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पुस्तक चर्चा: आख़िरी चट्टान तक

पता नहीं किस कक्षा में मोहन राकेश का एक यात्रा-वृत्तांत था - आख़िरी चट्टान। उस समय तो इसे पढ़ने और प्रश्नों के उत्तर देने के अंक मिलते थे, इसलिये कभी भी यह अच्छा नहीं लगा, लेकिन आज जब यह पूरी किताब पढ़ी तो आनंद आ गया।
आनंददायक यात्रा-वृत्तांत वे होते हैं, जिनमें गतिशीलता भी होती है और रोचकता भी होती है। ‘आख़िरी चट्टान तक’ ठीक इसी तरह की एक किताब है। लेखक ज्यादा देर कहीं ठहरता नहीं है। फटाफट एक वाकया सुनाता है और आगे बढ़ जाता है। गतिशीलता बरकरार रहती है। यात्रा सन 1952 के आख़िरी सप्ताह और 1953 के पहले सप्ताह में की गयी है। भारत नया-नया आज़ाद हुआ और गोवा भी भारत का हिस्सा नहीं था। लेखक ने उस दौरान गोवा की भी यात्रा की। तब दूधसागर जलप्रपात के नीचे से होकर मीटरगेज की ट्रेन भारत से गोवा जाया करती थी। भारत का आख़िरी स्टेशन था केसलरॉक और गोवा का पहला स्टेशन था कुलेम। दोनों ही स्टेशनों पर गाड़ी दो-दो घंटे रुका करती थी - कस्टम जाँच के लिये।




ऐसी-ऐसी बहुत सारी बातें आपको यह किताब पढ़कर ही पता चलेंगी।
“अब मैंने अपने को खुश रखने का एक तरीका सीख लिया है। और वह है खुश रहना। जब कभी मन उदास होने लगता है तो मैं जिस किसी के पास जाकर मज़ाक की दो बातें कर लेता हूँ, वह मुझे हँसोड़ समझता है और मेरी तबियत बहल जाती है।”
“हँसने के लिये इंसान को कहीं जाने की ज़रूरत नहीं। ...आज की दुनिया में इंसान को कहीं भी हँसने का सामान मिल सकता है। आज मंगलूर का एक जौहरी अपनी दुकान में सोने-चांदी के साथ मौसम्बियाँ भी बेचता है, तो सिर्फ़ इसीलिये कि मेरे जैसा आदमी राह चलते रुककर एक बार जोर से ठहाका लगा सके।”

इसके सभी चैप्टर्स के नाम भी बता देते हैं:
1. वांडर लस्ट
2. दिशाहीन दिशा
3. अब्दुल जब्बार पठान
4. नया आरंभ
5. रंग-ओ-बू
6. पीछे की डोरियाँ
7. मनुष्य की एक जाति
8. लाइटर, बीड़ी और दार्शनिकता
9. चलता जीवन
10. वास्को से पंजिम तक
11. सौ साल का गुलाम
12. मूर्तियों का व्यापारी
13. आगे की पंक्तियाँ
14. बदलते रंगों में




15. हुसैनी
16. समुद्र-तट का होटल
17. पंजाबी भाई
18. मलबार
19. बिखरे केंद्र
20. कॉफी, इंसान और कुत्ते
21. बस-यात्रा की साँझ
22. सुरक्षित कोना
23. भास्कर कुरुप
24. यूँ ही भटकते हुए
25. पानी के मोड़
26. कोवलम
27. आख़िरी चट्टान

पुस्तक: आख़िरी चट्टान तक
लेखक: मोहन राकेश
प्रकाशक: भारतीय ज्ञानपीठ
मुद्रक: रुचिका प्रिंटर्स, दिल्ली
आई.एस.बी.एन.: 978-81-263-1932-9
पृष्ठ: 112
अधिकतम मूल्य: 120 रुपये (हार्डकवर)




Comments

  1. "आनंददायक यात्रा-वृत्तांत वे होते हैं, जिनमें गतिशीलता भी होती है और रोचकता भी होती है"....सचमुच!

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  2. मैंने खरीदकर रखी तो हुई है लेकिन अब तक पढना नहीं हो पाया। जल्द ही पढ़ता हूँ।

    ReplyDelete
  3. ''आनंददायक यात्रा-वृत्तांत वे होते हैं, जिनमें गतिशीलता भी होती है और रोचकता भी होती है'' और साथ - साथ फीलिंग्स भी।

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चूडधार की यात्रा कथा तो पढ ही ली होगी। ट्रेकिंग पर जाते हुए मैं जीपीएस से कुछ डाटा अपने पास नोट करता हुआ चलता हूं। यह अक्षांस, देशान्तर व ऊंचाई होती है ताकि बाद में इससे दूरी-ऊंचाई नक्शा बनाया जा सके। आज ज्यादा कुछ नहीं है, बस यही डाटा है। अक्षांस व देशान्तर पृथ्वी पर हमारी सटीक स्थिति बताते हैं। मैं हर दस-दस पन्द्रह-पन्द्रह मिनट बाद अपनी स्थिति नोट कर लेता था। अपने पास जीपीएस युक्त साधारण सा मोबाइल है जिसमें मैं अपना यात्रा-पथ रिकार्ड नहीं कर सकता। हर बार रुककर एक कागज पर यह सब नोट करना होता था। इससे पता नहीं चलता कि दो बिन्दुओं के बीच में कितनी दूरी तय की। बाद में गूगल मैप पर देखा तो उसने भी बताने से मना कर दिया। कहने लगा कि जहां सडक बनी है, केवल वहीं की दूरी बताऊंगा। अब गूगल मैप को कैसे समझाऊं कि सडक तो चूडधार के आसपास भी नहीं फटकती। हां, गूगल अर्थ बता सकता है लेकिन अपने नन्हे से लैपटॉप में यह कभी इंस्टाल नहीं हो पाया।