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आगामी यात्राएँ

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Comments

  1. Hello pankaj ji if you pass through patna then called me on this number 8797447585.i am waiting for you.

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  2. kya aap ka koi youtube channel bhi hai kya ?

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रोरिक आर्ट गैलरी, नग्गर

इस यात्रा वृत्तान्त को आरम्भ से पढने के लिये यहां क्लिक करें । नग्गर का जिक्र हो और रोरिक आर्ट गैलरी का जिक्र न हो, असम्भव है। असल में रोरिक ने ही नग्गर को अन्तर्राष्ट्रीय पहचान दी है। निकोलस रोरिक एक रूसी चित्रकार था। उसकी जीवनी पढने से पता चलता है कि एक चित्रकार होने के साथ-साथ वह एक भयंकर घुमक्कड भी था। 1917 की रूसी क्रान्ति के समय उसने रूस छोड दिया और इधर-उधर घूमता हुआ अमेरिका चला गया। वहां से वह भारत आया लेकिन नग्गर तब भी उसकी लिस्ट में नहीं था। पंजाब से शुरू करके वह कश्मीर गया और फिर लद्दाख, कराकोरम, खोतान, काशगर होते हुए तिब्बत में प्रवेश किया। तिब्बत में उन दिनों विदेशियों के प्रवेश पर प्रतिबन्ध था। वहां किसी को मार डालना फूंक मारने के बराबर था। रोरिक भी मरते-मरते बचा और भयंकर परिस्थितियों का सामना करते हुए उसने सिक्किम के रास्ते भारत में पुनः प्रवेश किया और नग्गर जाकर बस गये। एक रूसी होने के नाते अंग्रेज सरकार निश्चित ही उससे बडी चौकस रहती होगी।

जनवरी में स्पीति: किब्बर भ्रमण

8 जनवरी 2016 बारह बजे के आसपास जब किब्बर में प्रवेश किया तो बर्फबारी बन्द हो चुकी थी, लेकिन अब तक तकरीबन डेढ-दो इंच बर्फ पड चुकी थी। स्पीति में इतनी बर्फ पडने का अर्थ है कि सबकुछ सफेद हो गया। मौसम साफ हो गया। इससे दूर-दूर तक स्पीति की सफेदी दिखने लगी। गजब का नजारा था। किब्बर लगभग 4200 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। इसे दुनिया का सबसे ऊंचा गांव माना जाता है। हालांकि लद्दाख में एकाध गांव इससे भी ऊंचा मिल जायेगा, लेकिन फिर भी यह सबसे ऊंचे गांवों में से तो है ही। यहां पहला कदम रखते ही एक सूचना लिखी दिखी - “आमतौर पर यह परांग ला दर्रा (18800 फीट) माह जून से सितम्बर के बीच खुला रहता है। फिर भी जाने से पहले इसकी सूचना प्रशासन काजा से जरूर लें (दूरभाष संख्या 1906-222202) तथा खास कर 15 सितम्बर के पश्चात दर्रे को पार करने की कोशिश घातक हो सकती है। यदि आप स्थानीय प्रदर्शक को साथ लें तो यह आपकी सुरक्षा के लिये उचित होगा।”

2016 की यात्राओं का लेखा-जोखा

यह साल बड़ा ही उलट-पुलट भरा रहा। जहाँ एवरेस्ट बेस कैंप जैसी बड़ी और यादगार यात्रा हुई, वहीं मणिमहेश परिक्रमा जैसी हिला देने वाली यात्रा भी हुई। इस वर्ष बाकी वर्षों के मुकाबले ऑफिस से सबसे ज्यादा छुट्टियाँ लीं और संख्यात्मक दृष्टि से सबसे कम यात्राएँ हुईं। केवल नौ बार बाहर जाना हुआ, जिनमें छह बड़ी यात्राएँ थीं और तीन छोटी। बड़ी यात्राएँ मलतब एक सप्ताह या उससे ज्यादा। इस बार न छुटपुट यात्राएँ हुईं और न ही उतनी ट्रेनयात्राएँ। जबकि दो-दिनी, तीन-दिनी छोटी यात्राएँ भी कई बार बड़ी यात्रा से ज्यादा अच्छे फल प्रदान कर जाती हैं।  ज्यादा न लिखते हुए मुख्य विषय पर आते हैं: