667 रुपये
2 अक्टूबर= 185 रुपये
3 अक्टूबर= 253 रुपये
4 अक्टूबर= 260 रुपये
5 अक्टूबर= 240 रुपये
6 अक्टूबर= 462 रुपये
7 अक्टूबर= 173 रुपये
8 अक्टूबर= 384 रुपये
कुल खर्च= 2624 रुपये


इसमें हल्दीराम द्वारा लाये गये मिठाई के डिब्बों, नमकीन, बिस्कुटों का खर्च और जाते समय हल्दीराम द्वारा अपनी तरफ से खिलाई गई बाल मिठाई का खर्च शामिल नहीं है। रास्ते में कई जगह टॉफी भी ली गई, उसका खर्च भी शामिल नहीं है।


पिण्डारी ग्लेशियर यात्रा
1. पिण्डारी ग्लेशियर यात्रा- पहला दिन (दिल्ली से बागेश्वर)
2. पिण्डारी ग्लेशियर यात्रा- दूसरा दिन (बागेश्वर से धाकुडी)
3. पिण्डारी ग्लेशियर यात्रा- तीसरा दिन (धाकुडी से द्वाली)
4. पिण्डारी ग्लेशियर यात्रा- चौथा दिन (द्वाली-पिण्डारी-द्वाली)
5. कफनी ग्लेशियर यात्रा- पांचवां दिन (द्वाली-कफनी-द्वाली-खाती)
6. पिण्डारी ग्लेशियर यात्रा- छठा दिन (खाती-सूपी-बागेश्वर-अल्मोडा)
7. पिण्डारी ग्लेशियर- सम्पूर्ण यात्रा
8. पिण्डारी ग्लेशियर यात्रा का कुल खर्च- 2624 रुपये, 8 दिन

Comments

  1. वैसे सस्ती भी नहीं थी, जायज कह सकते है।

    ReplyDelete
  2. तुम्हारे लेख घुमक्कड़ी को पापुलर बना देंगे चौधरी !
    कम से कम एक बार तुम्हारे साथ जाने का दिल है ....कच्छ, केरल अथवा नोर्थ ईस्ट का प्लान करने पर हो सके तो अपनी मित्र मंडली में शामिल करना !
    शुभकामनायें घुमक्कड़ी को !

    ReplyDelete
  3. नीरज जी,

    अब पिण्डारी की यात्रा खत्म करके मसूरी की यात्रा शुरू करो.....

    ReplyDelete
  4. अब तो लग रहा है कि घर में बना रहना मँहगा हो जाये।

    ReplyDelete
  5. इस से यह साबित होता है की समय होना चाहिए बन्दे के पास
    कम पैसे मैं भी ज्यादा घूम सकता है

    ReplyDelete
  6. 8 दिन की अखार्चा ठीक ही है भाई

    घुमक्कड़ी जिंदाबाद

    ReplyDelete
  7. bhai puri shrukhla badhiya hai, aap ki lekhni ka to jawab nahi

    ReplyDelete
  8. yaar mere accountant to mai hu

    balance sheet aapne bana di.

    ReplyDelete
  9. जहां ट्रेकर के कदम रुक जाते हैं, वही से पर्वतारोही के कदम शुरू होते हैं। तो आप उस श्रेणी में कब आओगे

    ReplyDelete

Post a Comment

Popular posts from this blog

ट्रेन में बाइक कैसे बुक करें?

अक्सर हमें ट्रेनों में बाइक की बुकिंग करने की आवश्यकता पड़ती है। इस बार मुझे भी पड़ी तो कुछ जानकारियाँ इंटरनेट के माध्यम से जुटायीं। पता चला कि टंकी एकदम खाली होनी चाहिये और बाइक पैक होनी चाहिये - अंग्रेजी में ‘गनी बैग’ कहते हैं और हिंदी में टाट। तो तमाम तरह की परेशानियों के बाद आज आख़िरकार मैं भी अपनी बाइक ट्रेन में बुक करने में सफल रहा। अपना अनुभव और जानकारी आपको भी शेयर कर रहा हूँ। हमारे सामने मुख्य परेशानी यही होती है कि हमें चीजों की जानकारी नहीं होती। ट्रेनों में दो तरह से बाइक बुक की जा सकती है: लगेज के तौर पर और पार्सल के तौर पर। पहले बात करते हैं लगेज के तौर पर बाइक बुक करने का क्या प्रोसीजर है। इसमें आपके पास ट्रेन का आरक्षित टिकट होना चाहिये। यदि आपने रेलवे काउंटर से टिकट लिया है, तब तो वेटिंग टिकट भी चल जायेगा। और अगर आपके पास ऑनलाइन टिकट है, तब या तो कन्फर्म टिकट होना चाहिये या आर.ए.सी.। यानी जब आप स्वयं यात्रा कर रहे हों, और बाइक भी उसी ट्रेन में ले जाना चाहते हों, तो आरक्षित टिकट तो होना ही चाहिये। इसके अलावा बाइक की आर.सी. व आपका कोई पहचान-पत्र भी ज़रूरी है। मतलब

46 रेलवे स्टेशन हैं दिल्ली में

एक बार मैं गोरखपुर से लखनऊ जा रहा था। ट्रेन थी वैशाली एक्सप्रेस, जनरल डिब्बा। जाहिर है कि ज्यादातर यात्री बिहारी ही थे। उतनी भीड नहीं थी, जितनी अक्सर होती है। मैं ऊपर वाली बर्थ पर बैठ गया। नीचे कुछ यात्री बैठे थे जो दिल्ली जा रहे थे। ये लोग मजदूर थे और दिल्ली एयरपोर्ट के आसपास काम करते थे। इनके साथ कुछ ऐसे भी थे, जो दिल्ली जाकर मजदूर कम्पनी में नये नये भर्ती होने वाले थे। तभी एक ने पूछा कि दिल्ली में कितने रेलवे स्टेशन हैं। दूसरे ने कहा कि एक। तीसरा बोला कि नहीं, तीन हैं, नई दिल्ली, पुरानी दिल्ली और निजामुद्दीन। तभी चौथे की आवाज आई कि सराय रोहिल्ला भी तो है। यह बात करीब चार साढे चार साल पुरानी है, उस समय आनन्द विहार की पहचान नहीं थी। आनन्द विहार टर्मिनल तो बाद में बना। उनकी गिनती किसी तरह पांच तक पहुंच गई। इस गिनती को मैं आगे बढा सकता था लेकिन आदतन चुप रहा।

जाटराम की पहली पुस्तक: लद्दाख में पैदल यात्राएं

पुस्तक प्रकाशन की योजना तो काफी पहले से बनती आ रही थी लेकिन कुछ न कुछ समस्या आ ही जाती थी। सबसे बडी समस्या आती थी पैसों की। मैंने कई लेखकों से सुना था कि पुस्तक प्रकाशन में लगभग 25000 रुपये तक खर्च हो जाते हैं और अगर कोई नया-नवेला है यानी पहली पुस्तक प्रकाशित करा रहा है तो प्रकाशक उसे कुछ भी रॉयल्टी नहीं देते। मैंने कईयों से पूछा कि अगर ऐसा है तो आपने क्यों छपवाई? तो उत्तर मिलता कि केवल इस तसल्ली के लिये कि हमारी भी एक पुस्तक है। फिर दिसम्बर 2015 में इस बारे में नई चीज पता चली- सेल्फ पब्लिकेशन। इसके बारे में और खोजबीन की तो पता चला कि यहां पुस्तक प्रकाशित हो सकती है। इसमें पुस्तक प्रकाशन का सारा नियन्त्रण लेखक का होता है। कई कम्पनियों के बारे में पता चला। सभी के अलग-अलग रेट थे। सबसे सस्ते रेट थे एजूक्रियेशन के- 10000 रुपये। दो चैप्टर सैम्पल भेज दिये और अगले ही दिन उन्होंने एप्रूव कर दिया कि आप अच्छा लिखते हो, अब पूरी पुस्तक भेजो। मैंने इनका सबसे सस्ता प्लान लिया था। इसमें एडिटिंग शामिल नहीं थी।