Monday, October 30, 2017

यात्रा श्री हेमकुंड साहिब की

15 जुलाई 2017
सुबह उठे तो मौसम ख़राब मिला। निश्चय करते देर नहीं लगी कि आज फूलों की घाटी जाना स्थगित। क्या पता कल सुबह ठीक मौसम हो जाये। तो कल फूलों की घाटी जाएंगे। आज हेमकुंड साहिब चलते हैं। कल भी मौसम ख़राब रहा तो परसों जायेंगे। यह यात्रा मुख्यतः फूलों की घाटी की यात्रा है, जल्दी कुछ भी नहीं है। तो हम केवल साफ मौसम में ही घाटी देखेंगे। वैसे जुलाई तक मानसून पूरे देश में कब्जा जमा चुका होता है, तो साफ मौसम की उम्मीद करना कुछ ज्यादा ही था, लेकिन हिमालय में अक्सर मौसम साफ ही रहता है। दोपहर बाद बरस जाये तो उसे खराब मौसम नहीं कहते। सुबह ही बरसता मिले तो खराब कहा जायेगा। अभी खराब मौसम था।
इंतज़ार करते रहे। इसका यह अर्थ न लगाया जाये कि हमने बालकनी में कुर्सियाँ डाल लीं और चाय की चुस्कियों के साथ बारिश देखते रहे। इंतज़ार करने का अर्थ होता है रजाईयों में घुसे रहना और जगे-जगे सोना व सोते-सोते जगना। नींद आ गयी तो आँख कुछ मिनटों में भी खुल सकती है और कुछ घंटों में भी। हाँ, एक बार बाहर झाँककर अवश्य देख लिया था। सिख यात्री नीचे गोविंदघाट से आने शुरू हो गये थे। सुबह कब चले होंगे वे? और हो सकता है कि इनमें से कुछ आज ही हेमकुंड भी पहुँच जायें। ज्यादातर यात्री नीचे लौटने की तैयारियों में थे। घोड़ों, खच्चरों व कंडी वालों से मोलभाव कर रहे थे। बारिश में ही।

Friday, October 27, 2017

पुस्तक चर्चा: आख़िरी चट्टान तक

पता नहीं किस कक्षा में मोहन राकेश का एक यात्रा-वृत्तांत था - आख़िरी चट्टान। उस समय तो इसे पढ़ने और प्रश्नों के उत्तर देने के अंक मिलते थे, इसलिये कभी भी यह अच्छा नहीं लगा, लेकिन आज जब यह पूरी किताब पढ़ी तो आनंद आ गया।
आनंददायक यात्रा-वृत्तांत वे होते हैं, जिनमें गतिशीलता भी होती है और रोचकता भी होती है। ‘आख़िरी चट्टान तक’ ठीक इसी तरह की एक किताब है। लेखक ज्यादा देर कहीं ठहरता नहीं है। फटाफट एक वाकया सुनाता है और आगे बढ़ जाता है। गतिशीलता बरकरार रहती है। यात्रा सन 1952 के आख़िरी सप्ताह और 1953 के पहले सप्ताह में की गयी है। भारत नया-नया आज़ाद हुआ और गोवा भी भारत का हिस्सा नहीं था। लेखक ने उस दौरान गोवा की भी यात्रा की। तब दूधसागर जलप्रपात के नीचे से होकर मीटरगेज की ट्रेन भारत से गोवा जाया करती थी। भारत का आख़िरी स्टेशन था केसलरॉक और गोवा का पहला स्टेशन था कुलेम। दोनों ही स्टेशनों पर गाड़ी दो-दो घंटे रुका करती थी - कस्टम जाँच के लिये।

Monday, October 23, 2017

गोविंदघाट से घांघरिया ट्रैकिंग

14 जुलाई 2017
सुबह चमोली से चलकर पीपलकोटी बस अड्डे पर रुके। पिछली बार भी यहीं रुककर पकौड़ियाँ खायी थीं। अक्सर ऐसा होता है। आपको एक बार एक जगह एक चीज अच्छी लगे तो चाहे आप दस साल बाद आएँ, आप उसे याद भी रखेंगे और दोहराना भी चाहेंगे।
चमोली से पीपलकोटी की सड़क बड़ी खराब है। बी.आर.ओ. पूरे रास्ते काम कर रहा है और इनका काम कभी खत्म नही होगा। हालाँकि पीपलकोटी से जोशीमठ और आगे गोविंदघाट तक बहुत अच्छी सड़क है।
हमें नहीं पता था कि गोविंदघाट से अलकनंदा के पार भी सड़क है और बाइक जा सकती है। एक जगह पार्किंग में बाइक खड़ी भी कर दी थी, पर्ची कटने ही वाली थी कि दीप्ति की निगाह नदी के उस पार घांघरिया जाने वाले रास्ते पर आती-जाती बाइकों और गाड़ियों पर पड़ी। इस बारे में पार्किंग वाले से बात की तो उसने इस अंदाज़ में उत्तर दिया कि मुझे लगने लगा कि अगर हम वहाँ बाइक ले गए तो पछतायेंगे। वो तो भला हो दीप्ति का कि हम यहाँ से बाइक लेकर चल दिये।

Friday, October 20, 2017

पुस्तक-चर्चा: हिमाचल के शिखरों में रोमांचक सफर

इस पुस्तक की तारीफ़ कैसे करूँ, कुछ समझ नहीं पा रहा। यात्रा-वृत्तांत विधा का यह एक हीरा है। आपको यदि यात्रा-वृत्तांत पसंद हैं, तो यह पुस्तक आपके पास होनी ही चाहिये। लेखक कुल्लू-निवासी डॉ. सूरत ठाकुर आपको हिमाचल के अप्रचलित स्थानों पर ट्रैकिंग कराते हैं। ऐसे स्थान कि आज इंटरनेट के जमाने में भी ढूंढ़े से नहीं मिलेंगे।

चलिये, प्रत्येक चैप्टर का आपको परिचय करा देते हैं:
1. भृगुतुंग से मलाणा
यात्रा अगस्त 1983 में की। इन्होंने अपनी यात्रा मनाली से गुलाबा बस से और उसके बाद पैदल शुरू की। गुलाबा से दशौर झील, भृगु झील, वशिष्ठ, मनाली, नग्गर, चंद्रखणी जोत और मलाणा। रास्ते में पड़ने वाले सभी गाँवों, स्थानों का अच्छा वर्णन।

Monday, October 16, 2017

कार्तिक स्वामी मंदिर

13 जुलाई 2017
रुद्रप्रयाग में दही समोसे खा रहे थे तो प्लान बदल गया। अब हम पोखरी वाले रास्ते से जाएंगे। उधर दो स्थान दर्शनीय हैं। और दोनों के ही नाम मैं भूल गया था। बाइक उधर ही मोड़ दी। अलकनन्दा पार करके दाहिने मुड़ गए। चढ़ाई शुरू हो गयी। मोबाइल ख़राब था और नक्शा सामानों में कहीं गहरे दबा हुआ था। जगह का नाम याद नहीं आया। कहीं लिखा भी नहीं मिला और किसी से पूछ भी नहीं सकते। बाद में ध्यान आया कि एक जगह तो कोटेश्वर महादेव थी। रुद्रप्रयाग के नज़दीक ही अलकनन्दा के किनारे। कितनी नज़दीक? पता नहीं। कितनी दूर? पता नहीं।
हम चलते रहे। ऊँचाई बढ़ती रही और अलकनंदा गहरी होती चली गयी। दूरियाँ लिखी आ रही थीं - चोपता, पोखरी, गोपेश्वर इतने-इतने किलोमीटर। लेकिन उस मंदिर का जिक्र नही आया। सोच लिया कि पोखरी पहुँचकर पूछूँगा किसी से। शायद पोखरी के बाद है वो मंदिर।

Monday, October 9, 2017

चलो फूलों की घाटी!

12 जुलाई 2017
थक गए। और थकान होगी ही। नींद भी आएगी। सुबह तीन बजे के उठे हुए और साढ़े चार के चले हुए। अब शाम छह बजे श्रीनगर पहुँचे। कमरा लिया। दीप्ति तो गीले कपड़े धोने और सुखाने में व्यस्त हो गयी, मैं खर्राटे लेने में। मुझे कोई होश नहीं कि दीप्ति ने कितना काम किया। सात बजे कपड़ों से फुरसत पाकर उसने मुझे जगाया, “चलो, कुछ खा आएँ।” मैंने नींद में बुदबुदा दिया, “मुझे कुछ नहीं खाना। तू खा आ।” वह अकेली कपड़े तो धो सकती है, लेकिन खाना नहीं खा सकती। एक घंटे और सोने दिया। फिर तो उठा ही दिया। इडली उपलब्ध हो तो यह उसका प्रिय भोजन है। उंगलियाँ सानकर ही खाती है। मुझे भी इडली अच्छी लगती है, लेकिन अगर पनीर का भी विकल्प हो, तो मैं पनीर लेना पसंद करूँगा।
रास्ते मे बहुत सारे लंगर लगे मिले थे। सरदारों वाले लंगर। हेमकुंड साहिब के तीर्थयात्रियों के लिए। स्प्लेंडर पर दो-दो तीन-तीन सरदार। पगड़ी वालों को तो हेलमेट की ज़रूरत नहीं, लेकिन बिना पगड़ी वाले भी बिना हेलमेट लगाये। सब मोटरसाइकिलों पर एक डंडा बंधा हुआ और डंडे पर नीला झंडा। वाहेगुरु दा खालसा। हम सभी लंगरों को नज़रअंदाज़ करते आ रहे थे, लेकिन एक जगह रुकना पड़ गया - कीर्तिनगर के पास। एक बूढ़े सरदारजी पीला झंडा पकड़े हुए बाइक के सामने ही अड़ गये। यहीं महाराष्ट्र की एक स्कार्पियो भी खड़ी थी। हमने इस गाड़ी को कई बार पीछे छोडा था और उन्होंने भी कई बार हमें पीछे छोड़ा था। वे खड़े दिखे तो हम भी रुक गए। हालाँकि बातचीत कुछ नहीं हुई। वे अब तक लंगर जीम चुके थे। हमारे रुकते ही चले गए।




Friday, October 6, 2017

पंचचूली बेसकैंप यात्रा की वीडियो

यात्रा के दौरान हम छोटी-छोटी वीडियो भी बनाते चलते हैं... और लौटकर कैमरे से लैपटॉप में कॉपी-पेस्ट कर देते हैं... और भूल जाते हैं... कभी-कभार इनकी याद आती है तो दो-दो, चार-चार वीडियो को जोड़कर या बिना जोड़े ही समय-समय पर आपको फेसबुक पेज और यूट्यूब के माध्यम से दिखा भी देते हैं... इन वीडियो की गुणवत्ता तो ख़राब ही रहती है, लेकिन आप चूँकि लाइक करते हैं, वाहवाही करते हैं; तो मुझे लगता है कि उतनी ख़राब भी नहीं होतीं... तो पंचचूली यात्रा की ऐसी ही सभी वीडियो को आपके सामने पुनः प्रस्तुत कर रहा हूँ... आपने शायद यूट्यूब वाली वीडियो न देखी हों, क्योंकि मैंने इनका प्रचार नहीं किया... फेसबुक पेज वाली तो निश्चित ही देख रखी होंगी...
इन्हें देखने के बाद या न देखने के बाद आप फेसबुक पेज को लाइक करना न भूलें... और यूट्यूब चैनल को भी सब्सक्राइब अवश्य करें... बड़ी मुश्किल से अपने ही यूट्यूब चैनल का लिंक मिला है... यूट्यूब वीडियो में आपको विज्ञापन भी दिखेंगे, तो यह मत समझ लेना कि धनवर्षा हो रही होगी... अभी 136 सब्सक्राइबर्स हैं... एक-दो दिन में फेसबुक के माध्यम से बताऊँगा कि इस पोस्ट की वजह से कितने सब्सक्राइबर्स बढ़े...

Wednesday, October 4, 2017

288 रेलवे स्टेशन हैं मुंबई और हावड़ा के बीच में

पिछले दिनों मैंने महाराष्ट्र में कुछ रेलमार्गों पर पैसेंजर ट्रेनों में यात्रा की थी। उनमें से अकोला से नागपुर का रेलमार्ग भी शामिल था। इस पर यात्रा करने के साथ ही मेरे पैसेंजर नक्शे में मुंबई और हावड़ा भी जुड़ गये। यानी मैं मुंबई-हावड़ा संपूर्ण रेलमार्ग पर पैसेंजर ट्रेनों में यात्रा कर चुका हूँ। ये यात्राएँ कई चरणों और कई वर्षों में हुईं। 
1. छत्रपति शिवाजी महाराज टर्मिनस मुंबई से भुसावल (20 फरवरी, 2012)
2. भुसावल से अकोला (18 फरवरी 2012)
3. अकोला से बडनेरा (26 अगस्त 2017)
4. बडनेरा से नागपुर (23 अगस्त 2017)
5. नागपुर से गोंदिया (5 अक्टूबर 2008)
6. गोंदिया से बिलासपुर (11 सितंबर 2014)
7. बिलासपुर से झारसुगुड़ा (25 अगस्त 2011)
8. झारसुगुड़ा से टाटानगर (10 सितंबर 2014)
9. टाटानगर से खड़गपुर (9 सितंबर 2014)
10. खड़गपुर से हावड़ा (22 अगस्त 2011)

Monday, October 2, 2017

जागेश्वर और वृद्ध जागेश्वर की यात्रा

All information about Jageshwar in Hindi
15 जून 2017
दन्या से जागेश्वर जाने में भला कितनी देर लगती है? आप ‘ट्यण-म्यण बाट, हिटो माठूँ-माठ’ पढ़ते-पढ़ते जागेश्वर पहुँच जाते हैं। कुमाऊँनी में लिखी इन बातों का अर्थ हमें नहीं पता। शायद ‘ट्यण-म्यण बाट’ का अर्थ होता होगा - टेढ़े-मेढ़े रास्ते। बाकी पता नहीं। सोच रहा हूँ कि अगर इसे मेरठी में लिखा जाये तो “ऐंड़े बेंड़े रस्ते” लिखा जायेगा। जिस दिन ‘हिटो माठूँ-माठ’ का अर्थ पता चल जायेगा, उस दिन उसे भी मेरठी में अनुवादित कर दूँगा।
मुख्य मार्ग से जब जागेश्वर के लिये मुड़े तो देवदार का जंगल आरंभ हो गया। एक होता है चीड़ का जंगल और दूसरा होता है देवदार का जंगल। चीड़ का जंगल भी निःसंदेह खूबसूरत होता है, लेकिन देवदार की बात ही कुछ और है।