Skip to main content

पुस्तक-चर्चा: पिघलेगी बर्फ

पुस्तक मेले में घूम रहे थे तो भारतीय ज्ञानपीठ के यहाँ एक कोने में पचास परसेंट वाली किताबों का ढेर लगा था। उनमें ‘पिघलेगी बर्फ’ को इसलिये उठा लिया क्योंकि एक तो यह 75 रुपये की मिल गयी और दूसरे इसका नाम कश्मीर से संबंधित लग रहा था। लेकिन चूँकि यह उपन्यास था, इसलिये सबसे पहले इसे नहीं पढ़ा। पहले यात्रा-वृत्तांत पढ़ता, फिर कभी इसे देखता - ऐसी योजना थी।
उन्हीं दिनों दीप्ति ने इसे पढ़ लिया - “नीरज, तुझे भी यह किताब सबसे पहले पढ़नी चाहिये, क्योंकि यह दिखावे का ही उपन्यास है। यात्रा-वृत्तांत ही अधिक है।” 
तो जब इसे पढ़ा तो बड़ी देर तक जड़वत हो गया। ये क्या पढ़ लिया मैंने! कबाड़ में हीरा मिल गया! बिना किसी भूमिका और बिना किसी चैप्टर के ही किताब आरंभ हो जाती है। या तो पहला पेज और पहला ही पैराग्राफ - या फिर आख़िरी पेज और आख़िरी पैराग्राफ।




उपन्यास का मुख्य पात्र जो भी कोई हो, उसके नाम से हमें मतलब नहीं। आज़ादी से कुछ साल पहले का कथानक है। लाहौर का निवासी था और अपने बाप की मारपीट से तंग आकर घर से भागकर ब्रिटिश फौज में भर्ती हो गया। दूसरा विश्वयुद्ध था और सिंगापुर का मोर्चा मिला। अंग्रेज हार गये तो युद्धबंदी बन गया। इन्हीं लोगों से आज़ाद हिंद फौज बनी। इंफाल की लडाई लड़ी और जब मामला कमजोर पड़ने लगा तो पीछे हटने लगे। इंफाल भारत में था और इतने साल भारत से दूर रहकर जब फिर से भारत से दूर हटने की बात आयी तो अपने एक साथी को लेकर भगोड़ा बन गया। बर्मा और पूर्वोत्तर भारत के जंगल, बारिश का मौसम और जंगल की तमाम तरह की मुश्किलें... इनका साथी एक नदी में बह गया। हमारा मुख्य पात्र भी जोंकों और मच्छरों का शिकार होते-होते मर ही चुका था, लेकिन तब तक वह चलता-चलता तिब्बत की सीमा के नज़दीक पहुँच गया था और एक तिब्बती व्यापारी दल ने इसे बचा लिया।
हमारा नायक ल्हासा में अपने प्राणदाता के घर में रहने लगा और उसकी बेटी के प्यार में पड़ गया। लेखक ने यहाँ एकदम जादू-सा बिखेर दिया है। अगर आपको लेखन में जादू पढ़ना है, तो इस किताब के ये पेज आपको पढ़ने ही होंगे। मैंने शुरू-शुरू में लेखक को कोसा भी कि इतनी अच्छी यात्रा चल रही थी हमारे नायक की, लेकिन यह प्यार का चक्कर क्यों घुसाया बीच में? लेकिन जैसे-जैसे किताब समाप्त होने को आयी, मुझे पता चलता गया कि यह प्यार का चक्कर नहीं था, बल्कि लेखन का जादू था। 
बाद के पन्नों में चीनी सेना तिब्बत पर कब्जा कर लेती है, दलाई लामा तिब्बत छोड़ देते हैं और लेखक को भी सपरिवार तिब्बत छोड़ना पड़ता है। एक बार फिर से यात्रा-वृत्तांत जैसा आनंद आता है, लेकिन भारत पहुँचते-पहुँचते लेखक फिर से अकेला रह जाता है। क्यों अकेला रह जाता है, क्या हुआ था; यह बताकर मैं आपको किताब के असली आनंद से वंचित नहीं करना चाहता। 





पिघलेगी बर्फ (उपन्यास)
लेखक: कामतानाथ
प्रकाशक: भारतीय ज्ञानपीठ
आई.एस.बी.एन. 81-263-1144-4
अधिकतम मूल्य: 155 रुपये (हार्ड कवर)



यदि यह पुस्तक अमेजन पर उपलब्ध नहीं है तो आप भारतीय ज्ञानपीठ की वेबसाइट से यहाँ क्लिक करके खरीद सकते हैं।




Comments

  1. इस तरहा कि diljeet की punjabi movie भी आई है कुछ story मिलती है

    ReplyDelete

Post a Comment

Popular posts from this blog

शिमला के फोटो

2 मई 2009, शनिवार। बीस दिन से भी ज्यादा हो गए थे, तो एक बार फिर से शरीर में खुजली सी लगने लगी घूमने की। प्लान बनाया शिमला जाने का। लेकिन किसे साथ लूं? पिछली बार कांगडा यात्रा से सीख लेते हुए रामबाबू को साथ नहीं लिया। कौन झेले उसके नखरों को? ट्रेन से नहीं जाना, केवल बस से ही जाना, पैदल नहीं चलना, पहाड़ पर नहीं चढ़ना वगैरा-वगैरा। तो गाँव से छोटे भाई आशु को बुला लिया। आखिरी टाइम में दो दोस्त भी तैयार हो गए- पीपी यानि प्रभाकर प्रभात और आनंद। ... तय हुआ कि अम्बाला तक तो ट्रेन से जायेंगे। फिर आगे कालका तक बस से, और कालका से शिमला टॉय ट्रेन से। वैसे तो नई दिल्ली से रात को नौ बजे हावडा-कालका मेल भी चलती है। यह ट्रेन पांच बजे तक कालका पहुंचा देती है। हमें कालका से सुबह साढे छः वाली ट्रेन पकड़नी थी। लेकिन हावडा-कालका मेल का मुझे भरोसा नहीं था कि यह सही टाइम पर पहुंचा देगी।

विशाखापटनम- सिम्हाचलम और ऋषिकोण्डा बीच

इस यात्रा वृत्तान्त को आरम्भ से पढने के लिये यहां क्लिक करें । 16 जुलाई 2014 की सुबह आठ बजे ट्रेन विशाखापट्टनम पहुंची। यहां भी बारिश हो रही थी और मौसम काफी अच्छा हो गया था। सबसे पहले स्टेशन के पास एक कमरा लिया और फिर विशाखापट्टनम घूमने के लिये एक ऑटो कर लिया जो हमें शाम तक सिम्हाचलम व बाकी स्थान दिखायेगा। ऑटो वाले ने अपने साले को भी अपने साथ ले लिया। वह सबसे पीछे, पीछे की तरफ मुंह करके बैठा। पहले तो हमने सोचा कि यह कोई सवारी है, जो आगे कहीं उतर जायेगी लेकिन जब वह नहीं उतरा तो हमने पूछ लिया। वे दोनों हिन्दी उतनी अच्छी नहीं जानते थे और हम तेलगू नहीं जानते थे, फिर भी उन दोनों से मजाक करते रहे, खासकर उनके जीजा-साले के रिश्ते पर। बताया जाता है कि यहां विष्णु के नृसिंह अवतार का निवास है। यह वही नृसिंह है जिसने अपने भक्त प्रह्लाद की उसके जालिम पिता से रक्षा की थी।

लद्दाख बाइक यात्रा- 13 (लेह-चांग ला)

(मित्र अनुराग जगाधरी जी ने एक त्रुटि की तरफ ध्यान दिलाया। पिछली पोस्ट में मैंने बाइक के पहियों में हवा के प्रेशर को ‘बार’ में लिखा था जबकि यह ‘पीएसआई’ में होता है। पीएसआई यानी पौंड प्रति स्क्वायर इंच। इसे सामान्यतः पौंड भी कह देते हैं। तो बाइक के टायरों में हवा का दाब 40 बार नहीं, बल्कि 40 पौंड होता है। त्रुटि को ठीक कर दिया है। आपका बहुत बहुत धन्यवाद अनुराग जी।) दिनांक: 16 जून 2015 दोपहर बाद तीन बजे थे जब हम लेह से मनाली रोड पर चल दिये। खारदुंगला पर अत्यधिक बर्फबारी के कारण नुब्रा घाटी में जाना सम्भव नहीं हो पाया था। उधर चांग-ला भी खारदुंगला के लगभग बराबर ही है और दोनों की प्रकृति भी एक समान है, इसलिये वहां भी उतनी ही बर्फ मिलनी चाहिये। अर्थात चांग-ला भी बन्द मिलना चाहिये, इसलिये आज उप्शी से शो-मोरीरी की तरफ चले जायेंगे। जहां अन्धेरा होने लगेगा, वहां रुक जायेंगे। कल शो-मोरीरी देखेंगे और फिर वहीं से हनले और चुशुल तथा पेंगोंग चले जायेंगे। वापसी चांग-ला के रास्ते करेंगे, तब तक तो खुल ही जायेगा। यह योजना बन गई।