Skip to main content

वृन्दावन यात्रा

12 फरवरी 2013
फरवरी का महीना घूमने के लिये सर्वोत्तम महीनों में एक है। सर्दी कम होने लगती है और गर्मी आती नहीं। मौसम अच्छा रहता है। लेकिन इस महीने की एक कमी है कि हरियाली न्यूनतम होती है। बसन्त का महीना होने के बावजूद भी हरियाली न्यूनतम। ठीक उसी तरह जिस तरह पच्चीस दिसम्बर को बडा दिन मनाया जाता है। एक दिन पहले ही साल का सबसे छोटा दिन होता है, अगले ही दिन बडा दिन। वाह!
इस महीने में हिमालय की ऊंचाईयों पर नहीं जा सकते। निचले इलाकों में भी इस दौरान भारी बर्फबारी होती रही, ठण्ड भी इस बार काफी रही। अन्य राज्यों के पहाडी स्थानों पर भी जाना अच्छा नहीं है, न्यूनतम हरियाली की वजह से। इसलिये इस महीने में ऐसे स्थानों पर जाना चाहिये, जहां प्राकृतिक सौन्दर्य की महत्ता ना हो।
ऐसा ही एक स्थान है मथुरा। पिछले साल इसी महीने आगरा गया था।
इस बार पिताजी और छोटे भाई धीरज को भी साथ ले लिया। धीरज लगभग चार साल पहले मेरे साथ शिमला गया था। पिताजी और मैं आज तक कहीं नहीं घूमे, हालांकि एक बार मैं और माताजी दो दिनों के लिये हरिद्वार- ऋषिकेश जरूर गये थे। पिताजी बहुत समय से कहते रहे हैं मेरे साथ घूमने के लिये लेकिन जनरेशन गैप...
12 फरवरी की सुबह सात बजकर पांच मिनट पर पुरानी दिल्ली से आगरा पैसेंजर चलती है, जो बारह बजे मथुरा पहुंचा देती है। दिल्ली से मथुरा डेढ सौ किलोमीटर दूर है। एक्सप्रेस ट्रेनें डेढ घण्टे में मथुरा पहुंच जाती हैं, बावजूद इसके मैंने पांच घण्टे लगाने वाली पैसेंजर चुनी। इसका कारण था मेरी नाइट ड्यूटी। रात्रि जागरण के कारण नींद आती है। पांच घण्टे यात्रा करने से नींद भी पूरी हो जाती और हम मथुरा भी पहुंच जाते।
जब ठीक सात बजकर पांच मिनट पर हम पुरानी दिल्ली के विशाल स्टेशन पर प्रवेश कर रहे थे, तभी सूचना गूंजी कि आगरा पैसेंजर प्लेटफार्म नम्बर बारह से चलने को तैयार है। यहीं से दौड लगा दी। फुट ओवर ब्रिज से जब प्लेटफार्म नम्बर बारह पर उतरे, तो यह खाली था। यानी ट्रेन चली गई? तभी काफी आगे एक ट्रेन खडी दिखी। हमने पुनः दौड लगाई। जैसे ही हम आखिरी डिब्बे के बगल तक पहुंचे, ट्रेन चल पडी। विलम्ब करने की अपनी आदत से आज नुकसान होने से बच गया।
अगर यह ट्रेन यहां से निकल जाती तो हम पुनः मेट्रो पकडकर सीधे प्रगति मैदान पर पहुंच जाते, जहां से तिलक ब्रिज रेलवे स्टेशन काफी नजदीक है। इस ट्रेन का तिलक ब्रिज का समय है सात बजकर चालीस मिनट यानी पैंतीस मिनट बाद।
लगभग चार घण्टे तक अच्छी नींद लेने पर जब आंख खुली तो ट्रेन वृन्दावन रोड स्टेशन पर खडी थी। चूंकि यहां उतरने का पहले कोई इरादा नहीं था, फिर भी उतर गये। स्टेशन से बाहर निकलते ही वृन्दावन जाने के लिये टम्पू मिल गये। शीघ्र ही हम वृन्दावन में थे।
मेरी इस यात्रा की कोई तैयारी नहीं थी। और हां, श्रद्धा भी नहीं थी। पता नहीं लोग कैसे इन भीडभाड वाली जगहों पर आनन्द ले लेते हैं। मेरा तो दम घुटने लगता है।
मोबाइल में गूगल मैप में देखा कि वृन्दावन में बांके बिहारी नामक मन्दिर है। इसका नाम मैंने पहले भी सुन रखा था। खाना खाकर जब बांके बिहारी की ओर चले, तो भीडभाड वाली सडक पर चलते ही गये। आखिर में यमुना किनारे जाकर रुके। मुझे अच्छा लगा यहां यमुना किनारे आकर। कुछ नाव वाले थे, जो श्रद्धालुओं से यमुना की सैर करने के लिये मोलभाव कर रहे थे। पिताजी इस स्थान के बारे में कुछ पूछते, इससे पहले मैंने ही कहा कि यह यमुना है, नहाना चाहते हो तो नहा लो, मेरा नहाने का कोई इरादा नहीं है। उन दोनों ने चार छीटें अपने ऊपर छिडके, सांकेतिक स्नान हो गया। मैंने यह भी नहीं किया।
यहां से बांके बिहारी मन्दिर का रास्ता पूछा। मन्दिर तक पहुंच गये। मन में एक क्षण के लिये भी भक्ति-भाव नहीं आया। पिताजी और भाई से कह दिया कि मेरी इन सब में कोई श्रद्धा नहीं है। मेरे चक्कर में मत रहना। जो भी, जैसा भी पूजा-पाठ करना चाहते हो, कर लेना। आपके साथ मैं शामिल जरूर हो जाऊंगा, लेकिन अपनी तरफ से पहल नहीं करूंगा।
अभी दो बजे थे, मन्दिर बन्द था। पता चला कि चार बजे मन्दिर खुलेगा। यह मेरे लिये घोर निराशा की बात थी क्योंकि मेरे लिये सबसे जरूरी चीज थी वृन्दावन से मथुरा जाने वाली मीटर गेज की रेल बस, जो वृन्दावन स्टेशन से चार बजकर दस मिनट पर प्रस्थान करती है। मैं किसी भी हालत में इसे नहीं छोड सकता था। यानी हमें बांके बिहारी मन्दिर का मोह छोडना पडेगा। पिताजी पहले यहां आ चुके थे, इसलिये उन्हें मेरे निर्णय पर कोई आपत्ति नहीं थी।
अभी हमारे पास दो घण्टे शेष थे। सोचा कि अंग्रेजों के मन्दिर चलते हैं। इस्कॉन मन्दिर को अंग्रेजों का मन्दिर कहा जाता है। जब हम वृन्दावन रोड स्टेशन से वृन्दावन आ रहे थे, तो यह हमारे रास्ते में पडा था लेकिन जानकारी न होने के कारण हम यहां नहीं उतरे।
यहां आकर पता चला कि यह मन्दिर भी बन्द है। यह भी चार बजे खुलेगा।
आखिर क्या कारण है कि कृष्णजी को दोपहर बाद खाना खाकर नींद आती है? चार बजे भगवान उठेंगे, तब भक्तों को दर्शन देंगे। मैं तो सोचता था कि दोपहर का खाना खाकर सिर्फ मुझे ही नींद आती है। यहां तो भगवान भी इस बीमारी से पीडित हैं। चलो, इस मामले में तो मैं भगवान के समकक्ष हो गया।
अगर पहले से भगवान के शयन कार्यक्रम की जानकारी होती तो हम सीधे पहले मथुरा पहुंचते। वहां से तीन बजे के आसपास चलने वाली मीटर गेज रेल बस से वृन्दावन आते और आराम से सभी मन्दिरों में अपने ‘समकक्ष’ को देखते। लेकिन अब क्या कर सकते थे?
वृन्दावन कृष्ण और राधा की भूमि है। एक बात समझ में नहीं आती कि कृष्ण जन्मभूमि से वृन्दावन के बीच यमुना होनी चाहिये थी, जबकि ऐसा नहीं है। सर्वप्रसिद्ध विचार हो सकता है कि यमुना ने रास्ता बदल लिया और जो पहले मथुरा व वृन्दावन के बीच से बहती थी, अब वृन्दावन का चक्कर लगाकर बहती है। दूसरी बात मेरे भी दिमाग में आ रही है कि मूल वृन्दावन यमुना के उस पार अभी भी हो सकता है। डण्डों और पण्डों के बल पर वर्तमान वृन्दावन अस्तित्व में आया हो। इस तथ्य को भी नकारा नहीं जा सकता।
पिताजी और भाई से अपने रेल प्रेम के लिये माफी मांगी और वृन्दावन स्टेशन की तरफ चल पडे।

वृन्दावन रोड स्टेशन



पिताजी और भाई यमुना किनारे

यमुना




बांके बिहारी मन्दिर



अगला भाग: वृन्दावन से मथुरा मीटर गेज रेल बस यात्रा

मथुरा गोवर्धन यात्रा
1. वृन्दावन यात्रा
2. वृन्दावन से मथुरा मीटर गेज रेल बस यात्रा
3. गोवर्धन परिक्रमा

Comments

  1. यमुना में इतना जल देख मन प्रसन्न हो गया।

    ReplyDelete
  2. कृष्ण जन्मभूमि भी वहीं है और यमुना और वृन्दावन भी वहीं हैं। कोई मार्ग परिवर्तन नहीं हुआ है। कृष्ण जन्मभूमि से कृष्ण को गोकुल ले जाया गया था जिस के रास्ते में आज भी यमुना नदी पड़ती है।

    ReplyDelete
  3. कपूर साहेब ने एकदम सही कहा है । यमुना मथुरा और गोकुल के बीच में है । वृन्दावन में श्रीकृष्ण और राधा मिला करते थे । श्रीकृष्ण गोकुल और राधा बरसाना से वृन्दावन आया करती थी ।

    ReplyDelete
  4. इस बार तेरे 'तीनो फोटू' बड़े सुंदर है नीरज हा हा हा हा हा भाई भी तेरी शक्ल का ही है क्या उसे घुमने का शोक नहीं ...

    ReplyDelete

Post a Comment

Popular posts from this blog

ट्रेन में बाइक कैसे बुक करें?

अक्सर हमें ट्रेनों में बाइक की बुकिंग करने की आवश्यकता पड़ती है। इस बार मुझे भी पड़ी तो कुछ जानकारियाँ इंटरनेट के माध्यम से जुटायीं। पता चला कि टंकी एकदम खाली होनी चाहिये और बाइक पैक होनी चाहिये - अंग्रेजी में ‘गनी बैग’ कहते हैं और हिंदी में टाट। तो तमाम तरह की परेशानियों के बाद आज आख़िरकार मैं भी अपनी बाइक ट्रेन में बुक करने में सफल रहा। अपना अनुभव और जानकारी आपको भी शेयर कर रहा हूँ। हमारे सामने मुख्य परेशानी यही होती है कि हमें चीजों की जानकारी नहीं होती। ट्रेनों में दो तरह से बाइक बुक की जा सकती है: लगेज के तौर पर और पार्सल के तौर पर। पहले बात करते हैं लगेज के तौर पर बाइक बुक करने का क्या प्रोसीजर है। इसमें आपके पास ट्रेन का आरक्षित टिकट होना चाहिये। यदि आपने रेलवे काउंटर से टिकट लिया है, तब तो वेटिंग टिकट भी चल जायेगा। और अगर आपके पास ऑनलाइन टिकट है, तब या तो कन्फर्म टिकट होना चाहिये या आर.ए.सी.। यानी जब आप स्वयं यात्रा कर रहे हों, और बाइक भी उसी ट्रेन में ले जाना चाहते हों, तो आरक्षित टिकट तो होना ही चाहिये। इसके अलावा बाइक की आर.सी. व आपका कोई पहचान-पत्र भी ज़रूरी है। मतलब

46 रेलवे स्टेशन हैं दिल्ली में

एक बार मैं गोरखपुर से लखनऊ जा रहा था। ट्रेन थी वैशाली एक्सप्रेस, जनरल डिब्बा। जाहिर है कि ज्यादातर यात्री बिहारी ही थे। उतनी भीड नहीं थी, जितनी अक्सर होती है। मैं ऊपर वाली बर्थ पर बैठ गया। नीचे कुछ यात्री बैठे थे जो दिल्ली जा रहे थे। ये लोग मजदूर थे और दिल्ली एयरपोर्ट के आसपास काम करते थे। इनके साथ कुछ ऐसे भी थे, जो दिल्ली जाकर मजदूर कम्पनी में नये नये भर्ती होने वाले थे। तभी एक ने पूछा कि दिल्ली में कितने रेलवे स्टेशन हैं। दूसरे ने कहा कि एक। तीसरा बोला कि नहीं, तीन हैं, नई दिल्ली, पुरानी दिल्ली और निजामुद्दीन। तभी चौथे की आवाज आई कि सराय रोहिल्ला भी तो है। यह बात करीब चार साढे चार साल पुरानी है, उस समय आनन्द विहार की पहचान नहीं थी। आनन्द विहार टर्मिनल तो बाद में बना। उनकी गिनती किसी तरह पांच तक पहुंच गई। इस गिनती को मैं आगे बढा सकता था लेकिन आदतन चुप रहा।

नेपाल यात्रा- गोरखपुर से रक्सौल (मीटर गेज ट्रेन यात्रा)

इस यात्रा वृत्तान्त को शुरू से पढने के लिये यहां क्लिक करें । 11 जुलाई की सुबह छह बजे का अलार्म सुनकर मेरी आंख खुल गई। मैं ट्रेन में था, ट्रेन गोरखपुर स्टेशन पर खडी थी। मुझे पूरी उम्मीद थी कि यह ट्रेन एक घण्टा लेट तो हो ही जायेगी लेकिन ऐसा नहीं हुआ। ठीक चार साल पहले मैं गोरखपुर आया था, मेरी ट्रेन कई घण्टे लेट हो गई थी तो मन में एक विचारधारा पैदा हो गई थी कि इधर ट्रेनें लेट होती हैं। इस बार पहले ही झटके में यह विचारधारा टूट गई। यहां से सात बजे एक पैसेंजर ट्रेन (55202) चलती है- नरकटियागंज के लिये। वैसे तो यहां से सीधे रक्सौल के लिये सत्यागृह एक्सप्रेस (15274) भी मिलती है जोकि कुछ देर बाद यहां आयेगी भी लेकिन मुझे आज की यात्रा पैसेंजर ट्रेनों से ही करनी थी- अपना शौक जो ठहरा। इस रूट पर मैं कप्तानगंज तक पहले भी जा चुका हूं। आज कप्तानगंज से आगे जाने का मौका मिलेगा।