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Monday, January 8, 2018

नागपुर से इटारसी पैसेंजर ट्रेन यात्रा

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27 अगस्त 2017
नागपुर-इटारसी पैसेंजर 51829
इस मार्ग से मैं पता नहीं कितनी बार यात्रा कर चुका हूँ, लेकिन पहली यात्रा हमेशा याद रहेगी। उस समय मुझे हैदराबाद जाना था और मैंने दक्षिण एक्सप्रेस इसलिए चुनी थी क्योंकि इसके सबसे ज्यादा ठहराव थे। रात निज़ामुद्दीन से चलकर झाँसी तक सुबह हो गयी थी। फिर झाँसी से नागपुर तक मैंने कभी खिड़की पर, तो कभी दरवाजे पर ही यात्रा की व रास्ते मे आने वाले छोटे-बड़े सभी स्टेशन व उनकी ऊँचाई नोट कर ली थी। उस समय मेरे पास कैमरा नहीं हुआ करता था और मुझे रेलयात्राओं में यही सब नोट करने व उनका रिकार्ड रखने का शौक था। तो उसी दिन इटारसी से नागपुर का मार्ग भी देखा। तसल्ली से। सतपुड़ा के पहाड़ों को पार करना होता है और इन्हें देखकर आनंद आ गया था। तभी सोच लिया था कि इस मार्ग पर पैसेंजर ट्रेन से भी यात्रा करूँगा।
आज वो मौका मिला। मौके तो पहले भी मिले थे, लेकिन मानसून की बात ही अलग है। आप किसी ऐसे मार्ग पर यात्रा कर रहे हों, तो मानसून तक इंतजार कर लेना ठीक रहता है।

सुबह 6 बजे अलार्म बजा और इसे बंद करके फिर से सो गया। गनीमत रही कि साढ़े सात बजे अपने आप आँख खुल गयी और ट्रेन छूटने से बच गयी। ठीक आठ बजे ट्रेन नागपुर से चल देती है। इस आधे घंटे में नहाना-धोना, होटल से स्टेशन तक जाना, टिकट लेना व ट्रेन का प्लेटफार्म ढूँढना सब शामिल था। स्टेशन के पूर्वी द्वार पर पूछताछ काउंटर नहीं था और डिस्प्ले पर इस ट्रेन को छोड़कर बाकी सभी ट्रेनों की स्थिति आ रही थी। फुट ओवर ब्रिज पर मैं चढ़ा और प्रत्येक ट्रेन को देखता हुआ आगे बढ़ने लगा। और जैसे ही एक ट्रेन के डिब्बों पर लिखा देखा - NCR, वहीं उतर गया। यह ट्रेन केवल इटारसी ही नहीं जाती, बल्कि दूसरे नंबर से आगे झाँसी और आगरा छावनी तक भी जाती है और यह उत्तर मध्य रेलवे की गाड़ी है, यह बात मुझे पता थी। ट्रेन के डिब्बों पर भी लिखा है - नागपुर - झाँसी - आगरा छावनी पैसेंजर।
इसके बराबर में प्लेटफार्म 5 पर अमरावती पैसेंजर खड़ी थी, जिससे मैं चार दिन पहले गया था। इस दोनो का प्रस्थान समय 8 बजे ही है।
गोधनी, भरतवाड़ा, कलमेश्वर, कोहली, सोनखांब, मेटपांजरा, काटोल। भूख लगी थी। ट्रेन में कोई कुछ बेचने नहीं आ रहा। काटोल में उम्मीद थी, लेकिन यहाँ भी खाली पेट। ट्रेन अठारह मिनट खड़ी रही - नौ पंद्रह से लेकर नौ तैंतीस तक। बंगलुरू पाटलिपुत्र (शायद संघमित्रा) आगे निकली।
कलंभा - कुछ टोकरे वाले चढ़े तो हैं, लेकिन आगे वाले डिब्बों में। अगले स्टेशन पर पीछे भी आ जाएंगे। लेकिन क्या पता तब तक सभी समोसे बिक जाएँ। बस, दो समोसे बच जाएँ मेरे लिए। और यह भी नहीं पता कि समोसे ही हैं या कुछ और। कुछ भी हों, ले लूँगा।
नरखेड़ में भुसावल पैसेंजर खड़ी थी, उसी कटनी वाले डीजल इंजन के साथ जो कल मुझे भुसावल से यहाँ लाया था। यह ट्रेन भुसावल से यहाँ आकर न्यू अमरावती चली जाती है। फिर सुबह वहाँ से नरखेड़ आ जाती है। अब दस बजे यह भुसावल के लिए चल देगी।
नरखेड़ से निकलते ही आपको छोटी-छोटी पहाड़ियाँ दिखने लगती हैं। रेलवे लाइन जैसे ही इनमें प्रवेश करती है, ठीक तभी हम महाराष्ट्र को पीछे छोड़कर मध्य प्रदेश मे प्रवेश कर जाते हैं। अब इटारसी तक हमारी यात्रा मध्य प्रदेश में ही रहेगी और सतपुड़ा में भी।
दारीमेटा, मध्यप्रदेश का पहला स्टेशन।
पांदुरना स्टेशन का नाम मराठी में भी लिखा था, लेकिन ‘साँची दुग्ध पार्लर’ कह रहा था कि यह मध्य प्रदेश में है। डिब्बे से सभी यात्री उतर गए, लेकिन डिब्बा पहले से भी ज्यादा भर गया। ट्रेन छोटी है, इसलिए पिछला डिब्बा प्लेटफार्म पर बीच में रुकता है और स्टेशन के इसी हिस्से में सबसे ज्यादा यात्री ट्रेन की प्रतीक्षा करते हैं।
तीगांव।
घुडनखापा से निकलते ही एक सुरंग है।
एक मालगाड़ी नागपुर की तरफ जा रही थी। 5 इंजन इसमें जुड़े थे। इधर से नागपुर की तरफ ढलान है, एक इंजन भी पर्याप्त होता, लेकिन नागपुर से इधर चढ़ाई है, तो ज्यादा पावर की जरूरत होती है। इंजनों की ज़रूरत चढ़ाई के वक्त होती है।
दूसरी सुरंग। नागपुर की तरफ जाती लाइन थोड़ा घूमकर जाती है। पता नहीं उस पर भी कोई सुरंग है या नहीं।
चिचौंडा, 699 मीटर ऊँचा स्टेशन। इस सेक्शन का सबसे ऊँचा। एक मीटर और ऊपर बना देते। ऐसा लगता है जैसे बेचारा नर्वस नाइंटीज में आउट हो गया।
चिचौंडा में मदुरई-चंडीगढ़ एक्सप्रेस के डिब्बे खड़े थे। कोई यात्री भी नहीं। गौरतलब है कि चंडीगढ़ के आसपास डेरा सच्चा सौदा वाले गुरमीत राम रहीम सिंह की सुनवाई के कारण दंगे हुए थे। उनके कारण उधर जाने वाली सभी ट्रेनें रद्द कर दी गयी थीं। इसके बावजूद भी इस ट्रेन को यहाँ खड़ा नहीं होना था। दिल्ली, सहारनपुर से ही वापस मुड़ लेना था, अपनी मदुरई की वापसी करते हुए। खैर, जो भी हो। रेलवे की बातें रेलवे ही जाने। हम तो साधारण यात्री ही ठहरे।
हतनापुर और मुलताई।
मुलताई में भारी भीड़ थी। ट्रेन पूरी भर गई। बड़ा कस्बा है। इनमें से कुछ तो आमला उतरेंगे और बैतूल में तो ट्रेन खाली ही हो जानी है।
मुलताई स्टेशन पर एक जगह लिखा था - ताप्ती नदी के उदगम स्थल दर्शन हेतु यहाँ उतरिये। और अनजाने में मैं पुण्य का काम कर बैठा। ताप्ती के संगम से उदगम की यात्रा। सूरत में ताप्ती संगम है। परसों मैंने वहीं से रेलयात्रा आरंभ की थी। और आज यहाँ मुलताई आ गया। स्टेशन के बगल में ताप्ती नदी पर रेलवे का पहला पुल है। बल्कि छोटी-सी पुलिया है। और अगर आपको ताप्ती पर पुल देखने हैं तो सूरत जाइये। नदियाँ छोटी-सी ही होती हैं अपने उद्गम पर।
जौलखेड़ा।
आमला जंक्शन। एक लाइन छिंदवाड़ा जाती है। अच्छी दर्शनीय लाइन वह भी।
गार्ड की बदली हो गयी। ड्राइवर का पता नहीं।
बरसाली में तमिलनाडु एक्सप्रेस धड़धड़ाती हुई क्रॉस हो गयी। दक्षिण एक्सप्रेस का इंतज़ार है। इसके एकदम पीछे ही है दक्षिण एक्सप्रेस। कभी भी आगे निकल सकती है। लेकिन बरसाली में जब मेरी ट्रेन की सीटी बजी, तो समझ गया कि यहाँ क्रॉसिंग नहीं हो रही। शायद अगले स्टेशन मलकापुर रोड पर क्रॉसिंग हो, क्योंकि बैतूल में दोनों ट्रेनों का ठहराव है। तो एक ही समय पर दो प्लेटफार्मों की जरूरत पड़ेगी। पता नहीं बैतूल में कितने प्लेटफार्म हैं, लेकिन जिस तरह बाकी स्टेशनों पर दो-दो ही प्लेटफार्म मिले, उससे यही लगता है कि बैतूल में भी दो से ज्यादा प्लेटफार्म नहीं होंगे। उत्तर की ओर जाती ट्रेन को दक्षिण वाले प्लेटफार्म पर लेना थोड़ा टेढ़ा काम होता है, खासकर ऐसी व्यस्त लाइनों पर। तो अगर मलकापुर रोड पर दक्षिण आगे नहीं निकली, तो बैतूल में भी आगे नहीं निकलेगी। चाहे मुझ से लिखवाकर ले लो।
मलकापुर रोड - लेकिन यह तो हाल्ट है। यहाँ दक्षिण तो क्या, कोई भी ट्रेन आगे नहीं निकल सकती।
किसी के मोबाइल में बज रहा था - आरती कीजे बड़ा देव की आरती। गौरतलब है कि गोंड़ आदिवासियों के मुख्य देवता हैं बड़ा देव। और भारत के इस इलाके में बड़ा देव की आरती नहीं बजेगी तो किसकी बजेगी?
गन्ने और मक्के की अच्छी खेती।
बैतूल।
बैतूल में तीन प्लेटफार्म हैं। दो प्लेटफार्म उत्तर की ओर जाने के लिए और एक प्लेटफार्म दक्षिण की ओर जाने के लिए। दक्षिण एक्सप्रेस यहाँ आगे निकली। पातालकोट एक्सप्रेस का भी समय हो चला था। लग रहा था कि इसे भी आगे निकालेंगे, लेकिन पैसेंजर को ही जाने दिया।
मंजुला खडसे जी सपरिवार मिलने आयीं। फेसबुक के माध्यम से हमारी अच्छी जान-पहचान है। पहले मुझे लगता था कि वे नागपुर में रहती हैं। पता नहीं कैसे लगता था। बस, लगता था। तो यह भी लग रहा था कि जब मेरा नागपुर में रुकना होगा, तो उन्हीं के यहाँ होगा।
और साथ ही अनुराग भी आ गये अपने एक मित्र के साथ। आपको शायद याद हो या न हो, लेकिन मुझे याद है कि दो साल पहले जब हम पातालकोट से बाइक से बैतूल आये थे तो अनुराग ने ही हमारी यहाँ ठहरने की व्यवस्था की थी।
ट्रेन का दो मिनट का ही ठहराव था, लेकिन गाड़ी आधे घंटे खड़ी रही। मानों कह रही हो, मिल लो सब अच्छी तरह। इस दौरान खूब बातें हुईं। सेल्फियों का भी दौर चला। और खाना भी। दोनों ही ढेर सारा खाना ले आये। फल-फ्रूट भी।
मरामझिरी के बाद पाँच सुरंगें हैं और पहाड़ी घुमावदार रास्ता है। अचानक ध्यान दिया कि ट्रेन में तीन इंजन लगे हैं। पता नहीं क्यों। जबकि ट्रेन एक ही इंजन से चल जाएगी। पैसेंजर ट्रेनों में ज्यादा लोड नहीं होता। मालगाड़ियों में बहुत लोड होता है। इसलिए मालगाड़ियों में कई इंजन लगाने होते हैं।
धाराखोह में दो इंजन हटा दिए। यहाँ दो-दो के ग्रुप में कुल छह इंजन खड़े थे। ये दो इंजन ट्रेन में शायद मरामझिरी में जोड़े होंगे। सेकंडों में जोड़ दिये थे और सेकंडों में हटा भी दिये। पता ही नहीं चला। धाराखोह से मरामझिरी तक चढ़ाई है, तो दो-दो अतिरिक्त इंजन लगाये जाते हैं। उन अतिरिक्त इंजनों को वापस धाराखोह भी तो लाना पड़ेगा। इसलिये हमारी ट्रेन में जोड़ दिया उन्हें - वापस लाने के लिये।
घोड़ा डोंगरी से एक लाइन सारणी जाती है। उधर एक बिजलीघर है और कोयले की ही मालगाड़ियाँ जाती हैं वहाँ। आप कभी सारणी जाओ तो कोयले की धूल से युक्त काली मिट्टी के बीच से होकर जाना पड़ेगा।
बरबतपुर में मेरी ट्रेन की जोड़ीदार ट्रेन क्रॉस हुई। वो भी एकदम खाली थी। इस मार्ग पर केवल एक ही पैसेंजर ट्रेन चलती है। नागपुर-इटारसी पैसेंजर। वैसे नागपुर से आमला तक भी एक पैसेंजर चलती है और आमला से बैतूल तक भी। लेकिन बैतूल और इटारसी के बीच में केवल यही एक पैसेंजर है। इटारसी से यह दोपहर बारह बजे के आसपास चलती है और रात में नागपुर पहुँचती है। जबकि मुझे अपनी यात्राओं के लिये केवल दिन की ट्रेनों की ही आवश्यकता होती है। इसलिये मैं कभी भी इस मार्ग पर इटारसी से शुरू नहीं कर सकता था। इसके विपरीत नागपुर से चलने वाली ट्रेन सुबह आठ बजे चलती है और शाम होने तक इटारसी पहुँच जाती है। ऐसे में मैं आसानी से यात्रा कर सकता था।
बरबतपुर में ही पातालकोट एक्सप्रेस आगे निकली।
चौलाई की टिक्कियाँ बेचने वाला एक आदमी आया। जिन डिब्बों में हम अपनी रसोई में दालें आदि रखते हैं, ऐसे एक डिब्बे में कुछ ही टिक्कियाँ थीं। “दत की तार” और चार टिक्कियाँ निकालकर हमारे सामने कर दीं। किसी ने नहीं ली तो “पाँत ले लो” कहकर एक और निकाल ली। अब भी किसी ने नहीं ली। ऐसा लग रहा था जैसे वह बस किसी तरह दस रुपये कमा लेना चाहता हो। ये टिक्कियाँ निःसंदेह घर की ही बनी होंगी। मेरे मन में एक ही बात आयी - जीने के लिये संघर्ष।
एक बच्चा अपने गुब्बारे में ही खुश था। उसमें हवा भरता, फिर निकाल देता। और सबकी तरफ देखकर हँसता। एक बार वह हवा भरता ही गया, भरता ही गया और...। नहीं, गुब्बारा नहीं फूटा। आप भी कितनी जल्दी गुब्बारा फुट जाने की कल्पना कर लेते हैं। बच्चे को अभी गुब्बारे के साथ अपने घर तक जाना है। गाँव के सब बच्चों को दिखाना है कि पिताजी ने बैतूल से गुब्बारा दिलाया। तो वह हवा भरता ही रहा। अचानक उसने एक ‘खोज’ की। इसमे एक बेहद बारीक छेद था और उससे हवा निकल रही थी। उसने अपनी खोज से अपने पिता को अवगत कराया। पिता ने वहाँ गाँठ मार दी। बच्चा फिर से फुलाने-पिचकाने में व्यस्त हो गया।
मगरडोह, ढोढरामोहार, पोला पत्थर, काला आखर, सहेली और ताकू। ये रेलवे स्टेशनों के नाम हैं।
‘काला आखर’ से याद आया - ‘काला आखर’ ‘भैंसा’ ‘बराबर’। ‘काला आखर’ तो यहाँ है, ‘भैंसा’ मथुरा के पास है और ‘बराबर’ बिहार में है - पटना और गया के बीच में।
एक मालगाड़ी आगे निकल गई। ये भी भला कोई बात हुई! मालगाड़ियों को रोक-रोककर यात्री गाड़ियाँ चलायी जाती हैं। लेकिन यहाँ उल्टा हो गया। मैं जानता हूँ ऐसा क्यों हुआ। इटारसी यहाँ से 25 किलोमीटर है। ज्यादा से ज्यादा घंटे भर की यात्रा है। इटारसी से यह ट्रेन झाँसी पैसेंजर बनकर शाम 6 बजकर 10 मिनट पर झाँसी जाएगी। तो अगर इसे अभी चार बजे ही इटारसी ले जाकर खड़ी कर देंगे तो यह दो घंटे तक इतने व्यस्त स्टेशन का एक प्लेटफार्म घेरकर खड़ी रहेगी। इसलिए इसे 6 बजे के आसपास ही इटारसी में प्रवेश कराया जाएगा और 5-10 मिनट रोककर आगे रवाना कर दिया जाएगा। इसका टाइम-टेबल भी इसी के अनुसार बनाया गया है। टाइम टेबल के अनुसार यह ट्रेन सहेली दो बीस पर ही आ जाती है और बाकी 30 किमी तय करने के लिए साढ़े तीन घंटे का समय दिया गया है।
बहुत सारे मित्र कहेंगे कि रेलवे गलत करता है। लेकिन रेलवे अपनी दूसरी ट्रेनों का भी आवागमन देखता है और उसी के अनुसार टाइम-टेबल डिजाइन करता है। झाँसी पैसेंजर ठीक समय पर रवाना हो; ट्रेन लेट हो रही हो - उसकी भी पूर्ति हो जाये और प्लेटफार्म भी खाली रहे; सब-कुछ सोचकर ही ऐसा टाइम-टेबल बनाया है।
चेन्नई-छपरा गंगा कावेरी एक्सप्रेस को आगे निकाल दिया। रोके रखो पैसेंजर को। मुझे कोई समस्या नहीं। इटारसी से दिल्ली के लिए मेरी ट्रेन कर्नाटक एक्सप्रेस रात दस बजे है। आराम से पहुँच जाऊंगा।
केसला।
कीरतगढ़।
एक ट्रेन बराबर वाली लाइन पर खड़ी थी। शायद नागपुर की तरफ जाएगी। एक चायवाला बड़ी तेजी से चलती हुई मेरी पैसेंजर से उतरा और उसमें जा चढ़ा। लेकिन वह गंगा कावेरी थी जो इटारसी की तरफ जा रही थी। सिग्नल मिलते ही वह चल पड़ी। चायवाला फिर उसमें से कूदा और खिसियाता-सा, हँसता-सा पैसेंजर में आ चढ़ा।
बंदर बेशुमार।
जुझारपुर एक टेक्निकल स्टेशन है। यह यात्रियों के लिये नहीं है, इसलिये कोई प्लेटफार्म भी नहीं है और स्टेशन बोर्ड भी नहीं है। यह असल में इटारसी का आउटर है। पाँच-छह लाइनें हैं। इटारसी की तरफ जाने वाली ट्रेनों को अक्सर यहाँ रोक दिया जाता है और जिस ट्रेन का भी इटारसी से बुलावा आता है, उस ट्रेन को भेज दिया जाता है।
और हमारी ट्रेन एकदम ठीक समय पर साढ़े पाँच बजे के आसपास इटारसी जा पहुँची। भोपाल व झाँसी की ओर इस ट्रेन से जाने वाले यात्री इसकी प्रतीक्षा कर रहे थे।



चिचौंडा में खाली खड़ी दक्षिण रेलवे की मदुरई-चंडीगढ़ एक्सप्रेस।














समाप्त।

3 comments:

  1. अपनी इतनी अच्छी तस्वीर वो बचचे भी देख पाते

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  2. पोस्ट तो पहले की तरह ठीक ठाक है लेकिन बच्चों और बंदरों की फोटो सचमुच बहुत खूबसूरत है। बड़े बंदर की तो बात ही क्या? लगता है किसी गंभीर मुद्दे पर सोच विचार रहे हैं।

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