Saturday, September 8, 2018

ग्रुप यात्रा: धराली सातताल ट्रैक, गुफा और झौपड़ी में बचा-कुचा भोजन

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24 जून 2018
कल किसी ने पूछा था - सुबह कितने बजे चलना है?
अगर सुबह सवेरे पाँच बजे मौसम खराब हुआ, तो छह बजे तक निकल पड़ेंगे और अगर मौसम साफ हुआ, तो आराम से निकलेंगे।
क्यों? ऐसा क्यों?
क्योंकि सुबह मौसम खराब रहा, तो दोपहर से पहले ही बारिश होने के चांस हैं। ऊपर सातताल पर सिर ढकने के लिए कुछ भी नहीं है।
तो इसीलिए आज मुझे भी पाँच बजे उठकर बाहर झाँकना पड़ा। मौसम साफ था, तो लंबी तानकर फिर सो गया।
...
आप सभी ने पराँठे खा लिए ना? हमने ऊपर सातताल में झील किनारे बैठकर खाने को कुछ पराँठे पैक भी करा लिए हैं और स्वाद बनाने को छोटी-मोटी और भी चीजें रख ली हैं। अभी दस बजे हैं। धूप तेज निकली है। कोई भी आधी बाजू के कपड़े नहीं पहनेगा, अन्यथा धूप में हाथ जल जाएगा। संजय जी, आप बिटिया को फुल बाजू के कपड़े पहनाइए। क्या कहा? फुल बाजू के कपड़े नहीं हैं? तो तौलिया ले लीजिए और इसके कंधे पर डाल दीजिए। हाथ पर धूप नहीं पड़नी चाहिए।
और अब सभी लोग आगे-आगे चलो। मैं पीछे रहूँगा। बहुत आगे मत निकल जाना। निकल जाओ, तो थोड़ी-थोड़ी देर में हमारी प्रतीक्षा करना। सभी साथ ही रहने चाहिए। यह सीधी पगडंडी जा रही है। जिधर भी यह मुड़ेगी, हमें भी उधर ही मुड़ लेना है।
...
इस यात्रा में बच्चे ढेर सारे सवाल पूछेंगे। उनके हर सवाल का जवाब दिया जाना होगा। लेकिन चुन्नू बाबू तो कुछ पूछ ही नहीं रहे। कम बोलते हैं। संजय जी उनकी इस आदत से बड़े परेशान हैं। कहते हैं - जो बच्चे शुरू में बड़ा ऊधम मचाते हैं, वे आगे चलकर अच्छे हो जाते हैं; लेकिन जो बच्चे शुरू में एकदम गुपचुप रहते हैं, वे आगे चलकर ऊधम मचाते हैं। चुन्नू बड़ा होकर ऊधम मचाया करेगा, इसलिए हम चिंतित रहते हैं।
“क्यों रे चुन्नू! कुछ पूछते क्यों नहीं? अच्छा, यह बताओ कि जंगल में यह रुक-रुककर सीटी बजने जैसी आवाज कैसी है?”
“पता नहीं।”
“पता तो किसी को भी नहीं है, लेकिन अंदाजे से ही बता दो।”
“कोई जंगली जानवर हो सकता है?”
“हाँ, जरूर हो सकता है।”
“या शायद जंगली जानवर न भी हो, कोई और भी कारण हो सकता है।”
“हाँ, सही बात है। बिल्कुल हो सकता है।”
“वैसे, यह आवाज है किसकी?”
“मुझे भी नहीं पता। हो सकता है कोई गड़रिया सब्जी बना रहा हो और कुकर की ढीली सीटी से लगातार भाप निकलती जा रही हो।”
“यहाँ जंगल में कौन सब्जी बनाएगा?”
और इस तरह चुन्नू बाबू शुरू हो गए। संजय जी, आपको अब चिंतित होने की आवश्यकता नहीं है।
असल में पानी का पाइप टूटा हुआ था। उससे लगातार प्रेशर में पानी आ रहा था, तो उसकी आवाज थी यह।

दोस्तों, इधर आओ। यह देखो। यह है सातताल की पहली झील। समुद्र तल से ऊँचाई 2850 मीटर। मैंने पहले ही बता दिया था कि ये झीलें बेहद छोटी हैं। इसलिए आपको इन्हें देखने में शायद आनंद न आए। तो यह सोच लेना कि हम जंगल-वाक कर रहे हैं। यहाँ अनगिनत वनस्पतियाँ हैं और फोटो खींचने की शानदार लोकेशन भी।
हम स्थानीय लोगों से भी बातचीत करते चलेंगे और उनकी गतिविधियों को भी देखेंगे। वो एक आदमी खेत में काम कर रहा है। चलिए, उससे बातचीत करते हैं।
क्या बात करेंगे उससे?
कुछ भी। उसकी दिनचर्या के बारे में, उसकी पढ़ाई-लिखाई के बारे में, उसकी कमाई के बारे में। और वह नई उम्र का है, तो पहाड़ छोड़कर मैदान में क्यों नहीं गया, यह भी पता करेंगे।
“हमारा यहाँ सेब का बगीचा है जी। बहुत अच्छी कमाई होती है। प्रति पेटी इतने रुपये मिलते हैं, जो सीजन खत्म होने तक कई लाख पार कर जाते हैं। अभी हम चेरी की भी पौध तैयार कर रहे हैं। यहाँ चेरी भी काफी पैदा होती है और सारी की सारी चेरियाँ यहीं पर बिक भी जाती हैं। धराली में आपने देखा होगा, चेरी ढाई सौ रुपये किलो हैं। सेब से भी ज्यादा आमदनी है।”
और आप सभी तो आगे निकल गए, लेकिन इससे मुझे पता चला है कि दूसरी झील के आसपास कहीं गुफा भी है।
अब हम दूसरी झील की ओर चलेंगे। धराली से पहली झील साढ़े तीन किलोमीटर दूर है और पहली से दूसरी झील डेढ़ किलोमीटर पर है। खुशी की बात यह है कि दूसरी झील सातताल में सबसे बड़ी झील है और दुख की बात है कि यह एकदम सूख चुकी है।
वो रहा दूसरा ताल। सूखने के बावजूद भी सबसे ज्यादा खूबसूरत है यह। एकदम खाली हरा-भरा मैदान और उस तरफ घना जंगल। बिल्कुल खजियार जैसी लोकेशन। फिलहाल धूप तेज है। कुछ देर छाँव में बैठ जाते हैं। नहीं, उस पेड़ पर काँटें हैं, उसकी छाँव में मत बैठना।
अब हम वो गुफा ढूँढ़ने जाएँगे, जिसका नाम भीम गुफा भी है। हमें नहीं पता गुफा कहाँ है। लेकिन उसने बताया था कि बायीं ओर को रास्ता जाता है। जबकि सीधा रास्ता तीसरी और चौथी झील पर जाता है। फिलहाल हम बायीं ओर थोड़ी दूर घूमकर आते हैं। कौन साथ चलेगा?
संजय जी, चुन्नू महाराज और अमित राणा चल देते हैं। बाकी सभी यहीं पेड़ की छाँव में बैठते हैं। समुद्र तल से 2980 मीटर ऊपर। आप लोग पराँठे खा लेना, हम लौटकर खाएँगे।

यह हल्की-सी पगडंडी मिली है। इस पर चलते हैं थोड़ी दूर। गुफा मिलेगी, तो ठीक है; अन्यथा लौट आएंगे। अब मैं मोबाइल में गाने बजा देता हूँ। चारों ओर घना जंगल है। और आपको पता ही है कि पूरे हिमालय के जंगलों में तेंदुए और काले भालू बहुतायत में हैं। इस जंगल में भी ये जानवर मौजूद हैं। उनसे बचना है, तो हमें उन्हें बताना होगा कि हम आ रहे हैं। वे रास्ते से हट जाएंगे। समस्या तब होती है, जब अचानक आमना-सामना हो जाता है। या तो हम जोर-जोर से बातें करते हुए चलें या फिर मोबाइल में तेज आवाज में गाने बजाएं।

यह बाड़ कैसी है? उस तरफ सेब का बगीचा है और खेत भी हैं। उधर एक छानी भी दिख रही है। बाड़ पार करें क्या? अगर छानी में कुत्ता हुआ तो? तेंदुए और काले भालू से तो बचना आसान है, लेकिन कुत्ते से बचना आसान नहीं। उससे छुपने में ही भलाई है।
अरे, छानी से एक आदमी बाहर निकल आया है और हमें आने का इशारा कर रहा है। चलो, चलते हैं। अब कुत्ते की कोई समस्या नहीं।
यहाँ तो बहुत सारे आदमी हैं। दारू की भी गंध आ रही है। मतलब पार्टी चल रही है। जंगल में मंगल।
“यह हमारा ही फार्म है। हम वैसे तो देहरादून में सैटल हो गए हैं, लेकिन साल में कभी-कभार आ जाते हैं। कल आए थे, उधर जंगल में कैंपिंग की थी। यह नेपाली नौकर बहादुर यहीं रहता है। सब यही सम्भालता है। फिलहाल सेब की खेती है, चेरी भी है और राजमा आदि भी बो रखा है।... और आप लोग चाय पीकर जाना, बन रही है।”
“मंजूर।”
तभी चुन्नू की आवाज आई - “पापा, भूख लगी है, चलो।”
“अरे, भूख लगी है। तो ये लो साग और चावल।”
प्लेट में साग और बासमती चावल हाजिर हो जाते हैं। कुछ चुन्नू ने खाए और कुछ उसके पापा ने। तारीफ दोनों ने की।
सभी लोग साथ ही निकल पड़ते हैं। इन्हें अब देहरादून जाना है। शायद अगले साल फिर आएंगे। हमें यहीं ठहरने का सुझाव देते हैं। खाने-पीने की कोई तंगी है ही नहीं।
लेकिन हमें भीम गुफा देखनी है। बहादुर दिखा देगा। पीछे लग लो इसके।
गुफा बहुत लंबी चौड़ी नहीं है। इधर से घुसो और उधर से निकल जाओ। खड़े-खड़े ही पार कर जाओगे। कहते हैं कि हर साल इसमें जून तक भी बर्फ भरी रहती थी, अमरनाथ जी की तरह, लेकिन इस साल कम बर्फबारी हुई है, इसलिए सब पिघल गई।

चलिए, अब हमने गुफा देख ली और साग चावल भी खा लिए। घने जंगल में स्थित ऐसी जगह की हमने कल्पना भी नहीं की थी। यहाँ तो बार-बार आना चाहिए।
“हम लोग यहाँ सर्दियों में भी रहते हैं। चारों ओर बर्फ होती है और आने-जाने के सब रास्ते बंद हो जाते हैं।” बहादुर ने बताया।

और ताल के किनारे बैठे सभी यात्री हमारी प्रतीक्षा करते-करते ऊब चुके थे और नतीजा अब मिला। सबने खूब सुनाई हमें। उन्हें नहीं पता था कि यहाँ से कुछ ही दूर जंगल के बीच में एक छानी भी है।
“अरे, हम वहाँ साग और चावल खाकर आए हैं।”
“हा हा हा... गुफा में सफेद बालों वाली बुढ़िया साग बना रही होगी।”
“हमारी बात पर यकीन नहीं हो रहा ना? अभी थोड़ी देर में बहादुर आएगा, तब आएगा आपको यकीन।”

उधर से बहादुर आता दिखा और इधर सभी को यकीन होता चला गया। साग बना है तो गजब का ही बना होगा। हमें क्यों नहीं बुलाया आपने?
“बहादुर भाई, साग और भी बचा है क्या?”
“हाँ जी, बहुत सारा बचा है।”
“तो चलो, हम भी खाएंगे।”
“चल तो देता, लेकिन मालिक लोग नीचे धराली गए हैं। उनका यह सामान मुझे ले जाना है। वे मेरी प्रतीक्षा करेंगे।”
“प्लीज, प्लीज।”

कुछ ही देर में हम सभी उस छानी में थे। तमाम तरह के फूल लगे थे। दीप्ति को काम मिल गया। चूल्हा जलाकर साग-चावल गर्म कर दिए। और सब के सब प्लेटों में, थालियों में लगे पड़े थे। खा भी रहे थे और वाहवाही भी कर रहे थे।
समुद्र तल से 3000 मीटर ऊपर। चारों ओर घना जंगल। एक छानी। छानी मतलब कच्चा अस्थाई घर। सड़क किनारे छानियाँ नहीं मिलती जी। ये मिलती हैं सड़क से बहुत दूर। और इनमें रुकना और भोजन करना अलौकिक अनुभव होता है।
आज आप सभी ने इस अलौकिक अनुभव को महसूस कर लिया है।
बहादुर को नीचे जाने की जल्दी थी और उसने हमारे लिए पूरी छानी खोल दी, सारे बिस्तर-गद्दे खोल दिए।
“आप आज यहीं रुक जाओ। सारा राशन है ही। बनाना और खाना।”
हम रुक तो जाते, बना-खा भी लेते, सबका रुकने का मन भी था, लेकिन इतने लोगों के लिए कंबल रजाइयाँ यहाँ नहीं थे।
काश! पहले पता होता।
अगली बार जब भी आएंगे, स्लीपिंग बैग तो जरूर लाएंगे। सिर छुपाने की पर्याप्त जगह है यहाँ।


वो रही छानी

यह जमीन इन्हीं की है, नाम पता नहीं। देहरादून रहते हैं।


भीम गुफा



सूख चुका दूसरा ताल अब भी कम खूबसूरत नहीं है।

उमेश और अजय छानी में

यहाँ तमाम तरह के फूल थे


साग और चावल का भोग...

ऊँचाई के कारण चुन्नू को सिरदर्द हो रहा था। 3000 मीटर की ऊँचाई बहुत ज्यादा नहीं होती, लेकिन दस मिनट सो लेने से आराम मिलता है।

ये पराँठे बच गए हैं... इन्हें कौन खाएगा?... लाओ, मुझे दो...


संजय जी और उमेश जी छानी में आराम फरमाते हुए... साथ ही आज रात यहीं रुक जाने के बारे में भी योजना बनाते हुए...

यह रही हमारी मंडली... फोटो लिया है दीप्ति ने...






दूसरी झील के किनारे ये खंडहर दिखते हैं... यहाँ कभी एक बाबाजी रहा करते थे... आग लग गई तो छोड़ना पड़ा...


वापसी का सफर




एक ने पूरा पेड़ उठा रखा है... एक खाली बोतल लिए खड़ा है...


और यह है भोजपत्र का पेड़

कुछ छोटी-छोटी वीडियो भी हैं... इन्हें भी देख लीजिए... अच्छा लगेगा...





अगले भाग में जारी...

इस यात्रा के साथी संजय जी ने अपने अनुभव अपने ब्लॉग में लिखे हैं... आप यहाँ क्लिक करके इसे भी पढ़ सकते हैं...
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दोस्तों, इस तरह की आगामी यात्रा 29 सितंबर 2018 से 2 अक्टूबर 2018 तक होगी... आप भी इसमें शामिल हो सकते हैं... अधिक जानकारी के लिए यहाँ क्लिक करें... अन्यथा नीचे फोटो पर क्लिक करें...


5 comments:

  1. मजा आ गया, एक ना भूलने वाला स्वाद और बेहद शानदार दिन।

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  2. क्या कमेंट करूँ कुछ समझ न रहा।कभी और तफ़रीह के लिए चलेंगे।

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    1. आप भी ब्लॉग लिखते है,

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