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Showing posts from November, 2012

जयपुर- चूरू मीटर गेज ट्रेन यात्रा

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इस यात्रा-वृत्तांत को आरंभ से पढ़ने के लिये यहाँ क्लिक करें । शेखावाटी में आज के समय (2012) में एक ही रूट पर मीटर गेज चलती है- जयपुर से चूरू के बीच। एक समय ऐसा हुआ करता था कि शेखावाटी के लोगों को पता भी नहीं था कि भारत में कहीं बडी ट्रेन भी चलती है। उनकी सबसे नजदीकी ब्रॉड गेज दिल्ली में हुआ करती थी। पिछले दिनों शेखावाटी में अचानक दो लाइनें बन्द हो गईं। पहली रतनगढ- सरदारशहर और दूसरी लोहारू- सीकर । इनमें से दूसरी वाली पर मैंने यात्रा कर रखी थी, सरदारशहर वाली पर नहीं की थी। इनके बन्द होते ही मुझे डर लगने लगा कि कहीं जयपुर-चूरू भी बन्द ना हो जाये। यह लाइन बन्द हो, इससे पहले ही इस पर यात्रा कर लेनी चाहिये। इसी सिलसिले में आज मैं जयपुर में हूं। यात्रा शुरू होती है नींदर बेनाड स्टेशन से। असल में कल रात मैं दस बजे जयपुर पहुंचा। अपने एक मित्र विधान उपाध्याय जयपुर के ही रहने वाले हैं और नींदर बेनाड के पास उनका घर है। रात उनके यहां चला गया। सुबह छह बजे तक आंख खुल जाये, यही बहुत बडा काम है। इसलिये तय हुआ सवा छह बजे तक नींदर बेनाड स्टेशन पहुंच जाना है। पन्द्रह किलोमीटर पीछे जयपुर जाकर वहां स

दिल्ली- जयपुर डबल डेकर ट्रेन यात्रा

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एक दिन अचानक नजर में आया कि लोहारू- सीकर मीटर गेज लाइन बन्द हो गई है। उसे बडी लाइन में बदला जायेगा और कुछ महीनों बाद वो भारत के मुख्य रेल नेटवर्क से जुड जायेगी। हालांकि हर बन्द होती छोटी लाइन के बारे में जानकर दुख तो होता है लेकिन ऐसा तो होना ही है। कब तक और क्यों दुखी हों? मेरे एक मित्र हैं- अभिषेक कश्यप जिनके बारे में मैंने सबसे पहले जाना कि वे ‘रेल-फैन’ हैं। यानी रेलों के जबरदस्त फैन। लेकिन उनका शौक केवल छोटी लाइनों तक ही है, बडी लाइनों के फैन हैं या नहीं लेकिन गेज परिवर्तन के जबरदस्त विरोधी। जी भरकर कोसते हैं वे रेलवे के गेज परिवर्तकों को। खैर, हमारा स्वभाव ही कुछ ऐसा है कि हम किसी भी तरह के परिवर्तन को स्वीकार करने में झिझकते हैं, जबकि हमें इसे स्वीकार करना चाहिये। बल्कि जिन्दगी में खुद भी परिवर्तित होते रहना चाहिये। तो जी, राजस्थान में कुछ समय पहले तक मीटर गेज ही हुआ करती थी, अब सब खत्म होती जा रही हैं। गिनी चुनी मीटर गेज ही बची हुई हैं, इनमें से भी ज्यादातर पर मैंने यात्रा कर रखी है। लोहारू- सीकर लाइन के बन्द होते ही मुझे चिन्ता सताने लगी जयपुर- चुरू लाइन की। मैंने लोहार

नीलकंठ से हरिद्वार साइकिल यात्रा

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इस यात्रा-वृत्तांत को आरंभ से पढ़ने के लिये यहाँ क्लिक करें । नीलकंठ से अब बारी थी वापस आने की। दोपहर बाद ढाई बजे के आसपास नीलकंठ से वापस चल दिये। बड़ी जबरदस्त तलब लगी है वापस चलने की क्योंकि अब सारे रास्ते नीचे ही उतरना है। ऋषिकेश से यहाँ आने में जो बुरी हालत हुई, अब हालत उसके बिल्कुल विपरीत होने वाली है। पैड़ल की जगह ब्रेक पर ध्यान लगाना पड़ेगा। नीलकंठ से निकलते ही ढलान शुरू हो गयी। पाँच किलोमीटर तक बड़ी जबरदस्त ढलान है। दो सौ मीटर नीचे पहुँच जाते हैं हम इस दूरी में। एक बात बड़ी अच्छी है कि सड़क बिल्कुल मस्त है, कहीं कोई गड्ढा तक नहीं है। साइकिल की अधिकतम स्पीड़ 36.5 किलोमीटर प्रति घंटा रिकार्ड़ की गयी। पाँच किलोमीटर बाद जब तिराहे से ऋषिकेश की तरफ़ मुड़ जाते हैं तो सड़क कुछ ऊबड़-खाबड़ हो जाती है। साइकिल के अगले पहिये को ऐसे में जबरदस्त झटके झेलने पड़ते हैं। इनसे बचने के लिये इसमें शॉकर लगे हैं।

ऋषिकेश से नीलकंठ साइकिल यात्रा

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हम ऋषिकेश में हैं और आज हमें सौ किलोमीटर दूर दुगड्डा जाना है साइकिल से। इसके लिये हमने यमकेश्वर वाला रास्ता चुना है - पहाड़ वाला। दिन भर में सौ किलोमीटर साइकिल चलाना वैसे तो ज्यादा मुश्किल नहीं है, लेकिन पूरा रास्ता पहाड़ी होने के कारण यह काम चुनौतीपूर्ण हो जाता है। कुछ दिनों पहले मैंने अपने एक दोस्त करण चौधरी का ज़िक्र किया था, जो एम.बी.बी.एस. डॉक्टर भी है। हमारी जान-पहचान साइकिल के कारण ही हुई। करण ने तब नई साइकिल ली थी गियर वाली। उसने इंडियामाइक वेबसाइट पर पूछा कि दिल्ली से पचास किलोमीटर की रेंज में कौन-सी ऐसी जगह है, जहाँ आसानी से साइकिल से जाया जा सकता है। संयोग से वो प्रश्न मेरे सामने भी आ गया। मैंने बता दिया कि सुल्तानपुर नेशनल पार्क चले जाओ। बस, हो गयी जान-पहचान।

रूपकुण्ड का नक्शा और जानकारी

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इस यात्रा वृत्तान्त को पूरा पढने के लिये यहां क्लिक करें । रूपकुण्ड का यात्रा वृत्तान्त तो खत्म हो गया है। आज कुछ और सामान्य जानकारी दी जायेगी, जो बाद में जाने वालों के काम आयेगी। रूपकुण्ड के यात्रा मार्ग में एक बेहद खूबसूरत बुग्याल आता है- बेदिनी बुग्याल। इसका पडोसी आली बुग्याल है। बेदिनी के बाद रूपकुण्ड जाने का एक ही रास्ता है जबकि बेदिनी जाने के दो रास्ते हैं- लोहाजंग से कुलिंग, वान होते हुए और लोहाजंग से कुलिंग, दीदना, आली बुग्याल होते हुए। लोहाजंग से कुलिंग होकर वान तक मोटर योग्य सडक बनी है लेकिन इस पर कोई बस नहीं चलती। बसें लोहाजंग तक ही आती हैं। लोहाजंग से वान जाने के लिये दिन भर में गिनी चुनी जीपें चलती हैं, यात्रियों की अपनी गाडियां भी चलती हैं, नहीं तो पैदल भी जाया जा सकता है- दूरी दस किलोमीटर है। अब प्रस्तुत हैं इस यात्रा मार्ग के छोटे-छोटे टुकडों की जानकारी: 1. वान से बेदिनी बुग्याल: बेहतरीन पगडण्डी बनी है, हो सकता है कि एक बार किसी से पूछना पडे कि बेदिनी का रास्ता किधर से जाता है। एक बार रास्ता पकड लेंगे तो दोबारा नहीं पूछना पडेगा। वान से शुरूआत में मध्यम स्तर

रूपकुण्ड यात्रा- आली से लोहाजंग

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इस यात्रा वृत्तान्त को शुरू से पढने के लिये यहां क्लिक करें । आली बुग्याल के बिल्कुल आखिरी सिरे पर है वो छोटा सा पानी का कुण्ड, मुझे बताया गया गया था कि वहां से नीचे उतरने का रास्ता मिलेगा। मैं कुण्ड के पास पहुंचा तो नीचे उतरने का रास्ता दिख गया। लेकिन मैं मुश्किल में पड गया कि रास्ता यही है या अभी कुछ और सीधे चलते जाना है। यहां से दाहिने की तरफ भी रास्ता होने का भ्रम था और सीधे भी। मुझे पता था कि आगे दीदना गांव तक भयानक जंगल मिलने वाला है। बेदिनी में ही मैंने इसकी पुष्टि कर ली थी। जंगल में अकेले चलते हुए मुझे डर लगता है। कुछ देर के लिये मैं कुण्ड के पास ही बैठ गया। एक आदमी आता दिखाई पडा। वो महिपत दानू (फोन- 09411528682, 09837439533) था, जो दीदना का रहने वाला है और लोहाजंग में उसकी दुकान भी है। उसने बताया कि दाहिने वाला रास्ता शॉर्टकट है, जो बहुत ढलान वाला है जबकि सीधा जाने वाला रास्ता खच्चरों वाला है। मैंने पूछा कि तुम किस रास्ते से जाओगे, तो बोला कि खच्चरों वाले रास्ते से क्योंकि मुझे इधर आये हुए बहुत दिन हो गये हैं, सुना है कि खच्चरों वाला रास्ता पक्का बन रहा है। देखूंगा कि