Monday, December 25, 2017

सूरत से भुसावल पैसेंजर ट्रेन यात्रा



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25 अगस्त 2017
कल बडनेरा से ट्रेन नंबर 18405 एक घंटा लेट चली थी। मैंने सोचा सूरत पहुँचने में कुछ तो लेट होगी ही, फिर भी साढ़े तीन का अलार्म लगा लिया। 03:37 का टाइम है सूरत पहुँचने का। 03:30 बजे अलार्म बजा तो ट्रेन उधना खड़ी थी, समझो कि सूरत के आउटर पर। मेरे मुँह से निकला, तुम्हारी ऐसी की तैसी मध्य रेल वालों।
फिर तीन घंटे जमकर सोया। पौने सात बजे उठा तो भगदड़ मचनी ही थी। सात बीस की ट्रेन थी और अभी नहाना भी था, टिकट भी लेना था और नाश्ता भी करना था। दिनभर की बारह घंटे की पैसेंजर ट्रेन में यात्रा आसान नहीं होती। कुछ ही देर में आलस आने लगता है और अगर बिना नहाये ही ट्रेन में चढ़ गये तो समझो कि सोते-सोते ही यात्रा पूरी होगी। इसलिये टिकट से भी ज्यादा प्राथमिकता होती है नहाने की। टिकट का क्या है, अगले स्टेशन से भी मिल जायेगा।
पश्चिम रेलवे वाले अच्छे होते हैं। पंद्रह मिनट में टिकट भी मिल गया और नहा भी लिया। इतने में राकेश शर्मा जी का फोन आ गया। वे स्टेशन पहुँच चुके थे। जिस प्लेटफार्म पर ट्रेन आने वाली थी, उसी प्लेटफार्म पर इत्मीनान से मिले। इत्मीनान से इसलिये क्योंकि पंद्रह मिनट की मुलाकात में हमने दो-दो समोसे भी निपटा दिये, चाय भी पी और बातें भी खत्म हो गयीं। घुमक्कड़ी, घर-परिवार, काम-धाम की सब बातें साझा करने के बाद हमारी कोई बात ही नहीं बची। राकेश जी बिहार से हैं और यहाँ हीरा कंपनी में काम करते हैं। समय मिलते ही घूमने निकल जाते हैं। इन्होंने बताया कि सापूतारा का कुछ हिस्सा महाराष्ट्र में है और गुजराती लोग वहाँ हिल-स्टेशन की वजह से नहीं जाते, बल्कि दारू पीने जाते हैं।
अगर कोई गुजराती आपसे कहे कि वे तो हर सप्ताह माउंट आबू घूमने जाते हैं या सापूतारा जाते हैं या दीव घूमने जाते हैं, तो विचलित मत होना, जलना मत। वे असल में पीने जाते हैं। वाकई गुजरातियों को कितनी परेशानी होती है! मैं भारत सरकार से आग्रह करता हूँ कि गुजरात के प्रत्येक जिले में एक ठेके भर की जगह को केंद्र शासित प्रदेश बना दिया जाये। साथ ही गुजरात सरकार से भी कहूँगा कि ऐसे सभी केंद्र शासित प्रदेशों के बाहर पुलिस खड़ी कर दी जाये और जो भी कोई ठेके से बाहर निकले, उसके मुँह में वो साँस सूँघने वाली मशीन लगाकर उसका चालान काट दिया जाये।
ट्रेन आकर लग गयी, लेकिन इसे डीजल शंटर धकेलकर ला रहा था। ऐसा लग रहा था जैसे ट्रेन आना ही न चाहती हो। इसका मालिक बिजली का इंजन बाद में आयेगा। शंटर इसे प्लेटफार्म पर छोड़कर चला गया। कुछ ही देर में फिर लौटा, एक-दो और डिब्बों के साथ। ये डिब्बे असल में मुंबई सेंट्रल से अहमदाबाद पैसेंजर के साथ जुड़कर आये थे और अब हमारी ट्रेन में जुड़कर नंदुरबार जायेंगे। इन्हें भी छोड़कर शंटर चला गया। और इसके बाद आया बिजली का इंजन। ट्रेन आधे घंटे लेट तो ज़रूर हुई, लेकिन एक बार चली तो सीधे उधना जाकर ही दम लिया।
उधना में पोरबंदर-कोचुवेली एक्सप्रेस ऐसी निकली, जैसे इसके पीछे कोई पड़ा हो। वटवा का डीजल इंजन, और खच-खच-खच-खच करता हुआ दौड़ने के ऐसे शोर मचा रहा था, मानों कह रहा हो - हट जाओ, वरना उड़ा दूँगा। कोंकण रेलवे से होकर ट्रेन जाएगी। वटवा अर्थात अहमदाबाद का इंजन भी लगे हाथों केरल, गोआ घूम आएगा। फिर वापस आकर बिजली के इंजनों से कहता रहेगा - गोआ घूम कर आया हूँ। होंगे तुम तीव्रगामी, मितव्ययी अपने घर के; लेकिन गोआ जाना तुम्हारे बस में ना है। गोआ तो हम ही जा सकते हैं, खर्चीले और धुआँ उड़ाने वाले।
उधना के बाद सिंगल लाइन है। डबल का काम चल रहा है।
नियोल स्टेशन पर ट्रेन नहीं रुकी, लेकिन भविष्य में कभी रुका करेगी।
चलथान के बाद डबल लाइन शुरू हो गयी। यह लाइन पहले सिंगल ही थी। अब काफी हद तक डबल हो चुकी है। जहाँ नहीं हुई, वहाँ एक-दो सालों में हो जायेगी।
गंगाधरा में भुसावल-सूरत नाइट पैसेंजर की क्रॉसिंग हुई। WAG-5A इंजन लगा था। यह थ्योरटीकली मालगाड़ियों का इंजन होता है। मालगाड़ियों का इंजन पैसेंजर ट्रेनों में क्यों लगा देते हैं? बुड्ढा हो जाता है, इसलिए? या इनका भी गार्ड, लोको पायलट की तरह प्रमोशन होता है!
बारदोली का नाम किसने नहीं सुना? हाथ उठाओ, जिसने नहीं सुना। कोई बात नहीं, मैं बता देता हूँ। सबको विकीपीडिया देखने की ज़रूरत नहीं। 1926 में बारदोली सत्याग्रह हुआ था। अंग्रेजों ने लगान बढ़ा दिया था, उसी की प्रतिक्रिया-स्वरूप। यहीं से वल्लभ भाई पटेल जी को ‘सरदार’ की उपाधि मिली। तो इस प्रकार बारदोली एक ‘हिस्टोरीकल प्लेस’ है।
टिम्बरवा में खमण वाले ट्रेन में चढ़ लिए। प्रत्येक डिब्बे में एक। जैसे पहले ही तय कर रखा हो कि किसे-किसे किस-किस डिब्बे में चढ़ना है। बेचने का तरीका आकर्षक था - “लेओ जी लेओ, दस का किलो, दस का किलो।” आपकी जानकारी के लिये बता दूँ कि खमण-ढोकले किलो में नहीं बिका करते। बस, तरीका था उसका। अख़बार के टुकड़े पर भर-भर कर रखता। लगभग सभी ने लिया। शौचालयों के बीच मे बैठे भिखारी ने भी, नए चकाचक कपड़े पहने बाल-बच्चों वालों ने भी और मैने भी। खमण-ढोकला तो मेरी पसंदीदा लिस्ट में है। इधर खमण-ढोकला, उधर वडापाव, उधर इडली-डोसा और उधर समोसा। भारत वाकई विविधताओं का देश है।
मंगरोलिया एक हाल्ट है। गाड़ी मेन लाइन पर ही रुकती है और रुकते ही चल देती है।
व्यारा। “दस रुपिया, दस रुपिया है। खमण वाला है, ढोकला वाला है। खमण ढोकला है। ताजा ताजा है। खत्म होने को है। फिर नहीं मिलेगा। खलास होने को है।” एक आदमी हिंदी में खमण बेच रहा था। गुजरात राज्य, महाराष्ट्र नज़दीक, हिंदी बहुत दूर। यही मज़ा है रेलयात्राओं का। आपके जिस सहयात्री को हिंदी नहीं आती, आप उससे भी हिंदी में बतिया सकते हैं। एक लोकल ट्रेन में, जो गुजरात से महाराष्ट्र तक का सफर तय करती है, हिंदी के साथ। और कोई भी असहज नहीं है। भाषाओं को लेकर जहाँ भी विवाद होता है, सब राजनीति-जनित है। जिसकी राजनीति नहीं चल रही, वो मराठी, कन्नड़, तमिल के नाम पर लोगों को अलग कर रहे हैं।
कीकाकुई रोड। यहाँ से दोनों तरफ पहाड़ियाँ दिखने लगीं। पश्चिमी घाट का उत्तरी भाग। स्टेशन के दक्षिण में पूर्णा वाइल्डलाइफ सेंचुरी है, तो उत्तर में तापी पार शूलपाणेश्वर सेंचुरी।
डोसवारा। गुजराती और अंग्रेजी में डोसवाडा लिखा है। हिंदी में ‘डोसवारा’ पता नहीं किसके दिमाग की उपज है।
इसके बाद उत्तर में पानी ही पानी दिखने लगा। नक्शा खोलकर देखा तो पता चला कि तापी नदी पर बाँध बना है। बहुत बड़ा बाँध है। इधर ही बगल में महाराष्ट्र है। यहाँ से आगे बड़ी दूर तक ट्रेन कई बार महाराष्ट्र और गुजरात में आना-जाना करती है। इधर बाँध हुआ, गर्म गुजरात में ठंडा-ठंडा कूल-कूल। फिर वाइल्डलाइफ सेंचुरी है, ठंडी-ठंडी, कूल-कूल। 'पिकनिक' मनाने आते होंगे गुजराती यहाँ तो।
क्या हर बार दारू का ज़िक्र करना पड़ेगा?
लक्कड़ कोट पता नहीं गुजरात में है या महाराष्ट्र में। गूगल मैप में एकदम सीमा पर दिखाया है। फिर भड़भुंजा गुजरात में है और नवापुर तो दोनों राज्यों में है ही। गुजरात महाराष्ट्र सीमा पर स्थित स्टेशन। बताते हैं कि आधा गुजरात मे है, आधा महाराष्ट्र में। विमलेश जी ने एक फोटो भेजा था, जिसमे स्टेशन पर ही एक जगह इस बारे में लिखा था। मैं उस स्थान को ढूंढ़ता रहा, नहीं मिला। सिंगल लाइन के जमाने में यहाँ दो ही प्लेटफार्म होते थे। डबल लाइन हुई तो तीन प्लेटफार्म हो गए। स्टेशन की इमारत भी नयी बनायी गयी और पुरानी इमारत के स्थान पर तीसरा प्लेटफार्म बनाया गया। इसी अदला-बदली में वो बोर्ड भी हट गया होगा।
तो अब हम महाराष्ट्र में प्रवेश कर गए। मोबाइल में ‘वेलकम टू महाराष्ट्र’ का संदेश आने ही वाला है।
खमण ढोकले का स्थान मूंगफली ने ले लिया। नदियाँ पानी से लबालब हैं। बाकी साल इनमे पानी नहीं रहता।
यह क्या? कोलदा नाम के दो स्टेशन???? एक तो नवापुर से 4 किलोमीटर आगे अर्थात रेलवे के 103 किमी पर और दूसरा इससे 5 किमी आगे अर्थात 108 किमी पर। समय के साथ स्टेशन खिसकते रहते हैं, लेकिन यह तो ज्यादा ही हो गया। देश मे एक ही नाम के और भी स्टेशन हैं, लेकिन इतना नज़दीक पहली बार देखे। और दोनों ही स्टेशनों पर ट्रेन रुकी। आपके लिए यह भले ही ‘छोड़ो, जाने दो’ वाली बात हो, लेकिन मेरे लिए तो अचरज भरी बात है।
चिंचपाडा में फाटक पर गाड़ियों की बड़ी लंबी लाइन थी। शायद काफ़ी देर से फाटक लगा होगा। इनमे महाराष्ट्र परिवहन की वापी-धुले बस भी खड़ी थी।
खातगाँव में घसियारियों ने अपने-अपने गट्ठर ट्रेन में भर दिए। मुझे बड़ी खुशी होती है ऐसे नज़ारे देखकर। अगर वे मेरे नज़दीक होतीं, तो मैं उनकी सहायता भी कर देता और उनके गट्ठरों को शौचालयों के बीच मे ठूँस भी देता, भले ही वे इसके लिए तैयार न होतीं। अगले स्टेशन खंडबरा में लकड़ी के गट्ठर वाली मिलीं। फोटो खींचते देख वे हँस भी पड़ीं। ले जाओ, खाली पड़ी है ट्रेन। वैसे भी पैसेंजर ट्रेनें समाज सेवा के लिए ही चलायी जाती हैं।
“ओये, बीड़ी।” इतना कहते ही वो घबरा गया और जलती बीड़ी को मुट्ठी में छुपाकर उठकर चला गया। अचानक मुझे बीड़ी की गंध आने लगी थी। इधर झाँका तो मूंगफली बेचने वाला आराम से बैठकर बीड़ी पी रहा था। हालाँकि वो पढ़ा-लिखा नहीं रहा होगा और ऊँचे खानदान का तो कतई नहीं। फिर भी वो जानता था कि ऐसे बीड़ी पीना गलत है। पहले जब कानून नहीं बना था, तो कोई कहीं भी बीड़ी सिगरेट पी लिया करता था। भले ही आपको कितनी भी परेशानी हो। और अब कानून बन गया है, तो सब बचकर पीते हैं। अब एक कानून और बन जाना चाहिए। गुटखा तमाखू चबाने का कानून। डिब्बे का वाशबेसिन इन लोगों ने भर रखा है और वह चोक हो गया है। हर कोने में लाल पिचकारी है। जब मैं दिल्ली में मेट्रो की लिफ्ट में ऐसे निशान देखता हूँ, तो खून खौल उठता है। और जब सामने वाला मुँह में गंद घोलकर ऊपर मुँह करके बात करता है, तब भी बहुत गुस्सा आता है। तो बस, यही दिली इच्छा है कि इसका कानून भी बन जाये।
खांडबारा में दो ट्रेनें क्रॉस हुईं - चेन्नई-अहमदाबाद नवजीवन एक्सप्रेस और दरभंगा-अहमदाबाद जनसाधारण एक्सप्रेस। नवजीवन में रोयापुरम का इंजन लगा था। रोयापुरम पढ़ते ही मेरा रोंया रोंया खिल उठता है। क्यों? क्योंकि दक्षिण भारत मे पहली ट्रेन 1854(?) में चेन्नई सेंट्रल से रोयापुरम तक ही चली थी। और उधर जनसाधारण एक्सप्रेस में सभी जनरल डिब्बे थे, दीन दयालु कोच।
आज गणेश चतुर्थी थी और महाराष्ट्र का यह महाराष्ट्रीय त्यौहार होता है। इसकी देखा-देखी देश के दूसरे हिस्सों में भी यह मनाया जाने लगा है। उत्तर भारत मे गणेश चतुर्थी नहीं मनायी जाती थी, लेकिन अब गाँवों तक मे गणेश पंडाल व गणेश विसर्जन दिखने लगा है। यह सब हिंदी फिल्मों का असर है। हिंदी फिल्में जहाँ गैर-हिंदी इलाकों में हिंदी को बढ़ावा दे रहीं हैं, वहीं हिंदी पट्टी में गणेश चतुर्थी मनवा रही है। क्या कहा? मुझे क्यों आपत्ति हो रही है? अजी नहीं, मुझे कोई आपत्ति ही नहीं है। जब तक इन मामलों में राजनीति नहीं घुसती, तब तक ये स्वस्थ रहेंगे। राजनीति घुसते ही इनका बेड़ागर्क होने लगेगा।
20 मिनट यहाँ ट्रेन रुकने के बाद ताप्ती गंगा एक्सप्रेस पास हुई। ताप्ती मतलब सूरत और गंगा मतलब सप्ताह में पाँच दिन छपरा व दो दिन भागलपुर। आज यह कहाँ जा रही है, मुझे नहीं पता। सूरत स्टेशन पर सुबह प्लेटफार्म 4 पर हमारी ट्रेन खड़ी थी। उसी समय प्लेटफार्म पर लाइन लगने लगी। मैंने राकेश से पूछा। उसने बताया, “ताप्ती गंगा वालों की लाइन है। सीजन में तो रात में ही लाइन लग जाती है, सुबह चलने वाली ट्रेन को पकड़ने के लिए।” ये जनरल डिब्बे वाले यात्री होते हैं। धक्कामुक्की न हो, इसलिए पुलिस लाइन लगवा देती है। पहले आओ, पहले जनरल डिब्बे में घुसो।
भादवड। भई देखो, सबको पता है कि बीच वाली लाइनें मेन लाइन होती हैं। डबल ट्रेक है, एक अप लाइन, एक डाउन लाइन। इनके दोनों तरफ एक-एक लाइनें और हैं, जिन पर प्लेटफार्म हैं। किसी ट्रेन को आकर रुकना है, तो वो प्लेटफार्म वाली लाइन पर आकर रोक दी जाएगी। जिसे नहीं रुकना, उसे मेन लाइन से स्पीड कम किये बिना निकाल दिया जाता है। जस्ट सिम्पल! लेकिन यहाँ कई स्टेशनों पर बीच मे दो लाइनें होने के बावजूद भी प्लेटफार्म वाली लाइनों को मेन लाइन बना रखा है। ऐसे में यहाँ न रुकने वाली ट्रेनों को अपनी स्पीड कम करनी होती है। ज्यादा समय नहीं हुआ, जब यह पूरा मार्ग सिंगल था। डबल बनाया तो ऐसे ही कर दिया। जबकि बड़ी आसानी से बीच वाली लाइन को बिना मोड़ दिए, बिना क्रॉस-ओवर दिए मेन लाइन बनाया जा सकता था।
अब क्या यह सब भी मुझ बेचारे दसवीं पास को ही बताना पड़ेगा?
नंदुरबार। यहाँ से ट्रेन 14:20 बजे चलेगी। आलू-बड़े खाकर लेट गया। सामने वाली सीट पर एक और यात्री आ बैठा, “भुसावल कितने बजे पहुँचेगी?” मैंने बता दिया कि रात आठ बजे पहुँचेगी। यह मिर्जापुर का रहने वाला था। काम की तलाश में पहले मुंबई गया, फिर सूरत। एक दिन में नए शहर में भला किसी को काम मिलता है? इसे भी नहीं मिला, तो निराश हो गया। अब भुसावल जा रहा है। वहाँ इसका कोई मित्र रहता है। वो इसे काम दिलाएगा। नहीं मिलेगा, तो मिर्जापुर लौट जाएगा।
उधर अहमदाबाद से चेन्नई जाने वाली नवजीवन एक्सप्रेस आ गयी। इसके यही डिब्बे चेन्नई जाकर चेरन एक्सप्रेस बनकर कोयम्बटूर भी जाते हैं। डिब्बों पर ही लिखा था, अन्यथा मुझे आकाशवाणी थोड़े ही सुनायी देती है।
फिर सूरत-अमरावती एक्सप्रेस आ गयी। मेरी ट्रेन के बहुत सारे यात्रियों को यह ले जाएगी। हालाँकि पैसेंजर टिकट धारक एक्सप्रेस में नहीं यात्रा कर सकते; लेकिन जिसे थोड़ी भी जल्दी हो, वे ऐसा नहीं देखते। फिर नंदुरबार वाले यात्री तो एक्सप्रेस का टिकट भी लेंगे और एक्सप्रेस में चढ़ेंगे भी। वैसे भी कुछ ही दिन पहले यह एक पैसेंजर गाड़ी थी। रेलवे ने इसे एक्सप्रेस का दर्जा दे दिया, बाकी सब वही का वही रहने दिया।
नंदुरबार में मुंबई सेंट्रल से आने वाला स्लीपर क्लास का डिब्बा हटा दिया गया। भुसावल से पैसेंजर ट्रेन आने ही वाली है, उसमें इसे जोड़ दिया जायेगा। यह फिर से दूसरे नंबर से मुंबई के लिये रवाना हो जायेगा।
इसके बाद सिंगल लाइन है। डबल का काम जारी। आगे के स्टेशन हैं - चौपाले, तिसी, रनाला, दोंडाईचा, विखरण, सोनशेलु, सिंदखेड़ा, होल, नरडाणा, बेटावद, पाडसे, भोरटेक, अमलनेर, टाकरखेडे, भोणे, धरणगाँव, चावलखेडे, पालधी और जलगाँव जंक्शन।
ट्रैक डबलिंग का काम बड़े भयंकर तरीके से चल रहा है। सभी स्टेशनों पर कुछ न कुछ हो रहा है। नयी इमारत बन रही है। नए ऊँचे प्लेटफार्म बन रहे हैं। लेकिन ज्यादातर स्थानों पर मेन लाइन को ही प्लेटफार्म वाली लाइन बना रहे हैं। ओये नीरज, तू क्यों इतना सोच विचार कर रहा है? वे कुछ सोच समझकर ही ऐसा कर रहे होंगे। तू दसवीं पास नहीं समझेगा इन बातों को। आगे बढ़। देख, वो नानखटाई वाला आ रहा है। दो स्टेशन पहले यही इंसान दस की पाँच बेच रहा था। अब दस की छह दे रहा है। सही है। लेकर रख ले बीस-तीस रुपये की। आगे काम आ जाएंगी।
जी, ठीक है। ले लूँगा। जब दस की सात देगा, तुरंत ले लूँगा।
ओये लालची, तू नहीं सुधरेगा।
आलू-बड़ा दस के चार। अब भला क्यों न लूँ? पीछे दस के दो खाकर आया था। यहाँ चार मिल रहे हैं, तो क्यों छोडूँ? लिए तो ये आलू-बड़े न होकर आलू-छोटे निकले।
नरडाणा में हिंदी में उद्घोषणा हुई - “यात्रीगण कृपया ध्यान दें। प्लेटफार्म एक पर खड़ी गाड़ी सूरत-भुसावल पैसेंजर रवाना होने वाली है। कृपया अपना-अपना स्थान ग्रहण करें।’ किसके समझ मे आयी होगी यह उद्घोषणा? इस लोकल ट्रेन में हिंदी भाषी यात्री हैं ही कितने? तो क्या उनके लिए उद्घोषणा की गयी है या स्थानीय मराठी भाषियों के लिए। लेकिन मेरा भारत ऐसा ही है। बल्कि मैं तो चाहूँगा कि दिल्ली के सभी स्टेशनों पर राजधानी होने के नाते बारी-बारी से सभी भाषाओं में उद्घोषणा हो। दो मंजिल ऊँचा स्टेशन बोर्ड हो; जिसमे हिंदी, अंग्रेजी के साथ साथ गुजराती, तमिल, तेलगू, कन्नड़, मलयालम, उड़िया, बंगाली, असमिया सभी भाषाओं में स्टेशन का नाम लिखा हो। जब गैर-हिंदी स्टेशनों में हिंदी चलती है, तो हिंदी स्टेशनों में भी गैर-हिंदी चलनी चाहिए। आज बंगलुरू में मेट्रो स्टेशनों पर हिंदी लिखने का विरोध हो रहा है, केवल इसलिए कि उन्हें पढ़ेगा-समझेगा कौन? बात एकदम सही है। बंगलुरू में कितने होंगे, जिन्हें सूचना हिंदी में ही चाहिए? उन्हें लगेगा ही कि हिंदी अतिक्रमण कर रही है। और कन्नड़ क्यों उसे स्वीकारे? अगर कल कन्नड़ को राष्ट्रभाषा बना दिया जाए तो क्या हम हिंदी वाले उसे स्वीकारेंगे? बिल्कुल भी नहीं। तो जी, बेहतर यही है कि हिंदी भी राष्ट्रभाषा है और कन्नड़, तमिल भी। आपको बंगलुरू मेट्रो में अगर हिंदी चाहिए, तो पहले दिल्ली मेट्रो में कन्नड़ को स्थान देना होगा। चेन्नई में हिंदी को सम्मान देना है, तो पहले दिल्ली में तमिल को सम्मान देना होगा।
यही सब चलता रहता है पैसेंजर ट्रेन में बैठकर। मोबाइल चार्जिंग वाला एक डिब्बा मिल गया है, अन्यथा पैसेंजर ट्रेनों में, जनरल डिब्बों में चार्जिंग कहाँ होती है? मोबाइल चार्जिंग पर लगा रखा है और अंगूठे व स्क्रीन की भिड़ंत कराए जा रहा हूँ। पहले लेखक कलम घिस कर बनते थे। अब स्क्रीन घिसकर बनते हैं।
पाडसे में अमरावती-सूरत एक्सप्रेस क्रॉस हुई। पहले यह ट्रेन पैसेंजर होती थी।
इसके बाद डबल लाइन शुरू हो गयी।
अमलनेर - आवाज आई “दस के आठ, दस के आठ।” मैं बेचैन हो उठा। ये दस के आठ क्या थे, पता नहीं चल सका। कुछ खाने का ही होगा। कुछ देर आवाज ही आती रही, फिर ट्रेन चल पड़ी। आवाज भी आनी बंद।
जलगाँव से पहला ही स्टेशन है पालधी। ट्रेन एकदम सही समय पर पहुँची, चली भी सही समय पर। लेकिन जलगाँव के आउटर पर ऐसी खड़ी हुई कि पचास मिनट लेट हो गयी। और भुसावल पहुँचते-पहुँचते डेढ़ घंटे लेट हो चुकी थी। जलगाँव पहुँचते ही मेरा काम समाप्त हो गया था, अब तो कभी भी भुसावल पहुँचे। वहाँ मेरी बुकिंग है ही विश्रामालय में।


दस्स रुपये... दस्स रुपये...


तापी नदी पर बना बांध









नंदुरबार और जलगाँव के बीच में दोहरीकरण का काम चल रहा है।







3 comments:

  1. सरजी आपके ब्लॉग पे हमेशा उत्तर भारत हिमालय कश्मीर के बारे में पड़ा, आज अपनी जगह के बारे में पड़ कर दिल खुश हो गया,
    मेरी गलती थी जो आपकी fb पे सूरत भुसावल पैसेंजर की यात्रा की पोस्ट पढ़ लेता तो शिंदखेड़ा में मुलाकात हो जाती 8 किलोमीटर से निकल गए आप इस बात का अफसोस है,

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  2. कई जानकारी से भरा हुआ पोस्ट। पिछले पोस्ट की तरह यह पोस्ट भी आप के लिखने में कुछ कुछ बदले हुये स्टाइल जैसा है और रोचकता से भरा हुआ है। जहां तक नवापुर स्टेशन की बात है। इसका पुराना स्टेशन भवन पहले दोनों राज्यों में था। गुजरात और महाराष्ट्र सीमा पर। लेकिन अब नया स्टेशन भवन ऐसा नहीं है। लेकिन इसका प्लेटफार्म अभी भी आधा गुजरात मे है और आधा महाराष्ट्र में। ऐसा वहाँ के स्टेशन मास्टर ने मुझे बताया था उस समय।

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  3. नीरज भाई, "यात्रा एक हिमालयी गांव की" के बारे में पूछना था. सीट फुल हो गयी की है अभी.मैं इंटरेस्टेड हूँ.बीवी और दो बच्चे (9 साल/साढ़े 5 साल) के साथ. कितना बुकिंग अमाउंट जमा करना है.

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