Monday, February 26, 2018

फोटो-यात्रा-7: एवरेस्ट बेस कैंप - जुभिंग से बुपसा

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17 मई 2016
“पता नहीं बंदा किस मिट्टी का बना था, आपे से बाहर हो गया - “आपको यहाँ कोई दिक्कत है, तो दूसरे होटल में चले जाईये।” इसके बाद कोठारी जी और उसमें बहस होने लगी। मैंने बीच-बचाव किया - “भाई देख, हम ग्राहक हैं। हमें कोई असुविधा हो रही है, तो हम किससे शिकायत करें? तुम शांत रहो और एक-एक शिकायत पर ध्यान दो। यह कहना बिल्कुल भी ठीक नहीं है कि होटल छोड़ दो।”
मन तो खट्टा हो ही चुका था। मैंने फिर कोठारी जी से कहा - “सर, होटल छोड़ देते हैं।”
...
“लॉज में हम आलू के पराँठे का ऑर्डर देने वाले थे, इसलिये यहाँ भी इसी के बारे में पूछा। होटल मालिक व मालकिन ने एक-दूसरे को देखा, फिर हमसे पूछा - “यह क्या होता है?” इसके बाद बारी थी मेरी और दीप्ति को एक-दूसरे को देखने की - “हम बनायेंगे।”
कुकर में आलू उबाले। भर-भरकर पाँच पराँठे बनाये। दो कोठारी जी ने, एक-एक हमने और एक होटल मालिक ने खाया। शानदार अनुभव था। दीप्ति पराँठे बना रही थी, मैं परोस रहा था और होटल मालिक बैठकर खा रहे थे। बाद में जब हमने पूछा कि पराँठे कैसे लगे, तो उत्तर मिला - “बहुत शानदार, लेकिन मिर्ची बहुत ज्यादा थी।”
यात्राओं में ऐसे अनुभव भी होते रहने चाहियें। यात्राएँ कभी भी नीरस नहीं होंगी। और ऐसे अनुभव अपने-आप नहीं हो जाते। आपका मन भी इन अनुभवों को स्वीकार करने वाला होना चाहिये। हम साहब बनकर पैर पर पैर रखकर बैठे होते तो यूँ पराँठे बनाकर सबको खिलाने का अनुभव नहीं हासिल कर सकते थे।
इससे एक सबक भी मिला। जो खुशी आलू के पराँठों में मिलती है, वो फ्री वाई-फाई में नहीं मिल सकती।”
एवरेस्ट बेस कैंप ट्रैक पर आधारित मेरी किताब ‘हमसफ़र एवरेस्ट का एक अंश। किताब तो आपने पढ़ ही ली होगी, अब आज की यात्रा के फोटो देखिये:

Thursday, February 22, 2018

फोटो-यात्रा-6: एवरेस्ट बेस कैंप - ताकशिंदो-ला से जुभिंग

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16 मई 2016
“140 रुपये की दो कप चाय और 250 रुपये का एक आमलेट मिला। यह इस ट्रैक की शुरूआत है। अभी इतनी महंगाई है, तो आगे और भी ज्यादा महंगाई मिलने वाली है। वैसे तो हमारे पास पर्याप्त पैसे थे, लेकिन फिर भी हम रोज के ख़र्चे और बाकी बचे पैसों व बाकी बचे दिनों का हिसाब एक कागज पर नोट करते जाते थे। कहीं ऐसा न हो कि किसी दिन हमें पता चले कि केवल दो दिन के पैसे ही बचे हैं। यहाँ आपके पास पैसे नहीं हैं, तो आपकी कोई पूछ नहीं।”
“नहाने का बड़ा मन था। यहाँ हम अपने इस ट्रैक की न्यूनतम ऊँचाई पर थे। यहाँ नहा लिये तो ठीक, अन्यथा आगे शायद नहाना न हो। गर्म पानी बहुत महँगा मिलेगा, जबकि यहाँ ठंड़े पानी से फ्री में नहाया जा सकता था। लेकिन इतने थके हुए थे कि कमरे में जाते ही पसर गये। एक घंटे तक बेसुध पड़े रहे, यहाँ तक कि दरवाजा भी बंद नहीं किया। एक घंटे बाद जब उठे तो पैर अकड़ गये थे और हम तीनों चलने में असमर्थ थे। किसी तरह कमरे से बाहर निकले और कदम-कदम पर ‘आई-उई’ चिल्लाते हुए थोड़ा टहले। बाहर बारिश हो रही थी, मौसम में ठंड़क हो गयी थी। अब नहाने का मन बदल चुका था।”




एवरेस्ट बेस कैंप ट्रैक पर आधारित मेरी किताब ‘हमसफ़र एवरेस्ट का एक अंश। किताब तो आपने पढ़ ही ली होगी, अब आज की यात्रा के फोटो देखिये:

Monday, February 19, 2018

फोटो-यात्रा-5: एवरेस्ट बेस कैंप - फाफलू से ताकशिंदो-ला

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15 मई 2016
“समय देखा - चार बजे थे। हम फाफलू से ग्यारह बजे चले थे। दूरी तय की केवल 17 किलोमीटर। डेढ घंटा रिंगमो में खड़ा रहा। इस तरह इस 17 किलोमीटर की दूरी को तय करने में साढ़े तीन घंटे लग गये। इसी से इस रास्ते की कठिनाईयों का अंदाज़ा लगाया जा सकता है। पता होता, तो हम बाइक फाफलू में ही छोड़कर यहाँ तक पैदल आते।
लेकिन एक सुकून अवश्य मिला। अब हमें कई दिनों तक बाइक नहीं चलानी है। अब यहाँ से एवरेस्ट बेस कैंप की ट्रैकिंग आरंभ होगी। अब वो समय शुरू हुआ है, जिसके लिये हम इतने उत्साहित थे, जिसके लिये इतनी दूर आये थे।”





एवरेस्ट बेस कैंप ट्रैक पर आधारित मेरी किताब ‘हमसफ़र एवरेस्ट का एक अंश। किताब तो आपने पढ़ ही ली होगी, अब आज की यात्रा के फोटो देखिये:

Thursday, February 15, 2018

फोटो-यात्रा-4: एवरेस्ट बेस कैंप - दुम्जा से फाफलू

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14 मई 2016
“जब भात के साथ दाल और आलू आये तो कोठारी जी ने पूछ लिया - ‘‘वेज?” अर्थात इसमें मांस तो नहीं है? लड़की रसोई में गयी और सरसों का भगोना उठा लाई और परोसते हुए बोली - “वेज।” यहाँ हमें संदेह हुआ कि कहीं ये लोग इसे ही ‘वेज’ तो नहीं कहते? हम ‘वेज’ कहते तो हमारा आशय शाकाहारी से होता, लेकिन यहाँ उबली हुई बे-स्वाद सरसों परोस दी जाती। इसके बाद भी कई बार ऐसा ही हुआ, तब हमें पक्का पता चल गया कि यही ‘वेज’ है। हमें यह सब्जी निहायत नापसंद थी और हम इसे बिल्कुल भी नहीं खाना चाहते थे। अब हम बड़ी दुविधा में पड़ गये थे। हम ‘वेज खाना’ ही लेना चाहते थे, लेकिन ‘वेज’ नहीं। कमाल यह हुआ कि सरसों बर्बाद न हो, इसलिये हमने दाल-भात माँगते समय यह कहना शुरू कर दिया था - “‘वेज’ मत देना।"





एवरेस्ट बेस कैंप ट्रैक पर आधारित मेरी किताब ‘हमसफ़र एवरेस्ट का एक अंश। किताब तो आपने पढ़ ही ली होगी, अब आज की यात्रा के फोटो देखिये:

Monday, February 12, 2018

फोटो-यात्रा-3: एवरेस्ट बेस कैंप - पशुपति दर्शन और आगे प्रस्थान

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13 मई 2016
“मेरे मोबाइल में रेल की पटरियों का वॉलपेपर लगा था। होटल मालिक की निगाह पड़ गयी और उसने इसे अपनी पत्नी और बच्चों को दिखाया। फिर ट्रेनों के कुछ फोटो भी दिखाए। बोला - “इंडिया में ऐसी होती है रेल। एक के पीछे एक बहुत बड़ी-बड़ी बसें जुड़ी होती हैं और लोहे की सड़क पर सर्र से भागी चली जाती हैं। बिजली से भी चलती हैं।” सब बड़े गौर से देखते रहे। इनके लिये रेल बहुत दूर की चीज है। बच्चों ने नेपाली में अपने पिता से अनगिनत प्रश्न पूछे, उत्तर मैंने दिये। एक तो नेपाल में ही रेल न के बराबर है। उन्हें इस ‘आश्चर्य’ को देखने विदेश जाना पड़ता है। फिर उससे भी बड़े आश्चर्य की बात यह थी कि इतने भारी-भरकम तामझाम को बिजली से कैसे चलाते हैं? जिस गाँव में बिजली ही नहीं है, जो गाँव दिन ढलने के बाद मात्र एक घंटे के लिये उजाला चाहता है, वहाँ के बच्चे कैसे समझ सकेंगे कि बिजली कितनी शक्तिशाली होती है?”




एवरेस्ट बेस कैंप ट्रैक पर आधारित मेरी किताब ‘हमसफ़र एवरेस्ट का एक अंश। किताब तो आपने पढ़ ही ली होगी, अब आज की यात्रा के फोटो देखिये:

Thursday, February 8, 2018

फोटो-यात्रा-2: एवरेस्ट बेस कैंप - काठमांडू आगमन

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12 मई 2016
इस पूरी यात्रा पर आधारित किताब ‘हमसफ़र एवरेस्ट में आपने पढ़ ही लिया होगा कि आज हम परासी से चलकर शाम होने तक काठमांडू पहुँच गये थे और दिल्ली के एक मित्र की बदौलत ठमेल में अच्छे होटल में रुके थे। रास्ते में नारायणगढ़ भी मिला, जहाँ गंडकी नदी पार की। सप्त गंडकी के नाम से प्रसिद्ध ये सात नदियाँ हैं, जो हिमालय में अलग-अलग स्थानों से निकलती हैं और अलग-अलग ही स्थानों पर आपस में मिलकर नारायणगढ़ में पहाड़ छोड़कर मैदान में आ जाती हैं। यही गंडकी नदी भारत में गंडक कहलाती है।
तो चलिये, बहुत लिख दिया। अब फोटो देखते हैं:

Monday, February 5, 2018

फोटो-यात्रा-1: एवरेस्ट बेस कैंप - दिल्ली से नेपाल

Delhi to Kathmandu Nepal Roadयह यात्रा मई 2016 में की गयी थी और इसे अभी तक ब्लॉग पर प्रकाशित नहीं किया गया था। योजना थी कि पहले इसकी किताब प्रकाशित होगी, उसके बाद ब्लॉग पर। आप जानते ही हैं कि इस यात्रा की किताब ‘हमसफ़र एवरेस्ट नवंबर 2017 में प्रकाशित हो चुकी है। इस पूरी किताब के एक-एक शब्द को अब ब्लॉग में लिखना तो संभव नहीं है, लेकिन अभी भी एक चीज ऐसी है जिसे किताब में पर्याप्त स्थान नहीं मिल सकता। और वो चीज हैं इस यात्रा के फोटो।
तो आज से हम इस यात्रा की फोटो-यात्रा आरंभ करते हैं। उम्मीद है कि आपने ‘हमसफ़र एवरेस्ट’ पढ़ ली होगी। यदि नहीं पढ़ी है, तो पढ़ लीजिये। फिर फोटो देखने का अलग ही आनंद मिलेगा।