Monday, February 22, 2016

जम्मू यात्रा - 2016 (सुनील गायकवाड)

मित्र सुनील गायकवाड ने अपनी जम्मू यात्रा का संक्षिप्त विवरण ‘मुसाफिर हूं यारों’ में प्रकाशन के लिये भेजा है। सुनील जी पुणे के रहने वाले हैं। हिन्दी में अक्सर नहीं लिखते। उनकी फेसबुक पर भी मराठी ही मिलती है। गैर-हिन्दी भाषी होने के बावजूद भी आपने इतना बडा यात्रा-विवरण हिन्दी में लिखा है, इसके लिये आप शाबाशी के पात्र हैं। आपने हालांकि बहुत सारी गलतियां कर रखी थीं, जिन्हें दूर करके आपका वृत्तान्त प्रकाशित किया जा रहा है।

“मंज़िल तो मिल ही जायेगी भटकते हुए ही सही, गुमराह तो वो हैं जो घर से निकले ही नहीं।”

नमस्कार मित्रों, मेरा नाम सुनील गायकवाड़ है। मैं पुणे, महाराष्ट्र का रहने वाला हूं। सोमनाथ, गिरनार पर्वत, सूरत, लखनऊ, कोलकाता, भुवनेश्वर, जगन्नाथ पुरी, सूर्य मंदिर, चेन्नई, तिरुपति, कन्याकुमारी, अमृतसर, गोल्डन टेम्पल, वाघा बॉर्डर; इन स्थानों पर घूम कर आया हूं।
अप्रैल 2015 में लेह-लद्दाख यात्रा के बारे में जानकारी के लिए गूगल पर सर्च कर रहा था, तो "मुसाफिर हूँ यारों" - लद्दाख साइकिल यात्रा का आगाज - ये ब्लॉग मिल गया। जब मैंने पूरा ब्लॉग देख लिया तो समझ में आया कि मेरे हाथ में तो क़ीमती खजाना लगा है। पूरे देश में भ्रमण किया है नीरज जाट ने तो। हम लोग तो सिर्फ सोच सकते हैं घूमने के बारे मे, पर नीरज जी ने तो हमारे सपने जिए हैं। मैं तो नीरज जी को इंडियन बेयर ग्रिल्स (Man vs. Wild) मानता हूं। बेयर ग्रिल्स जान बचाने के तरीके बताते हैं, नीरज भाई घुमक्कडी के।
चलो अब मेरी जम्मू यात्रा के बारे में बात करता हूं। हमारा प्लान कन्याकुमारी, रामेश्वरम, तिरुपति का था; पर ट्रेन और हमारा टाईम-टेबल का मिलाप नहीं हो पा रहा था। मैंने नीरज जी के वैष्णों देवी यात्रा का विवरण पढ़ा था, तो तय किया कि "वैष्णों देवी" चलते हैं। साथ अमृतसर, शिवखोड़ी, पटनीटॉप भी जायेंगे।
रिजर्वेशन करा लिया।


12 जनवरी 2016
शाम 05:20 बजे झेलम एक्सप्रेस से जम्मू की तरफ मैं, मेरा परम-मित्र शेखर, शेखर का भाई सागर, शेखर के मामा जी और उनका लड़का सुमित; हम पांच निकल पड़े। मामाजी भी अच्छे घुमक्कड़ हैं। नेपाल, केदारनाथ, अमरनाथ आदि स्थानों पर जाकर आये थे। सागर, सुमित प्रथम बार ट्रेन से इतना बड़ा सफर कर रहे थे। शेखर मेरे साथ तिरुपति जा चुका था।
अहमदनगर से 15-20 आर्मी वाले चढ़ गए। अम्बाला कैंट जा रहे थे। उसमे जो मराठी जवान थे, हमारे साथ गप्पे लड़ाने बैठ गये। उन्हें हमारे साथ अपनापन महसूस हो रहा था। क्यों न हो, 12-12 महीनों तक छुट्टी नहीं मिलती। घर की याद तो आती होगी, फिर मराठी लोग मिल गये तो अपनापन जाहिर होगा ही।
आर्मी के किसी भी जवान से बात की तो बड़ा गर्व महसूस होता है। ऐसा लगता है जैसे प्रधानमंत्री से बात कर रहे हो।
जब तक आर्मी वाले सतर्क हैं, हम लोग सुरक्षित है।

14 जनवरी 2016
प्रथम हमें अमृतसर जाना था। सुबह 6 बजे जालंधर कैंट पर हम उतर गये। ट्रेन लेट हो गयी थी। असल में उसका सुबह 04:45 टाइम था।
पूछताछ की तो पता चला देहरादून-अमृतसर (लाहौरी) एक्सप्रेस आ रही है। वो भी लेट चल रही थी। जनरल टिकट निकाला और बैठ गये। मुझे लगा जनरल डिब्बा है, जगह नहीं होगी बैठने के लिए, लेकिन डिब्बा तो खाली पडा था, कम लोग ही सफर कर रहे थे।
बाहर अच्छी-ख़ासी ठण्ड पड रही थी। लोगों ने बताया कि कल ही बारिश हुई है, इस लिए कोहरा और ठण्ड ज्यादा है। 9 बजे अमृतसर पहुँच गये। टैक्सी की और सीधा गोल्डन टेम्पल के पास पहुँच गये। दिसम्बर 2014 में अमृतसर आया था, इस लिए मुझे मालूम था कहां जाना है। गोल्डन टेम्पल के पास ही कमरा लिया, फ्रेश हो गये। सागर पुणे से ही थोड़ा बीमार था। यहाँ आकर ठण्ड से और बीमार हो गया। उसे डॉक्टर के पास ले गये। 1 इंजेक्शन लगवा दिया।
हमें शाम को कटरा के लिए निकलना था। इसलिए बस का टिकट करवाया स्लीपर का, 260 रूपये लिए। भूख बड़ी जोर से लगी थी, लंगर में गये। चावल की खीर मुझे ज्यादा पसंद आई। मैंने आज तक इतनी टेस्टी कभी खीर खायी नहीं थी। दिल खुश हो गया।
बॉर्डर के लिए टैक्सी करवा ली। 2 बजे निकल पडे। मैं दूसरी बार बॉर्डर देखने आया था। बाकी लोग पहली बार। चेकपॉइंट पर मामाजी को चेक करते टाइम BSF का जवान चकरा गया। मामाजी ने जो जैकेट पहना था, उसमें इतनी छोटी-छोटी 12 जेबे थीं कि बेचारा परेशान हो गया चेक करते करते।
खैर, हम बॉर्डर पर पहुँच गये, बैठने के लिए सीढ़ियां बनी हुई हैं। ऊपर जा कर बैठ गये जहां से इंडिया-पाक दोनों तरफ की परेड दिखाई दे। देशभक्ति के गाने चालू थे। छोटे बच्चे डांस कर रहे थे। जोर-जोर से नारे लगाये जा रहे थे - भारत माता की जय। माहौल देशभक्ति-मय हुआ था।
परेड चालू हो गयी तो और मजा आ गया। दोनों तरफ की टाइमिंग देखने लायक होती है। दोनों तरफ के राष्ट्रध्वज एक साथ उतारे गये।
मेरा तो मानना है हर भारतीय नागरिक को जीवन में एक बार तो बॉर्डर की परेड देख लेनी चाहिए।
7 बजे हम गोल्डन टेम्पल पहुँच गये। मंदिर रात में देखने के लिए मजा आता है। दर्शन कर लिए, फोटो भी खीच लिए।
हमारी कटरा के लिए 10:30 बजे बस थी, जो 11:30 बजे निकल पड़ी। मैं तो जाते ही सो गया।

15 जनवरी 2016
सुबह 7 बजे कटरा बस अड्डे पर उतर गये। होटलों के दलालों ने हमें घेर लिया। हमें आर्मी कैंप जाना था, जो बाणगंगा के पास है। सागर का दोस्त जो पुणे में आर्मी अफसर है, उसने हमारे रहने के लिए बात की थी। वहां गये तो पता चला कि फैमिली साथ होगी तो रूम मिलेंगे। उन्होंने हमें दर्शन की पर्ची दी 5 नंबर गेट से जाने के लिए। बाणगंगा से 10 मिनट की दूरी पर हमने कमरा ले लिया 600 का। फ्रेश हो कर 11 बजे रूम से चल पडे।
बाणगंगा से चढाई चालू हो जाती है। बाणगंगा चेकपॉइंट है, यहाँ पर सामान और पर्ची चेक की जाती है। कटरा से पर्ची कटवानी होती है। हमें तो आर्मी कैंप से मिल गयी थी, इसलिए कोई दिक्कत नहीं हुई। बाणगंगा पार करते ही घोडे व खच्चर मिल गये। हम तो पहली बार माता के दरबार में आये थे, इस लिए चलते ही जाना था। एक मंदिर में भंडारा चल रहा था। हम भी गये खाना खा लिया। चढाई चालू कर दी, रास्ते में विश्राम करने व खाने-पीने की बहुत बढिया सुविधाएं हैं। थकान तो अपनी अंतिम चरम पर थी। कैसे-वैसे अर्द्धकुंवारी पहुँच गये। अर्द्धकुंवारी बीच का पॉइंट भवन - बाणगंगा का। अर्द्धकुंवारी में चाय-पानी हो गया। किसी ने कहा हिमकोटी का रास्ता आसान है। फिर हम वहां से चल दिए। अर्द्धकुंवारी में भी रहने के लिए सुविधा है। बुकिंग कटरा में करानी होती है।
हिमकोटी का रास्ता थोड़ा आसान लग रहा था। पूरे रास्ते में बन्दर ही बन्दर हैं। अगर कोई उन्हें खाने को डाल दे, तो वो आपका पीछा नहीं छोड़ेंगे।
दो हैलीकॉप्टर कटरा-सांझीछत अप-डाउन कर रहे थे। शाम 05:35 बजे भवन पहुँच गये। 5 नंबर गेट की पर्ची थी, तो 5 नंबर गेट के सामने गये। आर्मी से बात की तो उसने बताया अब आरती का टाइम हुआ है। 8 बजे ही छोड़ेंगे। ढाई घंटे क्या करे?
सुबह रूम से निकलते समय एक गलती की थी। धूप अच्छी निकली थी, इस लिए जैकिट नहीं पहना, न ही टोपी।
अब सूरज डूब गया तो ठण्ड इतनी लग रही थी कि हाथ-पैर सुन्न पड रहे थे। कैसे-वैसे चाय पीकर टाइम निकाला।
सागर बीमार था, तो उसने सुबह ही स्वेटर के ऊपर जैकिट पहना था। अचानक उसे याद आया कि उसने अंदर में स्वेटर पहना है। उसने तुरंत ही मुझे स्वेटर निकालकर दिया। तब जाकर कुछ राहत मिली। 8 बजे दर्शन फिर से चालू हो गया। 09:15 बजे माता का दर्शन हो गया।
रात 2 बजे रूम पर पहुँच गये।

16 जनवरी 2016
दोपहर 01:30 बजे कटरा से शिवखोड़ी के लिए निकल पड़े। 200 रूपये बस का किराया आने जाने का, कटरा से 85 किलोमीटर दूर है। पूरा रास्ता पहाडों से होता हुआ जाता है। शिवखोड़ी की चढाई 3 किमी की है। घोडे व खच्चर की सुविधा यहाँ पर है। शिवखोड़ी में शिव का स्थान है। गुफा के अंदर शिव जी विराजमान हैं। साथ ही 33 कोटि देवी-देवता भी विराजमान हैं। बड़ी शांत जगह है शिवखोड़ी। मनमोहक पहाड़! हम शाम के समय में गये थे, इस लिए ज्यादा आनंद नहीं ले पाये। रात में 11 बजे वापस कटरा आ गये।

17 जनवरी 2016
आज सुबह कटरा बाजार में थोड़ी शॉपिंग कर ली। हमें आज पटनीटॉप में रुकना है। कटरा से पटनीटॉप के लिए बस नहीं है। उधमपुर से जाना पड़ता है। कटरा-उधमपुर-पटनीटॉप। पटनीटॉप पर पहुँच कर 600 का कमरा लिया। ऑफ सीज़न था, इस लिए 600 में मिल गया। यहाँ पर ठण्ड तो जबरदस्त थी।

18 जनवरी 2016
सुबह होटल वालो से ही गाड़ी की बात की 4700 रुपये में, जिसमें नत्थाटॉप, नाग टेम्पल, गौरीकुंड, सुध महादेव, मानतलाई, आखिर में जम्मू में छोड़ देंगे।
11 बजे होटल से नत्थाटॉप के लिये निकल पडे। नत्थाटॉप में स्नो का आनंद उठाने के लिए लोग आते हैं। पास ही सनासर है। मैंने नेट पर पढ़ा था कि यहां पैराग्लाइडिंग के लिए लोग आते हैं। लेकिन मुझे कही दिखाई नहीं दी। अपने जीवन में हमने पहली बार स्नो देखा। मजा आया। एक घंटे बर्फ में खेलने के बाद नाग टेम्पल के लिए निकल पडे। नाग टेम्पल 600 साल पुराना मंदिर है। इसकी कथा है इच्छाधारी नाग की। इसके दर्शन करके हम निकल लिए गौरी कुण्ड की तरफ।
गौरीकुंड 1.5 किमी का ट्रैक है। यहाँ माता पार्वती शिवजी को पति रूप में पाने के लिए तप करती थीं - ऐसी कथा है। यहाँ से 3 किमी पर ही सुध महादेव मंदिर है। यहां से आगे ही मानतलाई है, यहाँ पर शिव - पार्वती का विवाह हुआ था।
रात 8 बजे जम्मू पहुँच गये। स्टेशन के सामने ही होटल में कमरा लिया।
19 जनवरी 2016
आज सब आराम से सोकर उठे। दोपहर 12 बजे रघुनाथ मंदिर के लिए निकले। पास में बस अड्डा होने के कारण तुरंत बस मिल गयी रघुनाथ मंदिर के लिये। बाजार के बीच में मंदिर है। मंदिर के चारों तरफ आर्मी जवान तैनात हैं। मंदिर में प्रवेश करते ही पंडित लोग पैसे मांग लेते हैं। फिर भगवान के दर्शन। इस जगह सभी देवी-देवता के मंदिर हैं। इसके लगभग हर मंदिर में पंडित इशारों से पैसों की मांग करते हैं, जो लज्जास्पद है।
रघुनाथ बाजार में हमने शॉपिंग कर ली।
20 जनवरी 2016
आज रात हमारी वापसी की ट्रेन है। बाहुफोर्ट देखने की इच्छा थी। पर बाहर इतनी ठंड थी कि मन नहीं किया बाहर निकलने का। फिर क्या? टीवी चालू किया - भारत-ऑस्ट्रेलिया वनडे मैच चल रहा था। विराट-धवन की बैटिंग का आनंद उठाया। आखिर मैच हार गया भारत।
रात 09:45 बजे झेलम एक्सप्रेस से जम्मू से पुणे की तरफ चल दिए। दिलो में मीठी यादें लिए।

नीरज जी की "चलो बुलावा आया है" इस यात्रा की पोस्ट पढ़कर मुझे "वैष्णों देवी", "शिवखोड़ी" के बारे में जानकारी मिली। उसी का फायदा मुझे हमारी यात्रा में मिला। धन्यवाद नीरज जी।
मैंने पहली बार हिंदी में यात्रा विवरण लिखा। अगर गलती से कुछ शब्द इधर-उधर हो गए हों, तो माफ़ कर दीजिये। धन्यवाद। जय माता दी!!




आप भी अपने यात्रा-वृत्तान्त ‘मुसाफिर हूं यारों’ पर प्रकाशन के लिये भेज सकते हैं। साहसिक वृत्तान्त हों तो ज्यादा उत्तम रहेगा। प्रत्येक फोटो 500 केबी से कम होना चाहिये। वृत्तान्त केवल neerajjaatji@gmail.com पर ही भेजें।

18 comments:

  1. बढ़िया विवरण दिया है। गागर में सागर

    ReplyDelete
    Replies
    1. धन्यवाद रोमेश जी

      Delete
  2. बढ़िया विवरण दिया है। गागर में सागर

    ReplyDelete
  3. धन्यवाद नीरज जी आपने मेरी गलतियो को सुधार कर वृत्तान्त प्रकाशित किया ।

    ReplyDelete
  4. “मंज़िल तो मिल ही जायेगी भटकते हुए ही सही, गुमराह तो वो हैं जो घर से निकले ही नहीं।” सही लिखे है

    ReplyDelete
    Replies
    1. धन्यवाद नीरजजी

      Delete
  5. “मंज़िल तो मिल ही जायेगी भटकते हुए ही सही, गुमराह तो वो हैं जो घर से निकले ही नहीं।” सही लिखे है

    ReplyDelete
  6. सुनील गायकवाड , अच्छा यात्रा विवरण, अच्छा लगा। नीरज का भी सहयोग अच्छा है। मन खुश हो गया 😊

    ReplyDelete
    Replies
    1. धन्यवाद योगेन्द्र सोलंकी साहब ,
      नीरज जी के सहयोग बिना तो हमारी यात्रा और विवरण अधूरा होता ..

      Delete
  7. Sunil ji..Bahut hi badiya Vivran tha.. Wiase AApki Raghunath Temple me Pujariyon dwara bar bar paise mangne ke bat bilkul sahi hai..Mera v anubhav waisa hi tha..

    Ek bat aur . Raghunath Mandir me Ek Shivling hai kaphi bada sa hai jiske ispar se uspar tak (Transparent) dikhta hai aur pujari kahte hai ke ye patthhar ka bana hai sishe ka nahi aur duniya ka eklauta aisa Shivling hai.. Pata nhi ye sach hai yaa jhooth..

    ReplyDelete
    Replies
    1. धन्यवाद रविकांत जी ,
      वो पुजारी ऐसा क्यों करते हे पता नहीं ? शायद पैसो की लालच ?? मुझे ऐसा अनुभव तिरुपति के आसपास के छोटे छोटे मंदिरो में आया था !
      अगर भारत के सभी मंदिरोंमें ऐसा होने लगा तो , लोग मंदिरोंमें में जाना बंद कर देंगे , अगर कोई विदेशी को ऐसा अनुभव आया तो वो क्या सोचेंगे हमारे देश के बारेमे ...????

      वो शिवलिंग तो मुझे कांच का ही प्रकार लगता हे ...
      सही क्या गलत क्या शिव ही जाने ??

      Delete
  8. अच्छा यात्रा विवरण। अच्छा लगा की मराठीभाषी होते हुए हिंदी में लेख लिखा , सच है की एक हिंदी ही है जो समस्त देशवासियों को एक सूत्र में बांधे रह सकती है।

    ReplyDelete
  9. धन्यवाद अनुराग जी ,
    सच कहा आपने हिंदी हमारी राष्ट्रभाषा हे , वो हमें एक दुसरोसे बांधे रक सकती है !

    ReplyDelete
  10. बहुत बढ़िया सुनील..... प्रथम प्रयास लिखने का अच्छा रहा |

    ReplyDelete
  11. बढ़िया विवरण दिया है........ आपका पहला प्रयास ही बड़ा जोरदार रहा । सुनील जी और नीरज जी दोनों बधाई के पात्र है। सुनील जी , मैं भी पुणे से ही हूं और हम लोग जम्‍मू दर्शन का विचार कर रहे है। आपका यात्रा विवरण्‍ा हमारे लिए बहुत उपयोगी होगा।

    इसके अलावा यह बात भी सच ही है कि हिन्‍दी भाषा में ही वह सामर्थ्‍य है जो हम हिंदुस्‍तानियों को आपस में जोड़ के रखती है। हिन्‍दी में लिखने हेतु एक बार फिर से बधाई.......

    ReplyDelete
  12. धन्यवाद स्वाति जी ,
    आपका जम्मू दर्शन का विचार अच्छा हे ,कोशिश कीजिये की मार्च में ही जानेकी ,अप्रैल ,मई में धुप ज्यादा होगी ...

    ReplyDelete