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Showing posts from March, 2011

अल्मोडा यात्रा की कुछ यादें

इस यात्रा वृत्तान्त को शुरू से पढने के लिये यहां क्लिक करें । अतुल के साथ की गई अल्मोडा जिले की यात्रा में कई बातें ऐसी हैं जो अभी तक नहीं लिखी गईं। 22 फरवरी 2011 की सुबह-सुबह मैं, अतुल, रमेश, कैलाश और भुवन एक साथ घर से निकले। हम उस समय तक रमेश, कैलाश और भुवन के घर भागाद्यूनी में थे। रमेश और कैलाश को वापस दिल्ली आना था, भुवन को किसी काम से मुक्तेश्वर जाना था जबकि मुझे और अतुल को जाना था अल्मोडा। मेरी और अतुल की बोलचाल कल से ही बन्द थी। कारण था कि मैं कल उसके साथ गांव में घूमने नहीं गया था। ऊपर मोतियापाथर से हिमालय का नजारा शानदार दिखता है लेकिन दिमाग खराब होने की वजह से अतुल को इसमें कोई दिलचस्पी नहीं थी। उसके मूड को देखते हुए मुझे लग रहा था कि कहीं वह रमेश के साथ ही दिल्ली कूच ना कर ले। मैं इस हालात के लिये भी तैयार था कि मुझे अगले दो दिन अकेले भी बिताने पड सकते हैं। खैर, हल्द्वानी की बस आई और रमेश और कैलाश उसमें बैठकर चले गये। तब मामला स्पष्ट हुआ कि अब अतुल मेरे साथ ही जायेगा। हमारा आज का दिन बेहद व्यस्त रहा। लगभग पूरा दिन ही बस में गुजर गया। मोतियापाथर से आठ किलोमीटर आगे

सिद्धान्त चौधरी उत्तराखण्ड घूमना चाहते हैं

गाजियाबाद से सिद्धान्त चौधरी लिखते हैं: "नीरज भाई नमन, नीरज जी, मैं आपका ब्लॉग पिछले डेढ साल से पढ रहा हूं। आप जिस तरह से अपनी लेखनी प्रस्तुत करते हैं, मैं उसका काफी बडा प्रशंसक हूं। माफी चाहता हूं कि किसी कारणवश मैंने आपसे सम्पर्क करने का प्रयास नहीं किया। जब भी आप उत्तराखण्ड की यात्रा का सार प्रस्तुत करते हैं तो मुझे लगता है कि आप मुझे कुछ विशेष जानकारी दे सकते हैं। देखिये, वैसे मैं उत्तराखण्ड कई बार गया हूं (हरिद्वार, ऋषिकेश, नीलकण्ठ, देवप्रयाग, रुद्रप्रयाग, कर्णप्रयाग, जोशीमठ, भीमताल, नैनीताल आदि)। मैं हमेशा अकेला ही उत्तराखण्ड के लिये घूमने निकला हूं। ज्यादातर मैं गलत सीजन में निकल जाता हूं (नवम्बर-फरवरी), इस कारण से मैं कभी ज्यादा आगे नहीं जा सका। रास्ते बन्द होते हैं और लोकल लोगों से आगे जाने के बारे में पूछता हूं तो मना कर देते हैं। एक बार इरादा भी बना लिया था कि अबकी बार दिसम्बर में बद्रीनाथ जाना है लेकिन पाण्डुकेश्वर से आगे आर्मी वालों ने मना कर दिया। वास्तव में मेरे पास टाइम भी कम होता है इसलिये मैं प्लानिंग को ठीक तरह से मैनेज और एप्लाई नहीं कर पाता। एक बात और

रानीखेत के पास भी है बिनसर महादेव

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इस यात्रा वृत्तान्त को शुरू से पढने के लिये यहां क्लिक करें । 23 फरवरी 2011 को दोपहर बारह बजे के आसपास मैं और अतुल रानीखेत पहुंचे। चूंकि यह मौसम पीक सीजन नहीं है, इसलिये यहां कोई भीड-भाड नहीं थी। अपनी यात्रा में मैं जहां भी जाता हूं, उस राज्य और जिले का नक्शा अपने साथ रखता हूं। एक दुकान पर चाय-समोसे खाते हुए नक्शे में देखा कि रानीखेत के पास दो जगहें हैं- झूला देवी मन्दिर और बिनसर महादेव। चाय वाले से सलाह मिली कि जाना ही है तो पहले बिनसर महादेव जाओ। अल्मोडा जिले में दो बिनसर हैं। एक बिनसर तो यह रानीखेत के पास है और दूसरा अल्मोडा से करीब 35 किलोमीटर उत्तर में बिनसर सेंचुरी के नाम से जाना जाता है। बिनसर सेंचुरी बहुत ही प्रसिद्ध जगह है। जबकि रानीखेत से बीस किलोमीटर दूर वाला बिनसर महादेव कम प्रसिद्ध है। लेकिन कसम से भाई, जगह बडी मस्त है।

एक बैजनाथ उत्तराखण्ड में भी है

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इस यात्रा वृत्तान्त को शुरू से पढने के लिये यहां क्लिक करें । भारत में बैजनाथ और बैद्यनाथ बहुत हैं। इनमें से हिमाचल प्रदेश वाला बैजनाथ काफी प्रसिद्ध है। दिल्ली से सीधे बसें भी चलती हैं। और तो और, पठानकोट से नैरो गेज वाली कांगडा रेल भी बैजनाथ होते हुए ही जोगिन्दर नगर तक जाती है। लेकिन उस बैजनाथ के अलावा एक बैजनाथ उत्तराखण्ड के कुमाऊं में भी है। यह बागेश्वर जिले में गरुड के पास है। कौसानी से हिमालय की ओर देखने पर बीच में एक काफी बडी घाटी दिखाई देती है। पूरी घाटी में गांव और कस्बे बसे हुए हैं। इस घाटी को कत्यूरी घाटी कहते हैं। इस कत्यूरी घाटी की राजधानी किसी जमाने में बैजनाथ थी। तब इसे कार्तिकेयपुर कहते थे। बैजनाथ में गोमती और गरुड गंगा बहती हैं। संगम के किनारे ही सन 1150 का बना हुआ मन्दिर समूह है जिसे कत्यूरी राजाओं ने बनवाया था। यहां पत्थर के बने हुए कई मन्दिर हैं जिनमें मुख्य मन्दिर भगवान शिव का है।

कौसानी

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इस यात्रा वृत्तान्त को शुरू से पढने के लिये यहां क्लिक करें । कौसानी उत्तराखण्ड के बागेश्वर जिले में अल्मोडा-कर्णप्रयाग मार्ग पर स्थित है। इसके बारे में महात्मा गांधी कहते थे- अगर भारत में कौसानी है तो भारतीयों को स्विट्जरलैण्ड जाने की जरुरत नहीं है। गांधीजी ने यहां कुछ दिन बिताये थे। वे उस समय जहां ठहरे थे, उस जगह को आज ‘अनाशक्ति योग आश्रम’ कहते हैं। मेरी दिलचस्पी कौसानी घूमने की नहीं थी। मुझे प्राचीन और ऐतिहासिक जगहें देखना अच्छा लगता है। इस इलाके में ऐसी ही एक जगह बैजनाथ है। जब अल्मोडा से बैजनाथ जाते हैं तो रास्ते में कौसानी पडता है। बस, रुक गये कुछ देर के लिये कौसानी में। कुमाऊं का पूरा इलाका हिमालय के विस्तृत दृश्य के लिये जाना जाता है। लेकिन कौसानी से जो दृश्य दिखाई देता है, वो अदभुत है। यहां आकर मैंने सोचा कि अगर कौसानी से हिमालय ऐसा दिखता है तो लोग रानीखेत क्या देखने जाते हैं? इसी कारण अगले दिन मैं भी रानीखेत गया। वाकई कौसानी के आगे रानीखेत कुछ भी नहीं।

एक कुमाऊंनी गाँव- भागादयूनी

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इस यात्रा वृत्तांत को शुरू से पढने के लिये यहां क्लिक करें । 21 फरवरी को मैं और अतुल भागाद्यूनी गांव में थे। वैसे तो आज हमें यहां से सुबह को ही वापस चल देना था लेकिन यहां आकर ऐसा जी लगा कि प्रोग्राम बदल गया। अब कल यहां से जायेंगे। आज हमें पूरा गांव देखना था- कुमाऊंनी गांव। वैसे तो अतुल महाराज के लिये हर चीज नई थी जबकि मेरे लिये भी कुछ बातें नई थीं। गांव के एक कोने में ऊंचाई पर कुछ चट्टानें हैं। इनमें कुछ गुफाएं भी हैं। जब अतुल को बताया गया कि गुफाओं को देखने चलते हैं तो उसने सोचा कि वे गुफाएं बडी-बडी और गहरी गुफाएं होंगी। दो-चार ऋषि-महात्मा भी बैठे मिलेंगे। लेकिन जब असलियत खुली तो अतुल के शब्द थे- ‘ये गुफाएं हैं? यार, सारा एक्साइटमेंट खत्म हो गया।’ ये शब्द सुनकर तय हुआ कि थोडा नीचे एक गहरी गुफा है- सांपों वाली गुफा, वहां चलते हैं। अतुल फिर एक्साइटेड।

यात्रा कुमाऊँ के एक गाँव की

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इस यात्रा वृत्तान्त को शुरू से पढने के लिये यहां क्लिक करें । 20 फरवरी 2011 की सुबह-सुबह दिल्ली से निकलकर मैं और अतुल दोपहर तक हल्द्वानी पहुंच गये। हल्द्वानी से लमगडा जाने वाली बस पकडी और मोतियापाथर तक का टिकट ले लिया। हल्द्वानी से मोतियापाथर तक के 60-70 किलोमीटर में बस से साढे तीन चार घण्टे लगते हैं। मैं चार साल पहले भी वहां जा चुका था। लेकिन अतुल के लिये सबकुछ नया था। धानाचूली बैंड पहुंचे। यहां से एक रास्ता मुक्तेश्वर को भी जाता है। धानाचूली से हिमालय की चोटियां साफ दिखाई देती हैं लेकिन उस दिन मौसम कुछ खराब सा था इसलिये नहीं दिखीं। हमारे यहां परम्परा है कि अगर किसी के घर मेहमान बनकर जा रहे हैं तो खाली हाथ नहीं जाना चाहिये। पिछली बार मैंने यहां से मूंगफली ली थीं। इस बार भी ले ली। पहाडी मूंगफली अपने यहां वाली मैदानी मूंगफली से कुछ ‘बदसूरत’ सी होती हैं लेकिन दाना बिल्कुल लाल होता है। यहां की मूंगफलियां मोटी भी होती हैं।

एक यात्रा अतुल के साथ

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जनवरी के आखिरी दिनों में मैं ऐसे ही बैठा ऊंघ रहा था तो किसी नये नम्बर से फोन आया। इधर से हेलो किया तो उधर से आवाज आई- “नीरज जाट जी बोल रहे हैं?” मुझे हां बोलने में क्या दिक्कत थी? आवाज आई कि मैं सोनीपत से अतुल बोल रहा हूं। आपका नम्बर आपके ब्लॉग से लिया है। फिर तो तारीफ पर तारीफ शुरू हो गई। अपन भी फूल कर कुप्पा हुए जा रहे थे। आखिर में उसने कहा कि मैं भी आपके साथ एक सफर पर जाना चाहता हूं। अतुल की बेचैनी यही खत्म नहीं हुई। तीन-चार दिन बाद ही दिल्ली आ पहुंचे। बोलचाल और चालढाल देखकर ही मैं समझ गया कि बंदा पक्का शहरी है। इसे तो दिल्ली निवासी होना चाहिये था, सोनीपत यानी हरियाणा में कहां से आ गया। हमें तो इससे अडै-कडै की उम्मीद थी। खैर, हमारे यहां कोई मेहमान आया है, बिना खाये-खिलाये कैसे जाने देंगे। ले गये कैंटीन में। समोसे बने हुए थे। बोला कि कुछ नहीं खाऊंगा। जबरदस्ती दो समोसे ले लिये। एक खुद उठा लिया और प्लेट अतुल के सामने सरका दी। प्लेट में खाली एक समोसा देखकर बोला कि इसे ऐसे ही खाना पडेगा?

नाहरगढ़ किला, जयपुर

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इस यात्रा-वृत्तान्त को आरम्भ से पढने के लिये यहां क्लिक करें । सिटी पैलेस देखने के बाद समय बच गया तो हम जयगढ किला देखने निकल पडे। जब तक वहां पहुंचे तो किला बंद हो चुका था। चार साढे चार बजे के आसपास किला बंद हो जाता है। इसके पास ही नाहरगढ किला है। यह अंधेरा होने पर बंद होता है। वैसे तो जयगढ किला ज्यादा भव्य बताया जाता है लेकिन नाहरगढ भी कम नहीं है। यह एक पहाडी पर बना है। यहां से पूरे जयपुर शहर का विहंगम नजारा दिखाई देता है। इसका निर्माण 1734 में महाराजा सवाई जयसिंह द्वितीय ने करवाया था। 1857 में यह किला आसपास के इलाकों से भागे हुए अंग्रेजों की शरणस्थली के रूप में काम आया। इसका शिल्प ज्यादा उन्नत नहीं है। लेकिन इसकी लोकेशन इसे खास बनाती है। यहां से सूर्यास्त और जयपुर शहर बडे भव्य दिखते हैं।