Latest News

मानसून में बस्तर: दंतेवाड़ा, समलूर और बारसूर

बस्तर से अबूझमाड़

11 अगस्त 2019

छत्तीसगढ़ के हमारे सदाबहार, सदाहरित मित्र सुनील पांडेय जी अपने अडतालीस काम छोड़कर कसडोल से रायपुर आ गए थे - अपनी गाड़ी से। उधर कंचन भी आ चुकी थी, जो पहले लखनऊ से आगरा गई, आगरा से झेलम एक्सप्रेस पकड़कर दिल्ली गई और अगले दिन दिल्ली से फ्लाइट से रायपुर। तो इस तरह हम चार जने रायपुर से बस्तर की ओर जा रहे थे। वैसे तो हमने अपनी पूरी फेसबुक बिरादरी से इस यात्रा पर चलने को कहा था, लेकिन "डर के आगे जीत है" का हौंसला इन चार ने ही दिखाया। हम ये तो नहीं जानते कि हमारी इस यात्रा पर कितने लोगों की आँखें लगी थीं, लेकिन यह जरूर जानते हैं कि कुछ लोग नक्सली हमला और बम-भड़ाम होने की उम्मीद जरूर कर रहे होंगे।

कंचन को भूख लगी थी, इसके बावजूद भी उन्होंने हमें फ्लाइट में मिले पेटीज, बर्गर बाँट दिए। इससे हमारी भूख तो कांकेर तक के लिए मिट गई, लेकिन कंचन की भूख ने धमतरी भी नहीं पहुँचने दिए। कुरुद में बस अड्डे पर कुछ छोटा-मोटा मिलने की आस में गाड़ी रोकी, लेकिन वहाँ तो जन्नत मिल गई। चाय के साथ ताजे समोसे और जलेबियाँ। पोहा भी था, लेकिन मैं और दीप्ति रायपुर से ही इतना पोहा खाकर चले थे कि और खा लेते, तो वापस निकल जाता। इसलिए समोसे, जलेबी और चाय ले लिए।

हमारी मित्र-मंडली में समोसे आदि पर बहस चलती रहती है। कोई कहता है खाना चाहिए, कोई कहता है कि नहीं खाना चाहिए, कोई कहता है कि इस तेल में बने तो ही खाने चाहिए... जितने मूँ, उतनी बातें। उधर मैंने अभी हाल ही में सिंगापुर की 110 साल की एक बुढ़िया की खबर पढ़ी, जिसके मुँह में सिगरेट थी और नीचे लिखा था - "मेरे जो भी दोस्त सिगरेट नहीं पीते थे, वे सभी मर गए।”


हमें नहीं पता कि समोसा खाना अच्छा होता है या खराब होता है या किस तरह के तेल का समोसा ठीक होता है; लेकिन इतना पता है कि जो लोग समोसे नहीं खाते, पेट उनके भी खराब रहते हैं।

तो खैर, यात्रा चलती रही और हम सभी बस्तर की ओर बढ़ते रहे। सुनील जी नक्सलियों के किस्से बताते रहे, जो उन्होंने कहीं पढ़े थे या सुने थे... और कंचन डरने की बजाय यह उम्मीद कर रही थी - काश! कोई नक्सली मिल जाए। काश! कोई बंदूकधारी हमारी गाड़ी रोक ले।

लेकिन यहाँ न नक्सली हैं और न ही गाड़ी रोकी गई। छत्तीसगढ़ में नक्सली तो अब अबूझमाड़ और सुकमा-कोंटा के जंगलों में ही सिमटकर रह गए हैं। जगदलपुर तक तो मस्त हाइवे बना हुआ है, जिस पर चौबीस घंटे बसें चलती हैं।

शाम तक जगदलपुर पहुँच गए और कमरा लेकर सो गए। उठने के बाद बाजार में टहलने निकल गए। रात दस बजे भी अच्छी चहल-पहल थी और रक्षाबंधन की तैयारियाँ जोरों पर थीं। राखी की दुकानें सजी हुई थीं। फेसबुक पर इस बाजार का फोटो डालते समय यदि मैं जगह का नाम न लिखता, तो इसे शाहदरा या शास्त्री पार्क का बाजार मान लिया जाता।


अगले दिन यानी 12 अगस्त 2019 को सबकुछ पैक किया और होटल से चेक-आउट कर दिया। वैसे तो कार्यक्रम के अनुसार तीन दिन इसी होटल में रुकना था, लेकिन कंचन बड़ी जल्दी हमसे घुलमिल गई और अब वह भी ठेठ घुमक्कड़ हो गई थी। उसके घुमक्कड़ बनते ही हम भी अपने रंग में आ गए और "जहाँ शाम हो जाएगी, वहाँ रुकेंगे" कहकर दंतेवाड़ा की ओर चल दिए।

घंटे-डेढ़ घंटे बाद ही हम दंतेवाड़ा में दंतेश्वरी देवी के मंदिर में थे। यह एक शक्तिपीठ है और मंदिर में खूब चहल-पहल थी। गाड़ियों की पार्किंग की जिम्मेदारी महिलाओं की थी और वे इसे दौड़-दौड़कर कुशलता से कर रही थीं। उनकी जगह कोई पुरुष होता, तो वह उदास शक्ल बनाकर बैठा रहता और पार्किंग की पर्चियाँ देता रहता।

दंतेश्वरी मंदिर में पुरुष पैंट पहनकर प्रवेश नहीं कर सकते, केवल धोती पहनकर ही जा सकते हैं। प्रवेश द्वार के पास ही फ्री धोतियाँ मिलती हैं। मुझे धोती में देखकर दीप्ति बड़ी प्रसन्न हुई। उसने कुछ फोटो भी खींचे, जो हमेशा की तरह अभी तक भी उसके मोबाइल में निष्क्रिय पड़े हैं।

गीदम में ओम सोनी मिल गए और वे हमें समलूर ले गए। समलूर का नाम वैसे तो मैंने सुना-पढ़ा था, लेकिन इस समय बिल्कुल भी दिमाग में नहीं था और न ही वहाँ जाने की योजना थी। आपको बताता चलूँ कि ओम सोनी बस्तर के विकीपीडिया हैं। बस्तर के बारे में जो बात छत्तीसगढ़ सरकार को भी नहीं पता, वे बातें ओम को पता हैं। उनसे बात करते समय आपको पता नहीं किन-किन अजब-गजब स्थानों और परंपराओं के बारे में जानकारी मिलती है।

समलूर का शिव मंदिर ग्यारहवीं शताब्दी का बना हुआ है और चारों तरफ धान के खेत हैं। छोटा-सा मंदिर शायद आपको कुछ खास न लगे, लेकिन इसकी प्राचीनता इसे खास बनाती है। यहाँ से दूर पहाड़ियों की एक श्रंखला दिखती है, जो उत्तर से दक्षिण की ओर हैं। इन्हीं के दक्षिणी सिरे पर विश्वप्रसिद्ध बैलाडीला की लोहे की खदानें हैं, जहाँ से लोह-अयस्क निकालने के लिए जापानियों ने ब्रिटिश काल में विशाखापटनम से किरंदुल तक ब्रॉडगेज की रेलवे लाइन बिछाई और इसे विद्युतीकृत भी किया। आज भी यहाँ खूब लौह-अयस्क है और ट्रेनें भर-भरकर ओड़िशा और विशाखापटनम बंदरगाह तक जाती हैं। जगदलपुर में स्टील फैक्टरी बनाने का काम चल रहा है और दुर्ग से नारायणपुर, रावघाट होते हुए जगदलपुर तक रेलवे लाइन बिछाने का काम भी चल रहा है, ताकि इस लौह-अयस्क को भिलाई स्टील प्लांट तक भी पहुँचाया जा सके और जगदलपुर स्टील प्लांट के बने स्टील को देश के बाकी हिस्सों में सुगमता से भेजा जा सके।

इसी वजह से नक्सलियों और सरकार के बीच संघर्ष चलता रहता है। जबकि वास्तविकता यह है कि आज हमें जंगल भी चाहिए और स्टील भी चाहिए।

इसी पहाड़ी श्रंखला पर ढोलकल गणेश की प्रतिमा है, जिसे पहले कुछ स्थानीय निवासी ही जानते थे, लेकिन जब से नक्सलियों ने इसे तोड़कर गिराया है, तब से यह पूरे देश में चर्चा में आ गई और बस्तर पर्यटन का हिस्सा बन गई। इस क्षेत्र में नक्सली प्रभाव काफी कम है, इसलिए काफी यात्री ढोलकल जाने लगे हैं। दंतेवाड़ा से कुछ दूर तक गाड़ी से जाकर बाकी कुछ किलोमीटर पैदल चलना होता है - झाड़ियों और चट्टानों में। इस यात्रा में हमारा ढोलकल जाना प्रस्तावित नहीं था, लेकिन सर्दियों में जब हम पुनः यहाँ आएँगे, तो ढोलकल जरूर जाएँगे।

समलूर के बाद ओम हमें ले गए बारसूर। कुछ साल पहले जब मैं पहली बार बस्तर आया था, तब भी सुनील पांडेय जी ही साथ थे। तब भी हम बारसूर गए थे और इस स्थान ने मेरे मन में स्थायी छाप छोड़ रखी है। यहाँ मंदिरों के कुछ समूह हैं; जैसे बत्तीसा मंदिर, गणेश मंदिर, मामा-भांजा मंदिर आदि। सभी मंदिर ग्यारहवीं शताब्दी के बने हुए हैं और अपने उन्नत अतीत की कहानी कहते हैं। आज आप भले ही यहाँ आने से डरते हों और बस्तर को एक पिछड़ा स्थान मानते हों, लेकिन इसका अतीत गौरवमयी था।

आज सावन का आखिरी सोमवार था, इसलिए इन मंदिरों में थोड़ी चहल-पहल थी, अन्यथा पूरे साल ये यूँ ही खाली रहते होंगे। मंदिरों में कोई पुजारी नहीं है और सभी मंदिर पुरातत्व विभाग के अधीन हैं।

गणेश मंदिर में एक आदमी जिद करने लगा - "दस-बीस रुपये भी चढ़ाओ।"
ओम ने झिड़क दिया - "तू दारू पीने के लिए मंदिर में पैसे माँग रहा है?"

बारसूर से इंद्रावती नदी के पुल तक का रास्ता शानदार है। यही रास्ता आगे नारायणपुर चला जाता है। पिछली बार जब हम आए थे, तो इस पूरे रास्ते पर सुरक्षाबल तैनात थे और किसी को भी रुकने की अनुमति नहीं थी। एक रजिस्टर में नाम-पता भी लिखना पड़ा था और हम सीधे इंद्रावती पार करके ही रुके थे। कारण था कि यह स्थान नक्सलियों के साम्राज्य और सुरक्षाबलों के साम्राज्य की सीमा पर था। नदी के पार नक्सलियों का ‘साम्राज्य’ था, जिसमें नक्सलियों की तरफ से आम लोगों को तो जाने की अनुमति थी, लेकिन सुरक्षाबलों का प्रवेश वर्जित था। हो सकता है आगे कहीं नक्सलियों की भी चौकी हो और वहाँ भी किसी रजिस्टर में नाप-पता लिखना होता हो।

जबकि आज आर्मी कैंप वीरान पड़ा था, पूरे रास्ते कोई नहीं मिला। ओम ने बताया कि वह ‘सीमा’ अब नदी पार करके कुछ किलोमीटर आगे चली गई है। वहाँ तक सड़क भी अच्छी बन गई है और पुल भी बन गए हैं। धीरे-धीरे सुरक्षाबल उससे आगे के क्षेत्र को भी ’कैप्चर’ कर लेंगे और पूरा अबूझमाड़ नक्सलियों से विहीन हो जाएगा।

इंद्रावती नदी पूरे उफान पर थी। पिछली बार भी मानसून में मैं यहाँ आया था, तब भी नदी ऐसी ही थी। सच में इंद्रावती को तो मानसून में ही देखना चाहिए। वैसे आपको बता दूँ कि गर्मियों में यह नदी लगभग सूख जाती है और इस साल मई-जून में तो पूरी तरह सूख गई थी।

अब बारी थी रुकने की जगह ढूँढ़ने की। बारसूर में रुकने की कोई व्यवस्था नहीं है। दंतेवाड़ा में एक होटल है। आगे बचेली में दो-तीन होटल हैं और किरंदुल में भी एक-दो होटल हैं। बचेली को यदि छत्तीसगढ़ का एक शानदार हिल स्टेशन कहा जाए, तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। लेकिन नक्सली प्रभाव के कारण पर्यटक यहाँ आने से डरते हैं। बचेली के पास ही बैलाडीला की खदानें हैं और नक्सली इसका विरोध करते हैं और लौह-अयस्क ले जा रही ट्रेनों को उड़ाने की ताक में भी रहते हैं। इसलिए बचेली के आसपास के जंगल पर्यटन की दृष्टि से सुरक्षित नहीं हैं।

फिर भी हम बचेली रुकना चाहते थे। बचेली जाने और वहाँ रुकने में कोई समस्या नहीं थी। तभी अचानक याद आया कि बचेली से ऊपर पहाड़ों में आकाशनगर नामक स्थान भी है, जहाँ जाने के लिए अनुमति की आवश्यकता होती है। इसके लिए बिलासपुर में रहने वाले मित्र मानवेंद्र प्रताप सिंह जी को याद किया। उन्होंने मिनटों में व्यवस्था भी कर दी, लेकिन हम बारसूर में घूमते रहे और आकाशनगर के पहाड़ों पर बादल छा गए। बादल और बारिश हो, तो किसी को भी उधर नहीं जाने दिया जाता।

ओम ने मेघ प्रकाश शेरपा से परिचय कराया, जो दंतेवाड़ा में होम-स्टे चलाते हैं। उनका होम-स्टे दंतेवाड़ा से 8 किलोमीटर आगे एक गाँव में था और ऑफ सीजन के कारण बंद था और अस्त-व्यस्त भी। लेकिन उन्होंने हमारे ठहरने की व्यवस्था दंतेवाड़ा में अपने एक मित्र के यहाँ कर दी।

आज के लिए इतना ही... अगली पोस्ट आने तक आप फोटो देखिए और वीडियो भी देखिए...

समलूर मंदिर, दंतेवाड़ा
समलूर मंदिर, दंतेवाड़ा

मानसून में बस्तर

मानसून में बस्तर

मानसून में बस्तर

मानसून में बस्तर

बारसूर की यात्रा
बारसूर

बारसूर की यात्रा

बारसूर की यात्रा

मामा-भांजा मंदिर, बारसूर
मामा-भांजा मंदिर, बारसूर

Chhattisgarh Wildlife


इंद्रावती नदी, बारसूर
इंद्रावती नदी, बारसूर

इंद्रावती नदी, बारसूर
इंद्रावती नदी, बारसूर

इंद्रावती नदी, बारसूर

अबूझमाड़ में प्रवेश
अबूझमाड़ में प्रवेश

कड़कनाथ मुर्गा
कड़कनाथ मुर्गा पूरी तरह काला होता है, इसका खून भी काला होता है और काफी महंगा बिकता है...

कड़कनाथ मुर्गा

Chhattisgarh Art









3 comments:

  1. सुन्दर चित्रों से सजी एक बढ़िया लेख, आपने बढ़िया जानकारी मुहैया कराई है लेकिन नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में पर्यटकों को खतरा नहीं रहता क्या ? ये नाराजगी सिर्फ सरकारी तंत्र से होती है या ये नक्सली निजी तौर पर किसी के लिए भी हिंसक रहते है !

    ReplyDelete
    Replies
    1. सर, नक्सलियों से पर्यटकों को कोई खतरा नहीं है... उनका झगड़ा केवल सुरक्षाबलों और सरकारी तंत्र से है...

      Delete
  2. Bhai sahab dholkal aaye to bataiyega hum bhi sath chalenge.bhiali ke rahne wale hai.vaise do baar dhholkal jaa chuka hun.pichhle saal wife or baby ko le ke gaya tha.aapke blog 4 saal se follow kar raha hu.use dekh ke hi tungnath gaya tha 2015 me
    Ab roopkund ka plan bana raha
    Agle saal shreekhand mahadev

    ReplyDelete

मुसाफिर हूँ यारों Designed by Templateism.com Copyright © 2014

Powered by Blogger.
Published By Gooyaabi Templates