Skip to main content

विन्ध्याचल और खजूरी बांध

इस यात्रा वृत्तान्त को शुरू से पढने के लिये यहां क्लिक करें
चुनार से निकलकर हमारा काफिला मीरजापुर की तरफ चल पडा। मीरजापुर से कुछ किलोमीटर पहले एक छोटा सा चौरास्ता है, जहां से हम बायें मुड गये और सुनसान पडी सडक पर चलते चलते खजूरी बांध के समीप पहुंच गये। वैसे तो बांध वो जगह होती है, जहां पानी को बांधा जाता है। यानी जहां पानी के बहाव में रोक लगाई जाती है। वो जगह इस सुनसान सडक से काफी दूर थी, तो यहां ज्यादा समय नष्ट न करते हुए आगे बढ चले। कुछ देर बाद हम बांध पर पहुंचेंगे।
मीरजापुर-राबर्ट्सगंज रोड पर पहुंचे। इस पर करीब दो तीन किलोमीटर के बाद बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय का दक्षिणी परिसर बना है। बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय वैसे तो वाराणसी में है लेकिन इसकी एक शाखा यहां भी है।
चूंकि हम चन्द्रेश की कृपा से बाइकों पर थे तो किसी तरह के आवागमन की कोई परेशानी नहीं थी। अब वापस मीरजापुर की तरफ हो लिये और सीधे पहुंचे खजूरी बांध के मुहाने पर। यहां से एक नहर भी निकाली गई है। बांध होते ही नहरों के लिये हैं। हां, कभी कभी टरबाइन लगाकर बिजली भी बना ली जाती है।
इस बांध में दरारें पडी हुई हैं। इन दरारों से बहुत सारा पानी निकल जाता है। चन्द्रेश को डर है कि अगर इन दरारों की वजह से बांध टूट गया तो मीरजापुर में भारी तबाही मचेगी। लेकिन मुझे ऐसा नहीं लगता। क्योंकि यह इलाका बरसात को छोडकर सूखा ही रहता है। बाकी समय में इसमें पानी भरने का कोई तरीका नहीं है। बरसात में इसमें अधिकतम पानी रहता है। दूसरे, बांध की दीवार तकरीबन बीस-पच्चीस मीटर ऊंची है और लम्बाई भी पचास मीटर के करीब है। चूंकि पानी ज्यादा नहीं है इसलिये बांध टूटने की दशा में कभी भी पूरी दीवार नहीं टूट सकती। दीवार में जो छेद हैं, वे धीरे धीरे बडे होते चले जायेंगे। धीरे धीरे ज्यादा पानी निकलता चला जायेगा और धीरे धीरे इसकी जल-धारण क्षमता भी कम होती चली जायेगी। इसीलिये मुझे तबाही जैसे लक्षण नहीं लगते। यह एक दम तोडता हुआ बांध है।
यहां काफी समय व्यतीत किया गया। घर से लाया गया खाना भी निपटाया गया और अतुल को नहर में नहलाया भी गया।
अब बारी थी अपनी इस यात्रा के आखिरी पडाव यानी विन्ध्याचल की। मीरजापुर बाइपास से होते हुए विन्ध्याचल पहुंचे। सबसे पहले गये काली खोह।
विन्ध्याचल एक शक्तिपीठ है। यहां विन्ध्यवासिनी देवी की पूजा होती है। इसके अलावा रेलवे लाइन के दूसरी तरफ विन्ध्यवासिनी देवी मन्दिर से करीब दो-तीन किलोमीटर दूर अलग-अलग स्थानों पर कालीखोह और अष्टभुजा देवी के मन्दिर हैं। कालीखोह में एक गुफा है, जहां काली का मन्दिर है। जब हम कालीखोह पहुंचे तो बारिश होने लगी।
कालीखोह के आसपास गिजाई बहुत हैं। यह एक कानखजुरे जैसा लेकिन उससे छोटा सीधा-सादा जीव होता है। बरसात के मौसम में ज्यादा दिखाई देता है। कहीं कहीं तो इसके ढेर के ढेर मिल जाते हैं। अक्सर एक के ऊपर एक चढे हुए सैर करते रहते हैं, जो डबल डेकर बस जैसा लगता है। हाथ से पकडकर उठाने पर बेचारा कोई विरोध नहीं करता और छोड देने पर दोबारा चलना शुरू कर देता है।
बारिश होने के कारण काफी देर कालीखोह में ही बैठना पडा। इरादा अष्टभुजा जाने का भी था लेकिन सवा चार बजे हमें इलाहाबाद जाने के लिये जनता एक्सप्रेस पकडनी थी, इसलिये समय कम बचने के कारण अष्टभुजा कैंसिल करके सीधे विन्ध्यवासिनी मन्दिर पहुंचे। मन्दिर तक पहुंचने का रास्ता जहां बेहद गन्दा था, वहीं मन्दिर साफ-सुथरा नजर आया। मन्दिर की सफाई का कारण श्रद्धालुओं का न होना भी है। फिर भी ज्यादातर मन्दिरों की तरह यहां भी पैसे की भूख खूब दिखती है। हाथ में कैमरा देखते ही कई लोगों ने कहा कि यहां का फोटो ले लो, वहां का ले लो। मैंने फोटो लिये भी और फोटो लेते ही तुरन्त हाथ फैल जाता कि अब पैसे दो। पैसे देने के लिये अपने हाथ कभी नहीं बढते।
चार बज चुके थे। ट्रेन बिल्कुल सही समय पर चल रही थी। स्टेशन पर चन्द्रेश और उनके मित्र ने हमें भावपूर्ण विदाई दी। हमें इलाहाबाद जाकर प्रयागराज एक्सप्रेस से दिल्ली जाना था जबकि उन्हें अभी भी खराब मौसम में साठ किलोमीटर दूर अपने गांव जाना था।
और हां, विन्ध्याचल रेलवे स्टेशन भारतीय मानक समय रेखा पर स्थित है।

खजूरी बांध के समीप


खजूरी बांध




बांध से निकली नहर




चन्द्रेश

बांध की क्षतिग्रस्त दीवार





बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय का दक्षिणी परिसर

कालीखोह

गिजाई



विन्ध्यवासिनी मन्दिर






लखनऊ- बनारस यात्रा
1.वर्ष का सर्वश्रेष्ठ घुमक्कड- नीरज जाट
2.बडा इमामबाडा और भूल-भुलैया, लखनऊ
3.सारनाथ
4.बनारस के घाट
5.जरगो बांध व चुनार का किला
6.खजूरी बांध और विन्ध्याचल

Comments

  1. जय माँ विध्यावासिनी देवी....बहुत अच्छी पोस्ट....वन्देमातरम...

    ReplyDelete
  2. बाँध के चित्र बहुत अच्छे है और मुझे भी नहीं लगता है कि यह टूटेगा चित्रों से . विंध्यवासिनी देवी और काली खो यह दोनों देविया मैंने दर्शन किये थे जब मैं बनारस से प्रयाग जा रहा था. विन्ध्यावासिनी शायद अमिताभ बच्चन कि कुलदेवी है .

    ReplyDelete
  3. सौन्दर्य बिखरा पड़ा है, सारे देश में।

    ReplyDelete
  4. सुन्दर यात्रा वृत्तांत. सुन्दर तस्वीरें. हमारे यहाँ गिजाई छूने पर सिकुड़ कर गोल हो जाते हैं.

    ReplyDelete
  5. Bhai ye gijaai nahi mujhe to kaankhajura lag raha hai....

    ReplyDelete
  6. भारतीय मानक समय का बोर्ड भी सरकार ने लगवाया है।आपको उसे भी देखना था और उसकी तस्वीर भी लगानी चाहिए था

    ReplyDelete

Post a Comment

Popular posts from this blog

जाटराम की पहली पुस्तक: लद्दाख में पैदल यात्राएं

पुस्तक प्रकाशन की योजना तो काफी पहले से बनती आ रही थी लेकिन कुछ न कुछ समस्या आ ही जाती थी। सबसे बडी समस्या आती थी पैसों की। मैंने कई लेखकों से सुना था कि पुस्तक प्रकाशन में लगभग 25000 रुपये तक खर्च हो जाते हैं और अगर कोई नया-नवेला है यानी पहली पुस्तक प्रकाशित करा रहा है तो प्रकाशक उसे कुछ भी रॉयल्टी नहीं देते। मैंने कईयों से पूछा कि अगर ऐसा है तो आपने क्यों छपवाई? तो उत्तर मिलता कि केवल इस तसल्ली के लिये कि हमारी भी एक पुस्तक है। फिर दिसम्बर 2015 में इस बारे में नई चीज पता चली- सेल्फ पब्लिकेशन। इसके बारे में और खोजबीन की तो पता चला कि यहां पुस्तक प्रकाशित हो सकती है। इसमें पुस्तक प्रकाशन का सारा नियन्त्रण लेखक का होता है। कई कम्पनियों के बारे में पता चला। सभी के अलग-अलग रेट थे। सबसे सस्ते रेट थे एजूक्रियेशन के- 10000 रुपये। दो चैप्टर सैम्पल भेज दिये और अगले ही दिन उन्होंने एप्रूव कर दिया कि आप अच्छा लिखते हो, अब पूरी पुस्तक भेजो। मैंने इनका सबसे सस्ता प्लान लिया था। इसमें एडिटिंग शामिल नहीं थी।

जिम कार्बेट की हिंदी किताबें

इन पुस्तकों का परिचय यह है कि इन्हें जिम कार्बेट ने लिखा है। और जिम कार्बेट का परिचय देने की अक्ल मुझमें नहीं। उनकी तारीफ करने में मैं असमर्थ हूँ क्योंकि मुझे लगता है कि उनकी तारीफ करने में कहीं कोई भूल-चूक न हो जाए। जो भी शब्द उनके लिये प्रयुक्त करूंगा, वे अपर्याप्त होंगे। बस, यह समझ लीजिए कि लिखते समय वे आपके सामने अपना कलेजा निकालकर रख देते हैं। आप उनका लेखन नहीं, सीधे हृदय पढ़ते हैं। लेखन में तो भूल-चूक हो जाती है, हृदय में कोई भूल-चूक नहीं हो सकती। आप उनकी किताबें पढ़िए। कोई भी किताब। वे बचपन से ही जंगलों में रहे हैं। आदमी से ज्यादा जानवरों को जानते थे। उनकी भाषा-बोली समझते थे। कोई जानवर या पक्षी बोल रहा है तो क्या कह रहा है, चल रहा है तो क्या कह रहा है; वे सब समझते थे। वे नरभक्षी तेंदुए से आतंकित जंगल में खुले में एक पेड़ के नीचे सो जाते थे, क्योंकि उन्हें पता था कि इस पेड़ पर लंगूर हैं और जब तक लंगूर चुप रहेंगे, इसका अर्थ होगा कि तेंदुआ आसपास कहीं नहीं है। कभी वे जंगल में भैंसों के एक खुले बाड़े में भैंसों के बीच में ही सो जाते, कि अगर नरभक्षी आएगा तो भैंसे अपने-आप जगा देंगी।

2011 की घुमक्कडी का लेखा-जोखा

2011 चला गया। यह एक ऐसा साल था जिसमें अपनी घुमक्कडी खूब परवान चढी। जहां एक तरफ ग्रेट हिमालयन नेशनल पार्क के बर्फीले पहाडों में जाना हुआ, वहीं समुद्र तट भी पहली बार इसी साल में देखा गया। भारत का सबसे बडा शहर कोलकाता देखा तो नैरो गेज पर चलनी वाली गाडियों में भी सफर किया गया। आज पेश है पूरे सालभर की घुमक्कडी पर एक नजर: 1. कुमाऊं यात्रा: 20 से 24 फरवरी तक अतुल के साथ यह यात्रा की गई। जनवरी की ठण्ड में रजाई से बाहर निकलने का मन बिल्कुल नहीं करता, लेकिन जैसे ही फरवरी में रजाई का मोह कम होने लगता है तो सर्दियों भर जमकर सोया घुमक्कडी कीडा भी जागने लगता है। इस यात्रा में अतुल के रूप में एक सदाबहार घुमक्कड भी मिला। इस यात्रा में कुमाऊं के एक गांव भागादेवली के साथ रानीखेत , कौसानी और बैजनाथ की यात्रा की गई। बाद में अतुल पिण्डारी ग्लेशियर की यात्रा पर भी साथ गया था।