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अगर भारत में 2 टाइम जोन हों, तो...

सीधी खड़ी लाइन भारत की स्टैंडर्ड टाइम लाइन है... धरती जब 360 डिग्री घूमती है, तो समय में 24 घंटे का परिवर्तन आ चुका होता है... यानी 1440 मिनट... 360 डिग्री में 1440 मिनट... यानी 1 डिग्री घूमने में 4 मिनट का परिवर्तन... भारत का सबसे पूर्वी सिरा अरुणाचल में किबिथू के पास है... इसके देशांतर लगभग 97 डिग्री हैं... उधर सबसे पश्चिमी सिरा गुजरात में कोटेश्वर के पास है... इसके देशांतर लगभग 68 डिग्री हैं... यानी भारत के धुर पूरब और धुर पश्चिमी बिंदुओं के बीच लगभग 30 डिग्री का अंतर है... इसे अगर 4 से गुणा करे, तो 120 मिनट आता है... यानी 2 घंटे... मतलब... जब किबिथू में सूर्योदय होता है, तो उसके 2 घंटे बाद कोटेश्वर में सूरज निकलता है... जब कोटेश्वर में सूरज निकलता है, तब तक किबिथू में सूरज बहुत ऊपर आ चुका होता है... इसी प्रकार सूर्यास्त भी पहले किबिथू में होता है और उसके 2 घंटे बाद कोटेश्वर में...  दिल्ली का देशांतर 77 डिग्री है... यानी किबिथू से 20 डिग्री और कोटेश्वर से 9 डिग्री... यानी किबिथू में सूर्योदय होने के 80 मिनट बाद दिल्ली में सूर्योदय होता है... 

भारत में नेशनल पार्क

नेशनल पार्क यानी एक ऐसा क्षेत्र जो इकोसिस्टम के लिए अत्यधिक विशेष हो, किसी जीव के लिए विशेष हो, किसी वनस्पति के लिए विशेष हो... और उसे संरक्षित करना जरूरी हो... हमारे लिए यह प्रसन्नता की बात है कि भारत में बहुत सारे नेशनल पार्क हैं, जहाँ हम उन जीवों का दीदार करने या प्रकृति को प्राकृतिक वातावरण में देखने जा सकते हैं। ज्यादातर नेशनल पार्क किसी न किसी जीव के लिए जाने जाते हैं; जैसे जिम कार्बेट बाघ के लिए, काजीरंगा गैंडों के लिए, राजाजी हाथी के लिए, गीर शेर के लिए... लेकिन इन जंगलों में इन जानवरों के अलावा और भी बहुत सारे जानवर रहते हैं... ज्यादातर नेशनल पार्कों में हिरणों की अलग-अलग प्रजातियाँ निवास करती हैं; जैसे नीलगाय, सांभर, चीतल, चिंकारा, जंगली सूअर, काकड़ आदि... इन शाकाहारी जानवरों के अलावा एक मांसाहारी जानवर भी लगभग सभी नेशनल पार्कों में मिलता है... वो है तेंदुआ... पक्षियों की अनगिनत प्रजातियाँ सभी नेशनल पार्कों में मिलती हैं.. तो इस लेख में हम भारत के ज्यादातर नेशनल पार्कों का उल्लेख करेंगे और उनमें पाए जाने वाले उस विशेष जानवर का भी नाम लिखेंगे...

जालंधर और सहारनपुर से हिमालयी चोटियों के दिखने का रहस्य

फरवरी 2015 में मैं जालंधर से पठानकोट की ट्रेन यात्रा कर रहा था। यह सुबह पौने 9 बजे वाली लोकल ट्रेन थी, जो पठानकोट तक प्रत्येक स्टेशन पर रुकती हुई जाती है। जालंधर शहर से बाहर निकलते ही मुझे उत्तर में क्षितिज में बर्फीली चोटियाँ दिखाई दीं। चूँकि मैं इस क्षेत्र के भूगोल और मौसम से अच्छी तरह परिचित हूँ, इसलिए मुझे यह देखकर बिल्कुल भी आश्चर्य नहीं हुआ। मैं पूरे रास्ते इस नजारे को देखता रहा। हालाँकि मेरे पास अच्छे जूम का कैमरा था और मैं इनका फोटो ले सकता था, लेकिन मुझे लगा कि यहाँ से 4500 मीटर ऊँची धौलाधार की उन पहाड़ियों का नजारा अक्सर दिखता ही रहता होगा, इसलिए कोई फोटो नहीं लिया। फिर ये चोटियाँ एकदम क्षितिज में थीं और फोटोग्राफी के नजरिए से कैमरे को पूरा जूम करके उनका इतना शानदार फोटो भी नहीं आता कि देखने वाले वाह-वाह करें। तो मैंने उस नजारे का फोटो नहीं लिया। हिमालय की धौलाधार पर्वत श्रंखला की ऊँचाई बहुत ज्यादा तो नहीं है, लेकिन इसके नीचे कांगड़ा का पठार है, जहाँ छोटी-छोटी पहाड़ियाँ हैं... और उसके नीचे पंजाब के मैदान हैं। पंजाब के बहुत सारे स्थानों से धौलाधार सा...

पुस्तक चर्चा: दूर दुर्गम दुरुस्त (उमेश पंत)

पुस्तक: दूर दुर्गम दुरुस्त लेखक: उमेश पंत प्रकाशक: राजकमल ISBN: 978-93-89577-28-0 पृष्‍ठ: 224 मूल्य: 250 रुपये उमेश पंत जी की पहली किताब ‘ इनरलाइन पास ’ ने सफलता के झंडे गाड़े। इनकी वह किताब उत्तराखंड में आदि कैलाश ट्रैक पर आधारित है और प्रत्येक ट्रैक की तरह रोमांच से भरपूर है। अब जैसे ही इनकी दूसरी यात्रा किताब ‘दूर दुर्गम दुरुस्त’ आई, तो यह तो पक्का था कि यह भी रोमांच से भरपूर ही होगी। किताब पूर्वोत्तर की यात्राओं पर आधारित है। उमेश भाई ने इसके लिए दो बार पूर्वोत्तर की यात्राएँ कीं... फरवरी 2018 में और दिसंबर 2018 में। फरवरी में ये ट्रेन से गुवाहाटी पहुँचे और कुछ समय गुवाहाटी में रुककर मेघालय की ओर निकल गए। मेघालय में ये चेरापूंजी के पास डबल डेकर लिविंग रूट ब्रिज गए और डावकी भी गए। यहाँ मेरी एक शिकायत है कि इनके पास समय की कोई कमी नहीं थी, इसलिए इन्हें चेरापूंजी और डावकी में कम से कम एक-एक दिन रुकना चाहिए था। लेकिन खैर, कोई बात नहीं। सबकी अपनी-अपनी प्राथमिकताएँ और योजनाएँ होती हैं। मेघालय से वापस असम आए और सीधे पहुँचे तेजपुर। तेजपुर में इन्हें एक दिन अतिरिक्त ...

तीसरा दिन: जैसलमेर में मस्ती तो है

13 दिसंबर 2019 कुछ साल पहले जब मैं साइकिल से जैसलमेर से तनोट और लोंगेवाला गया था, तो मुझे जैसलमेर में एक फेसबुक मित्र मिला। उसने कुछ ही मिनटों में मुझे पूरा जैसलमेर ‘करा’ दिया था। किले के गेट के सामने ले जाकर उसने कहा - “किले में कुछ नहीं है... आओ, आपको हवेलियाँ दिखाता हूँ।” फिर हवेलियों के सामने भी ऐसा ही कहा और इस प्रकार मैंने पूरा जैसलमेर कुछ ही मिनटों में देख लिया। मुझे यह सब बड़ा खराब लगा था और बाद में मैंने उसे फेसबुक पर ब्लॉक कर दिया। हमारा अपना एक फ्लो होता है, अपनी रुचि होती है, अपना समय होता है, तब हम कहीं घूमने या न घूमने का निर्णय लेते हैं। अक्सर जब हम किसी शहर में जाते हैं, तो उस शहर के मित्र हमारी रुचि, फ्लो और समय का ध्यान न रखते हुए अपनी मर्जी से शहर घुमाने लगते हैं... हम मना करने में संकोच कर जाते हैं और इस प्रकार हमारा वह समय भी बर्बाद हो जाता है और हमारे मन में उस शहर की भी छवि खराब होती है। ऐसा ही जैसलमेर के साथ था। फिर हमने परसों जोधपुर का किला देखा... वहाँ हमारा मन नहीं लगा, तो लग रहा था कि कहीं जैसलमेर के किले में भी ऐसा न हो। लेकिन जैसलमेर आए हैं...

दूसरा दिन: पोखरण फोर्ट और जैसलमेर वार मेमोरियल

पिछली पोस्ट: जोधपुर में मेरा मन नहीं लगा 12 दिसंबर 2019... अपने आप सुबह सुबह ही आँख खुल गई। और खुलती भी क्यों न? हमने खुद ही कल ऐलान किया था कि सुबह 8 बजे हर हाल में सबको गाड़ी में बैठ जाना है। रेस्टोरेंट में पहुँचे, तो देखा कि सबने नाश्ता कर लिया है... बस, हम ही बाकी थे। गाड़ी में चढ़ा, तो सामने गुप्ता जी दिखे, फिर भी मैंने आवाज लगाई... "गुप्ता जी आ गए क्या??" गुप्ता जी ने हँसते हुए कहा... "हाँ जी, आ गए।" असल में कल सभी लोग गाड़ी में बैठ जाते और गुप्ता जी को फोन करके बुलाना पड़ता। कई बार ऐसा हुआ। हो सकता है कि एकाध बार किसी को खराब लगा हो, लेकिन यह सबसे युवा जोड़ी थी और फिर गुप्ता जी को आवाज लगाना हमारा नियमित क्रियाकलाप बन गया। पहले तो ओसियाँ के रास्ते जाने का विचार था, लेकिन अब गाड़ी जैसलमेर वाले सीधे रास्ते पर दौड़ रही थी। बाहर धूप निकली थी, लेकिन रात बूँदाबाँदी हो जाने के कारण ठंडक बढ़ गई थी, इसलिए किसी ने भी खिड़की नहीं खोली। आधे घंटे के अंदर सब के सब सो चुके थे। मैं खुद गहरी नींद में था। दो-ढाई घंटे बाद आँख खुली। गाड़ी एक होटल के सामने र...

जोधपुर में मेरा मन नहीं लगा

मैं अनगिनत बार जोधपुर जा चुका हूँ, लेकिन कभी भी यहाँ के दर्शनीय स्थल नहीं देखे। ज्यादातर बार अपनी ट्रेन-यात्राओं के सिलसिले में गया हूँ और एक बार दो साल पहले बाइक से। तब भी जोधपुर नहीं घूमे थे और एक रात रुककर आगे बाड़मेर की ओर निकल गए थे। इस बार भी हम जोधपुर नहीं घूमने वाले थे, लेकिन मित्रों के सुझाव पर जोधपुर लिस्ट में जोड़ा गया। यह यात्रा जैसलमेर और थार मरुस्थल की होने वाली थी, लेकिन सभी के लिए जोधपुर पहुँचना ज्यादा सरल है, इसलिए जोधपुर जोड़ना पड़ा - जोधपुर से शुरू और जोधपुर में खत्म। मैं भूल गया था कि हमारे सभी मित्र हमारे एक आग्रह पर कहीं भी पहुँच सकते हैं। मैंने सभी मित्रों को सुविधाभोगी समझ लिया था और मान लिया था कि अगर हम इस यात्रा को जोधपुर से जोधपुर तक रखेंगे, तो ज्यादा मित्र शामिल होंगे। हम आजकल दो तरह की यात्राएँ करते हैं - अपनी निजी यात्राएँ और कॉमर्शियल यात्राएँ। यह यात्रा एक कॉमर्शियल यात्रा थी - 11 से 15 दिसंबर 2019... सभी को 11 की सुबह जोधपुर में एकत्र होना था, पूरे दिन जोधपुर के दर्शनीय स्थल देखने थे और रात जोधपुर में रुककर अगले दिन टैक्सी से जैसलमेर के लिए निकल...