Skip to main content

चलो फूलों की घाटी!

12 जुलाई 2017
थक गए। और थकान होगी ही। नींद भी आएगी। सुबह तीन बजे के उठे हुए और साढ़े चार के चले हुए। अब शाम छह बजे श्रीनगर पहुँचे। कमरा लिया। दीप्ति तो गीले कपड़े धोने और सुखाने में व्यस्त हो गयी, मैं खर्राटे लेने में। मुझे कोई होश नहीं कि दीप्ति ने कितना काम किया। सात बजे कपड़ों से फुरसत पाकर उसने मुझे जगाया, “चलो, कुछ खा आएँ।” मैंने नींद में बुदबुदा दिया, “मुझे कुछ नहीं खाना। तू खा आ।” वह अकेली कपड़े तो धो सकती है, लेकिन खाना नहीं खा सकती। एक घंटे और सोने दिया। फिर तो उठा ही दिया। इडली उपलब्ध हो तो यह उसका प्रिय भोजन है। उंगलियाँ सानकर ही खाती है। मुझे भी इडली अच्छी लगती है, लेकिन अगर पनीर का भी विकल्प हो, तो मैं पनीर लेना पसंद करूँगा।
रास्ते मे बहुत सारे लंगर लगे मिले थे। सरदारों वाले लंगर। हेमकुंड साहिब के तीर्थयात्रियों के लिए। स्प्लेंडर पर दो-दो तीन-तीन सरदार। पगड़ी वालों को तो हेलमेट की ज़रूरत नहीं, लेकिन बिना पगड़ी वाले भी बिना हेलमेट लगाये। सब मोटरसाइकिलों पर एक डंडा बंधा हुआ और डंडे पर नीला झंडा। वाहेगुरु दा खालसा। हम सभी लंगरों को नज़रअंदाज़ करते आ रहे थे, लेकिन एक जगह रुकना पड़ गया - कीर्तिनगर के पास। एक बूढ़े सरदारजी पीला झंडा पकड़े हुए बाइक के सामने ही अड़ गये। यहीं महाराष्ट्र की एक स्कार्पियो भी खड़ी थी। हमने इस गाड़ी को कई बार पीछे छोडा था और उन्होंने भी कई बार हमें पीछे छोड़ा था। वे खड़े दिखे तो हम भी रुक गए। हालाँकि बातचीत कुछ नहीं हुई। वे अब तक लंगर जीम चुके थे। हमारे रुकते ही चले गए।




हम खा पी चुके तो एक सरदारजी ने धीरे से कहा, “कुछ दान पत्तर करते जाओ।” सौ रुपये दे दिए। वैसे सरदार मांगते नहीं हैं। अपने दम पर लंगर चलाते हैं। फिर भी मुझे उनका पैसे मांगना ठीक लगा। क्यों ठीक लगा, पता नही। लेकिन ठीक लगा।
शायद आपको अभी तक की रामकहानी समझ नहीं आयी होगी तो चलिये, शुरू से ही शुरू करते हैं:
दिल्ली से साढ़े चार बजे चले तो तीन घंटे में पुरकाजी पहुँच गए। नॉन स्टॉप। सड़क तो अच्छी है ही। मुज़फ्फरनगर के बाद भी ठीक हो गयी है। कहीं भी डायवर्जन नही है। बरला और छपार के बीच मे टोल बूथ बनाया जा रहा है। अभी रुड़की बाइपास तैयार नही हुआ है, सो रुड़की शहर से होकर जाना पड़ा। काँवड़ियों के कारण भारी ट्रैफिक और जाम।
बहादराबाद तक बारिश होने लगी। रेनकोट पहन लिए। बैग पहले ही रेनकवर में पैक थे। यह यात्रा अब ‘मानसून राइडिंग’ में बदल गयी। मूसलाधार बारिश। न गर्जना, न तूफ़ान। केवल बारिश। और सामने जहाँ तक भी निगाह जाती, बादल ही दिखते। इसका मतलब मौसम जल्द खुलने वाला नही। आगे हिमालय के पहाड़ हैं। उनसे टकराकर बादल बरस रहे हैं। यानी पहाड़ों में भी बारिश मिलेगी।
हरिद्वार में सड़क के चौड़ीकरण का काम चल रहा है। सड़क बनाने वाली कंपनी ने सड़क किनारे जो बैरीकेड़ लगा रखे हैं, उन पर लिखा था - दिल्ली मेट्रो। ये बैरीकेड़ दिल्ली से यहाँ कैसे पहुँचे, हम इस चक्कर में नहीं पड़े। तेज बारिश थी, इसलिये फोटो नहीं ले पाये। लौटते हुए अवश्य लेंगे।
हमेशा की तरह भीमगोडा बैराज से गंगा पार की और चीला रोड़ पर बढ़ चले। इस रास्ते मे दो नदियाँ हैं, जिन पर पुल नहीं हैं। सालभर इनमे पानी नहीं रहता, लेकिन मानसून में उफनती हैं। पहली नदी में एक फुट पानी था, आसानी से पार कर गए। दूसरी में ज्यादा पानी था और चौड़ाई भी काफ़ी थी। चार पुलिसवालों की भी ड्यूटी लगी थी। दो इधर, दो उधर। वे रोक तो किसी को नहीं रहे थे, लेकिन हालात पर नज़र रखे हुए थे। जब हम इसे पार कर रहे और सारा ध्यान पानी के बहाव और संतुलन बनाने पर था, अचानक पल भर के लिए निगाहें सामने खड़े पुलिसवाले पर चली गयी। वह हाथ हिला हिलाकर इधर होने, उधर होने, ऐसे आने, वैसे आने के लिए इशारा कर रहा था। वह शायद सभी को ऐसे ही इशारे करता हो, लेकिन एक बार पानी में घुसने के बाद किसी की निगाह उस पर नहीं पड़ सकती। सबका ध्यान बाइक से तीन-चार फीट आगे ही रहेगा।



तो मूसलाधार बारिश में चीला के जंगल में हम चले जा रहे थे। रेनकोट के बावजूद भी अंदर तक पानी पहुँच गया। मोबाइल रेनकोट की ही जेब में था। डर लगने लगा कि कहीं यह भी भीग न जाये, लेकिन अब तक काफी देर हो चुकी थी। किमसार वाले मोड़ पर एक शेड़ के नीचे रुक गये। दो साधु भी बैठे थे। जेब में हाथ डाला तो मोबाइल पर बाद में पहुँचा, पहले उंगलियाँ पानी में डूब गयीं। मोबाइल निकाला ज़रूर, लेकिन ऑन होने में एक महीना लग गया।
तो यहाँ दो साधु भी बैठे थे।
“नहीं, हम साधु नहीं हैं। हम बनारसी ब्राह्मण हैं।” साधु कहते ही दोनों ने एक साथ कहा। पिछले दो-तीन महीनों से गढ़वाल भ्रमण पर थे। केदारनाथ इत्यादि सब स्थान देख चुके थे। आज किमसार से आये थे। वहाँ भगवान शंकर का कोई मंदिर है। उससे पहले यमकेश्वर गये थे। इन्होंने बताया कि यमकेश्वर से किमसार तक कच्ची सड़क है, बाइक आराम से चली जायेगी। यह मेरी दिलचस्पी की बात थी। अभी तक मुझे यही पता था कि किमसार केवल इधर चीला की तरफ से ही सड़क मार्ग से जुड़ा है, लेकिन अब पता चल गया कि यमकेश्वर से भी जुड़ा है। आज तो नहीं जाना, लेकिन जायेंगे ज़रूर।
वीरभद्र बैराज से नीलकंठ रोड़ पर नहीं जाने दिया गया। बारिश अभी भी मूसलाधार हो रही थी। फिर बाइक वाले उत्पाती काँवडिये भी आने लगे थे। ऋषिकेश शहर से जाना पड़ा। और यह देखकर आनंद आ गया कि शहर की मुख्य सड़क यानी राष्ट्रीय राजमार्ग एक जलमार्ग बन गया है। फिर भी हम चलते रहे।
पहाड़ शुरू होते ही बारिश कम हो गयी। आवाजाही थी, तो हम भी चलते रहे। शुरू में तो बड़ी दूर तक सामने से कोई भी वाहन आता नहीं दिखा, लेकिन देवप्रयाग के पास जब रेला का रेला आता मिलने लगा, तो समझ गये कि कहीं भूस्खलन हुआ था। गंगाजी का आज एक अलग ही सौंदर्य दिखा। बारिश बंद हो गयी तो नदी के पानी के ऊपर धुंध मिली। केवल पानी के ऊपर ही। मैं और ज्यादा वर्णन नहीं कर सकता। मानसून में तो वैसे भी हिमालय खिल उठता है, पानी की यह धुंध सम्मोहित कर रही थी।
ऋषिकेश में दो किलो आम लिये थे - दशहरी। देवप्रयाग के बाद एक मोड़ पर बैठे और खा लिये। सब गुठलियाँ वहीं छोड़ दीं। पता नहीं उनका क्या हुआ होगा। लौटते समय हम उन गुठलियों को ढूँढते आये थे, लेकिन नहीं मिली। या फिर हम उस मोड़ को ही भूल गये होंगे। जो भी हो, अगर वे फल गयीं तो उनका नाम रखूँगा - जाटराम के आम।
आपको भविष्य में कभी देवप्रयाग और कीर्तिनगर के बीच में आम की टहनी पर ‘जाटराम के आम’ लिखा मिले तो समझ जाना कि वह ‘समाज-सेवा’ आपके इसी मित्र ने की है। और अगर आम का पेड़, पौधा मिले और कुछ भी न लिखा हो तो प्लीज, प्लीज, प्लीज; ‘जाटराम के आम’ लिखकर टांग देना। भगवान भला करेगा।
फिर इसके बाद वो लंगर छका, जिसका वर्णन पहले कर चुका हूँ।
श्रीनगर में 700 का कमरा 500 में पक्का कर दिया। सामान खोलकर कमरे में ला पटका। दीप्ति ने पूछा, “बाथरूम कहाँ है?” बोला, “उधर है जी, सभी कमरों का एक कॉमन ही है।” अब मुझे ध्यान आया कि कमरा देखते समय मैंने बाथरूम तो देखा ही नहीं था। अब 500 का कमरा महंगा लगने लगा, “भाई सुन, 100 रुपये कम कर, अन्नी तो हम जा रे हैं।”
“ऐसे कैसे कम होगा भाई जी? आपने ही तो 700 से 500 किया है।”
“देख ले भाई, 500 में अटैच बाथरूम वाला मिल जायेगा।”
और हम निकल पड़े। तुरंत 100 रुपये कम हो गये और कमरा हमें 400 का मिल गया। हालाँकि उसके पास खुले 100 रुपये नहीं थे, तो ये 100 रुपये हमें एक सप्ताह बाद लौटते समय मिले।
पहाड़ में शहरीकरण भले ही होने लगा हो, लेकिन इंसानियत ज्यों की त्यों है। शैतानी हम करते हैं और हम उन्हें भी शैतानी सिखा देते हैं।


चीला मार्ग पर किमसार मोड़ के पास

बनारसी साधु उर्फ़ ब्राह्मण
















1. चलो फूलों की घाटी!
2. कार्तिक स्वामी मंदिर
3. गोविंदघाट से घांघरिया ट्रैकिंग
4. यात्रा श्री हेमकुंड साहिब की
5. फूलों की घाटी
6. फूलों की घाटी के कुछ फोटो व जानकारी
7. फूलों की घाटी से वापसी और प्रेम फ़कीरा
8. ऋषिकेश से दिल्ली काँवड़ियों के साथ-साथ




Comments

  1. तस्वीरों में वास्तव में मानसून का जादु पहाड़ो पर दिख रहा है,घुमक्कड़ी में जीवन के आनंद को परिभाषित करने में आपका जवाब नही,फूलो की घाटी के नज़ारो का इंतजार रहेगा.

    ReplyDelete
  2. आम के आम गूठ्लियो के भी दाम | क्या खूब कही नीरज भाई|

    ReplyDelete
  3. आपकी इस यात्रा का इंतज़ार मुझे बहुत समय से था। इतनी बारिश में भी आपने तस्वीरें लीं, हिम्मत की बात है। बारिश की छटा कमाल लग रही है।

    ReplyDelete
  4. bhut badiya..... niraj ...
    ..
    ..
    ek photo us maharstra socripo ka bhi lete to dil garden garden ho jata
    ..
    ..

    ReplyDelete
  5. Banarasi bramhdo se ye bhi puchh lete ki banaras me kaha se hai kyo ki hum bhi banaras ke hai

    ReplyDelete
  6. एक सरदारजी ने धीरे से कहा, “कुछ दान पत्तर करते जाओ।” सौ रुपये दे दिए। वैसे सरदार मांगते नहीं हैं। अपने दम पर लंगर चलाते हैं। फिर भी मुझे उनका पैसे मांगना ठीक लगा। क्यों ठीक लगा, पता नही। लेकिन ठीक लगा। ठीक इसलिए लगा या कहे मांगना इसलिए ठीक लगा ताकि आदमी को मुफ्तखोरी की आदत ना लग जाये

    ReplyDelete
  7. Apaki har yatra lajabab hai our likhne ka tarika bhi tarife kabil he

    ReplyDelete
  8. मजेदार यात्रा

    ReplyDelete
  9. मजेदार यात्रा कथा ,हमने भी फूलों की घाटी,एवं हेमकुंड साहिब छोड़ दी थी ,आप के माध्यम से अब हो जाएगी|

    ReplyDelete
  10. मजेदार शुरूआत,,, आज यह यात्रा पूरी ही पढ़ लूंगा।

    ReplyDelete
  11. India ke bahar Nepal ke alaba aor kahi our ki yatra karke aaye

    ReplyDelete

Post a Comment

Popular posts from this blog

ट्रेन में बाइक कैसे बुक करें?

अक्सर हमें ट्रेनों में बाइक की बुकिंग करने की आवश्यकता पड़ती है। इस बार मुझे भी पड़ी तो कुछ जानकारियाँ इंटरनेट के माध्यम से जुटायीं। पता चला कि टंकी एकदम खाली होनी चाहिये और बाइक पैक होनी चाहिये - अंग्रेजी में ‘गनी बैग’ कहते हैं और हिंदी में टाट। तो तमाम तरह की परेशानियों के बाद आज आख़िरकार मैं भी अपनी बाइक ट्रेन में बुक करने में सफल रहा। अपना अनुभव और जानकारी आपको भी शेयर कर रहा हूँ। हमारे सामने मुख्य परेशानी यही होती है कि हमें चीजों की जानकारी नहीं होती। ट्रेनों में दो तरह से बाइक बुक की जा सकती है: लगेज के तौर पर और पार्सल के तौर पर। पहले बात करते हैं लगेज के तौर पर बाइक बुक करने का क्या प्रोसीजर है। इसमें आपके पास ट्रेन का आरक्षित टिकट होना चाहिये। यदि आपने रेलवे काउंटर से टिकट लिया है, तब तो वेटिंग टिकट भी चल जायेगा। और अगर आपके पास ऑनलाइन टिकट है, तब या तो कन्फर्म टिकट होना चाहिये या आर.ए.सी.। यानी जब आप स्वयं यात्रा कर रहे हों, और बाइक भी उसी ट्रेन में ले जाना चाहते हों, तो आरक्षित टिकट तो होना ही चाहिये। इसके अलावा बाइक की आर.सी. व आपका कोई पहचान-पत्र भी ज़रूरी है। मतलब

46 रेलवे स्टेशन हैं दिल्ली में

एक बार मैं गोरखपुर से लखनऊ जा रहा था। ट्रेन थी वैशाली एक्सप्रेस, जनरल डिब्बा। जाहिर है कि ज्यादातर यात्री बिहारी ही थे। उतनी भीड नहीं थी, जितनी अक्सर होती है। मैं ऊपर वाली बर्थ पर बैठ गया। नीचे कुछ यात्री बैठे थे जो दिल्ली जा रहे थे। ये लोग मजदूर थे और दिल्ली एयरपोर्ट के आसपास काम करते थे। इनके साथ कुछ ऐसे भी थे, जो दिल्ली जाकर मजदूर कम्पनी में नये नये भर्ती होने वाले थे। तभी एक ने पूछा कि दिल्ली में कितने रेलवे स्टेशन हैं। दूसरे ने कहा कि एक। तीसरा बोला कि नहीं, तीन हैं, नई दिल्ली, पुरानी दिल्ली और निजामुद्दीन। तभी चौथे की आवाज आई कि सराय रोहिल्ला भी तो है। यह बात करीब चार साढे चार साल पुरानी है, उस समय आनन्द विहार की पहचान नहीं थी। आनन्द विहार टर्मिनल तो बाद में बना। उनकी गिनती किसी तरह पांच तक पहुंच गई। इस गिनती को मैं आगे बढा सकता था लेकिन आदतन चुप रहा।

जाटराम की पहली पुस्तक: लद्दाख में पैदल यात्राएं

पुस्तक प्रकाशन की योजना तो काफी पहले से बनती आ रही थी लेकिन कुछ न कुछ समस्या आ ही जाती थी। सबसे बडी समस्या आती थी पैसों की। मैंने कई लेखकों से सुना था कि पुस्तक प्रकाशन में लगभग 25000 रुपये तक खर्च हो जाते हैं और अगर कोई नया-नवेला है यानी पहली पुस्तक प्रकाशित करा रहा है तो प्रकाशक उसे कुछ भी रॉयल्टी नहीं देते। मैंने कईयों से पूछा कि अगर ऐसा है तो आपने क्यों छपवाई? तो उत्तर मिलता कि केवल इस तसल्ली के लिये कि हमारी भी एक पुस्तक है। फिर दिसम्बर 2015 में इस बारे में नई चीज पता चली- सेल्फ पब्लिकेशन। इसके बारे में और खोजबीन की तो पता चला कि यहां पुस्तक प्रकाशित हो सकती है। इसमें पुस्तक प्रकाशन का सारा नियन्त्रण लेखक का होता है। कई कम्पनियों के बारे में पता चला। सभी के अलग-अलग रेट थे। सबसे सस्ते रेट थे एजूक्रियेशन के- 10000 रुपये। दो चैप्टर सैम्पल भेज दिये और अगले ही दिन उन्होंने एप्रूव कर दिया कि आप अच्छा लिखते हो, अब पूरी पुस्तक भेजो। मैंने इनका सबसे सस्ता प्लान लिया था। इसमें एडिटिंग शामिल नहीं थी।