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2009 के आखिर में वैष्णों देवी के दर्शन करने जम्मू गया तो वापसी में कटरा से सीधा ऊधमपुर पहुँच गया। वहां से दोपहर बाद जम्मू जाने के लिए एक पैसेंजर ट्रेन पकड़ी। इस मार्ग पर सफ़र करके दिमाग में आया कि वैष्णों देवी का यात्रा वृत्तान्त तो होता रहेगा, पहले भारतीय इंजीनियरी का अदभुत करिश्मा दिखा दिया जाए।
2009 के आखिर में वैष्णों देवी के दर्शन करने जम्मू गया तो वापसी में कटरा से सीधा ऊधमपुर पहुँच गया। वहां से दोपहर बाद जम्मू जाने के लिए एक पैसेंजर ट्रेन पकड़ी। इस मार्ग पर सफ़र करके दिमाग में आया कि वैष्णों देवी का यात्रा वृत्तान्त तो होता रहेगा, पहले भारतीय इंजीनियरी का अदभुत करिश्मा दिखा दिया जाए।
जितनी जानकारी मुझे अभी तक है उसके अनुसार बात दरअसल ये है कि आजादी से पहले पाकिस्तान नामक देश भारत देश का ही हिस्सा था। उन दिनों पूरे भारत में रेल लाइनों का विस्तार होता जा रहा था। दिल्ली से अम्बाला, अमृतसर होते हुए लाहौर, रावलपिण्डी तक ट्रेनें जाती थीं। पठानकोट को भी अमृतसर से जोड़ दिया गया था। जम्मू तक भी ट्रेनें जाती थीं। उन दिनों जम्मू-सियालकोट के बीच रेल सेवा थी। रावलपिण्डी से श्रीनगर तक भी रेल लाइन बिछाने की योजना बन रही थी।
लेकिन तभी विभाजन हो गया। लाहौर के साथ साथ रावलपिण्डी और सियालकोट भी पाकिस्तान में चले गये। जम्मू का ट्रेन सम्पर्क कट गया। फटाफट जालन्धर से पठानकोट और पठानकोट से जम्मू तक रेल लाइन बिछाई गयी। रावलपिण्डी से श्रीनगर तक रेल ले जाने की जो योजना बनी थी, वह भी ख़त्म हो गयी। अब सोचा गया कि जम्मू से ही श्रीनगर को मिला दिया जाए। सात-आठ साल पहले इसे राष्ट्रीय परियोजना घोषित कर दिया गया। इसे चार चरणों में निपटाना है - 1. जम्मू-ऊधमपुर, 2. बारामूला - काजीगुंड, 3. ऊधमपुर - कटरा और 4. कटरा - काजीगुंड। इनमे से पहले दो चरणों का काम तो ख़त्म हो चुका है। 2011 तक कटरा तक भी ट्रेन पहुँच जायेगी। फिर चौथा चरण चलेगा।
अब बात करते हैं पहले चरण की यानी जम्मू - ऊधमपुर लाइन की। यह लाइन 55 किलोमीटर लम्बी है। इसका करीब आधा भाग तो तवी नदी के किनारे किनारे है और लगभग पूरा भाग विशाल पर्वतों के बीच से है। इसमें 20 सुरंगें हैं। सबसे लम्बी सुरंग करीब ढाई किलोमीटर (2440 मीटर) लम्बी है। 50 से भी ज्यादा पुल हैं। एक पुल तो सैनिक छावनी के ऊपर से बनाया गया है। हद तो तब होती है जब रेल एक किलोमीटर लम्बी सुरंग से गुजरकर एकदम बहुत ऊंचे छोटे से पुल से गुजरती है और फिर एक किलोमीटर लम्बी सुरंग में जा घुसती है। जहाँ जम्मू तवी रेलवे स्टेशन समुद्र तल से 343.753 मीटर की ऊंचाई पर है वही ऊधमपुर रेलवे स्टेशन 660.054 मीटर की ऊंचाई पर है। रास्ते में चार स्टेशन और हैं- बजालता, संगर, मनवाल और रामनगर जम्मू कश्मीर।
ऊधमपुर जाने के लिए दिल्ली से दो ट्रेनें हैं- जम्मू मेल (4033) व उत्तर संपर्क क्रांति (2445)। इनके अलावा एक पैसेंजर ट्रेन (1PJU) पठानकोट से व दो पैसेंजर ट्रेनें (1JU व 3JU) जम्मू से भी चलती हैं। सुरक्षा के लिए हर सुरंग व हर पुल के दोनों तरफ चेकपोस्ट बनाई गयी है जिनमे जवान मुस्तैद रहते हैं। वैसे तो हर सुरंग व पुल पर लिखा है कि फोटो खींचना सख्त मना है लेकिन आदत से मजबूर हूँ, कुछ फोटो खींच ही लिए हैं। ये लो, आप भी देखिये:

(शुरू करें सफ़र ऊधमपुर की और?)
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(अच्छा, यह तो रात के समय जम्मू स्टेशन ही है)
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(जम्मू से चलते ही तवी नदी भी साथ हो लेती है)
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(बजालता रेलवे स्टेशन- पहला स्टॉप)
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(अगला स्टॉप होता है संगर)
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(लगभग आधे रास्ते भर तवी साथ रहती है...)
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(...और फिर एक पुल आता है, इसके बाद तवी नहीं दिखती)
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(यह पुल कम से कम तीन किलोमीटर लम्बा है)
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(पचपन किलोमीटर में बीस सुरंगें हैं)
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(बीच में तीसरा स्टेशन है- रामनगर जे एंड के)
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(यहाँ से आगे कटरा तक भी ट्रेनें चली जाया करेंगी, फिर वैष्णों देवी जाने के लिए जम्मू में नहीं उतरना पड़ेगा)
वैष्णों देवी यात्रा श्रंखला
1. चलूं, बुलावा आया है
2. जय माता दी- जम्मू पहुंचे
3. जम्मू से कटरा
4. माता वैष्णों देवी दर्शन
5. शिव का स्थान है- शिवखोडी
6. जम्मू- ऊधमपुर रेल लाइन
ये तो बहुत सुंदर चित्रो सहित जानकारी मिली. बहुत धन्यवाद.
ReplyDeleteरामराम.
जम्मू-उधमपुर रेल मार्ग बनाकर वाकई असम्भव को सम्भव कर दिखाया है भारतीय रेलवे ने.
ReplyDeleteबढ़िया चित्र..उम्दा वृतांत.
ReplyDelete’सकारात्मक सोच के साथ हिन्दी एवं हिन्दी चिट्ठाकारी के प्रचार एवं प्रसार में योगदान दें.’
-त्रुटियों की तरफ ध्यान दिलाना जरुरी है किन्तु प्रोत्साहन उससे भी अधिक जरुरी है.
नोबल पुरुस्कार विजेता एन्टोने फ्रान्स का कहना था कि '९०% सीख प्रोत्साहान देता है.'
कृपया सह-चिट्ठाकारों को प्रोत्साहित करने में न हिचकिचायें.
-सादर,
समीर लाल ’समीर’
बहुत सुंदर चित्र, जम्मु तवी गाडी पर तो हम भी बेठे है, जो रोहतक हो कर जाती है,जाखल जा कर रेल गाडी बदल लेते थे सुबह ४ बजे, ओर फ़िर हम लुधियामा उतर जाते थे सुबह सुबह फ़िर वहां ्से बस से अपने गांव जाते थे
ReplyDeleteबहुत सी यादे याद दिला दी आप ने.धन्यवाद
शानदार चित्रों से सजी आपकी ये पोस्ट दिल लुभा गयी...आपकी ये यायावरी नए साल में और भी परवान चढ़े इस कामना के साथ नव वर्ष की शुभकामनाएं...
ReplyDeleteनीरज
Chitron ke sahare Jammu Tawi se Udhampur tak ke darshan ho gaye. Achchi jaankari di hai aapne railway network ke itihaas ke bare mein.
ReplyDeletepryas jee, jammu se udhampur rail patri bichana utna mushkil nahi tha jitna bhartiya rail ne bana diya. pariyojna sirf paanch saal ki thi aur ise pandrah saal lage. Bhartiya corrpution ka nayab namoona hai yeh.
ReplyDeleteNeeraj ji bahut badiya aise hi ghumate raho.
Good efforts by jaat jee for providing valuable update
ReplyDeleteबहुत सुन्दर ओर ज्ञान वर्धक जानकारी....शायद मार्ग दर्शन का काम करेगी....करीब 33साल पहले माता के दरबार गया था, अब शिव खोरी जरूर जाऊंगा.....आभार ओर प्रेम जाट राम जी एक जाट की ओर से...
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