Skip to main content

आगामी यात्राएँ

नंबर सेव किए बिना सीधे हमें Whatsapp करें... Whatsapp Link



Comments

  1. Hello pankaj ji if you pass through patna then called me on this number 8797447585.i am waiting for you.

    ReplyDelete
  2. kya aap ka koi youtube channel bhi hai kya ?

    ReplyDelete

Post a Comment

Popular posts from this blog

रोरिक आर्ट गैलरी, नग्गर

इस यात्रा वृत्तान्त को आरम्भ से पढने के लिये यहां क्लिक करें । नग्गर का जिक्र हो और रोरिक आर्ट गैलरी का जिक्र न हो, असम्भव है। असल में रोरिक ने ही नग्गर को अन्तर्राष्ट्रीय पहचान दी है। निकोलस रोरिक एक रूसी चित्रकार था। उसकी जीवनी पढने से पता चलता है कि एक चित्रकार होने के साथ-साथ वह एक भयंकर घुमक्कड भी था। 1917 की रूसी क्रान्ति के समय उसने रूस छोड दिया और इधर-उधर घूमता हुआ अमेरिका चला गया। वहां से वह भारत आया लेकिन नग्गर तब भी उसकी लिस्ट में नहीं था। पंजाब से शुरू करके वह कश्मीर गया और फिर लद्दाख, कराकोरम, खोतान, काशगर होते हुए तिब्बत में प्रवेश किया। तिब्बत में उन दिनों विदेशियों के प्रवेश पर प्रतिबन्ध था। वहां किसी को मार डालना फूंक मारने के बराबर था। रोरिक भी मरते-मरते बचा और भयंकर परिस्थितियों का सामना करते हुए उसने सिक्किम के रास्ते भारत में पुनः प्रवेश किया और नग्गर जाकर बस गये। एक रूसी होने के नाते अंग्रेज सरकार निश्चित ही उससे बडी चौकस रहती होगी।

डायरी के पन्ने- 14

[डायरी के पन्ने हर महीने की पहली व सोलह तारीख को छपते हैं।] 16 सितम्बर 2013, सोमवार 1. एक मित्र ने कहा कि आप दिल्ली में रहते हैं, पढे लिखे हैं फिर भी जातिवाद और अलग-अलग धर्मों की बात करते हैं। अगर कोई छोटी जाति का होगा तो क्या आप उससे बात नहीं करेंगे? या आपके धर्म का नहीं होगा तो क्या आप उसका अपमान करेंगे? हालांकि मैंने उन्हें इस बात का स्पष्टीकरण दे दिया है, यहां उसका उल्लेख करना आवश्यक नहीं लेकिन इस बात ने मुझे कुछ सोचने को मजबूर कर दिया। वो यह कि मैं नीरज जाट के नाम से लिखता हूं। क्या ‘जाट’ शब्द लगाना अनिवार्य है? इस शब्द से जातिवादिता झलकती है। इसे हटाने का मन बना लिया। सोच लिया कि अब नीरज कुमार के नाम से लिखा करूंगा। लेकिन नहीं हटा सका। असल में अब इस शब्द से मुझे लगाव हो गया है, बहुत ज्यादा लगाव। अब यह मेरे लिये जातिसूचक नहीं रहा। पांच साल पहले जब मुझे इस दुनिया का कुछ भी नहीं पता था, तब ब्लॉग बन गया, संयोग से। यह भी नहीं पता था कि आगे चलकर इस ब्लॉग के सहारे मैं कहां पहुंचूंगा। बस ऐसे ही बन गया, संयोग था। उस समय नाम के आगे ‘जाट’ लगाने की धुन थी। मेल आईडी बनाता था, उसमें ‘जाट’ लि...

भागसू नाग और भागसू झरना, मैक्लोडगंज

इस यात्रा वृत्तान्त को शुरू से पढने के लिये यहां क्लिक करें । हमारी करेरी झील की असली यात्रा शुरू होती है धर्मशाला से। 23 मई की आधी रात तक मैं, गप्पू और केवल राम योजना बनाने में ही लगे रहे। केवल राम ने पहले ही हमारे साथ जाने से मना कर दिया था। अब आगे का सफर मुझे और गप्पू को ही तय करना था। गप्पू जयपुर का रहने वाला है। एक दो बार हिमालय देख रखा है लेकिन हनीमून तरीके से। गाडी से गये और खा-पीकर पैसे खर्च करके वापस आ गये। जब मैंने करेरी झील के बारे में ‘इश्तिहार’ दिया तो गप्पू जी ने भी चलने की हामी भर दी थी। सुबह कश्मीरी गेट पर जब मैंने गप्पू को पहली बार देखा तो सन्देह था कि यह बन्दा करेरी तक साथ निभा पायेगा। क्योंकि महाराज भारी शरीर के मालिक हैं।