Sunday, October 28, 2018

घुमक्‍कड़ों का कार्यक्रम: बरसूडी घुमक्कड़ महोत्सव

31 अगस्त 2018
एक बाइक पर मैं और दीप्ति व दूसरी बाइक पर नरेंद्र दिल्ली से सुबह-सवेरे निकल पड़े। सड़क खाली मिलती चली गई और हम नॉन-स्टॉप खतौली जा पहुँचे। भूख लगने लगी थी और खतौली बाईपास पर भोजन के विकल्पों की कोई कमी नहीं। लेकिन हम और भी सस्ते के चक्कर में सयाने बन गए और खतौली शहर में जा पहुँचे। यह सोचकर कि बाईपास पर तो टूरिस्ट लोग रुकते हैं और शहर में स्थानीय लोग ही होते हैं, इसलिए शायद किसी ठेले पर पाँच-दस रुपये में कुछ भरपेट मिल जाए। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। केले का एक ठेला था और अभी-अभी खुले हुए रेस्टॉरेंट थे, जिनमें कल के जूठे बर्तन माँजे जा रहे थे। भूख इतने जोर की लगी थी कि अगर केलेवाला न टोकता तो हम छिलका भी खा डालते।
इस यात्रा में हम अकेले नहीं थे। इससे जुड़े सभी लोग एक व्हाट्सएप ग्रुप में भी थे और अब लगातार अपनी लाइव लोकेशन शेयर कर रहे थे। साथ ही अपने खाने-पीने के भी फोटो डाल रहे थे। जैसे ही माथुर साहब ने बताया कि वे घर से पचास-साठ आलू के पराँठे बनाकर लाए हैं, तो कलेजा सुलग उठा। माथुर साहब की लाइव लोकेशन देखी, तो वे मेरठ के आसपास थे और मवाना की ओर बढ़ रहे थे।
“माथुर साहब को पकड़ो।” और हमने तुरंत खतौली से मीरांपुर की सड़क पर दौड़ लगा दी। जितनी दूरी है, उतने ही मिनट हमें मीरांपुर पहुँचने में लगे। फिर से माथुर साहब की लोकेशन देखी, वे अभी भी उसी जगह पर थे, जहाँ पंद्रह मिनट पहले थे। इसका मतलब वे रुके हुए हैं और पराँठे खा रहे हैं।
“कहीं वे सब पराँठे खत्म न कर दें।”
“पचास-साठ पराँठे थोड़े ही खा लेंगे वे दो जने?”
“क्या पता खा ही लें।"
“तो आगे गंगा बैराज पर रुकते हैं। कुछ देर उनकी प्रतीक्षा करेंगे और उन्हें बैराज पर ही रोक लेंगे। और वहीं हम भी पराँठे खा लेंगे।”
लेकिन मीरांपुर से निकलते ही जो बारिश शुरू हुई, उसने हमें रेनकोट पहनने को मजबूर कर दिया। जब तक रेनकोट पहने, तब तक हम तीनों भीग चुके थे।
बैराज पर गंगाजी महासागर बनी हुई थी। देखने में अच्छा तो लग रहा था, लेकिन बारिश ने रुकने नहीं दिया। क्योंकि अगर हम रुकते, तो माथुर साहब की लोकेशन देखने को मोबाइल निकालना पड़ता... और बेचारा मोबाइल एकदम भीग जाता। पराँठे हमें तो जीवनदान दे सकते हैं, लेकिन मोबाइल को नहीं।
बिजनौर शहर में पहुँच गए। एक पेड़ के नीचे तिरपाल डाले एक ठेलेवाला था। कढ़ी और आलू-पूरी मिल गए। पराँठों को भूल गए। बारिश अभी भी थी और तिरपाल चू रहा था। पानी मंगाने की जरूरत नहीं पड़ी, गिलास यूँ ही भर गया।
हमारे पास ऐसा कुछ भी नहीं था, जिससे हम चिकने हो चुके हाथ साफ कर सकें। मोटरसाइकिल का हैंडल चिकने हाथों से नहीं पकड़ा जा सकता। पकड़ना भी नहीं चाहिए।
“अखबार दे भाई।”
“ये लो जी... जितने चाहो, ले लो।”
अखबार के पन्ने फाड़-फाड़कर कई गोलियाँ बना दीं और हाथ एकदम साफ हो गए। अब जब हाथ साफ हो ही गए, तो मोबाइल में माथुर साहब की लोकेशन भी देख ली जाए।
“ओए, वे तो आगे निकल गए। बुढ़ापे में भी कितनी तेज गाड़ी चलाते हैं वे!"
“कहाँ पहुँच गए?”
“कीरतपुर।”

इस बार बारिश ने कोटद्वार क्षेत्र में बड़ी तबाही मचाई थी। जैसे ही पहाड़ शुरू होते हैं, बारिश की तबाही दिखने लगती है। जंगल वालों के एक कार्यालय की तो छत ही बची थी, बाकी सब बह गया। दीवारें वगैरा सब। पाँच किलोमीटर आगे भयंकर भू-स्खलन था। पिछले कई दिनों से यहाँ भू-स्खलन हो रहा था और राष्ट्रीय मीडिया में यह खूब सुर्खियों में था। आज सुबह भी यहाँ यातायात बंद था। अभी कुछ ही देर पहले रास्ता खुला था। अगर अभी भी बंद होता, तो हमें हरिद्वार का चक्कर लगाकर बरसूडी जाना पड़ता। लेकिन सुना है कि उधर भी कुछ गड़बड़ हुई है।
उत्तराखंड के कई जिलों में आजकल भारी बारिश का हाई अलर्ट घोषित हो गया था। स्कूलों की छुट्टियाँ हो गई थीं। चारधाम यात्रा बंद हो गई थी और कई ट्रैकिंग मार्गों पर भी रोक लगा दी थी। हमारे कुछ मित्र सतोपंथ जाने वाले थे, लेकिन उधर भी पहरा था।
इन सबके बावजूद भी कुछ लोग बरसूडी जा रहे थे।
कौन थे ये लोग? क्यों जा रहे थे ये बरसूडी?

हुआ यह कि तीन-चार साल पहले एक व्हाट्सएप ग्रुप बना... घुमक्कड़ी दिल से। इसमें उस समय के यात्रा ब्लॉगरों को जोड़ा गया। मुझे भी जोड़ दिया गया। धीरे-धीरे सदस्य बढ़ते चले गए। वहीं से आइडिया आया, एक गढ़वाली सदस्य बीनू कुकरेती के गाँव बरसूडी में कुछ करने का। दो बार पहले वहाँ कुछ हो चुका था, इस बार तीसरा मौका था। सभी ने आपस में पैसे इकट्‍ठे किए और दो-तीन दिन गाँव में रुकने और कुछ कार्यक्रम आयोजित करने की योजना बनाई; जैसे स्कूली कार्यक्रम, वृक्षारोपण और मेडिकल कैंप। एक लाख रुपये से भी ज्यादा राशि एकत्र हुई और फिलहाल लगभग पचास सदस्य बरसूडी के रास्ते में थे। कुछ पहुँच चुके थे, कुछ शाम तक पहुँच जाएँगे और कुछ कल पहुँचेंगे।

बरसूडी है कहाँ?
यह पौड़ी गढ़वाल जिले में है। कोटद्वार-पौड़ी मार्ग पर एक स्थान है गुमखाल। गुमखाल से जब ऋषिकेश की ओर चलते हैं, तो एक स्थान आता है द्वारीखाल। द्वारीखाल से सात-आठ किलोमीटर हटकर है बरसूडी। इनमें से चार-पाँच किलोमीटर तो कच्चा मोटर मार्ग है, बाकी पैदल चलना होता है। लेकिन इस पैदल में भी गाँव के दरवाजे तक मोटरसाइकिल चली जाती है।
खाल कहते हैं धार को। जिस धार पर गुमखाल स्थित है, उसी पर थोड़ी दूर लैंसडाउन भी स्थित है। यानी लैंसडाउन और गुमखाल लगभग समान ऊँचाई पर स्थित हैं। ठंडा मौसम रहता है। लेकिन लैंसडाउन तो प्रसिद्ध हो गया, गुमखाल प्रसिद्ध नहीं हुआ।
क्यों?
इसे गुमखाल वाले ही जानें।
अब जब गुमखाल प्रसिद्ध नहीं हुआ, तो और भी रिमोट में स्थित बरसूडी कैसे प्रसिद्ध हो जाएगा?
“अजी कैसे नहीं होगा प्रसिद्ध? हम करेंगे इसे प्रसिद्ध।” पिछले साल बीनू ने कहा था।
“हाँ, हम बरसूडी को उत्तराखंड के टूरिस्ट नक्शे पर लाएँगे।” बाकी सबने कहा था।
पता नहीं बरसूडी अभी तक उत्तराखंड के टूरिस्ट नक्शे पर आया है या नहीं आया, लेकिन सड़क तो पहुँचने लगी है। और मुझे अच्छी तरह याद है कि इस सड़क पर नरेंद्र ने मुझे दो बार नीचे गिराया। उस समय दीप्ति अकेले बाइक चला रही थी और वह आराम से निकाल ले गई।


घोंघा... कोटद्वार के आसपास कहीं...

गुमखाल क्षेत्र बेहद रमणीय है...




“नरेंद्र, अब तू आगे-आगे चल।”
“अरे नहीं, मुझे रास्ता भी नहीं पता।”
“रास्ता हम बताते हैं... हथेली पर लिख ले... पहले गुमखाल, फिर द्वारीखाल, फिर बरसूडी।”
“ओके.. लिख लिया।”
“क्या लिखा है?”
“पहले द्वारीखाल, फिर बरखाल, फिर गुमसूडी।”
“अबे नहीं... पहले गुमखाल, फिर द्वारीखाल, फिर बरसूडी।”


यह है द्वारीखाल... यहीं से बरसूडी मार्ग अलग होता है...

बरसूडी जाने वाला रास्ता

तो वहाँ पचास लोग कैसे ठहरेंगे?
बंद पड़े घरों में। यहाँ की संपूर्ण युवा आबादी शिक्षा और रोजगार के लिए मैदानों में शिफ्ट हो गई है और अब यहाँ केवल बूढ़े ही रहते हैं। पता नहीं कितने महीनों से बंद पड़े घर आज खुले थे।
गाँवों में तो सभी ताऊ और चाचा ही होते हैं। ज्यादा बूढ़े हुए, तो दादा। हमें बीनू के चाचा के यहाँ जगह मिली। और जैसे ही हमारा स्वागत करने को चाचा ने हाथ मिलाया, हमें लगा हम जन्नत में आ गए। इतना अपनापन केवल पहाड़ों में ही मिल सकता है।
और चाचा ने दारू तो कतई नहीं पी रखी थी। पहले तो मुझे लगा कि पी रखी है, क्योंकि पहाड़ों में दारू पीना एक रिवाज भी होता है। कम से कम ऐसे मौकों पर तो लोग पीते ही हैं। लेकिन यह मेरा वहम था। और यह वहम इतना बढ़ गया कि मुझे चाचा झूमते हुए दिखने लगे और उनके मुँह से दारू की गंध भी आने लगी। दीप्ति से पूछा - “चाचा ने दारू पी रखी है क्या?”
“नहीं।”
फिर भी वहम खत्म नहीं हुआ। लेकिन मुझे गंध क्यों आ रही है?
“माथुर साहब, आप बताइए। इन चाचा ने दारू पी रखी है ना?”
“मुझे तो नहीं लग रहा।”
फिर कुछ देर बाद सचिन त्यागी आ गए। उन्हें इसी घर में हमारे बगल वाला कमरा मिला। उनके आते ही मैंने सवाल दाग दिया - “त्यागी भाई, ऐसा लग रहा है जैसे चाचा ने दारू पी रखी है। मुझे गंध ही गंध आए जा रही है और काफी परेशान भी कर रही है।”
सचिन ने अपने अंदाज में मुआयना किया, चाचा के मुँह के पास नाक ले जाकर खूब बातें कीं और अच्छी तरह पड़ताल करने के बाद कहा - “नहीं पी रखी।”
...
“अरे रूपेश भाई... कैसे हो!”
रूपेश शर्मा जी ग्रेटर नोएडा में रहते हैं। व्हाट्सएप ग्रुप में पहले ही दिन से हैं, लेकिन आज पहली बार मिलना हुआ। और सबसे बड़ी बात कि बिल्कुल वैसे ही दिखते हैं, जैसे प्रोफाइल फोटो में दिखते हैं। सेम टू सेम।
और वे रहे चंद्रेश भाई। बनारस की तरफ के रहने वाले हैं। सस्ते में घूमते हैं। एक बार इनका फोन आया - “नीरज भाई, मैं गुरदोंगमर झील से बोल रहा हूँ। पच्चीस रुपये में गुरदोंगमर आ गया।” एक बार मैं ट्रेन से मुगलसराय से होकर गुजर रहा था, तो सिंघाड़ों से झोला भर दिया था। सिंघाड़ों में होते हैं काँटे... मुरादाबाद और गढ़ गंगा तक चला गया, लेकिन सिंघाड़ों के नीचे दबे केले नहीं निकाल पाया था। फिर एक बार पूरे दो दिनों तक धूप और बारिश में हमें बनारस और मिर्जापुर, विंध्याचल घुमाते रहे थे। आज बड़े दिनों बाद इनकी शक्ल देखी। बड़ा अच्छा लगा।
और वो रहा नटवर लाल भार्गव। भार्गव शायद पंडित होते हैं - राजस्थानी पंडित। लेकिन एक बार बरोट में मैंने सकुचाते हुए इससे पूछा था - “क्यों बे, तू अंडा खा लेता है क्या?” उत्तर मिला - “अंडा तो अंडा, मैं अंडे की माँ को भी खा लेता हूँ।”
एक बार नटवर एक गरीब लेखक के घर गया। लेखक खुश हो गया - आज तो 200 रुपये की बोहनी होकर रहेगी। लेकिन नंगा करके तलाशी लेने के बाद भी इसके पास 20 रुपये ही मिले। लेखक ने वही रख लिए। किताब थी - सुनो लद्दाख!
लेकिन मेरी नजरें ढूँढ रही थीं - माथुर साहब को।
“पराँठे तो सब खत्म हो गए।” माथुर साहब ने बम फोड़ा।
“कौन खा गया पचास पराँठे?”
“...”
“ठीक है, कल जिस-जिस को भी दस्त लगेंगे...”
और अगले दिन नरेंद्र को दस्त लग गए। उस नरेंद्र को, जो पूरे समय दिल्ली से यहाँ तक हमारे साथ रहा था।

सीधे अमरीका से आ रहे प्रवीण वाधवा जी से मिलना हुआ। वे अमरीका में कई किताबें लिख चुके हैं। ऑनलाइन भी लिखते रहते हैं। पिछले एक साल से उन्होंने हिंदी में लिखना शुरू किया है और देशभर में अपने खूब प्रशंसक बना लिए हैं। उनसे मिलकर बाकियों का तो पता नहीं , लेकिन मैं बड़ा धन्य हुआ। बाकी भी स्वयं को धन्य ही मान रहे होंगे, तभी तो कोई भी उन्हें अकेला नहीं छोड़ना चाहता था और वे एक तो जेटलैग और दूसरे आराम किए बिना लगातार चलते रहने के कारण नींद में डूबे हुए थे। खड़े हुए थे, तब भी लहर रहे थे। इसी वजह से उनके पाँवों में भी सूजन थी।
पानीपत कृषि विश्वविद्यालय में प्रोफेसर श्री बलकार जी से मिलना हुआ। उन्होंने अपनी एक किताब ''Common Garden Plants'' हमें दी। इस किताब में भारत में उगने वाले 207 फूलों के बारे में सचित्र सविस्तार लिखा गया है। हमारे लिए तो यह किताब बड़े काम की है।
पंजाब से आए हरजिंदर से भी मिले। हिंदी नहीं बोल सकते, लेकिन पढ़ सकते हैं। हमने उसी कमरे में अपनी किताबों की दुकान लगा ली थी, वे कई किताबें खरीदकर ले गए।
तो बहुत सारे मित्रों से मिलना हुआ, जिनसे पहले भी मिल चुके थे और जिनसे पहले कभी नहीं मिले थे। सूरज मिश्रा ने अपने पर्वतारोहण के किस्से सुनाए और हमें भी प्रेरित किया। प्रेरित इसलिए किया क्योंकि उन्होंने पर्वतारोहण का कोई प्रशिक्षण नहीं लिया है। स्वयं करते-करते सब जान गए।
भोजन का प्रबंध पंचायत भवन में था। हलवाई थे, पत्तलें थीं और दरी बिछी थी। मेरा नंबर पहली ही पंगत में आ गया। लेकिन आयोजकों को लगा कि यहाँ दरी बिछाना सही निर्णय नहीं है। अगर थोड़ा हटकर बिछाई जाए, तो पंगत में ज्यादा लोग आ जाएँगे।
हिंदुस्तान में भोजन करते व्यक्ति को टोकना अच्छा नहीं माना जाता, इसलिए कई लोग जोर-जोर से आपस में खुसर-पुसर करने लगे - “नीरज उठेगा, तो दरी को उधर बिछाएँगे, तभी बाकी लोग खाएँगे।” वे लोग आपस में जोर-जोर से खुसर-पुसर करते-करते दरी पर ही आ गए - “नीरज खाना खा लेगा, तो दरी को वहाँ ले जाएँगे। सभी लोग भूखे हैं, वहीं पर सभी एक साथ खा लेंगे।”
“अनिल, ओ चावल ला, और दाल भी; आधा पेट भर गया।” नीरज की आवाज गूँजी।
अनिल फटाक से दाल-चावल से प्लेट भर गया और कानों में फुसफुसा गया - “सर जी, उठ मत जाना।”

पंचायत भवन से उन चाचा के घर पहुँचे, तो पाया कि चाचा ने जो कमरा हमें दिया था, उसमें वे स्वयं सोए हुए हैं और कमरा दारू की दुर्गंध से गंधायमान हो रहा है। शायद फिर से मेरा वहम सक्रिय हो गया। रात के ग्यारह बजे थे। शायद चाचा भूल गए थे कि इस कमरे और इस बिस्तर पर आज किसी और का नाम लिख दिया था। या उन्हें लगा होगा कि बगल वाला कमरा तो दे ही रखा है। खैर, जो भी था, हमें इस बात से कोई शिकायत नहीं थी। यह होटल नहीं था, यह उनका घर था।
यह भी अच्छा था कि हमारे पास टैंट था। भला हो अनिल का कि वह इसे अपनी गाड़ी में रखकर ले आया था और तीन किलोमीटर पैदल चलकर गाँव तक भी ले आया था। हमने वहीं छत पर टैंट लगाना शुरू कर दिया।
तभी वहाँ से गुजर रहे अमरोहा के डी.एस.पी. श्री कुलदीप कुकरेती जी की निगाह पड़ गई - “यह क्या कर रहे हो? बाहर टैंट में सोओगे? आप बाहर सोओगे, तो गाँव की बेइज्जती हो जाएगी। हम आपको बाहर नहीं सोने देंगे।”
और दूसरे घर में एक कमरा मिल गया।


बरसूडी में विश्राम करते हुए... और पीछे बादलों की अठखेलियाँ...



खाने से जस्ट पहले... या फिर खाने के जस्ट बाद.. और फोटो में कौन-कौन हैं, मैं तो जानता हूँ... आप क्या करोगे जानकर?...

बरसूडी एक धार पर स्थित है... इसलिए पानी की तंगी रहती है... पुरुषों को नहाने के लिए गाँव से बाहर कुछ दूर जाना पड़ता है... लेकिन यह रास्ता भी सेल्फीस्टों के लिए शानदार है...



बरसूडी गाँव...

1 सितंबर 2018
आज का दिन था स्कूली कार्यक्रम का। हल्की बूंदाबांदी के बीच जब स्कूल में पहुँचे, तो मैं हैरान रह गया। प्राइमरी स्कूल तो गाँव से पौन किलोमीटर दूर है, लेकिन सीनियर सेकंडरी स्कूल दो किलोमीटर दूर है। खेती अब गाँव के आसपास ही सिमटकर रह गई है। क्योंकि खेती करने वाला कोई नहीं रहा। खेतों में खरपतवार और जंगल उगने लगा है। ये दो किलोमीटर जंगल से होकर ही हैं। स्कूल भी चारों ओर से जंगल से ही घिरा है। भला क्या तुक थी गाँव से इतनी दूर स्कूल बनाने की! हालाँकि स्कूल बरसूडी वालों की जमीन पर ही बना है।
“क्योंकि यह स्कूल कई गाँवों के बीच में है।” बीनू ने बताया।
मतलब कई गाँवों में यह अकेला हाई स्कूल है। यहाँ दसवीं तक की पढ़ाई होती है।
“उसके बाद?”
“बारहवीं के लिए द्वारीखाल।”
“फिर उसके बाद?”
“फिर कोटद्वार।”
इसका मतलब इतने सारे गाँवों का जो छात्र बारहवीं पास कर लेगा, उसे घर छोड़ना ही पड़ेगा। और कोई अगर अपने बच्चे को घर से बाहर भेजकर कोटद्वार में पढ़ा सकता है, तो वह देहरादून में भी पढ़ा सकता है। और फिर वो बच्चा हमेशा के लिए दिल्ली या देहरादून का हो जाता है। गाँव वापस लौटने की उसके पास कोई वजह नहीं होती।
और आप यह जानकर हैरान हो जाएँगे कि बरसूडी के प्राइमरी स्कूल और हाई स्कूल दोनों में भले ही कई गाँवों के छात्र पढ़ने आते हों; इसके बावजूद भी पहली कक्षा से दसवीं कक्षा तक कुल 63 छात्र हैं। दो स्कूलों में कई गाँवों के 63 छात्र!!!
आज हालाँकि हाई अलर्ट के कारण छुट्टी थी, लेकिन केवल 2 छात्र अनुपस्थित थे। सभी अध्यापक और बाकी सभी छात्र उपस्थित थे। खेलकूद प्रतियोगिताएँ हुईं, जिनमें लगभग सभी छात्रों ने पहला, दूसरा, तीसरा स्थान प्राप्त किया। कुछ कक्षाओं के तो शत प्रतिशत छात्रों को मेडल मिले, क्योंकि उन कक्षाओं में कुल 3-3 ही छात्र थे।
मुझे सबसे सीनियर छात्रों यानी नौवीं और दसवीं के छात्रों से बातचीत का मौका मिला।
“सबसे दूर से कौन आता है?”
एक लड़की ने शरमाते हुए हाथ जरा-सा हिलाया।
“कितना समय लगता है?”
“दो घंटे।”
यानी दो घंटे आने में और दो घंटे जाने में... पैदल... मतलब कम से कम 8 किलोमीटर दूर इनका गाँव है। और जंगल का रास्ता।
और वहाँ देहरादून में बैठकर पलायन पर सेमीनार आयोजित होती हैं, लेख लिखे जाते हैं, चिंताएँ व्यक्त की जाती हैं। देहरादून-दिल्ली मार्ग चार-लेन का बनाया जा रहा है; हरिद्वार में विशेष औद्योगिक केंद्र सिडकुल स्थापित किए जा रहे हैं; रेलवे लाइन बिछाई जा रही है; चारधाम परियोजना पर काम चल रहा है।
और इधर इन स्कूलों में पढ़ने वाले 63 बच्चों के गाँवों में आज भी सड़क नहीं है। मैं यही सब सोचता रहा, उधर प्रवीण वाधवा जी कहते रहे - “बच्चों, क्या आप जानते हैं कि हम कौन लोग हैं और आपके यहाँ क्यों आए हैं?”

और आप यह जानकर अत्यधिक हैरान हो जाएँगे कि प्राइमरी स्कूल के हैडमास्टर ने आज सुबह-सवेरे ही चाय की जगह दारू, पानी की जगह दारू और रोटी की जगह दारू ले ली थी। मुझे नहीं पता कि हैडमास्टर का क्या नाम था और वे कहाँ के रहने वाले थे, लेकिन आज यह मेरा वहम नहीं था। हैडमास्टर बरसूडी के तो रहने वाले नहीं थे, क्योंकि बरसूडी के लोग दारू नहीं पीते। दारू को छूते भी नहीं हैं, पाप समझते हैं। गाँव के बाहर इस बारे में तीन-चार बोर्ड भी लगे हैं। बताते हैं कि यह गाँव कुकरेतियों का मूल गाँव है और कुकरेतियों की कुलदेवी भी यहीं निवास करती हैं, इसलिए यहाँ कोई भी दारू नहीं पीता।
लेकिन स्कूल में तो पी जा सकती है, क्योंकि स्कूल गाँव से बहुत दूर है। जिस समय सभी बच्चे खेलकूद प्रतियोगिताओं में मेडल जीत रहे थे, उस समय उन बच्चों का हैडमास्टर उन्हीं बच्चों के सामने जमीन पर गिरा पड़ा था। जिस समय सभी बच्चों को मंच पर सम्मानित किया जा रहा था और सभी शिक्षकों को उपहार दिए जा रहे थे, उस समय हम घुमक्कड़ों की टोली में आवाज उठ रही थी - हैडमास्टर को यहाँ आने भी नहीं देना है। हालाँकि हमारी सभी शिक्षकों को भी सम्मानित करने की योजना थी, इसलिए हैडमास्टर को एक बार सम्मानित करने मंच पर बुलाना पड़ा।

और ऐसा नहीं था कि केवल वही एक आदमी नशे में धुत्त था। हम 50 घुमक्कड़ों में से भी कई लोग उसके भी उस्ताद थे। पूरे कार्यक्रम में जिनकी आवाज किसी ने नहीं सुनी, शाम को उनकी आवाज 7 किलोमीटर दूर द्वारीखाल तक पहुँच रही थी। पूरे कार्यक्रम में जिनकी शक्ल किसी ने नहीं देखी, वे आधी रात को केवल कच्छा पहने गाँव के चक्कर लगा रहे थे।

खैर छोड़िए... हमारे लिए बरसूडी में एक से एक सुखद क्षण आए। दोपहर बाद जब हम स्कूल से गाँव वापस पहुँचे, तो नवीन सजवाण अपने एक मित्र के साथ हमारी प्रतीक्षा कर रहे थे। नवीन भाई गुप्तकाशी के पास स्थित बसुकेदार के रहने वाले हैं और वहीं पर अध्यापक हैं। आज चूँकि छुट्टी थी, तो वे सुबह ही अपने घर से निकल पड़े थे और अब दोपहर बाद यहाँ पहुँचे। वे कई वर्षों से मेरा ब्लॉग पढ़ते हैं और पता नहीं कब से अपने यहाँ आने को कह रहे हैं। इस बार भी कहा, लेकिन बसुकेदार बहुत दूर है - चौखंबा के तले है बसुकेदार।

अगले दिन मेडिकल कैंप और वृक्षारोपण था। मेडिकल कैंप के लिए दिल्ली, मेरठ और अमरोहा तक से कई डाक्टर निःस्वार्थ भाव से आए थे। लेकिन समयाभाव के कारण हम यहाँ और ज्यादा समय नहीं दे पाए और वापसी के लिए निकल गए।

उम्मीद है कि अगली बार जब भी आएँगे, तो गाँव तक मोटर मार्ग पहुँच चुका होगा; प्राइमरी स्कूल के हैडमास्टर की बदली धारचूला की तरफ हो चुकी होगी और कोई संस्कारी हैडमास्टर आ चुका होगा और बीनू की तरह गाँव के कुछ और युवा भी ऐसी मुहिम में शामिल होंगे।

स्कूल चलें हम...


वह स्कूल है और यह खेल का मैदान... बाकी सब जंगल ही जंगल...




बच्चों के लिए पुरस्कार सामग्री और प्रोत्साहन सामग्री की व्यवस्था...


ये कौन-कौन हैं?... एक मिनट... पहचान लूँ... सबसे दाहिने है मास्टरजी नवीन सजवाण... फिर हेलमेट बाबा उमेश... नीचे बैठा नरेंद्र... जाटराम... और दूसरे हेलमेट बाबा का नाम भूल गया... और बुलेट पर दीप्ति...

पता नहीं कहाँ का रास्ता है..


और एक रेस यह भी थी... इसमें हाफ बाजू की टी-शर्ट पहने सचिन त्यागी आगे से पहले नंबर पर आया... और जाटराम पीछे से पहले नंबर पर... इससे एक सीख मिली... रेस जीतनी है, तो हाफ बाजू की टी-शर्ट पहननी चाहिए...

दो मुरादाबादियों का मिलन...

बच्चों से बातचीत...

और हमने दुकानदारी का कोई मौका नहीं छोड़ा... किताबों के कद्रदानों ने इतनी किताबें खरीदीं कि बरसूडी आने-जाने का खर्चा भी निकल गया और खाने-पीने का भी... यहाँ तक कि तरुण गोयल की किताबें भी बेच डालीं और गोयल साहब को एक धेला तक नहीं दिया...

ये फोटो पता नहीं किस-किसके हैं... व्हाट्सएप ग्रुप में शेयर हुए, तो कुछ चुनिंदा फोटो उठा लिए... ये जिनके भी हैं, उन्हें बहुत-बहुत धन्यवाद...


यह है पुरुषों के नहाने की जगह... महिलाएँ इस फोटो को न देखें... आगे बढ़ें...

सब सामान बच्चों को देने के लिए है...

हड्‍डी-रोग विशेषज्ञ डॉ. सुभाष शल्य जी बरसूडी तो नहीं जा सके, लेकिन उन्होंने दवाइयाँ भेज दीं...

बरसूडी के स्कूल में... सबसे दाहिने पानीपत कृषि विश्वविद्यालय में प्रोफेसर श्री बलकार सिंह जी और सबसे बाएँ अमरीका निवासी व कई पुस्तकों के लेखक श्री प्रवीण वाधवा जी... दोनों के बीच में बाकी सब...

खेल का भी काफी सामान भेजा गया... और फुटबॉल में हवा भरने का पंप भी... पता नहीं अब कोई खेलता होगा या नहीं...


श्री और श्रीमति माथुर साहब... पचास पराँठों वाले... 

हम सब घुमक्कड़ों ने सब बच्चों को ऐसे ही सम्मानित किया... और वो टी-शर्ट वाली रेस जो-जो घुमक्कड़ जीते थे, उन्हें बच्चों ने सम्मानित किया...
और मंच संचालन करते छत्तीसगढ़ से आए घुमक्कड़ श्री प्रकाश यादव जी... 



और अगले दिन अखबारों में...



...
लेकिन बात यहीं समाप्त नहीं हो जाती। अब सवाल उठता है कि इस कार्यक्रम से हासिल क्या हुआ। मेरी इस बारे में कार्यक्रम से जुड़े कई लोगों से बातचीत हुई। मेरा स्वयं भी यही मत है कि कहीं कुछ कमी थी। हमने दोनों स्कूलों के प्रत्येक बच्चे को कुछ बेसिक वस्तुएँ जैसे जूते, स्कूल बैग, कापियाँ, पैन, पेंसिल, खेल का सामान आदि दिए। अध्यापकों को भी ट्रैकसूट आदि दिए गए। पुस्तकालय के लिए पुस्तकें भी दी गईं। लेकिन अब लग रहा है कि कहीं इस तरह दिया जाना उन्हें ‘अपंग’ तो नहीं बना रहा? या ‘हमने यह दिया, हमने वह दिया’ कहना उनके आत्मसम्मान को ठेस तो नहीं पहुँचा रहा? इस तरह के कई सवाल मन में उमड़ रहे हैं। एक बैग देकर या जूते देकर क्या हमने उनका भविष्य सुरक्षित कर दिया? वे पहाड़ से बाहर नहीं जाएँगे और पहाड़ में ही अच्छा कमा-खा लेंगे, इसके लिए हम उन्हें मार्गदर्शन नहीं दे पाए। हालाँकि हमने सबसे सीनियर छात्रों के साथ कुछ बातचीत अवश्य की थी, लेकिन अल्प समय की उस बातचीत में हम उनसे भारत के राज्यों की राजधानियों के नाम और उत्तराखंड के जिलों के नाम ही पूछते रहे। आठ का पहाड़ा सुनकर एक बच्चे को ज्यादा अच्छा और दूसरे को कम अच्छा घोषित करते रहे।
हम ग्रामीणों से बातचीत नहीं कर पाए। हालाँकि बरसूडी में बूढ़े रहते हैं, लेकिन जो छोटे-छोटे बच्चे उस स्कूल में पढ़ने जाते हैं, उनके माता-पिता ये बूढ़े तो नहीं ही होंगे। उनके माता-पिता हमारी ही उम्र के होंगे। जिस उम्र की पूरी पीढ़ी आज पहाड़ से बाहर निकलती जा रही है, वे लोग यहाँ पहाड़ में रुके हुए हैं। वे किस प्रेरणा से रुके हुए हैं? क्या करते हैं वे यहाँ? आजीविका कैसे चलाते हैं? हमें उनसे सीखने की आवश्यकता थी और उन्हें यहीं रुके रहने के लिए पुरस्कृत व उत्साहित करने की भी आवश्यकता थी। लेकिन हम उन तक नहीं पहुँच सके।
अगली बार जब भी बरसूडी आना होगा, ये बातें हमारे दिमाग में रहेंगी और हम और ज्यादा परिष्कृत तरीके से काम करेंगे।
...
बाद में वृक्षारोपण भी हुआ। कुछ बीज डाले गए, कुछ पौध रोपी गईं। इनके पेड़ तो आने वाले समय में ही फल देंगे।
...
और आखिर में मैं यहाँ के एक ऐसे व्यक्ति का उल्लेख करना चाहूँगा, जो मैदानों में जा बसा था, लेकिन आज वापस पहाड़ में लौट आया है और यहीं से अपनी रोजी-रोटी कमा रहा है।
बीनू कुकरेती...
इसने अपने कुछ पहाड़ी मित्रों के साथ मिलकर एक ट्रैकिंग एजेंसी शुरू की है। ये लोग उत्तराखंड समेत कई राज्यों में ट्रैकिंग कराते हैं। लेकिन आजकल बीनू को एक भूत चढ़ा हुआ है - बरसूडी को उत्तराखंड के टूरिस्ट मैप में स्थान दिलाना है।
बरसूडी एक बेहद समृद्ध गाँव है। प्राकृतिक सुंदरता से भरपूर। यहाँ से चारों ओर का नजारा मन मोह लेता है। आप अगर कभी बरसूडी चले जाओगे, तो इसकी तारीफ करते हुए ही लौटोगे। यह सांस्कृतिक रूप से भी काफी समृद्ध है। यहाँ के बहुत सारे लोग बेहद उच्च पदों पर कार्यरत हैं।
हालाँकि बरसूडी में अभी फिलहाल कोई होटल या आधिकारिक होम-स्टे नहीं है, लेकिन अगर आप यहाँ जाओगे, तो यहाँ के निवासियों की सेवा भावना देखकर आपको होटल की याद नहीं आएगी। जिन निवासियों ने हम 50-60 लोगों को आगे बढ़कर अपने घरों में ठहराया, खुद जमीन पर सोए और हमें बिस्तरों पर सुलाया; वे आपके साथ भी बेहद शानदार व्यवहार करेंगे।
लेकिन इस तरह जाने में एक व्यावहारिक समस्या है। सर्वश्रेष्ठ देने के बाद भी मेजबान को लगेगा कि उसने आपका अच्छा स्वागत नहीं किया है, अच्छा खाना नहीं खिलाया है, अच्छा बिस्तर नहीं दिया है। और वे आपसे एक भी पैसा नहीं लेंगे। उधर आपको हीनभावना महसूस होगी कि इन्होंने हमारा इतना शानदार सत्कार किया, जी-जान से खाना खिलाया, अपने सर्वश्रेष्ठ बिस्तर पर सुलाया और पैसे भी नहीं लिए।
या हो सकता है कि मैं चार-पाँच दिन बीनू के घर पर ही रुककर आऊँ। लेकिन बाद में अगर कभी मेरी और बीनू की किसी बात पर अनबन हो जाती है, तो हो सकता है बीनू कह दे - अरे हम खुद नीचे सोए थे और तुम्हें बिस्तर पर सुलाया था। हालाँकि पहाड़ के लोग ऐसे नहीं होते, बीनू भी ऐसा नहीं है... वह ऐसा नहीं कह सकता... लेकिन अगर भविष्य में कोई बड़ी अनबन हो ही गई और उसने कह ही दिया, तब...?
हम 50 लोग दो दिनों तक बहुत सारे घरों में रुके। लेकिन क्या पता आज कोई ऐसी बात कह ही रहा हो? मुझे पता है कि पहाड़ के लोग ऐसे कतई नहीं होते...
लेकिन... अगर... आपसी बातचीत में... यूँ ही... कोई ताने मार ही रहा हो... कि हम जमीन पर सोए और अपने बिस्तरों पर इन्हें सुलाया...?
इसका समाधान है पैसे का प्रवाह। दोनों पक्षों के बीच पैसे का प्रवाह होगा, तो कभी भी ऐसी स्थिति सामने नहीं आएगी।
बीनू यही काम कर रहा है। अभी उसने पौड़ी के पास किसी गाँव में होम-स्टे शुरू किया है, भविष्य में बरसूडी में भी शुरू करेगा। आज मेरे बहुत सारे मित्र अपनी छुट्‍टियाँ मनाने बरसूडी जाना चाहते हैं; बीनू के भी बहुत सारे मित्र जाना चाहते हैं; उन मित्रों के भी मित्र जाना चाहते हैं; लेकिन यह झिझक उन्हें नहीं जाने दे रही। अगर गाँव में एक होटल खुल जाएगा या कोई आधिकारिक होम-स्टे शुरू हो जाएगा, तो यह झिझक समाप्त हो जाएगी और बहुत सारे लोग बरसूडी जाने लगेंगे। इसे ही इन्फ्रास्ट्रक्चर कहते हैं। बरसूडी में अभी इन्फ्रास्ट्रक्चर नहीं है।
आप भारत के किसी भी गाँव में किसी भी घर में जाकर शरण माँग सकते हो, आप कभी भी निराश नहीं होंगे; लेकिन अगर आपको अपने यहाँ टूरिज्म बढ़ाना है, तो बेसिक इन्फ्रास्ट्रक्चर अत्यधिक जरूरी है। बरसूडी में भी जरूरी है। इस बात को बीनू जानता है और वह इस दिशा में काम भी कर रहा है।


ऐसे फोटो तो दीप्ति ही ले सकती है... मुझे तो दिखते भी नहीं हैं ये सब...


जिनके यहाँ हम दो रात रुके...

25 comments:

  1. बहुत ही अच्छा प्रयास, पलायन को रोकने का उपाय है, पर्यटन। हिमाचल इसका श्रेष्ठ उदाहरण है

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  2. बेहतरीन प्रयास नीरज भाई। आप सब की घुम्मकड़ी को सलाम।

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  3. जबरदस्त जबरदस्त ओर जबरदस्त पहली बार आपकी लेखनी पढ़ी,काश आपकी लेखनी से हमारे उत्तराखंड के पलायन पर थोड़ा रोक लगे,बरसूडी का लेखन लाजबाब

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  4. अपने जीवन स्तर को बेहतर करने के लिए यदि यहां के निवासी निकलना चाहेंगे तो उन्हें कोई नहीं रोक सकेगा।

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  5. बहुत उम्दा लेख था। पूरी यात्रा नजरो के सामने आ गयी। वैसे इस कार्यक्रम की रूप रेखा बनाने वाले श्री अमित तिवारी जी है इन्होंने ही प्रथम बरसूडी कैम्प का संयोजन किया था जो अब नित्य वर्ष आयोजित होता आ रहा है।

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  6. दूसरे हेलमेट बाबा व्यास मुनि दास जी हैं! 😊

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  7. बहुत ही उम्दा लेख नीरज भाई... वो शब्द बहुत ही मार्मिक लगए जब उसने बताया कि दो घंटे लग जाते है स्कूल आने में...

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  8. बहुत ही सुन्दर लिखा भाई जी, असल समस्या पहाड़ की रोजी-रोटी है | अगर वहाँ इसका प्रबंध हो जाये तो कुछ पलायन तो कम होगा ही |

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  9. और मेडिकल कैंप की शुरुआत GDS वालों ने दूसरे साल से की, जो अब वृहद् रूप ले चूका है, जिसमे महती योगदान अपने दोनों डॉ प्रदीप और अजय जी का रहा है।

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  10. रोचक प्रस्तुति और शानदार प्रयास नीरज।

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  11. बहुत बढ़िया वर्णन किया है बरसूड़ी का नीरज भाई। हिंदी बोल सकता हूं पर बीच में पंजाबी के शब्द मिक्स हो जाते हैं। और इतने सारे घुमक्कड़ी लोगों को सामने देखकर तो जुबान थथलाने लगी थी। बरसूड़ी के बारे में आज और भी बहुत कुछ जान लिया आपके जरिए

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  12. बहुत ही दिलचस्प रमणिक ओर प्रेरणात्मक दौरा रहा आपका
    सल्यूट समस्त घुमक्कड़ मण्डली को👌👌👌👍💐

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  13. भाई ! फोटो तो बहुतै शार्प और हाई क्वालिटी है, मजे आ गए
    बच्चो को गिफ्ट देना अच्छा लगा. आप लोग कुछ भी सोचें, बच्चों के लिए तो यह यादगार ही रहेगा

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  14. bhut acha aur jankari bharpur likha hai bhai...

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  15. बहुत अच्छा लेख नीरज जी। सटीक विश्लेषण और सही विवरण। जाना मुझे भी था बारसुडी और मै बहुत समय से बरसुडी ग्रुप में भी जुड़ा हुआ था। ग्रुप अच्छा और अपना से लगा तो एक दिन फ्री था तो बिना झिझके एक सिंपल सी एक लाइन की पोस्ट डाल दी ग्रुप में जो बरसुडी सम्मेलन से सम्बंधित ही थी। एडमिन जी ने पोस्ट पोस्ट ही नहीं होने दी डिलीट कर दी। एक दिन तो पता नही चला फिर अगले दिन बीनू से chat की उसे इस बात का पता नही थ। बताया कि शायद दूसरे किसी एडमिन ने की होगी। कोई भी इसकी वजह नहीं बता पाया। मन खट्टा हो गया और मैने भी ग्रुप को राम राम कर दी। सोचा बरसुडी जा के ही पूछ लूंगा। ग्रुप में नहीं होने से तारीख कब गयी पता ही नहीं चला। उस समय गुस्सा तो मैं बहुत था पर मुझे लगा जब तक बात पूरी क्लियर नही तब तक किसे उलाहना दें। गुस्सा अब है के एडमिन उस दिन गड़बड़ ना करता या कोई वजह बता दी जाती तो मैं अब तक ग्रुप में होता और आप सब के साथ बरसुडी की फ़ोटो में मैं भी होता। शायद किस्मत में ही नहीं था । अब देखते हैं कब संयोग बनता है।

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  16. आदरणीय नीरज जी सबसे पहले आपको घुमक्कड़ पर पड़ने का साओभग्य मिला था आज ईस यात्रा के विवरण पड़ कर मन प्रसन्न हो गया।मेरे साथ एक बहुत बी समस्या है। किमुझे बस कार और ghumavda रास्ते में उल्टी की समस्या रहती है अवोमिन गोली लेने के बाद भी ठीक नहीं होती मेरी अधिकतम यात्रा रेल द्वारा है होती है।ईस यात्रा पड़कर बरसुदी गांव देखने बहुत इच्छा हो रही है।

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  17. बढिया संस्मरण । बरसुडी तो कभी नही गया, लेकिन पहले आयोजन से ही अप्रत्यक्ष रूप से जुड़ा रहा हूँ । ग्रुप के प्रयास से आज बरसुडी में सड़क आ गयी । ईश्वर करे जल्द ही वो सभी जरूरतें भी पूरी हो, जिनसे बरसुडी पर्यटन के नक्शे में शामिल हो जाये ।

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  18. धन्यवाद...मनोरम विवरण के लिए।

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  19. एक अच्छा प्रयास आप सभी का नीरज जी। क्या यह आयोजन हर साल होता है और इस आयोजन में भाग लेने की नियम व शर्ते क्या हैं कृपया मार्गदर्शन करें।

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  20. हम धन्य तो उसी दिन हो गए थे जिस दिन बरसूड़ी में आप और दीप्ति जी से मुलाकात हुई थी..... मगर अपने इस ब्लॉग में हमको स्थान देकर आपने हमें और भी धन्य कर दिया नीरज भाई....... आप यूँ ही अविरल लिखते रहें..... यही ईश्वर से कामना करते हैं.......
    और एक बात और
    ..आपकी विशेषता स्पष्ट और बेबाक ब्लॉग लिखने वाले ब्लॉगर की है....... इसे बनाएं रखें तो बहुत अच्छा होगा........

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  21. बहुत अच्छा। यथार्थ की कहानी। The Original.

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  22. बहुत सुंदर। आप लोगों का प्रयास सराहनीय है।

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  23. बहुत ही सुन्दर लेख भाई जी और करते रहो प्रयास आप बीनू कुकरेती जी के साथ लक्ष्य नेक है सफलता अवश्य मिलेगी

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