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गोविंदघाट से घांघरिया ट्रैकिंग

14 जुलाई 2017
सुबह चमोली से चलकर पीपलकोटी बस अड्डे पर रुके। पिछली बार भी यहीं रुककर पकौड़ियाँ खायी थीं। अक्सर ऐसा होता है। आपको एक बार एक जगह एक चीज अच्छी लगे तो चाहे आप दस साल बाद आएँ, आप उसे याद भी रखेंगे और दोहराना भी चाहेंगे।
चमोली से पीपलकोटी की सड़क बड़ी खराब है। बी.आर.ओ. पूरे रास्ते काम कर रहा है और इनका काम कभी खत्म नही होगा। हालाँकि पीपलकोटी से जोशीमठ और आगे गोविंदघाट तक बहुत अच्छी सड़क है।
हमें नहीं पता था कि गोविंदघाट से अलकनंदा के पार भी सड़क है और बाइक जा सकती है। एक जगह पार्किंग में बाइक खड़ी भी कर दी थी, पर्ची कटने ही वाली थी कि दीप्ति की निगाह नदी के उस पार घांघरिया जाने वाले रास्ते पर आती-जाती बाइकों और गाड़ियों पर पड़ी। इस बारे में पार्किंग वाले से बात की तो उसने इस अंदाज़ में उत्तर दिया कि मुझे लगने लगा कि अगर हम वहाँ बाइक ले गए तो पछतायेंगे। वो तो भला हो दीप्ति का कि हम यहाँ से बाइक लेकर चल दिये।




अलकनंदा के पुल पर रजिस्ट्रेशन हुआ। सरदार थे, अतिरिक्त सामान गुरुद्वारे में रख देने का भी अनुरोध किया, लेकिन हम एक-एक सामान चुन-चुनकर लाये थे। कुछ भी अतिरिक्त नहीं था। उन्होंने यात्रा की शुभकामना दी और हम अलकनंदा पार कर गए।
चार किमी तक अच्छी सड़क बनी है। अब महसूस हुआ कि अगर हम वहीं बाइक खड़ी कर देते तो बड़े पछताते। पुलना गाँव के पास दो लड़कों ने रोक दिया, “भाई जी, आगे पार्किंग नहीं है। आप यहीं बाइक खड़ी कर दो। देखो, कितनी सारी बाइकें यहाँ खड़ी हैं। सभी लोग यहीं खड़ी करते हैं।” मुझे उनकी बात में दम नहीं लगा, “हम बिल्कुल लास्ट में खड़ी करेंगे।”
“भाई जी, पचास मीटर आगे ही लास्ट है।”
“तो हम अपनी तसल्ली करके आते हैं।”
उन्होंने सही कहा था। 50 मीटर आगे ही सड़क समाप्त हो रही थी। कुछ गाड़ियाँ खड़ी थीं। हम वापस मुड़ गए। 2-3 दिनों के लिए खड़ी करेंगे, तो पार्किंग में ही ठीक रहेगी। मुड़ते ही देखा कि उनमें से एक लड़का हमारे पीछे-पीछे आ गया था। इन्होंने अपने-अपने घर के ऊपर ही पार्किंग बना रखी थी। एक की छत सड़क से ऊपर थी, दूसरे की नीचे। ऊपर वाला हमें अपनी ओर आकर्षित कर रहा था और नीचे वाला अपनी ओर। आखिरकार नीचे बाइक खड़ी कर दी। 3 दिनों की पार्किंग का शुल्क 50 रुपये था। यहीं पार्किंग में खड़ी बाइकों पर दो पुलिसवाले भी बैठे थे। यहाँ ड्यूटी लगने से परेशान थे और चुप थे।
“हेलमेट हमे दे दो भाई जी।”
“एक्स्ट्रा पैसे तो नही लोगे?”
यह पूछ लेना जरूरी है। उसने हेलमेट पर एक नंबर लिखा और अपने पास रख लिया। अगर इसके एक्स्ट्रा पैसे लेता तो हम इन्हें बाइक पर ही लॉक कर देते। दिल्ली वाले अपनी मोटरसाइकिलों पर हेलमेट-लॉक ज़रूर लगवाते हैं। कई बार यह दूसरे राज्य वालों के लिए कौतूहल की चीज भी बन जाता है।
समुद्र तल से लगभग 2000 मीटर की ऊँचाई पर पुलना स्थित है। दो बजे जब हमने पैदल यात्रा आरम्भ की तो तेज धूप थी। लेकिन घना जंगल है, इसलिए धूप की चुभन उतनी महसूस नहीं हुई। रास्ते मे एक जगह चार मित्र बैठे थे। उन्हें यह चुभन ज्यादा ही लग रही थी। वे परेशान थे कि इससे कैसे निपटें। एक अपने शर्ट बनियान निकालकर चलना चाहता था। दूसरा ऐसा न करने को कह रहा था। शरीर काला हो जाएगा। तीसरा टीशर्ट पहनने का सुझाव दे रहा था। हम उनकी इस परेशानी पर मुस्कुराते हुए निकल गए। हम पूरी बाजू की शर्ट पहने थे। धूप का चश्मा लगा रखा था। दीप्ति ने आँखों से नीचे पूरा चेहरा रुमाल से ढक रखा था। इस धूप में चुभन तो होनी ही होनी है। पसीना भी आना है। हमें केवल खुली त्वचा को जलने से बचाना है।
चढ़ाई अच्छी खासी है। चौड़ी पक्की पगडंडी बनी है। चलने में आनंद आता है। रास्ते मे जगह-जगह झाड़ू लिए सफाईकर्मी मिलते हैं। पैसे मांगते हैं।
2560 मीटर की ऊँचाई पर भ्यूंडार है। पहले मुझे लगता था कि यह स्थायी गाँव होगा, लेकिन अब ऐसा नही है। जून 2013 से पहले यह अच्छा-खासा गाँव था। एक नदी काकभुशुंडी-ताल की तरफ से आकर यहाँ लक्ष्मण गंगा में मिलती है। लेकिन जून 2013 में आयी जल-प्रलय में पूरा गाँव बह गया। चर्चा इसलिये नहीं हुई, क्योंकि केदारनाथ की चर्चा थी। तब से अब तक गाँव पुनः नहीं बस सका। कुछ लोग पुलना में बस गये, कुछ कहीं और। हालाँकि अब गाँव में कुछ घर बसने लगे हैं।
भ्यूंडार आकर आपने अगर जल-प्रलय की कल्पना नहीं की, तो समझिये कि आप संवेदनशील नहीं हैं। किस कदर तांडव मचाया था इन नदियों ने। भ्यूंडार दोनों के बीच में था या एक के किनारे था, पता नहीं... लेकिन बीच में खेत अवश्य रहे होंगे। सब समाप्त। पूरा गाँव ही बह गया, कल्पनातीत!




फिलहाल हेमकुंड यात्रा का एक पड़ाव भर है भ्यूंडार। ठहरने की कोई जगह नही, लेकिन खाने-पीने के भरपूर विकल्प। हमने जहाँ आलू के पराँठे खाये, वह चमोली का रहने वाला था। बताने लगा कि जून में यहाँ इतनी भीड़ होती है कि तंदूर चलाना पड़ता है और तब भी होश नही रहता। अभी तंदूर ठंडा पड़ा था और हमारे अलावा कोई भी नही था।
यहीं एक पक्के और बड़े पुल का काम चल रहा है। घांघरिया तक सड़क बनेगी। अभी जो छोटा पुल है, उसे देखने से ही लगता है कि थोड़ा-सा पानी बढ़ते ही यह बह जाएगा। एक पुल के अवशेष भी पानी मे पड़े थे। और यात्री इसे फटाफट पार करने के बजाय दिल्ली का लोहे का पुल समझकर इसी पर रुककर सेल्फियाँ लेते रहते हैं।
देवदार का जंगल। कहीं-कहीं भोजवृक्ष भी। देवदार का जंगल हो तो समझना कि उसके नीचे घनी झाड़ियाँ, पौधे और अन्य पेड़ भी होंगे। बेलें तो देवदार को दादाजी समझकर लिपट जाती हैं। चीड़ के जंगल मे ऐसा नही होता। चीड़ का जंगल है तो केवल और केवल चीड़ ही होगा।
भ्यूंडार से एक घंटे में 2 किमी चलने के बाद हम 2900 मीटर की ऊँचाई पर पहुँच गए। यहाँ कुछ दुकानें हैं। जिस दुकान में हमने चाय पी, वो भी चमोली का ही रहने वाला था।
पंजाब के दो परिवार मिले; दो पुरुष, दो महिलाएँ। चढ़ाई से त्रस्त थे। पूछने लगे, “आप पहली बार ही आये हो क्या?”
“हाँ जी, इधर पहली बार ही आये हैं।”
“कमाल है; पहली बार आये हो, फिर भी आपका स्टेमिना इतना अच्छा है।”
“कल इससे भी तेज चढ़ाई मिलने वाली है घांघरिया के बाद।”
“भला इससे ज्यादा भी कोई चढ़ाई हो सकती है? हम तो उम्मीद कर रहे हैं कि कल आसान रास्ता मिलेगा।”
“नही, आसान नही है। इससे भी तेज है।”
“आपको कैसे पता? आप तो पहली बार आये हो।”
मैं हँसता हुआ बिना उत्तर दिए आगे बढ़ गया।
रास्ते में जितने भी ढाबे हैं, सभी में पोस्टर-बैनर लगे हैं - अच्छी-अच्छी बातें लिखे हुए। और बातें भी एकदम प्रैक्टिकल।
“एक रविवार ही है, जो रिश्तों को संभालता है...बाकी दिन तो किश्तें उतारने में ही खर्च हो जाते हैं।”
“माना कि पूरी दुनिया खराब है, पर आपको अच्छा बनने से किसने रोका है?”
शाम सवा सात बजे घांघरिया पहुंचे। 3100 मीटर की ऊँचाई पर। हमारी उम्मीदों के विपरीत यहाँ पक्के आलीशान होटल बने थे। 500 का कमरा 400 में मिल गया। बेहद शानदार। हमें उम्मीद थी कि प्रति व्यक्ति की दर से 100-100 या 150-150 में बिस्तर और कंबल मिलेंगे।
एक पुलिस चौकी भी है। चौकी पर पुलिस वालों के साथ 8-10 भूटिया कुत्ते बैठे हैं। पुलिस का कोई काम नहीं, लेकिन कुत्तों का काम गायों को घांघरिया में घुसने से रोकना है। जब भी गायें इधर आने की कोशिश करतीं, सब के सब कुत्ते भौंकने लगते। हमें लगता कोई जानवर, भालू दिख गया है इन्हें। लेकिन जल्द ही पता चल गया कि गायों को भगा रहे हैं।
कल सुबह अगर मौसम साफ हुआ तो फूलों की घाटी जाएंगे। अन्यथा हेमकुंड जाएंगे।













भ्यूंडार

भ्यूंडार में दो नदियों का संगम




भ्यूंडार में पुराना बंद झूला पुल और नया बन रहा कंक्रीट का पुल


घांघरिया में हमारा ठिकाना

घांघरिया

घांघरिया








1. चलो फूलों की घाटी!
2. कार्तिक स्वामी मंदिर
3. गोविंदघाट से घांघरिया ट्रैकिंग
4. यात्रा श्री हेमकुंड साहिब की
5. फूलों की घाटी
6. फूलों की घाटी के कुछ फोटो व जानकारी
7. फूलों की घाटी से वापसी और प्रेम फ़कीरा
8. ऋषिकेश से दिल्ली काँवड़ियों के साथ-साथ




Comments

  1. सबसे पहले दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं
    मुझे लगता है कि घूमने की सारी किस्मत आप ही लिखा कर लाये हो आज तो आपकी पोस्ट पढ़ते-पढ़ते आँखे खुशी से भीग गयी
    भगवान् आपको यूँ ही घुमाता रहे
    जय हो

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  2. उसने सही कहा कि जून में भयंकर भीड़ होती है यहां ! अच्छा लगा ये जानकर कि पुलना तक सड़क बन गई है और आते जाते ये भी पता चला कि जीप भी चलती हैं वहां तक ! अच्छा भी और बुरा भी , आपने लिखा आगे घाँघरिआ तक भी सड़क बनेगी ! फिर बचेगा क्या ? 2007 में गए थे हम पति-पत्नी और दो मित्र ! घांघरिया में 2000 -1500 से कम का कोई होटल नहीं मिल रहा था , वहां के गुरूद्वारे में बिल्कुल जगह नहीं थी , जैसे तैसे एक कोना मिला और चार लोग बस बैठे -बैठे ही सोये और इसकी वजह से एक तो आगे हेमकुंड गया ही नहीं !

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  3. यूनेस्को ने नन्दा देवी राष्ट्रीय उद्यान और फूलों की घाटी राष्ट्रीय उद्यान को सम्मिलित रूप से विश्व धरोहर स्थल घोषित किया है, निश्चित ही बहुत सुन्दर होगा, आप लोग जाएंगे तो बड़ा अच्छा लगेगा
    पहाड़ी वादियों में पैदल चलने में परेशानी तो बहुत होती हैं लेकिन मजा भी बहुत आता है

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  4. भाई जी इतने ऊपर तो चीजें महँगी होती है फिर यहाँ डिस्काउंट किस बात का

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  5. बेमिसाल नीरजजी
    हम भी अभी जून मे सपरिवार गए थे यहां.
    पर valley मे ज्यादा फ्लावर नहीं थे.
    पर हेमकुंड सचमुच में स्वर्ग है.
    आपके photos का इंतज़ार रहेगा

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  6. lajwab NEERAJ MEIN 2007 MEIN GAYA THA BAHUT HI KHOOBSOORAT ADBHUT

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