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Monday, January 1, 2018

भुसावल से नरखेड़ पैसेंजर ट्रेन यात्रा

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26 अगस्त 2017
पहले मैं रात की बात सुनाता हूँ। भुसावल में विश्रामालय प्लेटफार्म 1 और 3 के बीच मे है। समझिए कि दोनों ही प्लेटफार्मों पर है। ताला लगा था। ताला खुलवाया तो बड़ी अजीब-सी गंध आयी। अजीब-सी गंध आये तो समझ जाइये कि भूत निवास करते हैं। मैं भी समझ गया। और यह भी समझ गया कि पूरे विश्रामालय में आज रात मैं अकेला रहने वाला हूँ। इसमे एक खंड़ वातानुकूलित था, एक गैर-वातानुकूलित। वातानुकूलित में भी दो कमरे थे और एक डोरमेट्री हॉल। अर्थात काफी बड़ा विश्रामालय था। केयर-टेकर तो बिजली जलाकर चला गया। रह गया मैं अकेला। ए.सी. चालू कर लिया, हॉल में ठंडक बनने लगी। प्लेटफार्मों के बीच मे होने के बावजूद भी बाहर की आवाजें नहीं आ रही थीं। डर लगने लगा। लकड़ी और काले शीशे के पार्टीशन थे सभी बिस्तरों के बीच में। काले शीशे में अपनी ही परछाई दिखती तो काँप उठता। बायीं खिड़की का पर्दा दाहिने शीशे में हिलता दिखता तो काँप उठता। अब आप कहेंगे कि यह तो नैचुरल है, इसमें भूतों का कोई रोल नहीं और न ही भूतों की उपस्थिति सिद्ध होती। लेकिन भईया, मैं भूतों से डरता हूँ, खासकर तब जब ऐसी सन्नाटी जगह पर अकेला होऊँ। हनुमान चालीसा की कोशिश की, लेकिन एक शब्द भी जुबान पर नहीं आया। आखिरकार गजाननं भूतगणादि सेवितं से काम चलाना पड़ा। नहाने गया तो साबुन लगाते समय आँख बंद करनी पड़ी। ऐसा लगा कि भूत पीछे ही खड़ा है और कंधे पर हाथ रखने वाला है। बड़ी जल्दी करके साबुन धोयी और आँखें खोलीं। कोई ना था। सोने से पहले मैंने विनती की - “भाई देख, मराठी तो मुझे आती नहीं। लेकिन इतना कहे देता हूँ कि सुबह छह बजे चला जाऊँगा। यह हवेली तेरी है और तेरी ही रहेगी। इसलिए नींद में खलल मत डालना।”
और आप शायद जानते हों कि भूत आज्ञाकारी होते हैं। पूरी रात बहुत अच्छी नींद आयी।
भुसावल तापी नदी के एकदम किनारे बसा है। भुसावल से जब खंडवा की तरफ चलेंगे तो चलते ही तापी पार करनी पड़ेगी। लेकिन मुझे चूँकि अकोला की तरफ जाना था, इसलिये तापी पार करने का सवाल ही नहीं।
ट्रेन चल पड़ी तो ज्यादा भीड़ नहीं थी। बिस्वा ब्रिज में बिस्वा नदी पार की। इस नदी का असली नाम विश्वगंगा है, लेकिन रेलवे पुल पर बिस्वा नदी लिखा था। इसी के कारण स्टेशन का नाम बिस्वा ब्रिज है। यहाँ लोकमान्य तिलक से शालीमार जाने वाली ट्रेन आगे निकली।
एक स्टेशन है वडोदा। हाल्ट है। यह तो ऐसे ही हो गया, जैसे आपको कहीं दूर-दराज़ में ‘दिल्ली’ नाम का स्टेशन मिल जाये। गुजरात वाले वडोदरा का पुराना नाम बरोडा था, जो कि वडोदा भी कहा जाता था। अभी भी अक्सर वडोदरा को वडोदा कह दिया जाता है। ऐसे में महाराष्ट्र में वडोदा स्टेशन होना मजेदार तो है ही।
बड़ी भीड़ थी ट्रेन में। ज्यों-ज्यों अकोला की तरफ बढ़ते गए, भीड़ भी बढ़ती गयी और एक समय ऐसा आया कि मुझे अपना दरवाजा छोड़ देना पड़ा। स्कूली बच्चों से लेकर तमाम तरह के दैनिक यात्रियों तक। ट्रेन के अंदर दूध के डिब्बे रखे थे तो बाहर खिड़कियों पर झोले टंगे थे। इन झोलों में क्या था और किस-किस ने टांग रखे थे, क्यो टांग रखे थे - मुझे नहीं पता। लेकिन सभी झोलों में लोहे के हुक थे। रोज ही ये झोले यहाँ टंगते होंगे।
कुछ साल पहले मैंने अकोला से भुसावल तक पैसेंजर ट्रेन में यात्रा की थी। तब भी बड़ी भयंकर भीड़ थी। कुछ रेलमार्ग होते ही हैं, जहाँ पैसेंजर ट्रेनों में हमेशा ही भीड़ होती है। बाद में नरेंद्र शेलोकर जी ने बताया कि नांदुरा और शेगाँव से बड़ी संख्या में दैनिक यात्री इसी ट्रेन से अकोला आते हैं। बताते हैं कि शेगाँव अच्छी दर्शनीय जगह है। एक बार सुनील पांडेय जी ने भी इसकी प्रशंसा की थी। लेकिन मुझे तो इस बार ट्रेन से उतरना ही नहीं है। अगली बार के लिये नोट कर लिया।
जलंब जंक्शन से एक लाइन खमगाँव जाती है। पहले इस मार्ग पर रेलबस चलती थी, लेकिन अब तीन डिब्बों की ट्रेन चलती है। WAG सिरीज का इंजन लगा था इस दो डिब्बों की ट्रेन में।
अकोला में मीटरगेज के कुछ डिब्बे खड़े थे। मीटरगेज की यहाँ केवल इतनी ही निशानी बची है। पटरियाँ ब्रॉडगेज में बदली जा चुकी हैं।
काटेपूर्णा स्टेशन की बगल में इसी नाम की नदी है और लंबा पुल भी है। यह नदी पता नहीं कहाँ से आती है, लेकिन इस पर कई बांध हैं और विदर्भ को ये बांध जीवन देते हैं। उत्तर में चलती हुई यह नदी बैतूल की तरफ से आती पूर्णा नदी में मिल जाती है। और पूर्णा जा मिलती है तापी नदी में - भुसावल के पास, हतनूर बांध बनाती हुई।
मुर्तिजापुर में ट्रेन कुछ ही सेकंड रुकी और आगे चल दी। उधर नरेंद्र शेलोकर भी बडनेरा पहुँच चुके थे और इस ट्रेन की व मेरी प्रतीक्षा कर रहे थे। वे इधर के ही रहने वाले हैं और आज मेरे साथ बडनेरा से नरखेड़ जायेंगे और नागपुर भी जायेंगे। मैं नागपुर रुक जाऊँगा और वे कोई ट्रेन पकड़कर लौट आयेंगे।
एक स्टेशन है - माना। उधर छत्तीसगढ़ में भी रायपुर-अभनपुर के बीच में नैरोगेज की लाइन पर माना स्टेशन था। छत्तीसगढ़ वाला स्टेशन मई 2017 में ही बंद हुआ है। इसका अर्थ है कि मई 2017 से पहले देश में माना नाम के दो स्टेशन थे। कहते हैं कि समान नाम के दो रेलवे स्टेशन नहीं हो सकते, लेकिन मेरी जानकारी में चार नाम ऐसे हैं जिन पर दो-दो स्टेशन हैं - नंबर एक, श्रीनगर - राजस्थान में और जम्मू-कश्मीर में। नंबर दो - सिलाखेडी, हरियाणा में और मध्य प्रदेश में। नंबर तीन - भौंरा, राजस्थान में और झारखंड़ में। और चौथा माना, महाराष्ट्र में भी और छत्तीसगढ़ में भी। हालाँकि भौंरा स्टेशन की अंग्रेजी वर्तनी में फ़र्क है, लेकिन बाकी स्टेशनों की वर्तनी में अंग्रेजी में भी कोई फ़र्क नहीं है।
बड़नेरा में नरेंद्र शेलोकर मिल गए। हाथ मे एक थैला, इसमे खाना है। आते ही कहा, “नीरज भाई, आप रात भुसावल डोरमेट्री में रुके थे। मैं आपको रात ही बता देता तो आप डर जाते। वो जगह बहुत डरावनी है।” सुनते ही मेरा मुँह खुला रह गया। वास्तव में अगर वे इस बारे में रात ही बता देते तो मैं वहाँ कतई नहीं रुकने वाला था।
अब हम एक ऐसी रेलवे लाइन पर यात्रा करने वाले हैं, जो भारत की नवीनतम रेलवे लाइनों में से एक है। कुछ ही समय पहले बडनेरा-नरखेड़ लाइन खुली है। यह मुख्यतः दक्षिण भारत और उत्तर भारत के बीच चलने वाली मालगाड़ियों के लिये बनायी गयी है। इसके बन जाने से मालगाड़ियों को नागपुर के अति व्यस्त स्टेशन से होकर नहीं गुजरना पड़ता। बडनेरा से अमरावती तक बहुत पुरानी लाइन है। अब अमरावती स्टेशन शहर के बीच में है, इसलिये अमरावती से आगे रेलवे लाइन ले जाना संभव नहीं था, तो अमरावती शहर से बाहर ही बाहर यह लाइन बनायी गयी है और पहला ही स्टेशन है - नया अमरावती। मराठी में ‘नवीन अमरावती’। यहाँ हमारी ट्रेन की जोड़ीदार ट्रेन यानी नरखेड़-भुसावल पैसेंजर क्रॉस हुई।
इतने में हमने खाना खा लिया। शाही पनीर और दाल। मिर्चें इतनी तीखी कि कानों से धुआँ निकलने लगा। हालाँकि दाल में नमक नहीं था। ऊपर से डालना पड़ा।
वलगाँव ही पहुँचे थे कि नरेंद्र को अपने यहाँ एक इमरजेंसी आ पड़ी। उन्हें लौटना पड़ा। मामला गंभीर ही होगा, अन्यथा कोई ऐसे नहीं लौटता। लेकिन जाते-जाते बता गए कि खेतों में सोयाबीन के साथ अरहर की दाल बो रखी है।
चांदुर बाजार - बड़ी तेज नींद आ रही है। ऐसे में मुझे आती भी है। सुबह जल्दी उठना और पिछले सात घंटो से रेलयात्रा करना। वो भी भीड़ में खड़े-खड़े। अब ट्रेन खाली हुई तो बैठना मिला। बाहर धूप निकली है। पेट भरने के बाद नींद आती ही है। अगर सो गया तो कई स्टेशन निकल जाएंगे।
नागझरी नदी। पीछे एक स्टेशन था - श्री क्षेत्र नागझरी। क्या इसका और उसका कोई सम्बन्ध है? या बस ऐसे ही?
बायीं तरफ पहाड़ियाँ दिख रही हैं। सतपुड़ा की पहाड़ियाँ। वो मध्य प्रदेश है। मध्य प्रदेश में पहाड़ियों पर जो गाँव होंगे, क्या उन्हें ट्रेन दिख रही होगी? ज़रूर दिख रही होगी। अगर वे पहाड़ियाँ न होतीं तो क्या पता इस नरखेड़ लाइन को सीधे बैतूल से जोड़ दिया जाता। ज्यादा दिन थोड़े ही हुए हैं इस लाइन को बने हुए!
अच्छी लग रही हैं पहाड़ियाँ। बीच मे हरे खेत। आपको हरे भू-भाग देखने का शौक है तो मानसून का इंतज़ार करना चाहिए। हरे रंग की इतनी वैरायटी मिलेंगी कि आप हैरान रह जाएंगे। अभी नरेंद्र मुझे बता रहे थे कि सोयाबीन के बीच मे दाल बो रखी है। सोयाबीन की भी हरी पंक्तियाँ और दाल की भी हरी ही पंक्तियाँ। तो उन्हें यह समझाने में बड़ी मशक्कत करनी पड़ी कि कौन-सा हरा सोयाबीन है और कौन-सा दाल। वे तो आसानी से बता रहे थे, लेकिन मैं आसानी से नहीं समझ रहा था। मुझे तो हरा ही हरा दिख रहा था सब।
हिवरखेड़ - पहाड़ियाँ और नजदीक आ गयी हैं। कितना अलग-सा लगता है, जब आपके एक तरफ पर्वत श्रृंखला हो और दूसरी तरफ विशाल मैदान। सतपुड़ा के पर्वतों के अगल-बगल ट्रेन चल रही है। एक तरफ मध्य प्रदेश, दूसरी तरफ दक्कन के पठार का उत्तरी सिरा। दूर तक मैदान ही मैदान। यह संतरे का इलाका है, सोयाबीन का इलाका है। और मध्य प्रदेश के पहाड़ों में कौन-सी फसलें हैं? कल देखेंगे।
मोर्शी और वरुड़ का ज़िक्र न करूँ तो महाराष्ट्र के मित्र बहुत मारेंगे। नरेंद्र भाई ने अल्प समय में ही मोर्शी व वरुड़ के बारे में इतना बता दिया था कि मैं इनका इंतज़ार करने लगा था। वरुड़ स्टेशन का तो नाम ही ‘वरुड़ ऑरेंज सिटी’ है। कहते हैं कि वरुड़ का संतरा इतना बेहतरीन होता है कि भारत में नहीं मिलता, सीधा निर्यात हो जाता है। मुझे पेड़ों पर संतरे तो नहीं दिखे, लेकिन पेड़ देखकर ही आनंद मना लिया।
ठीक समय पर ट्रेन नरखेड़ पहुँच गयी। ज़ाहिर है कि अब यह नरखेड़ जंक्शन बन गया है। ट्रेन से उतरकर सबसे पहला काम किया इंजन देखना। पूरा मार्ग इलेक्ट्रिक है, फिर ट्रेन क्यों डीजल इंजन से आयी? चार दिन पहले भी मैने यह ट्रेन देखी थी डीजल इंजन से चलती हुई। और कटनी का इंजन था।
2008 का जून का महीना था, जब मैं पहली बार इधर आया था। सिकंदराबाद जा रहा था और ट्रेन थी दक्षिण एक्सप्रेस। निज़ामुद्दीन से रात को चलकर सुबह यह ट्रेन झाँसी पहुँचती है और शाम को नागपुर। मैं उस दिन झाँसी से नागपुर तक खिड़की पर ही बैठा रहा था और समूचा मध्य प्रदेश देख डाला था। तब नरखेड़ भी देखा था। बड़ा आनंद आया था। पहाड़ी मार्ग है। लेकिन वह सुपरफास्ट ट्रेन थी। पैसेंजर ट्रेनों का चस्का लगा तो सोच रखा था कि इस मार्ग पर यानी नागपुर-इटारसी मार्ग पर पैसेंजर ट्रेन में भी यात्रा करूँगा। इसीलिये अब मैं नरखेड़ से नागपुर जा रहा था। कल सुबह इटारसी पैसेंजर पकडूँगा।
टिकट लेकर ट्रेन का इंतज़ार करने लगा। इटारसी की तरफ से संघमित्रा एक्सप्रेस आ रही थी। यह ट्रेन यहाँ नहीं रुकती, तो पूरी स्पीड़ पर थी। तभी गायों का एक झुंड़ रेलवे लाइन पार करने लगा। ड्राइवर ने सीटी बजानी शुरू कर दी। ब्रेक भी लगाए होंगे, लेकिन चलती ट्रेन एकदम थोड़े ही रुक जाती है? उधर एक गाय ट्रैक के बीचोंबीच रुक गयी। उसे कुछ मिल गया, खाने लगी। मुझे यमराज दिखने लगे, जो गाय के पास ही थे। सभी यात्री देखते रहे। मैं भी बैठा-बैठा जड़ हो गया। टक्कर अवश्य लगेगी। गाय वही गिर पड़ेगी या टक्कर के बाद उछलकर दूर जा पड़ेगी। जब ट्रेन सिर पर आ चुकी, गाय को भी आभास हुआ। भयंकर तेजी दिखायी उसने और उछलकर पटरियों से बाहर हो गयी। बाल-बाल बचने में भी कुछ गैप रहता होगा, लेकिन यहाँ तो वो गैप भी नहीं था। मैंने नज़र घुमाकर प्लेटफार्म पर बाकी यात्रियों को देखा। दो हट्टे-कट्टे नौजवान यात्री नीचे उकडू बैठे थे। अवश्यम्भावी दुर्घटना देखने की कल्पना से वे इतने विचलित हो गए कि खड़े नहीं रह सके।
छोटा भाई धीरज असिस्टैंट लोको पायलट है। बताता है कि गायें अगर ट्रैक पर खड़ी हैं तो आसानी से हटती नहीं हैं। अपनी कुछ ही महीनों की नौकरी में उसने पंद्रह-सोलह गायें कटती देखी हैं।
थैंक गॉड़, मैं लोको पायलट नहीं बना। इंजन में फँसी कटी हुई गाय और उसकी हड्डियाँ गिन-गिन कर मुझसे नहीं निकाली जातीं।
इटारसी की तरफ चढ़ाई है तो मालगाड़ियों में कई-कई इंजन लगाए जाते हैं। कोयले की एक मालगाड़ी में आगे एक इंजन और पीछे दो इंजन थे। इसके बाद आई मालगाड़ी में आगे दो इंजन थे - दोनो ही आसनसोल के। गाड़ी पता नहीं कहाँ जाएगी।
सवा घंटे की देरी से दक्षिण एक्सप्रेस आयी। यह एक सुपरफास्ट ट्रेन है और मैंने सुपरफास्ट का ही टिकट ले रखा था। आगे तो कई जनरल डिब्बे थे और ज्यादा भीड़ भी नहीं थी, लेकिन पीछे एक भी जनरल डिब्बा नहीं था। केवल एस.एल.आर. कोच ही थे। उसमे भी आधा विकलांगों और महिलाओं का। इसमे भयानक भीड़ थी। मुझे इस ट्रेन से जाने का इरादा त्यागने में एक सेकंड भी नहीं लगा। क्योंकि एक घंटे बाद ही जयपुर-नागपुर साप्ताहिक एक्सप्रेस आने वाली है। और वो ट्रेन एकदम खाली आएगी। जनरल डिब्बों में आराम से लेटकर जाऊँगा। अगर जयपुर-नागपुर ट्रेन न आती तो मेरे पास दक्षिण एक्सप्रेस में जाने के अलावा कोई और चारा नहीं होता। तब मैं या तो आगे वाले जनरल डिब्बों में चढ़ने के लिए दौड़ लगाता या फिर स्लीपर में चढ़कर अगले स्टेशन काटोल में फिर डिब्बा बदलता।
दानापुर-यशवंतपुर एक्सप्रेस बिना रुके निकल गयी। जनरल डिब्बे खाली ही थे। बिहार की ट्रेनों के जनरल डिब्बे अक्सर खाली नहीं रहते, तो इनका खाली रहना अचंभित भी कर रहा था और लालायित भी। लालायित इसलिए कि अगर रुक जाती, तो मैं चढ़ जाता।
और जयपुर-नागपुर एक्सप्रेस एकदम खाली थी। फिर तो नागपुर पहुँचा, चार सौ रुपये का कमरा लिया और सो गया। डिनर में क्या खाया, किस करवट सोया, नहाया; यह सब बताने की आवश्यकता नहीं।



जलंब स्टेशन और उधर खड़ी खमगाँव ट्रेन

शेगाँव



टाकली स्टेशन का सौंदर्य

बडनेरा में नरेंद्र शेलोकर जी मिले।




ट्रेन से दिखतीं मध्य प्रदेश स्थित सतपुड़ा की पहाड़ियाँ


सोयाबीन और अरहर







4 comments:

  1. तो भाई एक एक छोटी बड़ी घटना को लिखना क़ाबिले तारीफ़ है। हाँ माना पढ़कर माना गाँव याद आ गया।वही जो शायद भारत का आखिरी गांव है बद्रीनाथ के बाद।

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  2. गुरदेव मजा आ गया

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  3. अन्य रेल यात्रा की तरह यह पोस्ट भी मजेदार और जानकारी से भरा हुआ है। जहां तक वडोदरा स्टेशन से मिलता जुलता नाम की बात है। WADODRA (WDD/CR) नाम का भी एक स्टेशन है। जहां तक एक समान नाम वाले स्टेशनों की बात है। भारतीय रेल में एक समान नाम वाले लगभग एक दर्जन से ज्यादा स्टेशन हैं। जिनमें सीहोर,गांधीनगर,बेलापुर,ऊना ,महुआ,जयपुर,जूनागढ़,चन्द्रपुरा,रामनगर,श्री रामपुर,उदयपुर,दादर,पिपली,माना, श्रीनगर इत्यादि शामिल हैं।

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