Monday, November 20, 2017

फूलों की घाटी से वापसी और प्रेम फ़कीरा

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17 जुलाई 2017
आज का दिन कहने को तो इस यात्रा का आख़िरी दिन था, लेकिन छुट्टियाँ अभी भी दो दिनों की बाकी थीं। तो सोचने लगे कि क्या किया जाये? एक दिन और कहाँ लगाया जाये? इसी सोच-विचार में मुझे उर्गम और कल्पेश्वर याद आये। दीप्ति से कहा - “चल, आज तुझे एक रमणीक स्थान पर ले चलता हूँ।”
पेट भरकर नौ बजे के आसपास घांघरिया से वापस चल दिये। मौसम एकदम साफ था।
कुछ सरदार घांघरिया की तरफ जा रहे थे। आपस में बात कर रहे थे - “हिमालय परबत इदरे ही है क्या?” दूसरे ने उत्तर दिया - “नहीं, मनाल्ली की तरफ है। इदर केवल हेमकुंड़ जी हैं।”
इस रास्ते का वर्णन पहले कर चुका हूँ, इसलिये अब वर्णन हो ही नहीं रहा। हाँ, एक बात याद आ गयी। आपको याद होगा कि कल जब हम फूलों की घाटी गये थे तो एक नेपाली पॉर्टर भी लगभग हमारे साथ ही चल रहा था। ज्यादा उम्र नहीं थी उसकी। नाम भूल गया। काठमांडू की तरफ का था। वैसे भी प्रत्येक नेपाली काठमांडू का ही होता है। कम से कम बताता तो काठमांडू ही है। चाहे वो महेंद्रनगर की तरफ का हो या काकड़भिट्टा की तरफ का। तो इसने भी हमें काठमांडू ही बताया। मैंने बहुतेरा कुरेदा, लेकिन वह काठमांडू से अलग ही नहीं हुआ। तो वह नेपाली आज भी रास्ते में मिल गया। खाली कंडी लिये नीचे गोविंदघाट की तरफ जा रहा था। खुशी से झूमता हुआ, गाने गाता हुआ। मुझे लगा यही उसका व्यवहार है। बाद में दूसरे वृद्ध नेपाली ने बताया कि उसका बी.ए. का रिजल्ट आया है और वह पास हो गया है। इसलिये वह अब नेपाल जायेगा।
“ओये, मुबारक हो। नेपाल जा रहे हो?”
“हाँ जी, बी.ए. में पास हो गया हूँ। अब गोविंदघाट जाकर खूब नहाऊँगा, फिर कल नेपाल के लिये चल दूँगा।”
“उसके बाद क्या करोगे?”
“नौकरी मिल जायेगी। अब यह बोझा नहीं ढोना पड़ेगा।”
एक अन्य नेपाली ने बताया - “यहाँ घोड़े-खच्चर का काम स्थानीय लोग करते हैं, तो कंडी का काम नेपाली और मुसलमान करते हैं।” हालाँकि हमें पूरे रास्ते कंडी वाले नेपाली ही दिखे। केवल एक ही मुसलमान दिखा, वो भी काफी देर से मोलभाव कर रहे यात्रियों के साथ लगभग गाली-गलौच तक आ चुका था। हम उससे भी कुछ बातचीत करना चाहते थे, गाम-पता पूछना चाहते थे, लेकिन उसके उग्र तेवर देखकर चुपचाप आगे खिसक गये।
“यहाँ कोई कमाई नहीं है। रोजाना इतने रुपये खाने में खर्च हो जाते हैं, इतने रुपये का ठिकाना पड़ता है और यात्री चाहते हैं कि हम फ्री में उन्हें ऊपर ले जायें।” उस नेपाली ने बताया।
इतने में कुछ काँवड़ यात्रियों का एक दल आया और इससे मोलभाव करने लगा। इसने घांघरिया तक जाने के हज़ार रुपये मांगे, मोलभाव हुआ और नेपाली सात सौ में ले जाने को राजी हो गया। काँवड़िये झूठ बताने लगे कि पीछे सात सौ में दो लोगों को ले जाने वाले को छोड़कर आये हैं हम। मामला नहीं बना, यात्री आगे चले गये।
“ऐसा रोज ही होता है भाई जी। हमारा पाँच सौ रुपये रोजाना का खर्चा है ही। अब देश से इतनी दूर आये हैं तो सौ - दो सौ रुपये बचायेंगे भी। यहाँ मेहनत ज्यादा है, कमाई नहीं है।”
किसी सत्तर किलो के, अस्सी किलो के, सौ किलो के आदमी को अपनी पीठ पर उठाकर ले जाना कोई हँसी-मज़ाक थोड़े ही है? आप अपने बच्चों और कीमती सामान को इनके भरोसे छोड़ सकते हैं। इस काम के बदले अगर ये सात सौ रुपये माँगते हैं तो इन्हें दो सौ रुपये की कमाई होगी और अगर हज़ार रुपये माँगते हैं तो पाँच सौ रुपये की कमाई होगी। अब आप स्वयं विचारिये कि क्या आपको इनकी आवश्यकता है। यदि आवश्यकता है, आप चल नहीं पा रहे हैं तो बिना मोलभाव के इन्हें अपने साथ कर लें। मोलभाव करके आप सौ रुपये बचा लेंगे, दो सौ रुपये बचा लेंगे; क्या फ़र्क पड़ जायेगा?
पुलना में मोटरसाइकिल भी मिल गयी और हेलमेट भी। पुलना तक सड़क बनी है। इसे आगे घांघरिया तक बनाने का काम चल पड़ा है। भ्यूंडार में सड़क पुल भी बन रहा है। सर्वे भी हो चुके हैं।
“जब आगे तक सड़क बन जायेगी, तो आपके यहाँ कोई भी बाइक खड़ी नहीं करेगा। तब रोजगार के लिये क्या करोगे?”
वैसे ही मुस्कुराते हुए उत्तर दिया - “जितनी सड़क बनती चली जायेगी, पार्किंग को भी उतना ही आगे खिसकाते चले जायेंगे। पुलना भी अपना ही है, भ्यूंडार भी अपना ही है और घांघरिया भी अपना ही है।”
मैंने पूछा - “दिल्ली जाने का मन नहीं करता क्या तुम्हारा?”
बोला - “गया था मैं दिल्ली। मन नहीं लगा तो लौट आया। हुनर चाहिये, आदमी कहीं भी कमा लेता है।”
पूरा एक घंटा लगा पुलना से जोशीमठ आने में। कुछ अलग-सा खाने का मन था। एक होटल के बाहर डोसे का बड़ा-सा फोटो लगा था, तो लार टपक पड़ी। लेकिन जब उसने बताया कि अभी डोसा नहीं मिलेगा, तो बड़ी मुश्किल से लार काबू की। अगले होटल में भी वैसा ही फोटो था। जा पहुँचे। और मिल भी गया। मज़ा आ गया।
बाइक वाले काँवड़ियों का जो जमघट जोशीमठ में मिला, उससे अंदाज़ा हो गया कि जैसे-जैसे हम आगे बढ़ते जायेंगे, इनकी संख्या भी बढ़ती जायेगी। मुझे बाइक वाले काँवड़ियों और डाक काँवड़ियों से नफ़रत है। और ऐसा नहीं है कि केवल मुझे ही है। जो भी लोग सावन में काँवड़ यात्रा को गाली देते हैं, वे हमेशा इन्हें ही गाली देते हैं। मैं तो पैदल काँवड़िया रहा हूँ, मुझे तो पैदल और अन्य काँवड़ियों में अंतर पता है, लेकिन सभी को यह अंतर नहीं पता। तो उनके लिये सभी काँवड़िये निकम्मे और बदमाश ही होते हैं। सभी बाइक वाले काँवड़ियों ने अपनी-अपनी बाइकों से साइलेंसर हटा रखे थे और बाइकें जो भयानक शोर मचा रही थीं, बहुत ख़राब लग रहा था। और हेलमेट वाला एक भी नहीं। एक बाइक पर तीन-तीन बदमाश। कच्छे और बनियान में। कोई कोई तो केवल कच्छे में। मैं तो पहले से ही कामना करता आ रहा हूँ कि बाइक वाले काँवड़ियों और डाक काँवड़ियों को उत्तराखंड़ में प्रवेश ही न करने दिया जाये। और जब इनके साथ किसी दुर्घटना की ख़बर पढ़ता हूँ तो अच्छा लगता है।
चमोली तक हज़ारों बदमाश मिले। साढ़े चार बजे हम चमोली पहुँच गये थे। अभी भी तीन घंटे तक खूब उजाला रहने वाला था और हम रुद्रप्रयाग पहुँच सकते थे, लेकिन यहीं रुक गये। वो हॉस्पिटल वाला होटल जानता था कि बाइक वाले बदमाशों के कारण होटल फुल रहेगा, इसलिये वह 700 रुपये से कम नहीं हुआ। दूसरे होटल में 300 का कमरा मिल गया। जिस समय हम यहाँ पहुँचे, होटल खाली था। छह बजे तक सभी कमरे बदमाशों से भर गये। बिना साइलेंसर की बाइकों से पार्किंग भर गयी। इसके बाद, रात दस बजे तक भी, बदमाश कमरों की तलाश में आते रहे। चमोली बाज़ार में रात नौ बजे केवल बाइकों का जाम लगा था। कहीं किसी भी होटल में एक भी कमरा खाली नहीं था। बहुत सारे बदमाश सड़क पर ही सोये होंगे। हम दोनों बड़े खुश हुए इनकी बदहाली देखकर।
अब दिमाग में बड़ी उथल-पुथल मची थी। हरिद्वार के रास्ते जायें या किसी अन्य रास्ते। ऋषिकेश से दिल्ली तक पूरा मार्ग काँवड़ियों के कारण भयानक भीड़ भरा मिलने वाला था। इतनी भीड़ कि बड़ी गाड़ियाँ बंद कर दी जाती हैं। बाइकें चलती हैं।
मुझे काँवड़ यात्रा बहुत पसंद है। याद रखिये कि जब मैं काँवड़ या काँवड़िया शब्द का प्रयोग करूँ तो इसका अर्थ केवल पैदल काँवड़िये ही हैं। बाइक वाले या डाक काँवड़ वालों के लिये बदमाश शब्द का प्रयोग करूँगा। चूँकि हम भी बाइक पर थे, लेकिन हमारे सिरों पर हेलमेट सही तरीके से लगा था, बाइक के कागज भी पूरे थे और हमारी यात्रा फूलों की घाटी की यात्रा थी, न कि गंगाजल या सावन की यात्रा। तो ‘बदमाश’ की श्रेणी में हम नहीं आयेंगे।
दूसरा विकल्प था श्रीनगर से पौड़ी-कोटद्वार होते हुए जाना। लेकिन वह रास्ता मेन रास्ते से भी मुश्किल होने वाला है। क्योंकि दिल्ली की तरफ से सारा ट्रैफिक बिजनौर होते हुए ही हरिद्वार जाता है। तो हमें नजीबाबाद से मेरठ तक भयंकर ट्रैफिक मिलेगा और मेरठ से दिल्ली तक काँवड़िये। तीसरा विकल्प था कर्णप्रयाग से रानीखेत-रामनगर के रास्ते जाना। और चौथा विकल्प था देहरादून, पौंटा साहिब होते हुए। मेरा मन कभी हरिद्वार वाले मेन रास्ते से भी जाने का करता। चूँकि मैं पाँच बार हरिद्वार से मेरठ पैदल काँवड़ ला चुका हूँ, तो यह यात्रा मेरे लिये ‘इमोशन रीकॉल’ जैसी थी। इससे मेरी भावनाएँ जुड़ी हैं। मैं आज फिर से इसे जीना चाहता था। फिर से भंड़ारों में खाना चाहता था और खूब सारे फोटो भी खींचना चाहता था। दीप्ति गंगापार की है, मुरादाबाद की तरफ की। लेकिन सावन में उधर कम ही लोग काँवड़ लाते हैं। तो जो रौनक हरिद्वार-दिल्ली रोड़ पर होती है, वो मुरादाबाद की तरफ नहीं होती। उसके लिये भी यह एक नया अनुभव होगा।
जब भी हम ऋषिकेश से गुजरते हैं तो प्रेम फ़कीरा को याद कर लेते हैं। महाराज ऋषिकेश में ही ज्यादा समय व्यतीत करते हैं, तो कल मिलते हुए चलेंगे। और वे नरेंद्रनगर के पास किसी गाँव में थे। पिछली बार उन्होंने ऋषिकेश में ओशो आश्रम में ठहरा दिया था, बड़ा भारी खर्चा हुआ था। इस बार जैसे ही उन्होंने उस गाँव में आने को कहा, मैंने सबसे पहले खर्चे का ही पूछा। बोले कि अपना ही घर है, कोई खर्चा नहीं होना। मैं किसी के यहाँ जाता हूँ, तो अक्सर पूछ लेता हूँ - “हम बाज़ार से होकर आयेंगे। कुछ लाना है?”
उत्तर मिला - “टमाटर और दूध ले आना।”
सुबह होटल वाले ने बताया कि जो कमरा हमें 300 का मिला था, वैसे ही कमरे उन्होंने बदमाशों को 1000 और 1200 तक के दिये हैं। हमें दो बाल्टी गर्म पानी भी दिया, उन्हें घंटा गर्म पानी।
चमोली से साढ़े आठ बजे चल दिये। आज हमें केवल नरेंद्रनगर तक ही जाना था। लगभग 200 किलोमीटर। चौड़ी सड़क है। दिन छिपने से पहले ही पहुँच जायेंगे। अब बार-बार बताने की आवश्यकता नहीं कि पूरे रास्ते बदमाश ही मिले - बिना हेलमेट लगाये और बिना साइलेंसर की बाइक।
मुझे याद था कि हमने जाते समय भूल से कोटेश्वर महादेव देखना छोड़ दिया था। यह अलकनंदा के उत्तरी किनारे पर स्थित है। हम दक्षिणी किनारे से आ रहे थे। रुद्रप्रयाग जब कुछ ही किलोमीटर दूर रह गया तो अलकनंदा के उस तरफ देखना शुरू कर दिया। एक संकरी जगह पर यह मंदिर दिख भी गया। हम वहाँ तो नहीं गये, यहीं से कुछ फोटो ले लिये।
मोहनचट्टी पुल से नीलकंठ महादेव से आने वाला बदमाशों का रेला आ मिला। खूब पुलिस तैनात थी और किसी भी बदमाश को यहाँ नहीं रुकने दे रही थी। आपने अगर कभी इस तरह के दृश्य नहीं देखे हैं तो आप कल्पना भी नहीं कर सकते कि किस तरह बाइकों की भीड़ नीलकंठ की तरफ से आ रही थी। पुलिस की तारीफ़ करूँगा। वे अच्छी तरह जानते थे कि कोई भी अगर रुक गया तो जाम लग जायेगा और उसे संभालना कितना मुश्किल होगा। वे दिन-रात कई दिनों से इस रेले को संभाल रहे थे और आगामी दो-तीन दिनों तक और संभालेंगे।
ऋषिकेश से टमाटर और दूध लिये और नरेंद्रनगर की ओर चल दिये। इस सड़क पर भी बदमाश। गंगोत्री जाने वाले। नरेंद्रनगर बाईपास पर जब हम फ़कीरा से आगे का रास्ता पूछ रहे थे तो कईयों ने गौमुख का रास्ता पूछा। हम सबको नरेंद्रनगर शहर में भेज देते। बाईपास का कायाकल्प हो रहा है और इस समय यह बेहद ख़राब हालत में था।
बाईपास पर कुछ चलने के बाद एक सड़क दाहिने हाथ जाती दिख रही थी। यहीं महाराज मिल गये। एक-डेढ़ किलोमीटर इस दाहिनी सड़क पर चले तो फ़कीरा की ‘मॉडीफाइड़’ कार खड़ी मिल गयी। महाराज ने बताया - “अब एक किलोमीटर पैदल चलना है। कई बार होता था कि हम चाबी घर पर ही भूलकर कार तक आ जाते थे और तब चाबी लेने लौटना पड़ता था। तो अब इसकी चाबी हमेशा कार में ही रहती है। कभी तुम्हारा भी मन करे तो आना और कार लेकर कहीं घूम आना। बाद में कार यहीं छोड़ जाना।”
गाँव का नाम तो ध्यान नहीं। जब लगभग सभी ग्रामीण पलायन कर गये तो फ़कीरा के मित्र एक ओशो सन्यासी ने यहाँ एक मकान खरीद लिया। वे बड़े मज़े से सपरिवार यहाँ रहते हैं। खेतों में अकेला घर। और खेत भी देखरेख के अभाव में जंगल ही होते जा रहे हैं। फ़कीरा वैसे तो ज्यादातर बाहर ही घूमते रहते हैं, लेकिन अक्सर यहाँ आ जाते हैं। हमारा भी बड़ा अच्छा सत्कार हुआ। खिचड़ी बनायी। यह कहने की आवश्यकता नहीं कि बड़ा आनंद आया।
इस गाँव तक सड़क भी बनायी जायेगी और इसे आगे भी कहीं जोड़ा जायेगा। पहाड़ की खुदाई भी हो चुकी है, लेकिन बारिश में कुछ पत्थर गिर पड़े तो अभी तक वे गिरे ही पड़े थे। अन्यथा बाइक गाँव तक चली जाती।


घांघरिया में सुबह के समय ख़राब मौसम

भ्यूंडार

भ्यूंडार पुल... पानी का प्रवाह देखिये... और आप इसे फटाफट पार करने के बजाय इस पर खड़े होकर सेल्फी लेते हैं...



नेपाली पॉर्टर यात्रियों की प्रतीक्षा में...


पुलना गाँव

पुलना में पार्किंग में सी.सी.टी.वी....

2013 की प्रलय में पुलना को भी बड़ा नुकसान पहुँचा था...


कोटेश्वर महादेव, रुद्रप्रयाग


और अब प्रेम फ़कीरा के साथ...


वही घर है...





फ़कीरा की कार... जिसमें हमेशा चाबी लगी ही रहती है...


4 comments:

  1. बाइक कावड़िया वायु और ध्वनि प्रदूषण दोनों ज्यादा करते होंगे

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  2. बहुत जोरदार। प्रेम फकीरा जिन्दाबाद।

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  3. PREM FAKIRA JI AGRA KE RAHNE WALE HAIN KYA

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