Skip to main content

चंद्रबदनी मंदिर और लंबगांव की ओर

17 फरवरी 2016
ज्यादा विस्तार से नहीं लिखेंगे। एक तो यात्रा किये हुए अरसा हो गया है, अब वृत्तांत लिखने बैठा हूं तो वैसा नहीं लिखा जाता, जैसा ताजे वृत्तांत में लिखा जाता है। लिखने में तो मजा नहीं आता, पता नहीं आपको पढने में मजा आता है या नहीं।
तो जामणीखाल से सुबह नौ बजे बाइक स्टार्ट कर दी और चंद्रबदनी की ओर मुड गये। चंद्रबदनी मैं पहले भी जा चुका हूं - शायद 2009 में। तब जामणीखाल तक हम बस से आये थे और यहां से करीब आठ-नौ किलोमीटर दूर चंद्रबदनी तक पैदल गये थे। पक्की अच्छी सडक बनी है। आज बीस मिनट लगे हमें चंद्रबदनी के आधार तक पहुंचने में। यहां सडक समाप्त हो जाती है और बाकी एक किलोमीटर की दूरी पैदल तय करनी होती है।
यह दूरी भी तय हो गई। पक्का रास्ता बना है। लेकिन अच्छी चढाई है। चंद्रबदनी मंदिर की समुद्र तल से ऊंचाई करीब 2200 मीटर है। मंदिर के सामने पहुंचे तो वो नजारा दिखाई पडा, जिसकी हमने कल्पना भी नहीं की थी। किन्नौर हिमालय से लेकर नंदादेवी तक की चोटियां स्पष्ट दिखाई दे रही थीं और चौखंबा इनके राजा की तरह अलग ही चमक रही थी। कुमाऊं में किसी ऊंचाई वाले स्थान से देखेंगे तो नंदादेवी और पंचचूली चोटियों का प्रभुत्व दिखाई देता है और गढवाल में चौखम्बा का। अलग ही रुतबा है चौखम्बा का। किसी को भले ही इसकी पहचान न हो, लेकिन ध्यान अवश्य आकर्षित करती है यह। मुझे तो इसकी अच्छी तरह पहचान है।
चौखंबा ऐसे ही नगाधिपति नहीं बन गई। इसकी भौगोलिक स्थिति भी इसे अति विशिष्ट बनाती है। इसके पश्चिमी ढलान पर गौमुख ग्लेशियर का आरंभ है और पूर्वी ढाल पर सतोपंथ ग्लेशियर का। सतोपंथ ग्लेशियर को ही स्वर्गारोहिणी माना जाता है, जहां से युधिष्ठिर सशरीर स्वर्ग गये थे। यदि इस कथा को सत्य माना जाये, तो युधिष्ठिर चौखंबा पर ही चढ रहे थे। यदि गंगोत्री से बद्रीनाथ तक एक सीधी रेखा खींची जाये, तो चौखंबा इसी रेखा पर स्थित है और इस रेखा का सबसे ऊंचा बिंदु भी है। अर्थात इसके एक तरफ भागीरथी का जल-प्रवाह क्षेत्र है और दूसरी तरफ अलकनंदा का। वैसे तो हिमालय पर्वत श्रंखला 2400 किलोमीटर लंबाई में फैली है, लेकिन पुराणों में वर्णित स्वर्ग यही गंगोत्री और बद्रीनाथ के मध्य का क्षेत्र है। चौखंबा इसी क्षेत्र के केंद्र में है।



तो चंद्रबदनी से चौखंबा के दर्शन हुए। हम धन्य हो गये। फिर तो मंदिर में माथा टेकना, कुछ फोटो खींचना और आखिर में सूखा हुआ नारियल फोडकर फेंक देना औपचारिकता ही थी।
अब हमें जाना था सेम मुखेम और वहां जाने के लिये लंबगांव जाना पडेगा। जामणीखाल से लंबगांव की दूरी लगभग 100 किलोमीटर है। इसमें कम से कम चार घंटे तो लग ही जाने थे। लंबगांव से भी करीब 35-40 किलोमीटर आगे सेम मुखेम है। यानी यहां से सेम मुखेम पहुंचने में कम से कम छह घंटे तो लगने ही हैं। हमें वापस बाइक स्टार्ट करने में साढे ग्यारह बज गये थे। यानी ठीकठाक चलते रहे तो शाम पांच-छह बजे तक सेम मुखेम पहुंचेंगे। पता नहीं वहां रुकने का ठिकाना भी मिलेगा या नहीं। नहीं मिलेगा तो अंधेरे में 35-40 किलोमीटर का सफर तय करके वापस लंबगांव लौटना पडेगा। हम अंधेरे में नहीं चलना चाहते थे, इसलिये सोच लिया कि आज आराम से चलेंगे और लंबगांव ही रुकेंगे। कल सेम मुखेम देखेंगे।
रास्ता लगभग 1500 मीटर की ऊंचाई पर रहता है। गढवाल में इस ऊंचाई पर खूब गांव मिलते हैं, सीढीदार खेत मिलते हैं। और अगर थोडा और ऊपर रास्ता चढ जाये, तो किसी ‘खाल’ के आसपास चीड भी भरपूर मिलता है। चीड के जंगल में बाइक चलाने का आनंद केवल वही जान सकता है, जिसने चलाई हो।
थोडा आगे चलकर टिहरी बांध दिखाई देने लगा। यह भागीरथी और भिलंगना के संगम पर बना है। बांध के कारण बडी दूर तक भागीरथी नदी झील जैसी दिखाई देती है, तो भिलंगना भी झील जैसी ही दिखती है। यदि आप चंबा व नई टिहरी की तरफ से टिहरी बांध देखने जा रहे हैं और आपको भिलंगना भी देखनी है, तो आपको बांध पार करके थोडा सा भिलंगना घाटी में जाना होगा। बांध पर खडा होकर अक्सर पता नहीं चलता कि यहां दो नदियां भी मिल रही हैं।
भिलंगना भी गढवाल की एक प्रमुख नदी है और खतलिंग ग्लेशियर से निकलती है। फिर क्यों इसके और भागीरथी के संगम को ‘प्रयाग’ का दर्जा नहीं दिया गया? इसका कारण है कि सभी पांचों प्रयाग अलकनंदा पर हैं। भागीरथी पर केवल देवप्रयाग है, वो भी इसलिये क्योंकि वहां अलकनंदा और भागीरथी मिलती हैं।
शायद उस स्थान का नाम नंदगांव था। हमने लंच किया। होटल शानदार था और इस होटल में एक दूल्हा-दुल्हन व उनके परिजन भी भोजन कर रहे थे। उनकी वजह से यहां बडी चहल-पहल थी। निशा ने मुझे कोहनी मारी - “तुम मुझे नहीं ले गये कहीं इस तरह।” मैंने कहा - “हां, उस तरह तो नहीं ले गया, लेकिन जिस तरह अब हम जाते हैं, उस तरह यह भी नहीं ले जायेगा।” थोडी देर बाद बोली - “मुझे तो वो दुल्हन बडी सुंदर लग रही है।” मैंने कहा - “हां, मुझे भी बहुत सुंदर लग रही है।” फिर एक कोहनी पडी।
एक जगह लिखा मिला - “प्रसिद्ध खैंट पर्वत (परियों का देश), पीपल डाली से दूरी 30 किमी वाया रज़ाखेत एवं 5 किमी पैदल।”
खैंट पर्वत का नाम मैंने पहली बार सुना था। कितना अनजान है टिहरी अभी हमारे लिये! इस पर्वत के बारे में और इसके मिथकों, कथाओं के बारे में हम कुछ नहीं जान सके। हां, एक स्थानीय की उंगली की माध्यम से यह अवश्य पता चल गया कि भिलंगना के उस पार एक गंजा-सा पहाड ही खैंट पर्वत है।
एक नई चीज पता चली - खैंट पर्वत। इस बार तो नहीं, लेकिन कभी बाद में यहां आने का बहाना मिल गया।
नंदगांव से लंबगांव के लिये रास्ता अलग हो जाता है। पहले एक लंबे झूला पुल से भिलंगना पार करते हैं और फिर दूसरी तरफ बढ जाते हैं। यहीं थोडा आगे रज़ाखेत है, जहां से खैंट पर्वत के लिये रास्ता जा रहा था। हम सीधे बढते रहे।
भागीरथी-भिलंगना संगम के ऊपर पहुंचे और यहां से नया टिहरी, चंबा और टिहरी बांध और अच्छी तरह दिख रहे थे। इसके बाद हम भिलंगना घाटी छोडकर भागीरथी घाटी में चलने लगते हैं। नंदगांव में मैंने निशा को बताया था कि हम अब भिलंगना घाटी में हैं। यहां एक जगह रुककर मैंने निशा से पूछा - “वो जो नीचे नदी दिख रही है, कौन-सी है?” तुरंत बडे आत्मविश्वास से बोली - “भिलंगना।” मैंने कहा - “नहीं, यह भागीरथी है।” उसने बाइक रुकवाई। बांध को बडे गौर से देखा और बोली - “लेकिन भिलंगना कहां गई?” मैंने बताया - “झील में चुपचाप भागीरथी में मिल गई। न प्रवाह दिखाई देता है और न संगम। बडी दूर से ही दोनों नदियों का पानी ठहर-सा जाता है।”
रास्ता बहुत अच्छा है। ट्रैफिक तो है ही नहीं। शाम के समय सबकुछ सुनसान और उधर छिपता हुआ सूरज। सूरज छिपा और इधर हम लंबगांव में थे। 300 रुपये में खूब लंबा-चौडा कमरा मिला, जिसमें दो डबल-बेड थे। गीजर भी था, जिसका प्रयोग हम सुबह करेंगे। नीचे ‘बार’ था। इसलिये होटल मालिक ने फ्री में ऊपर कमरे में ही हमारे लिये खाना पहुंचा दिया।
गढवाल का बहुत इलाका अभी भी अनछुआ है। इसमें से काफी इलाके में सडकें भी बनी हैं, लेकिन कोई कभी-कभार ही जाता है। आप भी समय निकालिये गढवाल के इन इलाकों में घूमने और उनके बारे में दुनिया को बताने के लिये।

जामणीखाल से दूरियां

चंद्रबदनी से दिखता नई टिहरी

चंद्रबदनी की आखिरी सीढियां

चंद्रबदनी से दिखती चौखंबा

चौखंबा का थोडा-सा जूम-इन

ये बंदरपूंछ की तरफ की चोटियां हैं

चंद्रबदनी मंदिर

पार्किंग और सडक का डैड-एंड

लंबगांव की ओर





टिहरी झील




खैंट पर्वत

भिलंगना पर बना झूला पुल


भागीरथी और भिलंगना का संगम



सामने टिहरी बांध है, दाहिने से भागीरथी आ रही है और बायें से भिलंगना

भागीरथी पर निर्माणाधीन पुल







अगला भाग: नचिकेता ताल

1. गढवाल में बाइक यात्रा
2. चंद्रबदनी मंदिर और लंबगांव की ओर
3. नचिकेता ताल




Comments

  1. बहुत खूब, नए नए परियो के देश के दर्शन कराते रहिये, धन्यवाद.....

    ReplyDelete
  2. गढवाल के अनछुऐं इलाके की सैर कराने के लिए धन्यवाद

    ReplyDelete
  3. मजा आ गया चंद्रबदनी बहुत सुन्दर जगह है .. बहुत बार सोचती हैं लेकिन टल जाता है प्रोग्राम। . देखते हैं कब जाना होगा

    ReplyDelete
  4. खेएट पर्वत का विडियो लगभग एक साल पहले देखा था. youtubeपर ,चन्द्रबद्नी से दिखता चोख़ुम्बा पर्वत व अन्य पर्वत देखना अच्छा लगा .

    ReplyDelete
  5. टिहरी क्षैत्र के बारे में जानने की इच्छा भी पूरी कर दी, शुक्रिया नीरज जी.

    ReplyDelete
  6. बहुत अच्छी जानकारी टिहरी क्षैत्र की.
    सार्वजनिक परिवहन से अक्टूबर पहले पखवाड़े में बद्री, केदार यात्रा में क़ैसी दिक्कतें आ सकती हैं, बताइयेगा.

    ReplyDelete
    Replies
    1. कोई दिक्कत नहीं आयेगी... यात्रा की शुभकामनाएँ...

      Delete
  7. आपकी ब्लॉग पोस्ट को आज की ब्लॉग बुलेटिन प्रस्तुति जन्मदिन : मैथिलीशरण गुप्त और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। सादर ... अभिनन्दन।।

    ReplyDelete
  8. गढवाल के अनछुऐं क्षेत्र की जानकारी कराने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद.......हर बार की तरह रोचक पोस्‍ट, सुंदर चित्र।

    ReplyDelete
  9. BAHUT BADHIYA NEERAJ JI................................

    ReplyDelete
  10. सेठ गोविंददास की पुस्तक चारधाम यात्रा जो गीता प्रेस द्वारा 1959 में प्रकाशित की गई में भीलांगना भागीरथी संगम को गणेश प्रयाग बताया गया है।

    ReplyDelete
  11. आप ऐसे ही नये स्थलों की सैर कराते रहे

    ReplyDelete

Post a Comment

Popular posts from this blog

ट्रेन में बाइक कैसे बुक करें?

अक्सर हमें ट्रेनों में बाइक की बुकिंग करने की आवश्यकता पड़ती है। इस बार मुझे भी पड़ी तो कुछ जानकारियाँ इंटरनेट के माध्यम से जुटायीं। पता चला कि टंकी एकदम खाली होनी चाहिये और बाइक पैक होनी चाहिये - अंग्रेजी में ‘गनी बैग’ कहते हैं और हिंदी में टाट। तो तमाम तरह की परेशानियों के बाद आज आख़िरकार मैं भी अपनी बाइक ट्रेन में बुक करने में सफल रहा। अपना अनुभव और जानकारी आपको भी शेयर कर रहा हूँ। हमारे सामने मुख्य परेशानी यही होती है कि हमें चीजों की जानकारी नहीं होती। ट्रेनों में दो तरह से बाइक बुक की जा सकती है: लगेज के तौर पर और पार्सल के तौर पर। पहले बात करते हैं लगेज के तौर पर बाइक बुक करने का क्या प्रोसीजर है। इसमें आपके पास ट्रेन का आरक्षित टिकट होना चाहिये। यदि आपने रेलवे काउंटर से टिकट लिया है, तब तो वेटिंग टिकट भी चल जायेगा। और अगर आपके पास ऑनलाइन टिकट है, तब या तो कन्फर्म टिकट होना चाहिये या आर.ए.सी.। यानी जब आप स्वयं यात्रा कर रहे हों, और बाइक भी उसी ट्रेन में ले जाना चाहते हों, तो आरक्षित टिकट तो होना ही चाहिये। इसके अलावा बाइक की आर.सी. व आपका कोई पहचान-पत्र भी ज़रूरी है। मतलब

पुस्तक-चर्चा: पिघलेगी बर्फ

पुस्तक मेले में घूम रहे थे तो भारतीय ज्ञानपीठ के यहाँ एक कोने में पचास परसेंट वाली किताबों का ढेर लगा था। उनमें ‘पिघलेगी बर्फ’ को इसलिये उठा लिया क्योंकि एक तो यह 75 रुपये की मिल गयी और दूसरे इसका नाम कश्मीर से संबंधित लग रहा था। लेकिन चूँकि यह उपन्यास था, इसलिये सबसे पहले इसे नहीं पढ़ा। पहले यात्रा-वृत्तांत पढ़ता, फिर कभी इसे देखता - ऐसी योजना थी। उन्हीं दिनों दीप्ति ने इसे पढ़ लिया - “नीरज, तुझे भी यह किताब सबसे पहले पढ़नी चाहिये, क्योंकि यह दिखावे का ही उपन्यास है। यात्रा-वृत्तांत ही अधिक है।”  तो जब इसे पढ़ा तो बड़ी देर तक जड़वत हो गया। ये क्या पढ़ लिया मैंने! कबाड़ में हीरा मिल गया! बिना किसी भूमिका और बिना किसी चैप्टर के ही किताब आरंभ हो जाती है। या तो पहला पेज और पहला ही पैराग्राफ - या फिर आख़िरी पेज और आख़िरी पैराग्राफ।

46 रेलवे स्टेशन हैं दिल्ली में

एक बार मैं गोरखपुर से लखनऊ जा रहा था। ट्रेन थी वैशाली एक्सप्रेस, जनरल डिब्बा। जाहिर है कि ज्यादातर यात्री बिहारी ही थे। उतनी भीड नहीं थी, जितनी अक्सर होती है। मैं ऊपर वाली बर्थ पर बैठ गया। नीचे कुछ यात्री बैठे थे जो दिल्ली जा रहे थे। ये लोग मजदूर थे और दिल्ली एयरपोर्ट के आसपास काम करते थे। इनके साथ कुछ ऐसे भी थे, जो दिल्ली जाकर मजदूर कम्पनी में नये नये भर्ती होने वाले थे। तभी एक ने पूछा कि दिल्ली में कितने रेलवे स्टेशन हैं। दूसरे ने कहा कि एक। तीसरा बोला कि नहीं, तीन हैं, नई दिल्ली, पुरानी दिल्ली और निजामुद्दीन। तभी चौथे की आवाज आई कि सराय रोहिल्ला भी तो है। यह बात करीब चार साढे चार साल पुरानी है, उस समय आनन्द विहार की पहचान नहीं थी। आनन्द विहार टर्मिनल तो बाद में बना। उनकी गिनती किसी तरह पांच तक पहुंच गई। इस गिनती को मैं आगे बढा सकता था लेकिन आदतन चुप रहा।