Sunday, July 21, 2019

रघुपुर किले की फटाफट यात्रा

Raghupur Fort, Jalori Pass, Kullu

19 जुलाई 2019, शुक्रवार...
दोपहर बाद दिल्ली से करण चौधरी का फोन आया - "नीरज, मैं तीर्थन वैली आ रहा हूँ।”
"आ जाओ।”
फिर दोपहर बाद के बाद फोन आया - "नीरज, मैं नहीं आ रहा हूँ।”
"ठीक है। मत आओ।”
शाम को फोन आया - " हाँ नीरज, कैसे हो?... क्या कर रहे हो?... मैं आ रहा हूँ।”
"आ जाओ।”
रात नौ बजे फोन आया - "अरे नीरज, खाना खा लिया क्या?... सोने की तैयारी कर रहे होंगे?... बस, ये बताने को फोन किया था कि मैं नहीं आ रहा हूँ।”
"ठीक है। मत आओ।”
रात दस बजे फोन आया - "अरे बड़ी जल्दी सो जाते हो तुम।... इतनी जल्दी कौन सोता है भाई!... मैं आ रहा हूँ... बस में बैठ गया हूँ... ये देखो फोटो... सबसे पीछे की सीट मिली है।”
"खर्र.र्र.र्र..."
रात ग्यारह बजे फोन आया - "अरे सुनो, एक पंगा हो गया। बस वाले ने मुझे बाइपास पर उतार दिया है। उस बस में पहले से ही किसी और की बुकिंग थी और बस वाले ने मुझे भी बैठा लिया था। अब उतार दिया है। तो अब मैं नहीं आ रहा हूँ।"
"खर्र.र्र.र्र... खर्र.र्र.र्र..."
रात साढ़े ग्यारह बजे फोन आया - "होये उठ... हमेशा सोता रहता है... मैं आ रहा हूँ... दूसरी बस में सीट मिल गई है।”
"खार्र.र्र.र्र... खूर्र.र्र.र्र... खिर्र.र्र.र्र..."

Monday, July 8, 2019

राज ठाकुर का गाँव: बीजल



शांघड़ में थे, तो बड़ी देर तक राज ठाकुर को फोन करता रहा, लेकिन उसने उठाया नहीं। उसने आज हमें अपने घर पर बुलाया था - लंच के लिए और हमने उसका निमंत्रण स्वीकार कर लिया था। निमंत्रण इसलिए लिख रहा हूँ, क्योंकि लंच करके हमें वहाँ से चले जाना था। अगर चले जाने की बात न होती, तो आमंत्रण लिखता। उसके घर में कुछ काम चल रहा है, इसलिए वह अतिथियों का अच्छा सत्कार नहीं कर पाएगा, इसका उसे डर था और इसीलिए वह हमें ठहराने से मना कर रहा था।
आधे घंटे बाद जब उसका फोन आया, तो मेरा उत्तर था - “भाई जी, आपने फोन नहीं उठाया और हम बंजार पहुँच गए हैं। अब फिर कभी आएँगे।”
“ओहो... मुझे पता नहीं चला... मोबाइल खराब हो गया है... देख लो अगर आ सको तो...”
“नहीं आ सकते...”
“ये क्या हो गया मुझसे! ये तो बड़ी भारी गलती हो गई...”
“अच्छा, अच्छा ठीक है... आ रहे हैं आधे घंटे में... अभी शांघड़ से चले हैं... और अबकी बार फोन उठा लेना।”
रोपा में कमल जी को अलविदा कहा, क्योंकि उन्हें आज शिमला जाना था। लेकिन शाम को पता चला कि वे कसोल चले गए। मैं नशे से मीलों, कोसों, प्रकाश वर्षों दूर रहता हूँ, इसलिए मुझे कसोल और मलाणा कतई पसंद नहीं हैं और जो लोग कसोल जाते हैं, वे छँटे हुए नशेड़ी दिखाई पड़ते हैं। वैसे कमल जी ऐसे तो नहीं थे।

Sunday, July 7, 2019

शांघड़: बेहद खूबसूरत मुकाम



मनु ऋषि मंदिर से लौटकर हम रोपा में एक ढाबे पर चाय पी रहे थे। रसोई के दरवाजे पर लिखा था - "नो एंट्री विदाउट परमिशन"... और अजीत जी ने रसोई में घुसकर मालिक के हाथ में ढेर सारी प्याज और मालकिन के हाथ में ढेर सारे टमाटर देकर बारीक काटने को कह दिया। वे दोनों बाहर बैठकर प्याज-टमाटर काटने में लगे थे और अजीत जी रसोई में अपनी पसंद का कोई बर्तन ढूँढ़ने में लगे थे।
इस तरह एक बेहद स्वादिष्ट डिश हमारे सामने आई - साकशुका। मैं और कमल रामवाणी जी इस नाम को बार-बार भूल जाते थे और आखिरकार कमल जी ने इसका भारतीय नामकरण किया - सुरक्षा। अब हम यह नाम कभी नहीं भूलेंगे। जमकर ‘सुरक्षा’ खाई और बनाने की विधि मालिक-मालकिन दोनों को समझा दी।
अब बारी थी शांघड़ जाने की। आप गूगल पर शांघड़ (Shangarh) टाइप कीजिए, आपको ऐसे-ऐसे फोटो देखने को मिलेंगे कि आप इस स्थान को अपनी लिस्ट में जरूर नोट कर लेंगे। पक्का कह रहा हूँ। भरोसा न हो, तो करके देख लेना। तो हमने भी इसे नोट कर रखा था और आज आखिरकार उधर जा रहे थे।
रोपा से एक किलोमीटर आगे से शांघड़ की सड़क अलग होती है। दूरी 7 किलोमीटर है। नई बनी सड़क है और अभी कच्ची ही है। मोटरेबल है, बसें चलती हैं, कारें भी चलती हैं और मोटरसाइकिलें भी। रास्ते-भर इसे पक्का करने का काम लगा हुआ है। ठेकेदार काम छोड़कर न भागा, तो बारिश के इसी सीजन में सड़क पक्की बन जाएगी। वैसे भी बारिश में ग्रामीण सड़कें नहीं बना करतीं। गिट्टी के ऊपर डाली गई मिट्टी बह जाती है, बहती रहती है और आखिरकार ठेकेदार काम छोड़ देता है। ऐसा मैंने सुना है।
तो जिस समय शांघड़ पहुँचे, बूंदाबांदी होने लगी थी और अजीत जी ने तय कर लिया था कि कहाँ रुकना है। यह स्नोलाइन होम-स्टे था और इसके बोर्ड रोपा से ही देखने में आ रहे थे। बोर्ड से फोन नंबर लेकर जिस आदमी से कमरे की बात की, वह कहीं बाहर था और उसने 1000 रुपये का कमरा बोल दिया। जब कमरे में पहुँचे, तो लड़का उदास था, क्योंकि वह 1500 का देना चाहता था। 1000 बोलने वाला उसका पापा था, इसलिए बात माननी पड़ी अन्यथा हमें कहीं और ट्राई करना पड़ता। शांघड़ में कमरों की कोई कमी नहीं है और आज जून का आखिरी शनिवार होने के बावजूद भी कोई चहल-पहल नहीं थी। इसका मतलब था कि सब कमरे खाली पड़े थे।

Saturday, July 6, 2019

एक यात्रा सैंज वैली की



मैं जब अप्रैल 2019 के दूसरे सप्ताह में दिल्ली से हिमाचल के लिए निकला था, तो यही सोचकर निकला था कि तीर्थन वैली में रहूँगा और ग्रेट हिमालयन नेशनल पार्क में ट्रैकिंग किया करूँगा। लेकिन समय का चक्र ऐसा चला कि न मैं तीर्थन वैली में रह पाया और न ही ग्रेट हिमालयन नेशनल पार्क में जा पाया। तीर्थन वैली के बगल में एक छोटी-सी वैली है - जीभी वैली। इस वैली के घियागी गाँव में अपना ठिकाना बना और मेरा सारा समय घियागी में ही कटने लगा।
अभी पिछले दिनों अजीत सिंह जी आए और जीभी वैली से बाहर कहीं घूमकर आने को उकसाने लगे। मैं उनके उकसाए में नहीं आता और कल चलेंगे, परसों चलेंगे कहकर बच जाता। फिर कल-परसों आते-आते शनिवार आ जाता और मैं “वीकएंड पर बहुत भीड़ रहेगी और हम जाम में फँसे रहेंगे" कहकर फिर से अपना बचाव कर लेता। हालाँकि यहाँ न भीड़ होती है और न ही जाम। और कमाल की बात ये है कि घियागी की खाली सड़क पर मैं अजीत सिंह जी को भरोसा दिला देता कि भीड़ बहुत है और जाम भी लगा है।
लेकिन शुक्रवार 28 जून को मेरी नहीं चली और हम अपनी-अपनी मोटरसाइकिलों से सैंज वैली की ओर बढ़े जा रहे थे। आज मेरी न चलने का भी एक कारण था। मेरे सिर के बाल बहुत बढ़ गए थे और इतनी बेचैनी होने लगी थी कि रोज नहाना पड़ता था। यहाँ नाई न घियागी में था और न ही जीभी में। नजदीकी नाई 10 किलोमीटर दूर बंजार में था और नहाने से बचने के लिए बंजार जरूर जाना पड़ता। बस, इसी वजह से मुझे निकलना पड़ा और जब एक बार निकल गया तो सीधे सैंज वैली के प्रवेश द्वार लारजी पहुँचकर ही दम लिया। लारजी से चार किलोमीटर दूर ही औट है, जहाँ से दिल्ली-मनाली सड़क गुजरती है।