Tuesday, September 1, 2020

मेरी कुछ प्रमुख ऊँचाईयाँ

बहुत दिनों से इच्छा थी एक लिस्ट बनाने की कि मैं हिमालय में कितनी ऊँचाई तक कितनी बार गया हूँ। वैसे तो इस लिस्ट को जितना चाहे उतना बढ़ा सकते हैं, एक-एक गाँव को एक-एक स्थान को इसमें जोड़ा जा सकता है, लेकिन मैंने इसमें केवल चुनिंदा स्थान ही जोड़े हैं; जैसे कि दर्रे, झील, मंदिर और कुछ अन्य प्रमुख स्थान। 

Sunday, August 23, 2020

कहानी ‘घुमक्कड़ी जिंदाबाद-2’ पुस्तक की


आखिरकार 8 महीने की देरी से यह किताब छप ही गई। चलिए, अब इस किताब की पूरी कहानी विस्तार से बताते हैं...

‘घुमक्कड़ी जिंदाबाद’ किताब प्रकाशित करने का आइडिया 2018 में आया था। इरादा था कि अपने सोशल मीडिया नेटवर्क में से अच्छा लिखने वाले कुछ मित्रों के यात्रा-वर्णन एकत्र करके उन्हें किताब के रूप में प्रकाशित करेंगे। इसकी शुरूआत 2018 में कर भी दी थी। ऐलान कर दिया कि जिन मित्रों को भी अपने यात्रा-लेख किताब में प्रकाशित कराने हैं, वे निर्धारित शब्द-सीमा में लिखकर मुझे भेज दें।

उस समय लगभग 35 मित्रों ने अपने यात्रा-लेख भेजे। हमने पहले ही तय कर रखा था कि किताब में 240 से ज्यादा पेज नहीं रखेंगे। 200-240 पेज की किताब देखने में एकदम परफेक्ट लगती है। जबकि लेख इतने ज्यादा थे कि 500 पेज भी कम पड़ते। इनमें कुछ लेख तो ऐसे थे, जो पढ़ते ही मुझे पसंद आ गए; वहीं कुछ ऐसे भी लेख थे, जो बिल्कुल भी अच्छे नहीं लगे थे। कुल मिलाकर कुछ लेख तो छपने निश्चित थे और कुछ लेख नहीं छपने निश्चित थे। कुछ ऐसे भी लेख थे, जिनका छपना या न छपना किताब के पेजों पर निर्भर था। पेज सेटिंग और फाइनल एडिटिंग के समय अगर जगह बचेगी, तो लेख छपेंगे और अगर जगह नहीं बचेगी, तो लेख नहीं छपेंगे।

Saturday, June 27, 2020

अगर भारत में 2 टाइम जोन हों, तो...


India Time Zone
सीधी खड़ी लाइन भारत की स्टैंडर्ड टाइम लाइन है...

धरती जब 360 डिग्री घूमती है, तो समय में 24 घंटे का परिवर्तन आ चुका होता है... यानी 1440 मिनट... 360 डिग्री में 1440 मिनट... यानी 1 डिग्री घूमने में 4 मिनट का परिवर्तन...

भारत का सबसे पूर्वी सिरा अरुणाचल में किबिथू के पास है... इसके देशांतर लगभग 97 डिग्री हैं... उधर सबसे पश्चिमी सिरा गुजरात में कोटेश्वर के पास है... इसके देशांतर लगभग 68 डिग्री हैं... यानी भारत के धुर पूरब और धुर पश्चिमी बिंदुओं के बीच लगभग 30 डिग्री का अंतर है... इसे अगर 4 से गुणा करे, तो 120 मिनट आता है... यानी 2 घंटे...

मतलब... जब किबिथू में सूर्योदय होता है, तो उसके 2 घंटे बाद कोटेश्वर में सूरज निकलता है... जब कोटेश्वर में सूरज निकलता है, तब तक किबिथू में सूरज बहुत ऊपर आ चुका होता है... इसी प्रकार सूर्यास्त भी पहले किबिथू में होता है और उसके 2 घंटे बाद कोटेश्वर में... 

दिल्ली का देशांतर 77 डिग्री है... यानी किबिथू से 20 डिग्री और कोटेश्वर से 9 डिग्री... यानी किबिथू में सूर्योदय होने के 80 मिनट बाद दिल्ली में सूर्योदय होता है... 

Friday, May 8, 2020

भारत में नेशनल पार्क



नेशनल पार्क यानी एक ऐसा क्षेत्र जो इकोसिस्टम के लिए अत्यधिक विशेष हो, किसी जीव के लिए विशेष हो, किसी वनस्पति के लिए विशेष हो... और उसे संरक्षित करना जरूरी हो... हमारे लिए यह प्रसन्नता की बात है कि भारत में बहुत सारे नेशनल पार्क हैं, जहाँ हम उन जीवों का दीदार करने या प्रकृति को प्राकृतिक वातावरण में देखने जा सकते हैं।
ज्यादातर नेशनल पार्क किसी न किसी जीव के लिए जाने जाते हैं; जैसे जिम कार्बेट बाघ के लिए, काजीरंगा गैंडों के लिए, राजाजी हाथी के लिए, गीर शेर के लिए... लेकिन इन जंगलों में इन जानवरों के अलावा और भी बहुत सारे जानवर रहते हैं... ज्यादातर नेशनल पार्कों में हिरणों की अलग-अलग प्रजातियाँ निवास करती हैं; जैसे नीलगाय, सांभर, चीतल, चिंकारा, जंगली सूअर, काकड़ आदि... इन शाकाहारी जानवरों के अलावा एक मांसाहारी जानवर भी लगभग सभी नेशनल पार्कों में मिलता है... वो है तेंदुआ... पक्षियों की अनगिनत प्रजातियाँ सभी नेशनल पार्कों में मिलती हैं..

तो इस लेख में हम भारत के ज्यादातर नेशनल पार्कों का उल्लेख करेंगे और उनमें पाए जाने वाले उस विशेष जानवर का भी नाम लिखेंगे...

Wednesday, May 6, 2020

जालंधर और सहारनपुर से हिमालयी चोटियों के दिखने का रहस्य

फरवरी 2015 में मैं जालंधर से पठानकोट की ट्रेन यात्रा कर रहा था। यह सुबह पौने 9 बजे वाली लोकल ट्रेन थी, जो पठानकोट तक प्रत्येक स्टेशन पर रुकती हुई जाती है। जालंधर शहर से बाहर निकलते ही मुझे उत्तर में क्षितिज में बर्फीली चोटियाँ दिखाई दीं। चूँकि मैं इस क्षेत्र के भूगोल और मौसम से अच्छी तरह परिचित हूँ, इसलिए मुझे यह देखकर बिल्कुल भी आश्चर्य नहीं हुआ। मैं पूरे रास्ते इस नजारे को देखता रहा। हालाँकि मेरे पास अच्छे जूम का कैमरा था और मैं इनका फोटो ले सकता था, लेकिन मुझे लगा कि यहाँ से 4500 मीटर ऊँची धौलाधार की उन पहाड़ियों का नजारा अक्सर दिखता ही रहता होगा, इसलिए कोई फोटो नहीं लिया। फिर ये चोटियाँ एकदम क्षितिज में थीं और फोटोग्राफी के नजरिए से कैमरे को पूरा जूम करके उनका इतना शानदार फोटो भी नहीं आता कि देखने वाले वाह-वाह करें। तो मैंने उस नजारे का फोटो नहीं लिया।
हिमालय की धौलाधार पर्वत श्रंखला की ऊँचाई बहुत ज्यादा तो नहीं है, लेकिन इसके नीचे कांगड़ा का पठार है, जहाँ छोटी-छोटी पहाड़ियाँ हैं... और उसके नीचे पंजाब के मैदान हैं। पंजाब के बहुत सारे स्थानों से धौलाधार सालभर दिखती रहती है, जिनमें पठानकोट प्रमुख है। लेकिन अगर मौसम ज्यादा साफ हुआ, तो ये चोटियाँ पंजाब में सतलुज के उत्तर में स्थित किसी भी स्थान से देखी जा सकती हैं। यानी मंझा और दोआबा से धौलाधार दिख सकती है।

Monday, March 30, 2020

पुस्तक चर्चा: दूर दुर्गम दुरुस्त (उमेश पंत)



पुस्तक: दूर दुर्गम दुरुस्त
लेखक: उमेश पंत
प्रकाशक: राजकमल
ISBN: 978-93-89577-28-0
पृष्‍ठ: 224
मूल्य: 250 रुपये

उमेश पंत जी की पहली किताब ‘इनरलाइन पास’ ने सफलता के झंडे गाड़े। इनकी वह किताब उत्तराखंड में आदि कैलाश ट्रैक पर आधारित है और प्रत्येक ट्रैक की तरह रोमांच से भरपूर है।
अब जैसे ही इनकी दूसरी यात्रा किताब ‘दूर दुर्गम दुरुस्त’ आई, तो यह तो पक्का था कि यह भी रोमांच से भरपूर ही होगी। किताब पूर्वोत्तर की यात्राओं पर आधारित है। उमेश भाई ने इसके लिए दो बार पूर्वोत्तर की यात्राएँ कीं... फरवरी 2018 में और दिसंबर 2018 में। फरवरी में ये ट्रेन से गुवाहाटी पहुँचे और कुछ समय गुवाहाटी में रुककर मेघालय की ओर निकल गए। मेघालय में ये चेरापूंजी के पास डबल डेकर लिविंग रूट ब्रिज गए और डावकी भी गए। यहाँ मेरी एक शिकायत है कि इनके पास समय की कोई कमी नहीं थी, इसलिए इन्हें चेरापूंजी और डावकी में कम से कम एक-एक दिन रुकना चाहिए था। लेकिन खैर, कोई बात नहीं। सबकी अपनी-अपनी प्राथमिकताएँ और योजनाएँ होती हैं।
मेघालय से वापस असम आए और सीधे पहुँचे तेजपुर। तेजपुर में इन्हें एक दिन अतिरिक्त रुकना पड़ा, क्योंकि उस दिन अरुणाचल के लिए इनरलाइन पास नहीं बन सका। अगर मैं होता, तो समय बिताने काजीरंगा जा पहुँचता या नामेरी नेशनल पार्क भी दूर नहीं था। लेकिन उमेश भाई ने तेजपुर शहर में ही समय बिताना ठीक समझा और कभी पैदल, तो कभी मित्र के साथ तेजपुर घूमे।
फिर इन्होंने अरुणाचल में प्रवेश किया और बोमडीला रुके। अगले दिन तवांग और अप्रत्याशित रूप से तीसरे दिन गुवाहाटी लौट आए। और चौथे दिन जब ये गुवाहाटी से माजुली गए, तो मैं हैरान रह गया। हैरान इसलिए क्योंकि तीसरे दिन तवांग से गुवाहाटी लौटते समय ये तेजपुर से होकर गुजरे थे और चौथे दिन गुवाहाटी से माजुली जाते समय भी तेजपुर के काफी नजदीक से ही होकर जाना होता है। अगर पहले से प्लानिंग होती, तो तेजपुर में उतरकर गाड़ी बदलकर गुवाहाटी जाए बिना ही सीधे माजुली जा सकते थे और बेवजह की 400 किलोमीटर की बस यात्रा व उसके खर्चे से भी बच सकते थे।
एक दिन माजुली में रुककर ये फिर गुवाहाटी आ गए। इन्होंने काजीरंगा नहीं देखा। काजीरंगा नेशनल पार्क एक विश्व विरासत स्थल भी है और इसे न देख पाने की टीस जितनी उमेश भाई को थी, उससे ज्यादा मुझे महसूस हो रही है।
गुवाहाटी से अगरतला जाने के लिए इन्होंने बस का टिकट भी बुक कर लिया था, लेकिन तभी इरादा बदल गया और अगरतला न जाकर दिल्ली वापस लौट आए।
उमेश भाई ने 21 दिन की यह यात्रा अकेले की। चूँकि अच्छा यात्री अक्सर योजना बनाकर नहीं निकलता, इसलिए कई बार कुछ जगहें छूट जाती हैं और कई बार यात्राओं में बेवजह ज्यादा समय लग जाता है। हम भी अक्सर इस समस्या से जूझते रहते हैं। लेकिन चलने से पहले पूरे क्षेत्र का मोटा-मोटी नक्शा बना लेने से इस समस्या से बचा जा सकता है। मुझे पूरा विश्वास है कि अगर उमेश भाई को काजीरंगा का पता होता, तो वे काजीरंगा जरूर देखते। उन्होंने गुवाहाटी में कई दिन लगाए हैं और दो-तीन दिन तो वास्तव में बुरी तरह बर्बाद भी हुए हैं।
संयोग से ठीक उसी दौरान हम भी पूर्वोत्तर में अपनी मोटरसाइकिल से घूम रहे थे, लेकिन उमेश भाई ने मिलना नहीं हो पाया।

इनकी दूसरी यात्रा थी नागालैंड और मणिपुर की... दिसंबर 2018 में। मैं इन दोनों राज्यों में नहीं गया हूँ और इन्होंने यात्रा भी एकदम सधे हुए शेड्यूल में की। इसलिए दूसरा भाग पढ़ने का अलग ही आनंद रहा।

उमेश भाई की असली ताकत उनकी लेखन-शैली है। भले ही पहली यात्रा में इनका कुछ समय खराब हुआ हो, अकेलापन हावी रहा हो, लेकिन लिखने का अंदाज ऐसा है कि पाठक भी कभी उस अकेलेपन को महसूस करता है, तो कभी उत्साह से लबरेज हो जाता है।

किताब में कुछ त्रुटियाँ भी हैं, जिन्हें अगले संस्करण में ठीक किया जाना चाहिए...
1. पेज 24... कामाख्या स्टेशन को ‘महालक्ष्मी’ लिखा है। मुंबई छत्रपति शिवाजी स्टेशन से जस्ट पहले लोकल स्टेशन है महालक्ष्मी और इधर गुवाहाटी स्टेशन से जस्ट पहले स्टेशन है कामाख्या। दोनों ही नाम देवी के नाम पर हैं, इसलिए उमेश भाई को कन्फ्यूजन हो गया और कामाख्या को महालक्ष्मी लिख दिया।
2. पेज 102, पैरा 3... तिब्बत को डिब्बत लिख दिया है।
3. पेज 149... दूसरी यात्रा असम, नागालैंड और मणिपुर की थी, जबकि लिखा है कि यात्रा असम, मेघालय, अरुणाचल प्रदेश की है।
4. यह गलती तो नहीं है, लेकिन थोड़ा अटपटा लग रहा है। हो सकता है कि राजकमल प्रकाशन ऐसा करता हो या उन्होंने कोई नया प्रयोग किया हो। किताब में बायीं तरफ पेज नंबर नहीं लिखे हैं।

ये तो किताब की गलतियाँ थीं... लेकिन असली बात तो उमेश भाई के लेखन में है। लिखते हैं... पूर्वोत्तर दूर है, दुर्गम भी है, लेकिन दुरुस्त है। अपने पूर्वाग्रह अपने घर पर छोड़कर जाओ, तभी असली पूर्वोत्तर देखने को मिलेगा। लेकिन अपने पूर्वाग्रह लेकर जाओगे, तो परेशान हो जाओगे। उमेश भाई को यात्रा पर जाने से पहले और यात्रा के दौरान बहुत सारे लोगों ने डराया भी, लेकिन ये नहीं माने। इसी का नतीजा रहा कि पूरी यात्रा में इन्हें शानदार अनुभव हुए और शानदार लोग मिले। आप स्वयं जैसे होते हो, वैसे ही आपको लोग मिलते हैं।

लॉकडाउन के कारण किताब अमेजन पर अभी उपलब्ध नहीं है, लेकिन आप इसे सेव कर लीजिए। जैसे ही देश में लॉकडाउन हटेगा, किताब अमेजन पर उपलब्ध हो जाएगी।

Friday, January 3, 2020

तीसरा दिन: जैसलमेर में मस्ती तो है



13 दिसंबर 2019
कुछ साल पहले जब मैं साइकिल से जैसलमेर से तनोट और लोंगेवाला गया था, तो मुझे जैसलमेर में एक फेसबुक मित्र मिला। उसने कुछ ही मिनटों में मुझे पूरा जैसलमेर ‘करा’ दिया था। किले के गेट के सामने ले जाकर उसने कहा - “किले में कुछ नहीं है... आओ, आपको हवेलियाँ दिखाता हूँ।” फिर हवेलियों के सामने भी ऐसा ही कहा और इस प्रकार मैंने पूरा जैसलमेर कुछ ही मिनटों में देख लिया। मुझे यह सब बड़ा खराब लगा था और बाद में मैंने उसे फेसबुक पर ब्लॉक कर दिया।

हमारा अपना एक फ्लो होता है, अपनी रुचि होती है, अपना समय होता है, तब हम कहीं घूमने या न घूमने का निर्णय लेते हैं। अक्सर जब हम किसी शहर में जाते हैं, तो उस शहर के मित्र हमारी रुचि, फ्लो और समय का ध्यान न रखते हुए अपनी मर्जी से शहर घुमाने लगते हैं... हम मना करने में संकोच कर जाते हैं और इस प्रकार हमारा वह समय भी बर्बाद हो जाता है और हमारे मन में उस शहर की भी छवि खराब होती है।

ऐसा ही जैसलमेर के साथ था। फिर हमने परसों जोधपुर का किला देखा... वहाँ हमारा मन नहीं लगा, तो लग रहा था कि कहीं जैसलमेर के किले में भी ऐसा न हो। लेकिन जैसलमेर आए हैं, तो किले में जाना ही पड़ेगा...

जैसलमेर के किले में आबादी रहती है - यह मुझे पता था। बाहर ऑटो वाले किले के अंदर छोड़ने को कह रहे थे, लेकिन सबने पैदल ही चलना पसंद किया। बड़े और ऊँचे कई दरवाजों को पार करने के बाद हम किले में प्रवेश कर गए।