Wednesday, February 12, 2014

कश्मीर से दिल्ली

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8 जनवरी 2014 की दोपहर पौने एक बजे ट्रेन बनिहाल पहुंच गई। पौने आठ बजे ऊधमपुर से नई दिल्ली के लिये सम्पर्क क्रान्ति चलती है जिसमें मेरा वेटिंग आरक्षण है। इस तरह मेरे हाथ में पूरे सात घण्टे थे। कल ऊधमपुर से यहां आने में पांच घण्टे लगे थे। लेकिन आज मौसम खराब है, बनिहाल में बर्फबारी हो रही है, आगे पटनी टॉप में भी समस्या हो सकती है। अगर रातभर वहां बर्फबारी होती रही हो तो रास्ता भी बन्द हो सकता है। इस तरह बनिहाल उतरते ही मेरी प्राथमिकता किसी भी ऊधमपुर या जम्मू वाली गाडी में बैठ जाने की थी। सामने राजमार्ग पर अन्तहीन जाम भी दिख रहा था, जो मेरी चिन्ता को और बढा रहा था।
सुबह से कुछ भी नहीं खाया था। यहां थोडी सी पकौडी और चाय ली गई। फिर देखा कि जम्मू के लिये न तो कोई सूमो है और न ही कोई बस। समय मेरे पास था नहीं इसलिये फटाफट रामबन वाली बस में बैठ गया। आगे रास्ता खुला होगा तो रामबन से बहुत बसें मिल जायेंगीं। सीट पर बैठा ही था कि एक सूमो पर निगाह गई। ड्राइवर ऊपर सामान बांध रहा था। मैंने तेज आवाज में उससे पूछा तो उसने ऊधमपुर कहा। अब मैं क्यों रामबन वाली में बैठा रहता? पीछे वाली सीटें मिली लेकिन खैरियत यही थी कि समय से ऊधमपुर पहुंच जाऊंगा। चार सौ रुपये एडवांस में ले लिये।
यहां से निकलते ही उस अन्तहीन जाम में फंस गये। जम्मू-श्रीनगर राजमार्ग टू-लेन है जिसमें कुछ समय पहले तक एक लेन आने और दूसरी लेन जाने के लिये प्रयोग की जाती थी। लेकिन अब ऐसा नहीं है। अब यातायात इतना बढ गया है कि दोनों लेन एक ही दिशा के लिये खोली जाती हैं। एक दिन यातायात जम्मू से श्रीनगर जाता है और एक दिन श्रीनगर से जम्मू। संयोग से कल जम्मू से श्रीनगर का यातायात था, आज श्रीनगर से जम्मू का। इसके बावजूद भी कुछ स्थानीय गाडियां विपरीत दिशा में चलती हैं जिनकी वजह से जाम लगता है। एक बार जाम लग गया तो यह शीघ्र ही अन्तहीन हो जाता है।
बनिहाल कस्बे से निकले तो जाम से भी निकल गये। फिर भी जगह जगह जाम मिलते रहे। रामबन भी निकल गया और पटनी टॉप की चढाई शुरू हो गई। रामबन काफी नीचे चेनाब किनारे स्थित है, यहां बर्फ नहीं पडती। पटनी टॉप ऊपर है, वहां बर्फ पडती है। सामने से कुछ गाडियां आती दिखीं तो सांस में सांस आई कि मार्ग खुला है।
पटनी टॉप से आधा किलोमीटर पहले एकाएक गाडी में धुआं उठने लगा। ड्राइवर ने इसे बन्द कर दिया और यह सोचकर बोनट खोल दिया कि चढाई पर गाडी गर्म हो गई है। कुछ देर बाद स्टार्ट करने की कोशिश की तो यह स्टार्ट नहीं हुई। जांच की तो पाया कि इंजन के पास कुछ तार गलकर शॉर्ट सर्किट हो गये हैं। इसका इलाज यही निकला कि गाडी को वापस बटोट ले जाया जाये और वहां इन्हें ठीक कराया जाये। यहां से बटोट सात आठ किलोमीटर पीछे है और नीचे भी। गाडी बिना स्टार्ट किये वहां जा सकती है। मैंने यहीं उतरना ठीक समझा।
अच्छी खासी बर्फबारी हो रही थी। दस मिनट बाद ही एक और सूमो आई, हाथ देने से रुक गई। ऊधमपुर जाना है- यह कहकर मैं उसमें बैठ गया। लेकिन जब समय ही खराब हो अपने हाथ में कुछ नहीं रहता। शीघ्र ही यह गाडी भी बन्द हो गई। पता चला कि तेल खत्म हो गया है। गनीमत थी कि जब गाडी बन्द हुई तो पटनी टॉप से निकल चुके थे और रास्ता ढलान वाला हो गया था। पेट्रोल पम्प आठ दस किलोमीटर आगे कुद में है। इतनी दूर तक गाडी धीरे धीरे लुढकती हुई आई।
तेल भरवाया। यहां से चले तो एक महा-जाम में फंस गये। पांच बजने वाले थे। रास्ता साफ होता तो यहां से ऊधमपुर पहुंचने में एक घण्टा भी नहीं लगता। चूंकि आज सडक की दोनों लेन जम्मू जाने वाले वाहनों के लिये आरक्षित थीं इसलिये बायीं तरफ ट्रक थे और दाहिनी लेन में छोटी गाडियां सूमो और कारें। सामने से कोई गाडी आयेगी तो पहाडी मार्ग होने की वजह से वह सडक से नीचे नहीं उतर सकती थी। ऐसे में छोटी गाडियों को उसे रास्ता देने के लिये ट्रकों की लेन में घुसना पडेगा। इसी वजह से जाम लग जाता था। ऊंचाई पर होने की वजह से हमें दिखाई दे गया कि यह जाम आगे कई किलोमीटर लम्बा है। दो घण्टे एक ही जगह खडे रहे। ट्रेन पकडने की सारी उम्मीदें जाती रहीं। आरक्षण की स्थिति चेक की तो पाया कि मेरी सीट कन्फर्म हो गई थी।
साढे छह बजे जाम खुला। अभी भी सवा घण्टा था ट्रेन के चलने में। सूमो तेज चलती तो लगता कि ट्रेन पकड लूंगा। रुक जाती तो ट्रेन भी निकल जाती। मैं लगातार गूगल मैप पर अपनी स्थिति देखता चल रहा था, स्टेशन इतना किलोमीटर दूर है, इतना समय बचा है, यही गणना करने में लगा हुआ था। जो आनन्द किसी क्रिकेट मैच में तब आता है जब आखिरी ओवर बचा हो, आपको बारह रन चाहिये और आपके दो विकेट हाथ में हों, वही आनन्द अब मुझे आ रहा था। एक एक गेंद कीमती होती है, एक एक किलोमीटर और एक एक मिनट कीमती है। मामला बिल्कुल मार्जिन पर चल रहा था। तभी एक चौका मारकर एक बल्लेबाज आउट हो गया। एक डॉट बॉल चली गई। धुकधुकी बढती जा रही थी। राजमार्ग से स्टेशन काफी दूर है। मैं स्टेशन जाने वाले तिराहे पर उतर जाऊंगा और तुरन्त ऑटो पकडूंगा, वो पचास रुपये या सौ रुपये जितने भी लेगा मैं दे दूंगा। बस ट्रेन मिल जाये।
जब उस मोड से पांच किलोमीटर दूर रह गया तो मैंने ड्राइवर से कहा कि स्टेशन वाले तिराहे पर उतार देना। मेरे इतना कहने की देर थी और आखिरी बल्लेबाज भी आउट हो गया। ऐसा जाम मिला कि आधे घण्टे रुकना पड गया। जब उस तिराहे पर गाडी रुकी तो आठ बज चुके थे। ट्रेन दस मिनट पहले छूट चुकी थी। ऊधमपुर से ट्रेनें हमेशा समय पर ही छूटती हैं। मैं अब यहां उतरकर क्या करता? जम्मू चलने को कह दिया। किसी दूसरी ट्रेन से चला जाऊंगा। पौने बारह बजे जबलपुर एक्सप्रेस जायेगी। जींद, रोहतक के रास्ते जाती है, कल दोपहर तक दिल्ली पहुंचेगी।
ऊधमपुर-जम्मू मार्ग एक शानदार मार्ग है। यह एक एक्सप्रेस हाईवे है, कुछ बन चुका है, कुछ बन रहा है। पुराने रास्ते के मोडों को खत्म करके इसे यथासम्भव सीधा बनाने की कोशिश की गई है, चौडा भी काफी है। साढे नौ बजे तक जम्मू के बस अड्डे पर पहुंच गया। पटनी टॉप से यहां के दो सौ रुपये लिये। अब फिर विचार आया कि बस से जाऊं या ट्रेन से। फिर ट्रेन ने बाजी मार ली। बस में भी बैठकर ही जाना है, ट्रेन में भी। अगर लेटने की जगह मिल गई तो बल्ले बल्ले। फिर रेल के किराये और बस के किराये की तो कोई तुलना ही नहीं। एक सज्जन के साथ मिलकर स्टेशन जाने के लिये अस्सी रुपये में ऑटो किया, दोनों के चालीस चालीस रुपये लगे। उन सज्जन को सहारनपुर जाना था। देहरादून में उनकी तैनाती है, फौजी हैं। कल वहां रिपॉर्ट करना है। किश्तवाड से आ रहे थे। जामों ने उन्हें भी काफी परेशान किया। अब चिन्ता में थे कि पता नहीं सहारनपुर की ट्रेन मिलेगी भी या नहीं। मेरे पास चिन्ता-निवारण उपाय था। बता दिया कि पौने ग्यारह बजे लोहित एक्सप्रेस जायेगी। उसके बाद कोई ट्रेन नहीं है, वही एकमात्र ट्रेन है। जब स्टेशन में प्रवेश कर रहे थे, मुझे उद्घोषणा सुनाई दी- अर्चना एक्सप्रेस प्लेटफार्म नम्बर तीन पर खडी है। मैंने तुरन्त उन सज्जन को रोका और कहा कि अर्चना एक्सप्रेस जाने को तैयार खडी है, इसे आठ बजे ही चले जाना चाहिये था लेकिन लेट है। इससे चले जाओ। और जल्दी सहारनपुर पहुंच जाओगे। उन्होंने दौड लगा दी।
मैं टिकट लेने एकमात्र लम्बी लाइन में लग गया। हालांकि मेरा टिकट सम्पर्क क्रान्ति में कन्फर्म हो गया था लेकिन वह किसी दूसरी ट्रेन में मान्य नहीं है। जब यह लाइन काफी लम्बी हो गई तो दूसरी खिडकी भी खोल दी गई। मैं अविलम्ब उसमें जा लगा। नई दिल्ली का टिकट मांगा रोहतक रूट से, लेकिन उसने अम्बाला रूट का टिकट दे दिया। मैंने आपत्ति जताई तो उसने कहा कि यह भी चल जायेगा। मैंने ले तो लिया लेकिन मैं निराश था। जब यह ट्रेन अम्बाला से जायेगी ही नहीं तो टिकट उस रूट का क्यों लूं? आप भले ही साधारण टिकट पर यात्रा कर रहे हों लेकिन आपके पास उसी रूट का टिकट होना चाहिये जिससे ट्रेन जायेगी। साधारण टिकट पर लिखा होता है कि यह किस रूट का टिकट है। दो भिन्न-भिन्न रूटों की दूरियों में कुछ अन्तर होता है। किराया दूरी पर आधारित होता है। अगर आप छोटे रूट का टिकट लेकर लम्बे रूट से यात्रा कर रहे हों तो यह माना जाता है कि आप निर्धारित दूरी से अधिक यात्रा कर रहे हो और इसकी पेनल्टी लगती है। लेकिन गनीमत है कि अम्बाला रूट रोहतक रूट के मुकाबले ज्यादा लम्बा है। यानी मैंने ज्यादा दूरी का टिकट लिया है और यात्रा करूंगा कम दूरी पर।
स्क्रीन पर दो ट्रेनें दिख रही थीं- जम्मू जबलपुर और जम्मू बान्द्रा स्पेशल। जम्मू रूट पर मैं स्पेशल ट्रेनों का बडा भक्त हूं। मैंने इससे पहले दो बार इस मार्ग पर स्पेशल ट्रेनों में यात्रा की है। साधारण टिकट होने के बावजूद भी साधारण डिब्बे में आराम से पैर पसारकर सोते हुए। मुझे लगा कि यह ट्रेन लुधियाना, जाखल, हिसार, रतनगढ, जोधपुर के रास्ते जायेगी। अगर ऐसा है तो इस ट्रेन से जाखल तक चला जाऊंगा। सुबह सात आठ बजे यह जाखल पहुंचेगी, कम से कम रात भर आराम से सोना तो मिल जायेगा। लेकिन जब नेट पर इसकी जानकारी ली तो खुशी का ठिकाना नहीं रहा। यह अम्बाला और दिल्ली होते हुए जायेगी। अब कोई फिक्र नहीं, बारह बजे भी दिल्ली पहुंचेगी तो भी ठीक है। सम्पर्क क्रान्ति छूटने का सारा दुख समाप्त हो गया। इसका असली समय यहां से सुबह छह सात बजे चलने का था लेकिन अत्यधिक लेट हो जाने की वजह से यह अब रात को साढे ग्यारह बजे जायेगी।
जबलपुर एक्सप्रेस साप्ताहिक ट्रेन होने के बावजूद भी दिल्ली और आगे झांसी तक एक दैनिक ट्रेन है। असल में रोज इसी समय यानी पौने बारह बजे सप्ताह में एक दिन जबलपुर, एक दिन कन्याकुमारी, एक दिन मंगलौर, तीन दिन चेन्नई के लिये ट्रेनें यहां से रवाना होती हैं। अब एक और नई ट्रेन इसी समय निर्धारित की गई है कोटा के लिये। इस प्रकार मध्य हरियाणा और दिल्ली, मथुरा, आगरा, झांसी तक के लिये यह दैनिक ट्रेन की तरह कार्य करती है। इस वजह से मेरी उम्मीद से ज्यादा भीड थी। अक्सर साप्ताहिक ट्रेनों में दैनिक ट्रेनों के मुकाबले कम भीड होती है।
जबलपुर एक्सप्रेस को आधा घण्टे विलम्ब से प्लेटफार्म नम्बर एक से रवाना किया जायेगा और साढे ग्यारह बजे बान्द्रा स्पेशल को उसी प्लेटफार्म से। इस तरह जब बान्द्रा स्पेशल प्लेटफार्म पर आई तो जबलपुर की भीड उसमें चढने लगी। कुछ लोग डिब्बे पर बान्द्रा लिखा देखकर कन्फ्यूज थे। यहां मैंने कुछ मेहनत की और डिब्बे के उन यात्रियों को उतार दिया जिनके पास जबलपुर वाली का टिकट था। पूरे डिब्बे में दो तीन फौजी और एक दो अन्य यात्री थे जो आगे मुम्बई जायेंगे। ट्रेन चलने से पहले ही मैं स्लीपिंग बैग में घुस गया। अलार्म लगाने की कोई आवश्यकता नहीं थी। बारह बजे से पहले यह दिल्ली नहीं पहुंचने वाली।
अगले दिन आंख खुली तो बाहर भयंकर कोहरा था। ट्रेन रेंग रही थी। नौ बज चुके थे और ट्रेन करनाल पहुंचने वाली थी। धीरे धीरे पानीपत भी निकल गया और सोनीपत भी। थोडी निराशाजनक बात यह थी कि ट्रेन आजादपुर से बाईपास लाइन पकडकर सफदरजंग जायेगी। नई दिल्ली या पुरानी दिल्ली नहीं जायेगी। सफदरजंग से मुझे फिर पूरी दिल्ली पार करके वापस कश्मीरी गेट लौटना पडेगा। इसलिये जैसे ही किसी ने आजादपुर फ्लाईओवर के पास चेन खींची तो मैं भी उतर गया। फिर मेट्रो पकडकर शास्त्री पार्क पहुंचने में समय ही कितना लगता है?

पटनी टॉप

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9 comments:

  1. आज तो फ़िल्म जल्दी ही खत्म हो गई :)

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    1. ललित भाई: फिल्म जल्दी इसलिए खतम हो गयी की बंद आज "पत्नी"टॉप पर फंसा था... ;)

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  2. पहाड़ पर जाम, ट्रेन छूटने का कारण, पल पल की धक धक। एक अच्छा वृत्तचित्र बन सकता है इस पर तो।

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  3. मस्त
    लेक्किन बड़ी आपाधापी होती है कई बार

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