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केदारकंठा ट्रैक-2 (सांकरी से जूड़ा का तालाब)

केदारकंठा ट्रैक भाग-1

सुबह सवेरे अवतार भाई उपस्थित थे। हमें इस ट्रैक के लिए एक पॉर्टर की आवश्यकता थी, तो होटल वाले ने आज सुबह अवतार भाई को बुला लिया। वे सौड़ गाँव के रहने वाले हैं, जो सांकरी से एकदम लगा हुआ है। 

“कितने पैसे लोगे?”

“आप कितने लोग हो?”

“तीन।”

“केदारकंठा ट्रैक करना है ना आपको?”

“हाँ।”

“6000 रुपये पर पर्सन लगेंगे।”

“अरे, तुम्हें होटल वाले ने बताया नहीं क्या? हमें पूरी बुकिंग नहीं करनी है। हमें केवल एक पॉर्टर चाहिए। दो दिनों के लिए।”

“आप दो दिनों में ट्रैक करोगे? यह दो दिन का ट्रैक नहीं है।”

“देखो अवतार भाई, हमें दो दिनों के लिए एक पॉर्टर चाहिए। हमने होटल वाले से पॉर्टर की बात की थी।”

“नहीं, पॉर्टर तो मिलने मुश्किल हैं। नेपाली लोग लॉकडाउन के कारण आए नहीं हैं।”

“फिर तो तुम रहने दो। हम मार्किट में जा रहे हैं। पॉर्टर आराम से मिल जाएगा।”

“अच्छा, ठीक है। कितना सामान है?”

“तुम्हें केवल राशन लेकर चलना है। कैंपिंग का सारा सामान हमारे पास है और हम लेकर चलेंगे।”

“दो दिनों का राशन भी बहुत हो जाएगा। फिर बर्तन-बुर्तन भी होंगे। दो पॉर्टर लगेंगे।”

“कितना राशन लग जाएगा? आधा किलो चावल, आधा किलो आलू, दो प्याज, दो टमाटर, एक कुकर। खिचड़ी बनाएँगे और कुकर में चाय भी बना लेंगे।”

“फिर भी बहुत सामान हो जाएगा।”

“तो एक काम करना। मैं राशन उठा लूँगा और तुम कैंपिंग का सामान उठा लेना।”

“चलो, देखते हैं।”

“पैसे बताओ।”

“मैं वैसे तो टूर गाइड हूँ। 1500 रुपये प्रतिदिन चार्ज लेता हूँ, लेकिन आपसे 1000 ले लूँगा।”

“हमें गाइड नहीं, पॉर्टर चाहिए। पॉर्टर के रेट 700 रुपये प्रतिदिन हैं। हम इससे ज्यादा नहीं देंगे।”


आखिरकार 800 रुपये प्रतिदिन में बात तय हो गई। राशन अवतार उठाएगा और कैंपिंग का सारा सामान हम उठाएँगे। हम तीन जने थे - मैं, दीप्ति और दीप्ति का भाई हर्षित। हमारे पास दो टैंट थे। दो टैंटों में चार लोग आराम से सो जाते हैं, इसलिए तय हुआ कि अवतार हमारे एक टैंट में सोएगा। अपने लिए वह अपना स्लीपिंग बैग लेकर चलेगा। 

चाय बनाने का सामान ले लिया और खिचड़ी का सामान ले लिया। दूध का टेट्रा-पैक ले लिया। यह टेट्रा-पैक अच्छी चीज है। नहीं तो ट्रैक पर या तो काली चाय पीनी पड़ती थी या पाउडर ले जाना पड़ता था। दो टाइम की खिचड़ी के लिए आधा किलो चावल, आधा किलो आलू ले लिए। साथ में प्याज, टमाटर, अदरक-लहसुन का पेस्ट, मिर्च, हल्दी, नमक वगैरा वगैरा ले लिए। छौंकने के लिए तेल लेना भूल गए। इसका पता तब चला, जब हम चार घंटे तक पसीना बहाने के बाद आज के ठिकाने पर पहुँच चुके थे।

सांकरी पिछले कुछ वर्षों में विंटर ट्रैकिंग का गढ़ बनता जा रहा है। दिसंबर और जनवरी में यहाँ लाखों ट्रैकर्स आते हैं। जहाँ पूरे गढ़वाल का यात्रा सीजन अब बंद होने वाला था, वहीं सांकरी का सीजन शुरू होने जा रहा था। सांकरी समेत आसपास के गाँववाले भी ट्रैकिंग से जुड़े हैं। इसका प्रभाव मोरी और पुरोला तक भी देखने को मिलता है। सांकरी में फोन नेटवर्क नहीं है। इसलिए बुकिंग और अन्य कम्यूनिकेशन के लिए मोरी और पुरोला के लोग एक्टिव हैं। 

हम जिस होटल में रुके थे, उस होटल में इंडियाहाइक्स ने भी बेस बना रखा था। इंडियाहाइक्स एक प्रसिद्ध ट्रैकिंग कंपनी है। केदारकंठा को विंटर ट्रैक के रूप में उभारने का श्रेय इंडियाहाइक्स को ही जाता है। लेकिन मुझे डर है कि केदारकंठा के साथ रूपकुंड वाला केस न हो जाए।

कुछ साल पहले रूपकुंड बड़ा प्रसिद्ध ट्रैक हुआ करता था। इंडियाहाइक्स के बड़े-बड़े ग्रुप लगातार रूपकुंड जाते थे। तो रूपकुंड की प्रसिद्धि काफी तेजी से फैली और स्थानीय ग्रामीणों ने भी अपनी ट्रैकिंग एजेंसियाँ बनाकर ट्रैक कराने शुरू कर दिए। फिर अचानक माननीय उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने एक निर्णय सुनाया - पूरे उत्तराखंड के बुग्यालों में रात रुकने पर प्रतिबंध। इस केस की शुरूआत रूपकुंड से ही हुई थी। फैसला रूपकुंड के बारे में ही दिया जाना था, लेकिन इसे और ज्यादा विस्तार देते हुए पूरे उत्तराखंड पर लागू कर दिया। इसका सबसे बुरा असर रूपकुंड की ट्रैकिंग पर पड़ा, क्योंकि ट्रैकर्स को दो रातें बेदिनी बुग्याल में बितानी होती थीं।

हालाँकि बाद में इस फैसले का विरोध हुआ, तो थोड़ी-बहुत ढील दे दी गई।

अब आते हैं केदारकंठा पर। केदारकंठा जाने के कई रास्ते हैं। इनमें सबसे प्रसिद्ध रास्ता सांकरी वाला है। यह रास्ता गोविंद नेशनल पार्क के अंदर से होकर जाता है। सांकरी 2000 मीटर पर और केदारकंठा 3800 मीटर की ऊँचाई पर स्थित हैं। सर्दियों में 2000 मीटर पर भी अच्छी-खासी बर्फबारी हो जाती है। अब आप सोच सकते हैं कि 3800 मीटर तक पहुँचते-पहुँचते कितनी बर्फ और ठंड हो सकती है। आपकी सुविधा के लिए बता दूँ कि मनाली 2000 मीटर पर और रोहतांग पास 3900 मीटर पर हैं।

अब चूँकि यहाँ के सभी गाँववालों का मुख्य रोजगार केदारकंठा ही है और वन विभाग को भी अच्छी आमदनी होती है, तो खूब बर्फ होने के बावजूद भी सुरक्षित रास्ते बना दिए जाते हैं। लोग आते-जाते रहते हैं और रास्ते बने रहते हैं। 

लेकिन अगर कभी कोई अनहोनी हो गई, तो जिला प्रशासन व वन विभाग इस विंटर ट्रैक को हमेशा के लिए बंद कर देंगे। अक्सर एक बार अनहोनी होने पर इस तरह के प्रतिबंध लगा दिए जाते हैं। जिस राज्य में हिमाचल से अच्छी सड़कें होने के बावजूद भी आज भी रात में गाड़ियाँ चलाने पर प्रतिबंध हो; जिस राज्य को चारधाम यात्रा के नाम पर बैठे-बिठाए बहुत बड़ी आमदनी हो जाती हो, उस राज्य को केदारकंठा बंद होने से कोई फर्क नहीं पड़ेगा। 

फर्क पड़ेगा सांकरी और आसपास के गाँववालों पर। बस, मुझे इसी बात का डर है।


भरपेट आलू के पराँठे खाने के बाद दोपहर 11 बजे हम सांकरी से चल पड़े। आज हमें 2800 मीटर की ऊँचाई पर स्थित जूड़ा लेक के पास टैंट लगाना था। यानी हमें आज 800 मीटर चढ़ना था। मुझे इस क्षेत्र के भूगोल की अच्छी जानकारी है। मुझे पता है कि कहाँ ज्यादा तेज चढ़ाई है और कहाँ कम तेज चढ़ाई है। आज का पूरा रास्ता ज्यादा तेज चढ़ाई वाला था। ऐसे में हम दूरी में नहीं, बल्कि ऊँचाई में बात करते हैं। ऐसे रास्तों पर हम एक घंटे में 200 मीटर चढ़ सकते हैं। इसका अर्थ हुआ कि 800 मीटर चढ़ने में हमें 4 घंटे लगेंगे। हालाँकि सांकरी से जूड़ा लेक की दूरी 3 किलोमीटर ही है। 

रास्ते में अवतार की एक छानी भी मिली। भेड़पालक लोग या किसान लोग जंगल में या अपने खेतों में एक कच्चा घर बनाकर रखते हैं, जिसे छानी कहते हैं। इसमें ये लोग रहते भी हैं और रुकने-खाने का सारा बंदोबस्त भी होता है। 

इनके ये खेत गाँव से काफी ऊपर हैं और केवल पैदल चलकर ही यहाँ तक पहुँचा जा सकता है। लेकिन नौकरियों आदि की वजह से खेत में काम करने वाले लोग शहरों में चले गए और खेत वीरान हो गए। इनके ये खेत और छानी कई सालों से वीरान पड़े थे। 

इस बार जब कोरोना व लॉकडाउन लग गए, तो किसी की नौकरी छूट गई और ट्रैकिंग का काम भी बंद हो गया। खाली बैठने से अच्छा था कि खेतों का हालचाल ले लिया जाए। तो ये लोग खेतों में आए; छानी को ठीक किया और राजमा व चौलाई बो दी। आज दोनों फसलें पक चुकी थीं और धूप में सूखने डाल रखी थीं। अब इनका इरादा यहाँ सेब का बगीचा लगाने का है और छानी को होमस्टे बनाने का है।

यहाँ एक-एक कप चाय पीकर आगे चल दिए। रास्ते में कई जगहों पर लोग अपनी दुकानों की मरम्मत करने में लगे हुए थे। केदारकंठा के ट्रैक पर इन दो महीनों में बहुत ट्रैकर्स आते हैं। ऐसे में चाय की एक दुकान भी अच्छी-खासी आमदनी दे देती है। 

साढ़े तीन बजे जूड़ा लेक पहुँच गए। छोटी-सी झील है और बीच में एक टापू है। पानी रुका हुआ था, इस वजह से गंदा था। सर्दियों में यह झील जम जाती है और इस पर आप पैदल भी टहल सकते हैं। 

ट्रैकिंग में चढ़ाई पर मुझे पसीना आता है। और यहाँ तो जबरदस्त चढ़ाई थी। खूब पसीना आया। अंदर-बाहर के सारे कपड़े भीग गए। ऐसे में रुकने के बाद ठंड लगती है। अगर फटाफट कपड़े न बदले गए, तो बड़ी देर तक कँपकँपी आती है। टैंट लगाने की वजह से मुझे कपड़े बदलने में देरी हो गई, तो कँपकँपी छूटने लगी। मैंने कपड़े बदले और स्लीपिंग बैग में घुस गया। आधे घंटे तक काँपता रहा। तब तक हर्षित और दीप्ति ने चाय बना ली। 

फिर इसके बाद खिचड़ी बनाई, खाई और सो गए। 

लेकिन इसके अलावा एक महत्वपूर्ण घटना और भी घटी। रात नौ बजे के आसपास 5 लड़के हाथों में टॉर्चें लिए हुए नीचे से आए। इन्होंने हमारे गाइड से अगली कैंपसाइट की दूरी पूछी - इसका अर्थ था कि इनके साथ कोई लोकल गाइड नहीं है। 

“आपको फोरेस्ट वालों ने आने कैसे दिया?”

“हमने उत्तरकाशी से पर्वतारोहण का कोर्स कर रखा है। हम पर्वतारोही हैं और हमें ट्रैकिंग में कोई दिक्कत नहीं होती। हमने फोरेस्ट वालों को कन्विंस कर लिया।”

“अगली कैंपसाइट एक घंटा आगे है, लेकिन आप पर्वतारोही हो, आपको आधा घंटा ही लगेगा।”

अवतार ने इन्हें सलाह दी कि बहुत रात हो गई है, आप यहीं रुक जाओ, भोजन बनाओ, खाओ और सुबह सवेरे निकल जाना। लेकिन उन्हें केदारकंठा से सूर्योदय देखना था, इसलिए वे चले गए। वे अगली कैंपसाइट यानी बेसकैंप पर रुकेंगे और रात 2-3 बजे फिर ट्रैक शुरू कर देंगे ताकि सूर्योदय के समय तक केदारकंठा चोटी तक पहुँच सकें। 

केदारकंठा से सूर्योदय देखने का बड़ा क्रेज है। लेकिन इसके लिए लोगों को रात 2 बजे चलना होता है। वे अंधेरे में टॉर्च की रोशनी में चलते रहते हैं। हमें यह क्रेज नहीं है। होना भी नहीं चाहिए। 

लेकिन वे लोग 10 मिनट बाद ही लौट आए।

“क्या हुआ?”

“आगे रास्ता ही नहीं मिल रहा। रास्ता नीचे उतरने लगा था, जबकि ऊपर जाना चाहिए था। तो हम वापस आ गए।”

अब उन्होंने यहीं टैंट लगा लिए और खाना बनाने लगे। रात दो बजे ये लोग सूर्योदय देखने निकल जाएँगे। हमें चिंता इस बात की है कि रात दो बजे ये हमें डिस्टर्ब करेंगे।

Swargarohini Peak
सांकरी से दिखती 6200 मीटर ऊँची स्वर्गारोहिणी चोटी

Kedarkantha Trek
सांकरी उन लोगों के लिए भी अच्छा है, जो ट्रैकिंग नहीं करना चाहते... यहाँ का शांत वातावरण और ग्रामीण जीवन मनमोहक है...

सांकरी में वन विभाग की चौकी... यहीं से केदारकंठा ट्रैक के परमिट हाथोंहाथ बन जाते हैं... पहचान-पत्र की एक प्रति आवश्यक है...

राजमा

छानी, जिसमें हम आधा घंटा रुके और चाय-चुई पी... नीचे चौलाई और ऊपर छत पर राजमा सूख रहा है...




2500 मीटर की ऊँचाई पर स्थित जेनौला थाच... जंगल के बीच में ऐसे छोटे-छोटे मैदानों को थाच कहते हैं और थाचों में अक्सर छानियाँ मिल जाती हैं...




छोटी-सी जूड़ा लेक... हमारी आज की कैंपसाइट...


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अगले भाग में जारी...


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