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दिल्ली चिडियाघर

अभी पिछले दिनों चिडियाघर जाना हुआ। दिल्ली घूमने का जिक्र एक दिन मैंने विपिन से कर दिया। वे तुरन्त राजी हो गये। मैंने अविलम्ब चिडियाघर का प्रस्ताव रखा, जिसे उन्होंने मान लिया। रविवार को जाना तय हुआ। शनिवार को धीरज भी गांव से आ गया था।
मैं पहले भी यहां आ चुका था लेकिन तब कैमरा नहीं था। इसलिये इस बार आने का मुख्य उद्देश्य फोटो खींचना ही था। दोपहर से लेकर शाम अन्धेरा होने तक का समय हमारे पास था।
चालीस रुपये प्रति व्यक्ति टिकट और साथ में मुझे कैमरे का पचास रुपये का टिकट भी लेना पडा। चिडियाघर में खाने की कोई भी वस्तु लाना मना है ताकि दर्शक जानवरों को न खिला दें। सूक्ष्म खान पान के लिये अन्दर इन्तजाम है।
मुझे जाने से पहले कुछ जानकारों ने बताया था कि प्रवेश करने के बाद बायीं तरफ मत जाना बल्कि दाहिनी तरफ जाना। कारण? कि बडे बडे जानवर शेर आदि दाहिनी तरफ ही हैं। अगर बायें जायेंगे तो बन्दरों व हिरणों से ही पाला पडेगा, जब तक शेरों तक आयेंगे तो काफी थक चुके होंगे। चूंकि मैं पहले आ चुका था, इसलिये इस बात की जानकारी मुझे भी थी लेकिन मेरा मकसद शेर वगैरा देखना नहीं था। इसलिये प्रवेश करते ही सभी सलाहों को नजरअन्दाज कर दिया। बायीं तरफ चल पडे।
दिल्ली चिडियाघर की खास बात है कि यहां जानवर खुले में हैं। गिने-चुने जानवर ही पिंजरे में हैं। शेर, तेंदुए सब खुले में विचरते हैं। दर्शकों और जानवरों के बीच में मात्र एक बडी सी पानी की खाई है। खाई का डिजाइन ही जानवरों की हद तय करता है। एक जगह तो एक लंगूर खाई पार करके दर्शक दीर्घा में बैठ गया था। बन्दर प्रजाति के लिये खाई पार करना ज्यादा मुश्किल नहीं है। दीवारों और पेडों की टहनियों के प्रयोग के अलावा थोडा सा अपने दिमाग का इस्तेमाल करके ये जीव ऐसा आसानी से कर सकते हैं।
सर्दी का मौसम होने के कारण गुनगुनी धूप निकली थी। सभी जानवर बाहर निकले थे। मगरमच्छों को ज्यादातर दर्शकों ने नकली सिद्ध कर दिया। यह जीव घण्टों बिना हिले डुले एक ही मुद्रा में पडा रहता है। जो दर्शक आधे घण्टे पहले मगरमच्छ को देखकर गये थे, उन्होंने आधे घण्टे बाद भी उसे उसी मुद्रा में देखकर, पत्थर कंकड मारकर यह सिद्ध कर दिया कि ये मोम आदि के पुतले हैं। प्रशासन ने वहां एक सूचना भी टांग रखी है- मगरमच्छों को पत्थर न मारें, यह जिन्दा है।
शेर, बाघ और तेंदुए सभी के लिये शेर ही थे। धीरज मेरे पास आया और बोला कि वहां चीते का बाडा है। अभी तक शेर, बाघ, सफेद बाघ आदि सब दिख गये थे, लेकिन चीता नहीं दिखा था। मैं तुरन्त उधर लपका। दूर से ही जब ‘चीता’ दिखा तो मैंने धीरज को लताडा- यह चीता दिखता है तुझे? तेन्दुए को चीता कहता है।
हिमालयन काले भालू का बाडा खाली दिखा। निराशा हुई। हिमालय के इस खूंखार जीव को कैद में देखने की बडी तमन्ना थी। भगवान करे यह जीव मुझे कभी खुले में न मिले।
विपिन को शायद कुछ जल्दी थी। अभी दिन छिपने के काफी गुंजाइश थी। जब पूरा चक्कर लगा लिया गया तो मैंने कहा कि चलो, कुछ देर बैठते हैं। विपिन ने तुरन्त मना कर दिया कि अब क्या रह गया देखने को? बाहर निकलकर कुछ खाने की इच्छा जाहिर की तो फिर से मना कर दिया कि तुम्हें खाना हो, तो खा लो, हम नहीं खायेंगे। विपिन अगले ही सप्ताह मेरे साथ ऋषिकेश जाने वाले हैं। डर है कि कहीं वहां भी सुकून और खाने के मामले में विवाद न हो जाये।
कुछ फोटो हैं। इनमें से कुछ जानवरों के नाम मैं भूल गया हूं।












ये एक ही मुद्रा में घण्टों पडे रहते हैं। मुंह खुला है तो घण्टों तक खुला ही रहेगा।

जंगली सूअर




दरियायी घोडा










तेन्दुआ


ईमू


आज रविवार होने के कारण अच्छी भीड थी।





Comments

  1. वाह जी :) पीली टी शर्ट वाला प्राणी जाना पहचाना सा लगा । नाम तो हमें भी मालूम नहीं उसका .............बढिया रही चिडियाघर की सैर :)

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    1. Sahi baat hai.yeh parani tou poore bharat m vicharta rahta hai..aapko kasmir to kanyakumari kahi bhi mil sakta hai..."Neeraj jee aapki nazaroo se chidiyaghar dekhkar, phir iccha ho gayi chidiyaghar jaane kee....dhanyabaad

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  2. Prani evam pakshio ka asli nivas to jungle hi hai, photos acche hai

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