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Showing posts from May, 2013

साइकिल से लद्दाख यात्रा

4 जून को दिल्ली से निकल जाने की योजना है और 27 जून को दिल्ली वापस आने की। पिछले साल साइकिल ली थी ना, बडी महंगी थी; पता नहीं था कि ऐसी साइकिलें सस्ती भी आती हैं, करण के चक्कर में ले बैठा। तभी से दिमाग में सनक थी कि इसे लद्दाख ले जाऊंगा। एक बार ऋषिकेश ले गया नीलकण्ठ तक, पता चल गया कि लद्दाख जैसी अत्यन्त ऊंची जगहों पर साइकिल चलाना आसान नहीं होगा। उसके बाद चार पांच दिनों तक राजस्थान में भी चलाई, इतना थक गया कि आगे न चलाने की प्रतिज्ञा कर ली। लेकिन जैसे ही थकान उतरी, फिर से धुन चढ गई। हिसाब लगाया। श्रीनगर से लेह के रास्ते मनाली 900 किलोमीटर है। रोज पचास किलोमीटर के औसत से भी चलाऊंगा तो अठारह दिन में मनाली पहुंचूंगा। यानी कम से कम बीस दिन की छुट्टी तो लेनी ही पडेगी। छुट्टी सीमा बीस से बढाकर सत्ताइस दिन कर दी और इसमें नुब्रा घाटी, पेंगोंग झील व चामथांग भी शामिल कर दिये। मोरीरी झील चामथांग का मुख्य आकर्षण है। लेकिन सत्ताइस दिन की छुट्टी मिलना आसान नहीं। साहब से छुट्टी के बारे में बात की, तय हुआ कि बीस ही दिन की मिल सकती है। मैंने सत्ताइस दिन हटाकर बीस दिन की लगा दी। अभी पास नहीं हुई

शिमला कालका रेल यात्रा

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इस यात्रा वृत्तान्त को शुरू से पढने के लिये यहां क्लिक करें । 27 अप्रैल 2013 सुबह सराहन में साढे पांच बजे उठा और अविलम्ब बैग उठाकर बस अड्डे की ओर चल दिया। तीन बसें खडी थीं, लेकिन चलने के लिये तैयार कोई नहीं दिखी। एक से पूछा कि कितने बजे बस जायेगी, उसने बताया कि अभी पांच मिनट पहले चण्डीगढ की बस गई है। अगली बस साढे छह बजे रामपुर वाली जायेगी। चाय की एक दुकान खुल गई थी, चाय पी और साढे छह बजे वाली बस की प्रतीक्षा करने लगा। बिना किसी खास बात के आठ बजे तक रामपुर पहुंच गया। यहां से शिमला की बसों की भला क्या कमी? परांठे खाये। नारकण्डा की एक बस खडी थी। मैंने उससे पूछा कि यह बस नारकण्डा कितने बजे पहुंचेगी तो उसने बताया कि पौने बारह बजे। साथ ही उसने यह भी बताया कि हम थानाधार, कोटगढ के रास्ते जायेंगे इसलिये सीधे रास्ते से जाने वाली बस के मुकाबले आधा घण्टा विलम्ब से पहुंचेंगे। बस के कंडक्टर ने ही सलाह दी कि पीछे पीछे सीधे रास्ते वाली बस आ रही है, आप उससे चले जाना। मैं उसकी यह सलाह सुनकर नतमस्तक रह गया।

डायरी के पन्ने- 7

1 मई 2013, बुधवार 1. आज की तो वैसे मेरी छुट्टी थी, फिर भी कपडे वगैरह धोने के कारण दिल्ली ही रुकना पडा। दोपहर को जॉनी का फोन आया। मैं समझ गया कि जॉनी आज रोहित की सगाई करा रहा होगा। मेरे न पहुंचने पर याद कर रहा होगा। लगभग दो महीने पहले ही रोहित ने मुझे बता दिया था कि दो मई को उसकी शादी है। इसके बाद पिछले दिनों उसने अपने सैंकडों मित्रों के साथ मुझे भी शादी का कार्ड ई-मेल से भेज दिया। मैंने इस मेल को नजरअंदाज कर दिया। दो महीने पहले सुनी हुई बात को तो मैं कभी का भूल गया था। इसके बाद जॉनी का फोन आया कि तू सगाई में क्यों नहीं आया? मैंने यह कहकर पीछा छुडाया कि कल बारात में साथ चलूंगा। वैसे मेरा कोई इरादा नहीं था बारात में चलने का, और याद भी नहीं था। कल मेरी सायंकालीन ड्यूटी है। शाम को ही मोदीपुरम बारात जायेगी। सबसे पहले खान साहब से कहकर ड्यूटी बदलवाई गई। प्रातःकालीन ड्यूटी करूंगा और शाम को बारात कर लूंगा।

सराहन में जानलेवा गलती

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इस यात्रा वृत्तान्त को शुरू से पढने के लिये यहां क्लिक करें । 25 अप्रैल 2013 बशल चोटी के पास बाबाजी के साथ कुछ समय बिताकर वापस सराहन के लिये चल पडा। बाबाजी नीचे कुछ दूर तक रास्ता बताने आये। रास्ता स्पष्ट था, लेकिन धुंधला था। पत्थर ही बेतरतीबी से पडे हुए थे। बाबाजी ने बता दिया था कि नीचे जहां मैदान आयेगा, वहां से रास्ता बायें मुड जाता है। जबकि सीधे शॉर्टकट है। मैं इधर आते समय शॉर्टकट से आया था और मैदान के पास सही रास्ते को पकड नहीं सका था। सोच लिया कि इस बार भी शॉर्टकट से ही उतरूंगा, ज्यादा मुश्किल नहीं है। मोबाइल में गाने बजाने शुरू कर दिये। पहली बार जंगल में चलते हुए गाने बजा रहा था। अटपटा सा लग रहा था। मैदान आया। पगडण्डी बायें मुड गई। मैंने इसे छोडकर सीधे चलना ही उपयुक्त समझा। पहली गलती यही हुई। यह एक शॉर्टकट था। आवाजाही न होने के कारण कोई पगडण्डी या निशान भी नहीं था। बाबाजी ने सलाह दी थी कि अगर शॉर्टकट से जाओ तो एक बडा ऊंचा पेड मिलेगा, उसे पार करते ही बायें मुड जाना और उतरते रहना। यहां देखा तो सारे के सारे पेड ऊंचे ही दिखे। इन स्थानीय लोगों ने उस एक पेड का नाम ‘ऊंचा पेड

सराहन से बशल चोटी तथा बाबाजी

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इस यात्रा वृत्तान्त को शुरू से पढने के लिये यहां क्लिक करें । 25 अप्रैल 2013 हमेशा की तरह उठने की वही बात- सिर पर सूरज आ गया जब मैं उठा। कल तो नहाया नहीं था। कमरे में गीजर भी लगा था, इरादा था नहाने का लेकिन देखा कि बिजली नहीं है तो इरादा बदलते कितनी देर लगती है? बस अड्डे के पास एक ढाबा है जहां सुबह से शाम तक खाने पीने को मिलता रहता है। कल वहां जाकर चावल खाये थे। अब सुबह का समय, आलू के परांठे की तैयारी थी। एक परांठा मैंने भी बनवा लिया। साथ में चाय और आमलेट भी। पहले तो सोचा कि इतना बडा तीर्थ- भीमाकाली- यहां कहां अण्डे आमलेट मिलेंगे? फिर दिमाग में आया कि यह देवी भेड बकरे तक नहीं छोडती, अण्डा कहां ठहरता है? आमलेट को कहा तो तुरन्त हाजिर हो गया। खा-पीकर डकार लेकर पैसे देकर जब बाहर निकला तो दुकान वाले से पूछा कि यहां से बशल चोटी दिखती है क्या? उसने एक ऐसी चोटी की तरफ इशारा कर दिया जो उस बूढे के सिर की तरह दिख रही थी जिस पर दो चार सफेद बाल ही रह गये हों। दो-चार जगह बर्फ थी वहां।

सराहन की ओर

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23 अप्रैल 2013 कई दिनों की जद्दोजहद के बाद तय हुआ कि किन्नौर चला जाये। बीस दिन पहले की गई कांगडा यात्रा के दौरान दिल्ली से कांगडा जाने की बस यात्रा में बुरी हालत हो गई थी। उससे सबक लिया गया और कालका तक रेल से जाने के लिये हिमालयन क्वीन में आरक्षण भी करा लिया था। यह ट्रेन सराय रोहिल्ला से सुबह पौने छह बजे चलती है। डिपो से पांच बजे निकलने वाली पहली मेट्रो पकडी और कुछ ही देर में शास्त्री नगर और वहां से पैदल दस मिनट में सराय रोहिल्ला। जब मैं स्टेशन पहुंचा, तब तक ट्रेन प्लेटफार्म पर लगी भी नहीं थी। पहले यह गाडी निजामुद्दीन से चलती थी और नई दिल्ली, सब्जी मण्डी रुकते हुए आगे की यात्रा करती थी। मैंने पहले भी इसे एक बार सब्जी मण्डी से पकडा है। उस समय यह ज्यादा मित्रवत प्रतीत होती थी। अब सराय रोहिल्ला से चलती है तो लगता है जैसे विदेश से चलती हो। इतनी सुबह नई दिल्ली के मुकाबले सराय रोहिल्ला विदेश जाने के बराबर ही है। गाडी प्लेटफार्म पर लगी। इसमें बैठने की सीटें होती हैं। मेरी सीट खिडकी वाली थी, बराबर में किसी का आरक्षण नहीं था। तुरन्त लेट गया और सो गया। एक जगह टीटी आया टिकट चेक करने बस।

पालमपुर का चिडियाघर और दिल्ली वापसी

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इस यात्रा वृत्तान्त को शुरू से पढने के लिये यहां क्लिक करें । 6 अप्रैल 2013 बरोट में थे हम। सोकर उठे तो दिन निकल गया था। साढे आठ बज चुके थे। कल तय हुआ था कि आज हम रेल की पटरी के साथ साथ पैदल चलेंगे और जोगिन्दर नगर पहुंचेंगे। अपनी यह मंशा हमने चौकीदार को बताई तो उसने हमें जबरदस्त हतोत्साहित किया। रास्ता बडा खतरनाक है, भटक जाओगे, घोर जंगल है, भालू काफी सारे हैं, कोई नहीं जाता उधर से। हमने कहा कि भटकेंगे क्यों? रेल की पटरी के साथ साथ ही तो जाना है। बोला कि मेरी सलाह यही है कि उधर से मत जाओ। नटवर से गुफ्तगू हुई। हिमानी चामुण्डा जाने से पैरों में जो अकडन हुई थी, वो अभी तक मौजूद थी। चौकीदार के हतोत्साहन से पैरों की अकडन भी जोश में आ गई और एक सुर में दोनों ने चौकीदार से पूछा कि अब जोगिन्दर नगर की बस कितने बजे है? सवा नौ बजे। सवा नौ बजे लुहारडी से आने वाली बस आ गई और पौने दो घण्टे में इसने हमें जोगिन्दर नगर पहुंचा दिया। जाते ही पठानकोट जाने वाली बस मिल गई। इसमें टिकट लिया गया पालमपुर तक का। पालमपुर से आगे एक चिडियाघर है। मैंने तो खैर यह देखा हुआ है, नटवर की बडी इच्छा थी इसे देखने क

डायरी के पन्ने- 6

16 अप्रैल 2013, मंगलवार 1. अनुज धीरज दिल्ली आया। उसे कल नोएडा किसी प्राइवेट कम्पनी में नौकरी के लिये इंटरव्यू देने जाना है। वो अभी तक गांव के पास ही उसी कॉलेज में अध्यापक था, जिसमें पिछले साल उसने डिप्लोमा किया था। 17 अप्रैल 2013, बुधवार 1. धीरज नोएडा चला गया, मैं मेरठ चला गया। कल की मेरी छुट्टी है, पिछले सप्ताह गांव जाकर उसी दिन लौटना पडा था। आज खान साहब को अच्छी तरह समझा दिया कि इस बार मुझे न बुलाया जाए। मोहननगर से हरियाणा रोडवेज की हरिद्वार जाने वाली बस पकडी, खाली पडी थी। ‘ 2. पता चला कि धीरज नोएडा में धक्के खा रहा है। असल में उसका इंटरव्यू ग्रेटर नोएडा सेक्टर 41 में था, जबकि वो ढूंढ रहा था नोएडा सेक्टर 41 में। बाद में उसे समझाया गया तब वो ग्रेटर नोएडा पहुंचा। शाम तक वापस लौट आया। इंटरव्यू अच्छा हुआ और बाद में फोन करके परिणाम बताये जायेंगे।