Skip to main content

पुस्तक-चर्चा: बादलों में बारूद

मज़ा आ गया। किताब का नाम देखने से ऐसा लग रहा है, जैसे कश्मीर का ज़िक्र हो। आप कवर पेज पलटोगे, लिखा मिलेगा - यात्रा-वृत्तांत। लेकिन अभी तक मुझे यही लग रहा था कि कश्मीर का यात्रा-वृत्तांत ही होगा। लेकिन जैसे ही ‘पुस्तक के बारे में’ पढ़ा, तो मज़ा आ गया। इसमें तो झारखंड़ के जंगलों से लेकर लद्दाख और सुंदरवन तक के नाम लिखे हैं।





पहले सभी यात्राओं का थोड़ा-थोड़ा परिचय करा दूँ:
1. जंगलों की ओर
झारखंड़ में छत्तीसगढ़ सीमा के एकदम पास गुमला जिले में बिशुनपुर के पास जंगलों की यात्रा का वर्णन है।
2. पहाड़, पलामू और आग
झारखंड़ में बिशुनपुर के पास धरधरी जलप्रपात की रोमांचक यात्रा। और इससे भी रोमांचक है पलामू के जंगलों में नक्सली रणधीर भगत से मुलाकात और उनसे वार्तालाप।
झारखंड़ के जंगलों के ये दो वृत्तांत पढ़ते ही मेरे लिये तो किताब की कीमत वसूल हो गयी।
3. साना-साना हाथ जोड़ि...
सिक्किम यात्रा का वर्णन है। गंगटोक, लाचुंग और युमथांग।
4. हिरना, देख बूझ बन चरना
नेपाल यात्रा का वर्णन। उन दिनों नेपाल में लोकतंत्र नया-नया ही स्थापित हुआ था और देश में अराजकता और महंगाई का दौर था। कोई राजशाही को अच्छा बताता था और किसी के लिये लोकतंत्र अच्छा है। लेखिका ने काठमांडू, पोखरा और चितवन के बारे में लिखा है। साथ ही साथ उस समय के राजनीतिक माहौल के बारे में भी।
5. बादलों में बारूद
मेघालय यात्रा। लेखिका पहले शिलांग के आसपास घूमीं, फिर चेरापूंजी गयीं और फिर एक स्थानीय के घर पर रुक गयीं। स्थानीय के गाँव के पास रात में गोलीबारी हुई - सुरक्षाबलों और उग्रवादियों के बीच में।
6. जाल, जहाज और मछुआरे
सुंदरवन यात्रा। लेखिका की एक विशिष्ट शैली है लिखने की। पहले जमकर प्रकृति चित्रण करती हैं, फिर अचानक... आप भी देखिये:
“हवा में उड़ते बाल, मेरा दुपट्टा स्वर्णिम आकाश, नज़रों की छोर तक फैली अपूर्व जलराशि, उड़ते जल-पाखी, धीमी-धीमी बहती जल तरंग... सब कुछ इतना जादुई, अविश्वसनीय और अदभुत था कि मैं, मेरा आसपास, मेरा देशकाल सब कुछ स्थगित था। वे पल अमर होते जा रहे थे। माइंड नो माइंड बनता जा रहा था। आत्मा के नुकीले कोने घिसने लगे थे कि तभी कुछ हुआ... और मेरे पंख टूट गये। झीना-झीना सा वह जादुई रेशमी आकाशी वितान तड़क गया।
कोई रो रहा था। एक चुप्पे किस्म का रोना। इतनी भव्यता और सौंदर्य के बीच रुलाई?...”
यही वो जादू था जिसने मुझे अभी तक इस किताब में बांधे रखा। सौंदर्य-वर्णन और फिर अचानक दुखियों का वर्णन। चाहे वो कोई पत्थर तोड़ती महिला हो, चाहे जंगल बनाने को ज़मीन से बेदखल कर दिये गये नागरिक।
7. देश में विदेश
लेखिका कुछ समय चेन्नई में रहीं। अपने प्रवास के कुछ अनुभव साझा किये हैं। और मैं यह देखकर हैरान रह गया कि यह वही लेखिका है जिसने ऊपर के छह चैप्टर्स लिखे हैं या कोई और है। क्योंकि इसमें केवल आलोचना की गयी है चेन्नई, तमिलनाडु और हिंदुत्व की। घरों में बनायी जाने वाली अल्पना, बालों में गुंथे फूल और माथे पर लगे तिलक समेत तमाम बातों को अंधविश्वास कहकर प्रचारित किया है। चेन्नई की एक भी अच्छी बात नहीं। मुझे काफी निराशा हुई।



8. बुद्ध, बारूद और पहाड़
लद्दाख यात्रा। वही सर्किट जो टूरिस्ट लोग करते हैं - निम्मू संगम, पेंगोंग और नुब्रा घाटी। लेकिन इस चैप्टर ने मुझे बहुत ज्यादा निराश किया। समूचे लद्दाख की आलोचना, लद्दाखियों की आलोचना, उनके रीति-रिवाजों की आलोचना। जानकारी के अभाव में कुछ तथ्यात्मक गलतियाँ भी हैं - “खरगोश के आकार के हलके भूरे कुत्ते जिन्हें मारमूट कहते हैं...” और स्टैक्ना में श्योक नदी। लेकिन ये तथ्यात्मक गलतियाँ कोई बड़ी बात नहीं हैं।
जो बड़ी बात है, वो है:
“कुछ लामा यंत्रवत मंत्र पाठ करते जा रहे थे। मैंने फिर एक लामा से पूछा, ‘बुद्धत्व क्या है? क्या आप अपने उन उद्देश्यों तक पहुँच पाये जिसके चलते आप लामा बने?’ पर किसी को भी मेरे प्रश्न में कोई दिलचस्पी नहीं थी। हाँ, एक युवा लामा ने बड़ा बेबाक जवाब दिया, ‘मुझे लामा मेरे माँ-बाप ने बनाया।’ ”
जब आप इस पूरे पेज को पढ़ेंगे, तो आपको पता चलेगा कि लेखिका को लामाओं से नफ़रत थी और इसी कारण उसने उस लामा से पूछा कि जिस काम के लिये आप लामा बने थे, उसमें सफल हुए या नहीं। लेखिका जानना भी नहीं चाहतीं कि कोई अपनी मर्जी से लामा नहीं बनता, यह वहाँ का सामाजिक तानाबाना है। एक बच्चे को गृहस्थी के लिये रोककर रखते हैं और दूसरे को लामा बना देते हैं। और इस प्रक्रिया में लड़के-लड़की का कोई भेद नहीं होता। यह ठीक वैसे ही है जैसे किसी बच्चे का नाम बबलू रख दिया जाये और आप उससे पूछें कि तेरा नाम जॉनी क्यों नहीं है। बच्चा कहेगा कि मेरे माँ-बाप ने रखा है।
“बुद्ध की इस नगरी में बुद्धत्व कहीं नहीं था। जिस कर्मकांड और पूजा-पाठ के विरुद्ध बौद्ध धर्म की स्थापना हुई थी, वह आज तरह-तरह के कर्मकांड, अंधविश्वास और अंधश्रद्धा के दलदल में धँसा हुआ था।... एक घर की छत पर कुछ ईंटें छितरी हुई थीं, ध्यान से देखा तो देखा कि उन ईंटों की देह पर भी मंत्र खुदे हुए थे।... आज आलम यह है कि जरा-सी भी बारिश तेज हुई कि ईश्वर-भीरु लद्दाखी डरकर गोम्पा में जाकर प्रार्थना शुरू कर देते हैं।... लद्दाख की प्रगति के लिये ज़रूरी है कि कुछ समय के लिये लद्दाख से ऐसे धर्म को देशनिकाला मिल जाये।”
मैं हैरान रह गया इन लाइनों को पढ़कर। बिना सोचे-समझे कुछ भी लिख दिया।
“खारदुंग-ला टॉप दुनिया का सबसे ऊँचा मोटर से जाने का रास्ता है। इतने ऊँचे और दुर्गम पहाड़ों पर श्रम, स्वप्न और जीवन झोंककर इतने खर्चीले रास्ते बनाना हमारी असफल विदेश नीति का परिणाम है।”
‘श्रम, स्वप्न और जीवन झोंककर’ - इसका मतलब लेखिका कम्यूनिस्ट हैं। शुरू के छह चैप्टर्स में भी उन्होंने श्रमिकों, मज़दूरों, दुखियारों की बात की थी, लेकिन केवल व्यक्तिगत। कोई रो रहा है तो उससे जाकर पूछ लेती थीं, उसके दुख के मूल तक चली जाती थीं। यह अज़ीब नहीं लगा, बल्कि बहुत अच्छा लगा। लेकिन अब अच्छा नहीं लग रहा। खारदुंग-ला पर सड़क बनाने में श्रमिकों को श्रम करना पड़ा, तो यह असफल विदेश नीति है।
अभी एक चैप्टर और बचा है।
9. देखती चली गयी
केरल के कालडी में शंकराचार्य का जन्म हुआ था। इत्तेफ़ाक की बात, कालडी में ही लेखिका को एक लेक्चर के लिये बुलाया गया। अब उन्होंने लेक्चर में क्या कहा, नहीं पता; केरल में क्या देखा, नहीं पता। लेकिन यह पता चल गया कि लेखिका कम्यूनिस्ट होने के साथ-साथ फेमिनिस्ट और दलित-विचारक भी हैं। और आप जानते ही हैं कि दलित-विचारकों का दलितों से कोई लेना-देना नहीं होता, बल्कि गैर-दलितों को अपमानित करना ही लक्ष्य होता है।
“दक्षिण भारत के अधिकांश प्राचीन और ऐतिहासिक शहरों और यहाँ तक कि विकसित चेन्नई में भी एक समानता देखी थी - सब के सब देह से आधुनिक थे पर दिमाग से पौराणिक। अतिरेक में बहता जीवन। हर ललाट पर भभूत का टीका। हर हाथ में मोबाइल। हर घर के बाहर ईश्वरीय आस्था की प्रतीक अल्पना मंडी हुई और हर घर के भीतर ब्रॉड बैंड। सुबह वेदमंत्र, शाम को मॉल में खरीदारी...।”
...
आप किताब अवश्य पढ़िये। महंगी भी नहीं है। शुरू के छह चैप्टर्स बेमिसाल हैं। मज़ाक नहीं कर रहा हूँ। यदि आपको यात्रा-वृत्तांतों का असली जादू पढ़ना हो तो इन छह चैप्टर्स को पढ़िये। प्रकृति-वर्णन का शानदार वर्णन, फिर धीरे-धीरे अपने मनोभावों को ऊँचाईयों पर ले जाकर अचानक ज़मीन पर आ जाना, किसी एक स्थानीय व्यक्ति के दुखों और संघर्षों का वर्णन। और फिर से प्रकृति-वर्णन।
आख़िर के तीन चैप्टर्स यात्रा-वृत्तांत नहीं हैं। इनमें केवल धर्म की, सवर्णों की, स्थानीय रीति-रिवाजों की आलोचना की गयी है। लगता है कि लेखिका से भूलवश ये तीन चैप्टर्स इस किताब में लग गये।

पुस्तक: बादलों में बारूद
लेखिका: मधु कांकरिया
प्रकाशक: किताबघर प्रकाशन
मुद्रक: कुमार ऑफसेट प्रिंटर्स, पटपड़गंज, दिल्ली
आई.एस.बी.एन.: 978-93-83233-90-8
पृष्ठ: 168
अधिकतम मूल्य: 300 रुपये (हार्डकवर)




Comments

  1. भायो मारों को कम्युनिस्ट से उतनी ही प्यार है जितने इस लेखिका को चैनैई से :) कभी ना पढू इसकी किताब वैसे किताब का नाम देख कर उत्सुक हो गया था आप के टिपन्नी ने उस उत्सुकता को शांत कर दिया

    ReplyDelete
  2. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, जोकर “ , मे आप की पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

    ReplyDelete
  3. कम्युनिज्म के गढ़ देशों से कम्युनिज्म खत्म हो गया.
    पर हमारे कुछ देसी लोग इसकी ज्योति जलाये हुए हैं

    ReplyDelete
  4. ना तो कम्युनिस्ट हमारे देश के हुए ना ही इनकी सोच ।।
    इनसे कोई भी उम्मीद करनी बेकार है। ये हमेशा देश और हमारे भारतीय धर्मो का मज़ाक उड़ाते आये है।

    ReplyDelete
  5. पिछले वर्ष आपने एक यात्रा वृतांत सुझाया था 'इनरलाइन पास'। वास्तव में वह बेहतरीन था और उसे कई बार पढ़ चुका हूँ लेकिन अब जब आपने 'बादलों में बारूद' का रिव्यु दे ही दिया है तो कम से कम इस किताब में पैसे बेकार नहीं करूँगा। कम्युनिष्ट विचारधारा मुझे पसंद नहीं।

    अब तो सीधा हमसफ़र एवरेस्ट ही पढ़ा जाएगा।

    ReplyDelete

Post a Comment

Popular posts from this blog

रोरिक आर्ट गैलरी, नग्गर

इस यात्रा वृत्तान्त को आरम्भ से पढने के लिये यहां क्लिक करें । नग्गर का जिक्र हो और रोरिक आर्ट गैलरी का जिक्र न हो, असम्भव है। असल में रोरिक ने ही नग्गर को अन्तर्राष्ट्रीय पहचान दी है। निकोलस रोरिक एक रूसी चित्रकार था। उसकी जीवनी पढने से पता चलता है कि एक चित्रकार होने के साथ-साथ वह एक भयंकर घुमक्कड भी था। 1917 की रूसी क्रान्ति के समय उसने रूस छोड दिया और इधर-उधर घूमता हुआ अमेरिका चला गया। वहां से वह भारत आया लेकिन नग्गर तब भी उसकी लिस्ट में नहीं था। पंजाब से शुरू करके वह कश्मीर गया और फिर लद्दाख, कराकोरम, खोतान, काशगर होते हुए तिब्बत में प्रवेश किया। तिब्बत में उन दिनों विदेशियों के प्रवेश पर प्रतिबन्ध था। वहां किसी को मार डालना फूंक मारने के बराबर था। रोरिक भी मरते-मरते बचा और भयंकर परिस्थितियों का सामना करते हुए उसने सिक्किम के रास्ते भारत में पुनः प्रवेश किया और नग्गर जाकर बस गये। एक रूसी होने के नाते अंग्रेज सरकार निश्चित ही उससे बडी चौकस रहती होगी।

जनवरी में स्पीति: किब्बर भ्रमण

8 जनवरी 2016 बारह बजे के आसपास जब किब्बर में प्रवेश किया तो बर्फबारी बन्द हो चुकी थी, लेकिन अब तक तकरीबन डेढ-दो इंच बर्फ पड चुकी थी। स्पीति में इतनी बर्फ पडने का अर्थ है कि सबकुछ सफेद हो गया। मौसम साफ हो गया। इससे दूर-दूर तक स्पीति की सफेदी दिखने लगी। गजब का नजारा था। किब्बर लगभग 4200 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। इसे दुनिया का सबसे ऊंचा गांव माना जाता है। हालांकि लद्दाख में एकाध गांव इससे भी ऊंचा मिल जायेगा, लेकिन फिर भी यह सबसे ऊंचे गांवों में से तो है ही। यहां पहला कदम रखते ही एक सूचना लिखी दिखी - “आमतौर पर यह परांग ला दर्रा (18800 फीट) माह जून से सितम्बर के बीच खुला रहता है। फिर भी जाने से पहले इसकी सूचना प्रशासन काजा से जरूर लें (दूरभाष संख्या 1906-222202) तथा खास कर 15 सितम्बर के पश्चात दर्रे को पार करने की कोशिश घातक हो सकती है। यदि आप स्थानीय प्रदर्शक को साथ लें तो यह आपकी सुरक्षा के लिये उचित होगा।”

भागसू नाग और भागसू झरना, मैक्लोडगंज

इस यात्रा वृत्तान्त को शुरू से पढने के लिये यहां क्लिक करें । हमारी करेरी झील की असली यात्रा शुरू होती है धर्मशाला से। 23 मई की आधी रात तक मैं, गप्पू और केवल राम योजना बनाने में ही लगे रहे। केवल राम ने पहले ही हमारे साथ जाने से मना कर दिया था। अब आगे का सफर मुझे और गप्पू को ही तय करना था। गप्पू जयपुर का रहने वाला है। एक दो बार हिमालय देख रखा है लेकिन हनीमून तरीके से। गाडी से गये और खा-पीकर पैसे खर्च करके वापस आ गये। जब मैंने करेरी झील के बारे में ‘इश्तिहार’ दिया तो गप्पू जी ने भी चलने की हामी भर दी थी। सुबह कश्मीरी गेट पर जब मैंने गप्पू को पहली बार देखा तो सन्देह था कि यह बन्दा करेरी तक साथ निभा पायेगा। क्योंकि महाराज भारी शरीर के मालिक हैं।