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उत्तर बंगाल यात्रा - नेवरा वैली नेशनल पार्क

16 फरवरी 2018 हमारी इस यात्रा की शुरूआत नामदफा नेशनल पार्क से हुई थी और आज हम नेवरा वैली नेशनल पार्क जाने वाले थे। इनके बीच में भी हमने कई नेशनल पार्कों की यात्राएँ कीं। ये दोनों ही नेशनल पार्क कई मायनों में एक जैसे हैं। सबसे खास बात है कि आप दोनों ही नेशनल पार्कों में कुछ ही दूरी तक सड़क मार्ग से जा सकते हैं, लेकिन आपको बाकी यात्रा पैदल ही करनी पड़ेगी। हिमालयन काले भालू, तेंदुए और बाघ के जंगल में पैदल भ्रमण करना रोमांच की पराकाष्ठा होती है। किसी अन्य नेशनल पार्क में आपको पैदल घूमने की अनुमति आसानी से नहीं मिल सकती। यहाँ तक कि आप काजीरंगा तक में अपनी गाड़ी से नीचे नहीं उतर सकते। कई बार तो हम बैठकर गणना करते रहते कि अपनी मोटरसाइकिल से जाएँ या गाड़ी बुक कर लें। कल फोरेस्ट वाले ने बताया था कि मोटरसाइकिल से न जाओ, तो अच्छा है। हालाँकि स्थानीय लोग बाहरियों को इस तरह हमेशा मना ही करते हैं, हमें भी एहसास था कि 15-16 किलोमीटर दूर जाने में हालत खराब हो जानी है। अभी कुछ ही दिन पहले हम मेघालय में अत्यधिक खराब रास्ते और अत्यधिक ढलान के कारण बीच रास्ते से वापस लौटे थे, तो आज हमने गाड़ी बुक करना ही उचित ...

उत्तर बंगाल - लावा और रिशप की यात्रा

15 फरवरी 2018 हमने सोच रखा था कि अपनी इस यात्रा में 2000 मीटर से ऊपर नहीं जाएँगे। क्योंकि मुझे लग रहा था कि इतनी ऊँचाई पर कहीं न कहीं ब्लैक आइस मिलेगी और मुझे ब्लैक आइस से बड़ा डर लगता है। और आज जब हम माल बाजार में थे, तो लावा जाने और न जाने का मामला बराबर अधर में लटका हुआ था। “लेकिन लावा क्यों? अभी हमारे पास कई दिन हैं और हम सिक्किम भी घूमकर आ सकते हैं।” दीप्ति ने पूछा। “वो इसलिए कि अपनी मोटरसाइकिल से सिक्किम जाने में गुरदोंगमर झील भी जाना जरूर बनता है और फिलहाल या तो वहाँ का रास्ता बंद मिलेगा या खूब सारी ब्लैक आइस मिलेगी। मैं बिना गुरदोंगमर के सिक्किम नहीं घूमना चाहता।” दूसरी बात, कोई भी उत्तर भारतीय यात्री लावा घूमने नहीं जाता। वे दार्जिलिंग जाते हैं, सिक्किम जाते हैं, लेकिन लावा नहीं जाते। उत्तर बंगाल में जहाँ से भी कंचनजंघा दिख जाए, वही स्थान घूमने योग्य है। इसीलिए दार्जिलिंग प्रसिद्ध है। लावा से भी कंचनजंघा दिखती है, लेकिन दार्जिलिंग के आगे यह प्रसिद्ध नहीं हो पाया। फिर यह 2000 मीटर से ऊपर है। एक अलग ही नशा होता है, इतनी ऊँचाई वाले किसी अप्रसिद्ध स्थान में। माल बाजार में आलू के पर...

घुमक्‍कड़ों का कार्यक्रम: बरसूडी घुमक्कड़ महोत्सव

31 अगस्त 2018 एक बाइक पर मैं और दीप्ति व दूसरी बाइक पर नरेंद्र दिल्ली से सुबह-सवेरे निकल पड़े। सड़क खाली मिलती चली गई और हम नॉन-स्टॉप खतौली जा पहुँचे। भूख लगने लगी थी और खतौली बाईपास पर भोजन के विकल्पों की कोई कमी नहीं। लेकिन हम और भी सस्ते के चक्कर में सयाने बन गए और खतौली शहर में जा पहुँचे। यह सोचकर कि बाईपास पर तो टूरिस्ट लोग रुकते हैं और शहर में स्थानीय लोग ही होते हैं, इसलिए शायद किसी ठेले पर पाँच-दस रुपये में कुछ भरपेट मिल जाए। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। केले का एक ठेला था और अभी-अभी खुले हुए रेस्टॉरेंट थे, जिनमें कल के जूठे बर्तन माँजे जा रहे थे। भूख इतने जोर की लगी थी कि अगर केलेवाला न टोकता तो हम छिलका भी खा डालते। इस यात्रा में हम अकेले नहीं थे। इससे जुड़े सभी लोग एक व्हाट्सएप ग्रुप में भी थे और अब लगातार अपनी लाइव लोकेशन शेयर कर रहे थे। साथ ही अपने खाने-पीने के भी फोटो डाल रहे थे। जैसे ही माथुर साहब ने बताया कि वे घर से पचास-साठ आलू के पराँठे बनाकर लाए हैं, तो कलेजा सुलग उठा। माथुर साहब की लाइव लोकेशन देखी, तो वे मेरठ के आसपास थे और मवाना की ओर बढ़ रहे थे। “माथुर साहब को पकड़ो।” और हमन...

प्रजातंत्र... इंदौर... 24 अक्टूबर 2018

उत्तर बंगाल यात्रा - तीन बीघा कोरीडोर

14 फरवरी 2018 हम इतिहास की गहराइयों में नहीं जाएँगे, लेकिन इतना जान लीजिए कि आजादी से पहले इधर दो प्रमुख रियासतें हुआ करती थीं – कूचबिहार रियासत और रंगपुर रियासत। बँटवारा हुआ तो कूचबिहार भारत में आ गया और रंगपुर पूर्वी पाकिस्तान में। लेकिन इन दोनों रियासतों की सीमाएँ बड़ी अजीबो-गरीब थीं। एक रियासत के अंदर दूसरी रियासत की जमीनें थीं, जिन्हें ‘एंकलेव’ कहते हैं। यहाँ तक कि एक एंकलेव के अंदर दूसरा एंकलेव भी था और एक जगह तो तिहरा एंकलेव भी। बँटवारे में एंकलेव भी बँट गए। 1971 में बांग्लादेश बना, तब तक भी मामला ऐसा ही था। मुझे पता है कि ऊपर का पैरा आप बिल्कुल भी नहीं समझे होंगे। चलिए, आसान शब्दों में बताता हूँ। एंकलेव मतलब एक देश की मुख्यभूमि के अंदर दूसरे देश के आठ-दस गाँव, जो चारों ओर से पूरी तरह पहले देश से घिरे हुए हों। भारत के अंदर बांग्लादेश के गाँव भी थे और बांग्लादेश के अंदर भारत के गाँव भी। ऐसे एक-दो नहीं, बल्कि लगभग 200 एंकलेव थे। यानी भारत के उस एंकलेव में स्थित आठ-दस गाँवों के लोगों को अगर कोलकाता या सिलीगुड़ी कहीं भी जाना होता था, तो बांग्लादेश से होकर ही निकलना पड़ता था। इसी तरह बा...

उत्तर बंगाल यात्रा - बक्सा टाइगर रिजर्व में

13 फरवरी 2018 नौ बजे दुधनोई से चल दिए और लक्ष्य रखा राजा भात खावा। यानी बक्सा टाइगर रिजर्व के पास। दूरी चाहे जो भी हो, लेकिन हम दिन छिपने से पहले पहुँच जाएँगे। लगभग ढाई किलोमीटर लंबा नरनारायण सेतु पार किया। यह रेल-सह-सड़क पुल है। नीचे रेल चलती है, ऊपर सड़क। यह पुल ज्यादा पुराना नहीं है। शायद 1998 में इसे खोला गया था। उसी के बाद इधर से रेल भी चलना शुरू हुई। उससे पहले केवल रंगिया के रास्ते ही रेल गुवाहाटी जाती थी। पुल पार करते ही जोगीघोपा है। कोयला ही कोयला और ट्रक ही ट्रक। लेकिन हमें बजरंग जी के कार्यालय जाने की जरूरत नहीं पड़ी। उन्हें पता नहीं कैसे हमारी भनक लग गई थी और वे हमें सड़क पर ही हाथ हिलाते मिले। एक बार फिर से पुल पर आकर फोटोग्राफी का दौर चला। यहाँ राजस्थानी भोजनालय भी है। राजस्थानी भोजनालय मतलब शुद्ध शाकाहारी। कोयले और ट्रकों के कारण माहौल तो ‘काला-काला’ ही था, लेकिन यहाँ अच्छा खाना खाने वालों की अच्छी भीड़ थी। चलते समय हमें रास्ता भी समझा दिया गया कि आगे चलकर एक तिराहा आएगा और उधर से जाना, इधर से मत जाना। दो-चार स्थानों के नाम और बताए, लेकिन वे सब हमारे पल्ले नहीं पड़े।

अनजाने मेघालय में - चेरापूंजी-नोंगस्टोइन-रोंगजेंग-दुधनोई यात्रा

12 फरवरी 2018 मैं पहले ही बता चुका हूँ कि हमने नोंगस्टोइन होते हुए रोंगजेंग तक जाने का फैसला किया था। अगर समय पर्याप्‍त होगा, तो सीजू जाएँगे अन्यथा दुधनोई की तरफ निकल लेंगे। और इसके लिए सुबह चार बजे चेरापूंजी से निकलना भी पक्का कर लिया। लेकिन ऐसा भला कभी हुआ है? आठ बजे चेरापूंजी से निकले। चार घंटों का नुकसान कह रहा था कि अब हम सीजू तो नहीं जा रहे। चेरापूंजी से शिलोंग वाली सड़क पर चल दिए। जब दो दिन पहले हम चेरापूंजी आए थे, तो इस सड़क को अंधेरे में तय किया था, ठंड से ठिठुरते हुए। लेकिन इसकी खूबसूरती अब दिखनी शुरू हुई। सड़क तो वैसे पठार के ऊपर ही है, लेकिन पठार और गहरी घाटियों के किनारों से भी यह गुजरती है। दक्षिण में गहरी घाटियाँ दूर-दूर तक दिखती हैं। अगर मौसम एकदम साफ हो, तो धुर दक्षिण में बांग्लादेश का मैदानी इलाका भी देखा जा सकता है। इस समय मौसम तो वैसे साफ ही था, लेकिन दूर धुंध भी बनी हुई थी। जब शिलोंग दस-बारह किलोमीटर रह गया, तो मासिनराम से आने वाली सड़क भी मिल गई। हम इसी सड़क पर मासिनराम की ओर चल दिए। अब तक तो हम पूरी तरह पठार पर आ गए थे और गहरी घाटियाँ पीछे कहीं छूट गई थीं। अब पूरे रास...