पिण्डारी ग्लेशियर यात्रा- पहला दिन (दिल्ली से बागेश्वर)

October 21, 2011
जरूरी सूचना: इस यात्रा वृत्तान्त को पढने से पहले यह जान लें कि हम पिण्डारी और कफनी दोनों ग्लेशियरों तक गये लेकिन खराब मौसम के कारण ना पिण्डारी और ना कफनी, किसी को नहीं देख पाये। हम नहीं देख पाये तो आपको कैसे दिखा सकते हैं? इतना जानने के बाद भी अगर आप इसे पढते हैं तो बाद में यह मत कहना कि दो घण्टे बर्बाद हो गये और ग्लेशियर नहीं दिखा।
1 अक्टूबर 2011, वो शुभ दिन था जब पिण्डारी ग्लेशियर के लिये प्रस्थान किया। इसके बारे में अपने ब्लॉग पर सूचना काफी पहले ही दे दी थी, जिसका नतीजा यह हुआ कि जाने वालों में सोनीपत के अतुल और बाराबंकी के नीरज सिंह भी तैयार हो गये। वैसे तो मथुरा के ‘फकीरा’ भी तैयार थे लेकिन जैसे ही उन्हें पता चला कि कार्यक्रम एक-दो दिन का नहीं बल्कि आठ दिन का है तो उन्होंने मना कर दिया। अतुल को 30 सितम्बर की रात को मेरे पास ही आना था और बाराबंकी वाले नीरज को बाघ एक्सप्रेस (13019) से हल्द्वानी पहुंचना था।
मैं हमेशा नाइट ड्यूटी करके निकलता हूं। इसलिये तीस सितम्बर की रात को दस बजे से लेकर एक अक्टूबर की सुबह छह बजे तक ड्यूटी थी। यह ड्यूटी अपने यहां एक अक्टूबर की मानी जाती है, इसलिये एक तारीख को छुट्टी नहीं लेनी पडी। अतुल को शास्त्री पार्क स्थित अपने कार्यालय ही बुला लिया। अतुल पहले भी एक बार साथ जा चुका था, तब भी हमने ऐसा ही किया था। अच्छा हां, एक बात और बता दूं कि रात की ड्यूटी में मुझे एक मैण्टेनेंस गाडी ‘धरतीधकेल’ चलानी पडती है। इस गाडी को तकनीकी भाषा में CTMC कहते हैं। रेलवे वाले इसे अच्छी तरह जानते होंगे। यह गाडी रात को डिपो से निकलकर मेन लाइन पर चलती है। इसे चलाने का लाइसेंस हमारे यहां जूनियर इंजीनियर (JE) को मिलता है तो मुझे भी मिला हुआ है।
पिछली बार जब अतुल यहां आया था तो मैं तो धरतीधकेल लेकर चला गया जबकि अतुल को डिपो में ही सुला दिया। जब हम सफर करने लगे तो मुझे आने लगी नींद। अतुल को नींद कहां? उसने मुझे सोने नहीं दिया। लेकिन अब सोचा कि इस बार ऐसा नहीं होने दूंगा। ना खुद सोऊंगा, ना अतुल को सोने दूंगा। चल भाई अतुल, तू भी हमारे साथ ही मेन लाइन पर चल।
जब साढे छह बजे शाहदरा से बरेली एक्सप्रेस (14556) पकडी तो मुझे तो नींद आ ही रही थी, आंख अतुल की भी नहीं खुल रही थीं। हम डिपो से निकलने में ही लेट हो गये थे तो शाहदरा से टिकट भी नहीं ले पाये, मुरादाबाद तक बेटिकट ही गये। यह वही गाडी है जो रात को दिल्ली से ऊना हिमाचल तक हिमाचल एक्सप्रेस बनकर चलती है और दिन में दिल्ली से बरेली तक। हिमाचल एक्सप्रेस में इसमें स्लीपर डिब्बे लगे होते हैं जबकि बरेली एक्सप्रेस बनने पर इसके स्लीपर डिब्बों का दर्जा खत्म करके जनरल बना दिया जाता है। इसीलिये अतुल मुरादाबाद तक हैरान-परेशान होता हुआ गया कि जाट महाराज ने बेटिकट स्लीपर डिब्बे में सफर करवा दिया। वैसे ढाई-ढाई सौ रुपये दोनों के जुर्माने के लगाकर पांच सौ रुपये मैंने अलग जेब में रख लिये थे कि टीटी आयेगा और जुर्माने को कहेगा तो तुरन्त दे देंगे। हालांकि ऐसी नौबत नहीं आई।
मुरादाबाद में लंच करके हल्द्वानी की बस पकडी। पहले तो खुद मुरादाबाद, फिर रामपुर, बिलासपुर, रुद्रपुर के जामों को झेलते हुए दोपहर बाद तीन बजे हल्द्वानी पहुंचे। यहां पिछले छह घण्टों से बाराबंकी वाले नीरज सिंह हमारी बाट देख रहे थे। नीरज सिंह जो कि मिर्ची नमक के नाम से लिखते हैं, हमने उसे हल्दी नमक कर दिया और नीरज भाई हो गये हल्दीराम। आगे से उन्हें हल्दीराम ही कहा जायेगा।
हल्द्वानी पहुंचकर तुरन्त अल्मोडा की आल्टो पकडी। यहां यातायात के तीन साधन हैं- बस, जीप और आल्टो। आमतौर पर जीप का किराया बस से बीस पच्चीस रुपये ज्यादा होता है और आल्टो का जीप से पचास रुपये ज्यादा। लेकिन हम चूंकि जामों में फंसकर काफी लेट हो चुके थे और आज का प्रोग्राम बागेश्वर पहुंचने का था। इसलिये हमें आल्टो से चलना पडा। दो सौ रुपये प्रति सवारी तय हुआ। हमने ड्राइवर से यह भी बता दिया कि हमें बागेश्वर जाना है इसलिये उसने अल्मोडा में अपने किसी परिचित जानकार ड्राइवर को फोन करके बता दिया कि अभी रुक जा, तीन सवारियां बागेश्वर की लेकर आ रहा हूं।
सात बजे के करीब अल्मोडा पहुंचे। हमें दूसरी आल्टो में शिफ्ट कर दिया गया। सात बजे हालांकि अन्धेरा हो जाता है, इसलिये काफी अन्धेरा हो गया था। अल्मोडा से बागेश्वर वाली सडक बहुत बढिया बनी हुई है। शायद ही कहीं गड्ढा हो। चीड का जंगल है पूरे रास्ते भर। हमें उस दिन तो पता नहीं चला था, इस बात का पता हमें वापस आते हुए चला। रास्ते में एक जगह तेंदुआ भी दिखा। हालांकि ड्राइवर ने बाघ-बाघ चिल्लाकर गाडी रोक दी थी कि इसे देखना हमारे यहां शुभ माना जाता है।
दस बजे के करीब बागेश्वर पहुंचे। लेट हो जाने के कारण तीन सौ रुपये का एक कमरा मिला। तीनों जने पडकर सो गये।


अगला भाग: पिण्डारी ग्लेशियर यात्रा- दूसरा दिन (बागेश्वर से धाकुडी)


पिण्डारी ग्लेशियर यात्रा
1. पिण्डारी ग्लेशियर यात्रा- पहला दिन (दिल्ली से बागेश्वर)
2. पिण्डारी ग्लेशियर यात्रा- दूसरा दिन (बागेश्वर से धाकुडी)
3. पिण्डारी ग्लेशियर यात्रा- तीसरा दिन (धाकुडी से द्वाली)
4. पिण्डारी ग्लेशियर यात्रा- चौथा दिन (द्वाली-पिण्डारी-द्वाली)
5. कफनी ग्लेशियर यात्रा- पांचवां दिन (द्वाली-कफनी-द्वाली-खाती)
6. पिण्डारी ग्लेशियर यात्रा- छठा दिन (खाती-सूपी-बागेश्वर-अल्मोडा)
7. पिण्डारी ग्लेशियर- सम्पूर्ण यात्रा
8. पिण्डारी ग्लेशियर यात्रा का कुल खर्च- 2624 रुपये, 8 दिन

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15 Comments

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October 21, 2011 at 6:35 AM delete

बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
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यहाँ पर ब्रॉडबैंड की कोई केबिल खराब हो गई है इसलिए नेट की स्पीड बहत स्लो है।
बैंगलौर से केबिल लेकर तकनीनिशियन आयेंगे तभी नेट सही चलेगा।
तब तक जितने ब्लॉग खुलेंगे उन पर तो धीरे-धीरे जाऊँगा ही!

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October 21, 2011 at 7:41 AM delete

आगे की प्रतीक्षा है।

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October 21, 2011 at 8:51 AM delete

खूबसूरत प्रस्तुति |

त्योहारों की नई श्रृंखला |
मस्ती हो खुब दीप जलें |
धनतेरस-आरोग्य- द्वितीया
दीप जलाने चले चलें ||

बहुत बहुत बधाई ||

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October 21, 2011 at 9:42 AM delete

आगे का हाल जानने की उत्सुकता है!

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October 21, 2011 at 10:05 AM delete

भाई वाह मजा आ गया
आगे कि यात्रा का इन्तजार..........

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October 21, 2011 at 10:50 AM delete

इस सफ़र का पूरा लुत्फ़ लेंगे आपके साथ.

बेटिकट सफ़र के जो रहस्योद्घाटन आप करते जा रहे हैं, वो कल कहीं आपके विरुद्ध भी भ्रष्टाचार के प्रमाण न मान लिए जायें !!!

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October 21, 2011 at 11:26 PM delete

लिखते लिखते सो गए .. आपके जगने का इंतजार कर रही हूं .. बढिया लिखा आपने !!

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October 22, 2011 at 5:30 PM delete

वाह ग्लेशियर हम भी घूम रहे हैं आपके साथ ।

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October 22, 2011 at 7:05 PM delete

बिना टिकट व बिना फ़ोटो ना भाई ना ये नहीं चलेगा? टिकट भी लो व फ़ोटो भी दिखाओ तभी बात बनेगी।

जय भोले नाथ, सबके साथ।

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October 23, 2011 at 4:43 PM delete

सही कहा संदीप , बगैर फोटू के मज़ा नहीं आ रहा हैं..ऐसा लगता हैं मानो ..टी.वी के जमाने में रेडियो देख रहे हो ? कम से कम अतुल के साथ ही एक फोटू लगा देनी थी ?

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October 26, 2011 at 12:15 AM delete

दीपावली के पावन पर्व पर हार्दिक बधाइयाँ और शुभकामनाएँ |

way4host
rajputs-parinay

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October 30, 2011 at 1:43 PM delete

Fir Beena Ticket Traint Ki sawari .

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November 7, 2011 at 6:47 AM delete

चलिये, आल्टो से पहुँचे तो आराम ही रहा होगा...और अब तो रात भर सोना ही है...

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November 11, 2013 at 12:38 PM delete

घूमने का शौक तो मुझे भी है यार पर क्या करूं, आपकी जैसी किस्मत कहां मेरी.

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