Friday, May 30, 2014

चूडधार यात्रा-1

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7 मई 2014, बुधवार
चण्डीगढ स्टेशन के प्रतीक्षालय में जब नहा रहा था तभी बाडमेर-कालका एक्सप्रेस आ गई। मैंने कालका तक का टिकट ले रखा था। फटाफट नहाया और ट्रेन में जा बैठा। ट्रेन यहां काफी देर तक रुकी रही थी। हालांकि आज हिमाचल में लोकसभा के चुनाव थे, फिर भी मैंने सोच रखा था कि चूडधार तो जाना ही है। अगर उत्तराखण्ड की तरह यहां भी बसों का टोटा रहा तो सोलन तक जाने के लिये ट्रेन थी ही। हिमाचल में यात्रा करने का एक लाभ ये भी है कि यहां के पहाडों में बहुत दूर दूर तक दूसरे राज्यों की सरकारी बसें भी जाती हैं। उत्तराखण्ड में ऐसा नहीं है। अगर हिमाचल परिवहन की बसें बन्द मिली तो हरियाणा, पंजाब और चण्डीगढ परिवहन की बसें भी नियमित रूप से शिमला और आगे तक जाती हैं।

लेकिन ऐसा नहीं था। कालका बाजार के अन्दर से हिमाचल परिवहन की बस मिल गई। हालांकि यह भरी थी, मुझे खडे होकर यात्रा शुरू करनी पडी। सीट मिली डेढ घण्टे बाद धर्मपुर जाकर। यहां से सोलन पन्द्रह-बीस मिनट की दूरी पर ही है। सोलन बाईपास पर उतर गया। मुझे मालूम नहीं था कि नोहराधार की बसें यहां से भी मिल जाती हैं इसलिये पांच रुपये देकर एक ऑटो में बैठकर सोलन शहर के अन्दर वाले बस अड्डे पहुंचा। यहां आसानी से नोहराधार की बस मिल गई। यह बस कुपवी जा रही थी।
चूडधार जाने के कई रास्ते हैं लेकिन सबसे प्रचलित रास्ता नोहराधार वाला बताया जाता है। सोलन से 40 किलोमीटर दूर रामगढ है, उससे भी 35 किलोमीटर और आगे नोहराधार है। 75 किलोमीटर की इस दूरी को तय करने में पांच घण्टे लग जाते हैं। सडक बहुत पतली सी है और खराब भी है। हिमाचल की सडकों से मुझे एक ही शिकायत रही है कि दो-तीन राष्ट्रीय राजमार्गों को छोडकर अन्य मार्ग बेहद खराब हालत में हैं। सोलन से नोहराधार का किराया 100 रुपये है।
हिमाचल के जिस हिस्से में अब मैं प्रवेश कर रहा था, वह पर्यटकों से बिल्कुल अछूता है। इसकी पूर्वी सीमा उत्तराखण्ड के देहरादून जिले के जौनसार क्षेत्र से मिलती हैं। यानी टौंस नदी से। दक्षिण में नाहन, रेणुका झील और पौण्टा साहिब है और उत्तर में रोहडू। इस पूरे क्षेत्र के बिल्कुल बीच में 3600 मीटर से भी ज्यादा ऊंची चूडधार चोटी है जहां सर्दियों में खूब बर्फ पडती है जो मई तक रहती है। यह शिवजी भगवान को समर्पित है और पूर्वी हिमाचल व गढवाल में इसकी खूब मान्यता है। नोहराधार से चूडधार की दूरी 18 किलोमीटर है। रास्ते में ठहरने और खाने-पीने की सुविधाएं हैं और पैदल चलने लायक अच्छा रास्ता बना हुआ है।
ढाई घण्टे में बस रामगढ जाकर लगी। रामगढ इस इलाके का एक प्रमुख कस्बा है। यहां से शिमला, सोलन और नाहन को छोडकर जहां भी जाने वाली बसें मिलेंगी, उनके नाम आपने पहले कभी नहीं सुने होंगे- बडू साहिब, कुपवी, ब्राइला, पुन्नरधार, हाब्बन, शिलाई।
शाम चार बजे नोहराधार पहुंचा। 2135 मीटर की ऊंचाई पर बसा यह एक छोटा गांव है। लेकिन बसें यहां काफी देर तक रुकती हैं। बस ने मुझे जहां उतारा, वहीं से चूडधार का रास्ता जाता है। उसी के सामने चौहान साहब का होटल है। भूख लगी थी, सबसे पहले खाना खाया। फिर यहीं 250 रुपये का एक कमरा लेकर रुक गया। वैसे मेरा इरादा बारह बजे तक यहां पहुंचकर पैदल यात्रा शुरू कर देने का था लेकिन एक तो चण्डीगढ और कालका में ही लेट हो गया। रही सही कसर नोहराधार वाली बस ने पूरी कर दी। अब आगे बढने का सवाल ही नहीं था। सुबह आगे बढूंगा।
पहाड के दूसरे हिस्सों की तरह यहां भी मुझे चूडधार जाने से हतोत्साहित किया गया कि तीसरी के बाद बर्फ बहुत ज्यादा है। तुम यहां पहली बार आये हो, तुम नहीं जा पाओगे। जून में आना, कल वापस दिल्ली लौट जाओ। अगले दिन जब मैं चलने लगा तो उन्होंने मुझे रोके रखा कि अकेले हो, मत जाओ, रास्ता भटक जाओगे, नहीं पहुंच पाओगे। मैंने पूछा कि यह जो सामने प्रवेश द्वार है, रास्ता जाता दिख रहा है, क्या इसमें से आगे और भी रास्ते निकलेंगे? बोले कि रास्ता तो यही है, सीधे इसी पर बढते जाना है लेकिन तुम भटक जाओगे। मैंने कहा कि यही रास्ता है तो कभी नहीं भटकूंगा। फिर भी मुझे आगे नहीं बढने दिया गया। मैंने पूछा कि लोगबाग तो जा ही रहे होंगे। बोले कि रोज जा रहे हैं। मैंने कहा कि अगर रोज जा रहे हैं तो मैं भी चला जाऊंगा। आखिरकार छह लडकों का एक ग्रुप आया, तब उनके साथ जाने दिया मुझे। चलते चलते जब पक्का हो गया कि आगे रुकने की कोई समस्या नहीं आयेगी तो अपना स्लीपिंग बैग यहीं रख दिया।
आठ तारीख की सुबह आठ बजे यात्रा शुरू कर दी। नोहराधार एक धार पर बसा हुआ है। आगे चूडधार तक भी हमें धार के ही साथ साथ चलना होता है। शुरू में बडी तेज चढाई आई या फिर इतने दिनों बाद ट्रैकिंग कर रहा था तो इस वजह से लग रहा था। रास्ता घरों और खेतों के बीच से होकर ही आगे बढता है। जगह जगह श्रद्धालुओं ने सूचना पट्ट भी लगा रखे हैं। एक घण्टे तक चलते रहने के बाद 2384 मीटर की ऊंचाई पर लक्की ढाबा मिला। यहां तक घर और खेत बरकरार थे, इसलिये थकान नहीं हुई थी। फिर नोहराधार से भी पेट भरकर चला था।
जिन छह लडकों के साथ मैंने शुरूआत की थी, वे कांगडे के रहने वाले थे और कभी के मुझसे आगे निकल गये थे। पीछे मुडकर देखने पर नीचे धार पर बसा नोहराधार काफी शानदार दिखता है। जैसे जैसे आगे बढते जाते हैं, नोहराधार भी छोटा होता जाता है। जब जंगल में घुस जाते हैं तो यह दिखना बन्द हो जाता है।
एक घर के सामने से जब गुजर रहा था तो बडी तेजी से एक कुत्ता भौंकता हुआ आया। घर के लकडी के दरवाजे से बाहर निकलकर वह मेरी तरफ बुरी तरह भौंके जा रहा था। वह इतना उत्तेजित था कि कभी कभी तो मुझसे फुट भर की दूरी तक आ जाता। काट खाने को लालायित था। अगर मैं हिंसक हो उठता, कोई पत्थर उठा लेता तो वह पक्का मुझ पर झपट पडता। ऐसा कुत्ता मैंने आज तक नहीं देखा था। मुझे रुकना पडा और इस दृश्य को देख रही घर की मालकिन से कुत्ते को हटाने की गुहार करने लगा। लेकिन वह दुष्टा तमाशा देखती रही और एक बार भी कुत्ते को कुछ नहीं कहा। उल्टे मुझसे ही कहा कि तुम जाओ यहां से, तुम्हें देखकर भौंक रहा है। वो तो अच्छा था कि इसके साथी कुत्ते कुछ दूर खडे खडे हंसी मजाक की मुद्रा में गुर्रा देते थे। नहीं तो अगर वे भी इसका समर्थन करते तो मेरा काम तमाम था। धीरे धीरे मैं आगे बढा और आखिरकार मुसीबत से निकल गया।
साढे नौ बजे थे जब जंगल शुरू हो गया। चूडधार जाने वाले नोहराधार से सुबह ही निकलते हैं इसलिये जिसे भी जाना था, वो जा चुका था। न कोई आता दिख रहा था, न कोई जाता। अन्दाजा था कि वे छह लडके आधे घण्टे पहले यहां से निकले होंगे। कुछ तो उनका सहारा था, कुछ यह चौडी पगडण्डी; अन्यथा मुझे हिमालय के जंगलों से बहुत डर लगता है।
इसी जंगल में एक होटल मिला- शिरगुल राज होटल। यहां एक तो चाय नाश्ते की दुकान है। इसी के पास लाल छत वाला एक होटल है। दुकान बन्द थी, खुली होती तो मैं चाय पीता।
सवा ग्यारह बजे जमनाला नामक स्थान पर पहुंचा। यह जगह 2850 मीटर की ऊंचाई पर है। नीली छत वाली एक झौंपडी थी जो निःसन्देह खाने-पीने की दुकान ही होगी। यह भी बन्द थी। मैं कुछ देर बैठना और कुछ खाना पीना चाहता था। जमनाला जंगल के बीच में एक खुली जगह है और चरागाह भी है। कुछ गायें यहां चर रही थीं लेकिन इंसानी कौम यहां भी नहीं दिखी। पिछले दो घण्टों से लगातार भालुओं से भरे जंगल में चलते रहने से मैं डरा हुआ भी था, गायों को देखकर कुछ डर कम हुआ।
जंगल में पानी की कोई कमी नहीं है। पानी के अनगिनत छोटे छोटे झरने और सोते हैं। इसी तरह के एक झरने के पास पांच लडके बैठे खा-पी रहे थे। ये चूडधार से वापस आ रहे थे। मुझे अब तीसरी पहुंचने की जल्दी थी। मैंने इनसे पूछा तो बताया कि तीसरी पहुंचने में आधा घण्टा और लगेगा। आधा घण्टा यानी एक घण्टा। और ऐसा ही हुआ। जब तीसरी नामक जगह की पहली झलक मिली तो एक बज चुका था।
हवा अपने पूरे वेग से चल रही थी। तीसरी भी धार पर ही स्थित है। हिमालय की धारों की एक खासियत है कि अगर हवा न भी चले तो यहां जरूर लगती है और अगर थोडी बहुत ही चले तो धारों पर तूफान मच जाता है। दोनों तरफ दूर-दूर तक फैली घाटियां और आप स्वयं को बडी ऊंची जगह पर पाते करते हैं, जहां से आप इधर गर्दन घुमायेंगे तो नीचे दूर तक फैला जंगल और फिर गांव और सडकें, इसी तरह दूसरी तरफ गर्दन घुमायेंगे तो नीचे फिर वही नजारा। इस ऊंचाई की वजह से हवा बेरोकटोक चलती है। उडा देने को लालायित रहती है। तीसरी 3228 मीटर की ऊंचाई पर है। इस ऊंचाई पर ठण्ड भी बहुत होती है।
दुकान एक बडी चट्टान की आड में है, जहां हवा कम लगती है। फिर भी लगता था कि हवा इस मामूली सी झौंपडी को आज तो उडाकर ही ले जायेगी। मुझे सर्दी लग रही थी। अभी तक चढाई पर था तो शरीर गर्म था, उतनी सर्दी महसूस नहीं हो रही थी। पसीना भी आ रहा था। अब उसी पसीने की वजह से शरीर से गर्मी बाहर निकलनी शुरू हो गई तो सर्दी लगने लगी। फटाफट हिम्मत करके सारे कपडे बदले, दो कप चाय पी, आग के पास बैठा; तब जाकर राहत मिली।
हिमालय की इन ऊंचाईयों पर ऐसे मौसम में जंगल में एक झौंपडी में बैठे हों और चाय मिलती रहे; बस यही जन्नत हो जाती है। चाय की एक-एक चुस्की! आहा! महसूस ही किया जा सकता है, लिखा नहीं जा सकता।
मैंने पूछा कि अगर यह तीसरी है तो पहली और दूसरी कहां हैं? बोले कि नीचे शिरगुल राज होटल मिला होगा, वह पहली है। जमनाला दूसरी है और यह तीसरी है। फिर पूछा- चौथी भी है? हंसकर बोले कि नहीं, चौथी नहीं है। फिर तो आखिरी ही है। यहां से दिखता है चूडधार? बोले कि नहीं दिखता। लेकिन सामने उस चोटी पर चले जाओ, वहां से दिखेगा।
सामने वृक्षरहित एक ढलानदार मैदान है। जिसका उच्चतम सिरा यहां से काफी दूर था और करीब सौ मीटर ऊपर रहा होगा। अब तक ताजगी भी आ चुकी थी। यहीं रुकने का मन बना लिया था। कल सुबह जब हवा नहीं होगी, तो चूडधार जाऊंगा। इसलिये ठीक है, अब उस मैदान तक जाता हूं।
हल्की हल्की चढाई है। शीघ्र ही मैं इसके उच्चतम शिखर यानी 3343 मीटर की ऊंचाई पर था। यहां से चूडधार शिखर दिख रहा था। शिखर और इसके नीचे काफी बर्फ भी दिख रही थी। लेकिन काफी दूर से देखने पर बर्फ उतनी खतरनाक नहीं लग रही थी। मैंने कैमरा पूरा जूम करके देखने की कोशिश की ताकि शिखर को और स्पष्ट देख सकूं। ऊबड-खाबड चट्टानें ही दिखीं। कैमरा बन्द करने ही जा रहा था कि कुछ विशेष दिखा। लगा कि कुछ लोग बर्फ से होकर आगे बढ रहे हैं। कैमरे की ऑप्टिकल जूम की लिमिट से बाहर की बात थी यह, डिजीटल जूम का सहारा लेना पडा। सत्तर गुना बडा करने पर दिखने लगा कि वे पांच लोग हैं और चूडधार की ओर बढ रहे हैं। जो बर्फ अभी नंगी आंखों से छितरी हुई और कमजोर सी दिख रही थी, अब वही भयावह दिखने लगी। वे पांचों बडे तीखे ढलान पर फैली पडी बर्फ में रास्ता ढूंढते हुए धीरे धीरे आगे बढ रहे थे। मेरे रोंगटे खडे हो गये। मुझे भी कल वहीं से जाना है।
हिमालय में मेरी दो चीजों से जान सूखती है- जंगल और बर्फ। फिर बर्फ अगर तीखे ढलान पर हो तो और भी बुरी बात है। एक तो यह वैसे ही रपटीली होती है, फिर मेरे पैर भी कांपने लगते हैं। नीचे लौटकर सोचा कि अगर रोज बीस-तीस लोग आ-जा रहे हैं तो नीरज, तू भी जा सकता है। तुझे रास्ता तो बनाना ही नहीं है। बर्फ में पहले गये लोगों के पदचिह्न तो मिलेंगे ही। जैसे वे गये हैं, तू भी चला जायेगा।
मुझे पता है कि हिमालय के जंगलों में भालू होते हैं तो इस जंगल में भी हैं। इस वजह से मैं डरा हुआ भी था। मन था कि इस झौंपडी वाले से पूछूं। लेकिन यह भी कहेगा कि भालू हैं तो डर और बढ जायेगा। इसलिये नहीं पूछता। यही बात मन में बैठती गई, बैठती गई और आखिरकार पूछ ही बैठा कि यहां भालू तो आ ही जाते होंगे। बोला कि हां, आ जाते हैं। भालू के अलावा लकडबग्घे भी आते हैं। लेकिन आदमी को कुछ नहीं कहते। हिमालय में लकडबग्घा मेरे लिये नई जानकारी थी। मैंने कहा कि यहां लकडबग्घे कहां से आ गये, तेंदुए आते होंगे। बोला कि नहीं, तेंदुए नहीं हैं यहां, लकडबग्घे हैं। मुझे लग रहा है कि वे तेंदुए को ही लकडबग्घा कहते होंगे। क्योंकि तेंदुआ हिमालय में भालू से भी सुलभ जानवर है। तेंदुआ शिवालिक की पहाडियों से लेकर सुदूर लद्दाख तक पाया जाता है जबकि भालू केवल मध्य हिमालय का जीव है।
बाद में भाई तरुण गोयल से भी इस बारे में बात हुई। उन्होंने भी लकडबग्घे होने का खण्डन किया।
रेडियो पर एफएम में गाने बज रहे थे। यह शायद रेडियो मिर्ची था या रेड एफएम लेकिन था दिल्ली का कोई स्टेशन। जब आरजे ने बताया कि दिल्ली में आज मौसम सुहावना हो गया है, बूंदाबांदी हो रही है और तापमान गिरकर 39 डिग्री पर पहुंच गया है तो झौंपडी वाला बहुत हैरान हुआ। बोला कि ये क्या कह रहे हैं? 39 डिग्री तापमान और मौसम सुहावना। मैंने कहा कि हां, नीचे ऐसा ही है। 45 डिग्री से ऊपर था तापमान, अब 39 है तो मौसम सुहावना हुआ कि नहीं। उसका लडका भी बैठा हुआ था। लडका हैरान था कि किसी जगह का तापमान 45 डिग्री कैसे हो सकता है? ऐसे में लोगबाग कैसे रह सकते हैं?
यहां तीसरी में खाने-पीने के साथ साथ रजाईयां भी थीं, जिससे रात में अच्छी नींद आई।
नोहराधार में चूडधार जाने का रास्ता

चूडधार का रास्ता... शुरू में चढाई बडी तेज है।

कुछ ऊपर से दिखता नोहराधार



जमनाला

जमनाला


ऐसी चट्टानें हिमालय की उत्पत्ति की कहानी सुनाती हैं।

तीसरी

तीसरी एक धार पर है जहां हवा बडी तेज लगती है।



पीछे चूडधार शिखर है ऊपर बायें कोने में।


तीसरी के सामने वाले टीले का जीपीएस डाटा


चूडधार शिखर

बर्फ में आगे बढते पांच लोग

मौसम साफ हो तो किन्नौर के बर्फीले पर्वत दिख जाते हैं।


जडी-बूटियों की यहां भरमार है।



चूडधार और जाटराम

नीचे बायें तीसरी और ऊपर दाहिने चूडधार शिखर

लगता है तीसरी में कुछ यात्री आये हैं।


सूर्यास्त


यह है आज की ट्रैकिंग- नोहराधार से तीसरी तक। फोटो पर क्लिक करके बडा करके देखा जा सकता है।


अगले भाग में जारी...

चूडधार कमरुनाग यात्रा

1. कहां मिलम, कहां झांसी, कहां चूडधार
2. चूडधार यात्रा- 1
3. चूडधार यात्रा- 2
4. चूडधार यात्रा- वापसी तराहां के रास्ते
5. भंगायणी माता मन्दिर, हरिपुरधार
6. तराहां से सुन्दरनगर तक- एक रोमांचक यात्रा
7. रोहांडा में बारिश
8. रोहांडा से कमरुनाग
9. कमरुनाग से वापस रोहांडा
10. कांगडा रेल यात्रा- जोगिन्दर नगर से ज्वालामुखी रोड तक
11.चूडधार की जानकारी व नक्शा

16 comments:

  1. जिन रास्तों पर थोड़ी परेशानी के बाद जाया जा सकता है, पपता नहीं स्थानीय निवासी वहाँ जाने से क्यों रोकते हैं। मेरे साथ भी ऐसा कई बार हो चुका है। हास्य के पुट के साथ जबरजस्त लेखिनी।

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  2. jai ho neeraj bhai aisa aap hi kar sakte ho.

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  3. BADUU SAHIB ME INTERNATIONAL UNIVERSITY HAI YAH ISKHO DWARA CHALAI JATI HAI....YAH BAHUT FAMOUS PLACE HO GYA HAI...

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  4. Shandar Lekhan.... Mene Yatra Vritant me itni Achhi tarah se likhne wala banda nahi dekha....

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  5. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल शनिवार (31-05-2014) को "पीर पिघलती है" (चर्चा मंच-1629) पर भी होगी!
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  6. शानदार यात्रा वृतान्त व फोटो.
    हिमालय के जंगलो मे भालू व तेन्दुए वहुत पाए जाते है लक्कडभग्गे का पता नही.शायद वो ठीक भी कह रहे हो.

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  7. Namashkar neeraj ji ek bar phir himachal ghumane ke liye shukriya maza aa gaya main bhi india vapas aane ke bad koshish karunga himachal aur uttrakhand ghumne ki agli post ka girlfriend ki tarah intezar rahega

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  8. अहा!!! बहुत बढ़िया सफ़र....! घूम रहे हैं आपके साथ, बड़े दिनों बाद फिर से :)

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  9. आज एक बात बताओ नीरज , क्या तुम्हे मालुम होता है की जिस जगह जा रहा हूँ वहां ठहरने को मिलेगा ---? यदि नहीं मिला और तुम्हारा तम्बू भी नहीं हुआ तो क्या करोगे ऐसी हालत में ????

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  10. भाई, कायल हो गए पहाड़ों के, क्या गज़ब लगते हैं, तुम्हारी फोटोग्राफी ने और भी दर्शनीय कर दिए !!

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  11. neeraj ji bahut hi achha lga aapki profile dekh kar
    mai wo hun
    jisne raste me shirgul maharaj ki plates lagai thi, mera naam vijay bhawani hai, or mai ambala city ka rahne wala hun
    m.0972 99999 51

    kabhi ambala aana ho to ek baar jarur mil kar jana

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  12. neeraj ji bahut hi achha lga aapki profile dekh kar
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  13. neeraj ji bahut hi achha lga aapki profile dekh kar
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