Wednesday, December 9, 2015

जोशीमठ-पौडी-कोटद्वार-दिल्ली

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30 सितम्बर 2015
आज हमें दिल्ली के लिये चल देना था। सुबह सात बजे ही निकल पडे। एक घण्टे में पीपलकोटी पहुंचे। पूर्व दिशा में पहाड होने के कारण धूप हम तक नहीं पहुंच पा रही थी, इसलिये रास्ते भर ठण्ड लगी। पीपलकोटी में बस अड्डे के पास ताजी बनी पकौडियां देखकर रुक गये। यहां धूप थी। पकौडियां, चाय और गुनगुनी धूप; तीनों के सम्मिश्रण से आनन्द आ गया। आधे घण्टे में यहां से चले तो नौ बजे चमोली पहुंचे, दस बजे कर्णप्रयाग। यहां 15 मिनट रुके, आराम किया। वातावरण में गर्मी बढने लगी थी। रास्ता अलकनन्दा के साथ साथ है और ज्यादा ऊंचाई पर भी नहीं है। इसलिये गर्मी लगती है।
गौचर रुके। यहां से बाल मिठाई ली। हम दोनों को यह मिठाई बेहद पसन्द है लेकिन चूंकि यह कुमाऊं की मिठाई है इसलिये लगता है गढवाल वाले इसे बनाना नहीं जानते। कुछ दिन पहले कर्णप्रयाग से ली थी, वो पिघल गई थी और सभी मिठाईयां एक बडा लड्डू बन गई थीं। आज ली तो यह भी खराब थी। इसका पता दिल्ली आकर चला। खैर, गौचर में दुकान वाले से कुछ बातें कीं। आपको पता नहीं याद हो या न हो; कुछ साल पहले जब देश में कांग्रेस की सरकार थी, तो सोनिया और राहुल गांधी आदि गौचर आये थे और ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेलवे लाइन का शिलान्यास किया था। इसी के बारे में पता करना था कि कुछ काम भी चल रहा है या नहीं। दुकान वाले ने बताया कि वे लोग तो यहां पिकनिक मनाने आये थे। ऊपर हवाई अड्डे परिसर में ही ‘शिलान्यास’ जैसा कुछ आयोजित हुआ, फीता जैसा कुछ काटा और बात खत्म हो गई।

रुद्रप्रयाग से आगे कलियासौड में धारी देवी मन्दिर है। अलकनन्दा पर बन रहे एक बांध के कारण यह मन्दिर डूब क्षेत्र में आ रहा है। धारी देवी मन्दिर को निश्चित ही डूबना पडेगा। यह देवी गढवाल की एक आराध्या देवी हैं, इसलिये इस बात का स्थानीयों ने खूब विरोध किया। लेकिन आखिरकार 16 जून 2013 की शाम को मन्दिर से देवी की मूर्ति को नये बने मन्दिर में स्थानान्तरित कर दिया गया। ठीक उसी दिन कुछ ही घण्टों बाद केदारनाथ समेत पूरे उत्तराखण्ड में जो तबाही मची, उसने पूरी दुनिया को हिलाकर रख दिया। इसे देवी के क्रोध के रूप में देखा गया। अब तय ये हुआ है कि धारी देवी उसी स्थान पर रहेंगी जहां पहले थीं। इसके लिये बांध के पानी में एक प्लेटफार्म बनाया जा रहा है जहां मन्दिर बनेगा और धारी देवी को वहां स्थापित किया जायेगा। श्रद्धालु एक पुल के द्वारा मन्दिर तक पहुंचेंगे।
एक बजे श्रीनगर पहुंचे। अब तक तो खूब गर्मी लगने लगी थी। लंच किया। अब कुछ ऐसा हुआ कि हम पौडी, कोटद्वार के रास्ते जाना चाहते थे जबकि करण हरिद्वार के रास्ते। जाहिर है कि अब हमें अलग होना पडेगा। पहले तो मैंने करण को बता दिया कि वो कैसे ऋषिकेश और हरिद्वार की भीड को अलग छोडकर खाली रास्ते से चीला की तरफ निकल सकता है। फिर जब गूगल मैप पर दूरियां देखीं तो पाया कि श्रीनगर से दिल्ली दोनों ही रास्तों से बिल्कुल बराबर दूरी पर है। इसलिये उसने भी हमारे ही साथ चलने का निर्णय लिया।
दो बजे श्रीनगर से निकल गये और पौडी की तरफ चल दिये। रास्ता चढाई का है और जितना पौडी की तरफ चलते गये, अलकनन्दा घाटी उतनी ही मनोहारी दिखती गई। एक घण्टे में ही पौडी पहुंच गये, रास्ता अच्छा बना है। पौडी पार करके जब अचानक चौखम्भा दिखाई दी तो 15-20 मिनट के लिये रुक गये। नजारा वास्तव में अचम्भित कर देने वाला था। करण आगे निकल गया था, इसलिये उसे यह नजारा नहीं दिखा होगा। बुवाखाल में चौराहा है, जहां से दो रास्ते पता नहीं कहां-कहां जाते हैं जबकि तीसरा रास्ता कोटद्वार की तरफ; हम कोटद्वार की तरफ मुड गये। चौडी साफ-सुथरी टू-लेन की सडक और कोई ट्रैफिक नहीं। वास्तव में मुख्य ऋषिकेश रोड पर यह आनन्द नहीं मिलने वाला था। साढे चार बजे ज्वाल्पा देवी पहुंच गये। अगर बीनू कुकरेती मुझे इस मन्दिर में दस मिनट रुकने का आग्रह न करते तो हम बिना रुके चले आते। 20 मिनट के लिये रुके। मन्दिर सडक से थोडा नीचे है, सीढियां बनी हैं। आगामी नवरात्रों के मद्देनजर मन्दिर में साफ-सफाई और थोडा सा निर्माण कार्य चल रहा था।
सतपुली पहुंचे और फिर गुमखाल की चढाई आरम्भ कर दी। सतपुली लगभग 500 मीटर की ऊंचाई पर है जबकि गुमखाल 1500 मीटर पर। सतपुली से गुमखाल का रास्ता कुछ पतला था लेकिन ट्रैफिक न होने के कारण बाइक चलाने में कोई दिक्कत नहीं आई। यहां मैंने करण को फोन मिलाया। श्रीनगर के बाद से हम नहीं मिले थे। उसने बताया कि वो कोटद्वार पार करके नजीबाबाद पहुंचने वाला है। वास्तव में उस समय मुझे बडा गुस्सा आया। वो आगे चला गया, इस बात पर नहीं बल्कि उसने ‘अलविदा’ नहीं कहा। मैं बाइक तेज नहीं चलाता, इस बात का उसे पता था। उसे हमसे पहले दिल्ली पहुंचना था और हमसे आगे निकलना था, इस बात का वो निश्चय कर चुका होगा। जिस समय उसने निश्चय किया, उसी समय अलविदा कह देता तो हम मना नहीं करते। आखिर अलविदा तो श्रीनगर में ही कर चुके थे जब वो हरिद्वार के रास्ते जाने वाला था। फिर जब कोटद्वार की तरफ चलने का इरादा बना तो साथ चलने की बात हुई थी। बाद में जब हम दिल्ली में मिले तो उसने बताया कि उससे आगे एक स्थानीय बुलेट वाला चल रहा था। करण के पास भी बुलेट थी। करण ने उससे रेस लगा ली और हमें भूल गया। मुझे किसी के साथ होने या न होने से फर्क नहीं पडता लेकिन इतने दिनों से दिन-रात साथ थे, तो कम से कम फोन पर ही अलविदा कह देता। उल्टा मुझे जलाने को कहने लगा कि मैं तुम्हारे लिये नजीबाबाद रुक जाता हूं। भला कहां नजीबाबाद और कहां सतपुली?
शाम छह बजे गुमखाल पहुंचे। गुमखाल एक खाल यानी धार पर स्थित है। सतपुली से यहां तक चढाई है और इसके बाद कोटद्वार तक उतराई। गुमखाल उसी धार पर स्थित है जिस पर लैंसडाउन। बल्कि गुमखाल पार करके लैंसडाउन दिखता भी है। गुमखाल से एक रास्ता लक्ष्मणझूला भी जाता है। गुमखाल से दुगड्डा और आगे कोटद्वार तक एक नम्बर की सडक बनी है और चीड का जंगल है। चीड के जंगल मुझे बडे अच्छे लगते हैं। ऊंचाई पर होने के कारण यहां मौसम भी ठण्डा था। एक बार तो मन भी किया कि गुमखाल ही रुक लेते हैं। आगे कोटद्वार रुकना पडेगा, उससे अच्छा तो गुमखाल ही रुक लें। लेकिन कल दोपहर तक दिल्ली पहुंचना अनिवार्य है, इसलिये नहीं रुके। किसी दिन फुरसत से गुमखाल आयेंगे और आसपास चीड के जंगल को देखेंगे। लैंसडाउन तो प्रसिद्ध हो गया लेकिन गुमखाल गुमनाम रह गया। शायद अंग्रेजी नाम का असर हो। आप भी कभी लैंसडाउन जाओ तो एक चक्कर गुमखाल का भी लगाना, अच्छा लगेगा।
सवा सात बजे कोटद्वार पहुंचे। वैसे तो यह गढवाल में ही है लेकिन यहां गढवाल जैसे कोई चिह्न नहीं हैं। न भौगोलिक रूप से और न ही सांस्कृतिक रूप से। सबकुछ मैदान जैसा है, लोग भी। 500 रुपये का महा-घटिया कमरा मिला। थके हुए थे, ज्यादा हमने ढूंढा भी नहीं।
अगले दिन साढे छह बजे कोटद्वार से चल दिये। सुबह सुबह नजीबाबाद पार हो गये, अन्यथा शहर में खूब भीड मिलती है। नजीबाबाद के पास कोहरा मिला। अक्सर सितम्बर में कोहरा नहीं होता लेकिन यहां काफी घना कोहरा था और वाहनों को हेडलाइट जलाकर चलना पड रहा था। बिजनौर भी बाहर-बाहर ही निकल गये। सडक शानदार बनी है। टू-लेन सडक है। बैराज पार करके गंगा के इस तरफ आ गये। यह यूपी का मुजफ्फरनगर जिला है। एक जगह रुककर चाय-पकौडे का नाश्ता किया। मीरांपुर होते हुए रामराज पहुंचे तो मेरठ जिले में प्रवेश कर गये। मवाना बाईपास से निकले। बाईपास बनने से पहले मवाना शहर से निकलना पडता था और जाम व ट्रैफिक में भी फंसना पडता था। मवाना से आगे एक गांव है मसूरी। यहां से दौराला की ओर मुड गये। दौराला यहां से 15 किलोमीटर दूर है, रास्ता शानदार बना है। दौराला के बाद तो वही हरिद्वार हाईवे मिल जाता है जो चार लेन का है। अगर मसूरी से दौराला न जाते तो मेरठ की भीड का सामना करना पडता।
11 बजे मुरादनगर नहर पर पहुंचे। मुझे दो बजे ऑफिस जाना है। दोनों थके हुए हैं, कौन घर जाकर खाना बनायेगा? इसलिये यहीं लंच भी कर लिया। कुछ ही समय पहले मेरठ से गाजियाबाद तक की सडक टूटी हुई थी। लेकिन अब इसे अच्छा बना दिया है। हालांकि इस पर ट्रैफिक इतना ज्यादा होता है कि इसे यथाशीघ्र छह लेन बनाने की आवश्यकता है। अब अच्छी सडक बन जाने से न कहीं ट्रैफिक रुकता है और न ही जाम लगता है।
ठीक साढे बारह बजे हम शास्त्री पार्क में थे। 1206 किलोमीटर बाइक चली।

पीपलकोटी में नाश्ता

चमोली से दूरियां


निर्माणाधीन धारी देवी मंदिर


अलकनंदा और सड़क

पौड़ी रोड से दिखती अलकनंदा और श्रीनगर

पौड़ी से दिखती चौखम्भा और अन्य चोटियाँ

बुवाखाल से दूरियां

बुवाखाल से चौखम्भा शानदार दिखती है.

अच्छी सड़क बनी है.



ज्वाल्पा देवी मंदिर



गुमखाल

गुमखाल के पास चीड का जंगल.

अँधेरे में कोटद्वार की ओर.

नजीबाबाद के पास कोहरा


मुरादनगर गंगनहर पर




समाप्त!

19 comments:

  1. Vah . Ghar pahuchane par shanti bhi milti he . Read karne se ham bhi feel karte he ki ham bhi yatra me he . Grtat Neeraj & Neesha .

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    1. धन्यवाद उमेश भाई...

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  2. आपके साथ हम भी घर पहुँच गए। आनंद आया इस सफ़र में। रास्ते वाकई गज़ब नज़र आ रहे हैं। और चौखम्बा ऐसे लग रहा है जैसे कोई रूहानी ताकत बाहें फैलाये खड़ी हो।

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    1. धन्यवाद अंशुल जी...

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  3. आपकी इस पोस्ट ने मेरी काफी यादें ताजा करा दी।एक बार बर्फ के कारण कोटद्वार पौड़ी रूट पर मुझे सोलह किलोमीटर पैदल चलना पड़ा था ।ठीक ही कहा आपने कहाँ सतपुली कहाँ नजीमाबाद बहुत ही अंतर हुआ।

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    1. धन्यवाद हर्षिता जी...

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    1. धन्यवाद गुप्ता जी...

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  5. वाह!
    बहुत शानदार यात्रा रही।
    आपसे मिलके आनंद आया भाई
    जल्दी ही साथ यात्रा करेंगे।

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    1. हमें भी आपसे मिलकर बहुत आनंद आया... धन्यवाद आपका...

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  6. चलोजी आपका यात्रा वृतांत पढ़कर हमने भीएक बार फिर बद्रीनाथ एवम् अन्य स्थान घूम लिए। खाल का अर्थ कहीं दर्रा तो नही जैसेj&k में गला या ला ,हिमाचल में जोत और उत्तराखंड में खाल शब्द प्रयोग होता है जैसे सभी दर्रों के साथ खाल शब्द लगा है।

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    1. खाल का अर्थ है रीढ़, धार... इनमे दर्रे भी आ जाते हैं...

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  7. अच्छी यात्रा रही। वैसे आखिरी दो दिन भागमभाग रही, लेकिन करण ने सही नही किया, एक बार आपको बताना तो चाहिए था।

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    1. हाँ सचिन भाई.. आख़िरी दो दिन भागमभाग ही रही...

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  8. एक और यात्रा का सफलता पूर्वक समापन। मुसाफिर यूँही चलता रहे बस यही दुआ है।

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    1. धन्यवाद निशांत जी...

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  9. नीरज भाई ,

    यात्रा शानदार रही ….

    करण का आपको अलविदा न कहना …. अछा नही लगा ।इतने दिन साथ थे आप। १ फोन call तो जरूर कर सकता था वो ….

    नीरज भाई उत्तर कि तरफ बहोत यात्रा कर लि जरा… दक्षिण कि तरफ भी चल दिजिये …. रामेश्वरम , मीनाक्षी टेंमपले , तिरुपती बालाजी,KODAIKANAL ,ऊटी , मेसुर आदी ……

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  10. कोटद्वार में आने की सूचना देते तो हमें भी आपके दर्शन हो जाते

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  11. भाई मई एक बार गया था लैंसडाउन तो गुमखाल में और चीड के जंगलो में दिन भर घूमते रहे थे अपने एक मित्र के साथ... कसम से मजा आ गया था. उस क्षेत्र में मैंने पहाड़ में ऊपर की तरफ पत्थर के टुकडो की बनी मेड बहुत दिखती थी. समझ नहीं आया शायद वो निजी संपत्ति की मार्किंग थी.

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