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केरला रेलवे स्टेशन

हां जी, केरला रेलवे स्टेशन। अक्सर स्टेशनों के बाद सम्बन्धित राज्य का नाम लगा हुआ तो सबने देखा ही होगा, जैसे कि रामनगर जम्मू कश्मीर, रामनगर बंगाल, माधोपुर पंजाब, किलांवाली पंजाब, ऊना हिमाचल, धरमपुर हिमाचल, पालमपुर हिमाचल, बरियाल हिमाचल, सुलाह हिमाचल, फतेहगढ हरियाणा, बिशनपुर हरियाणा, दौलतपुर हरियाणा, इस्माइला हरियाणा, रायपुर हरियाणा, भवानीपुर बिहार, गुण्डा बिहार, जागेश्वर बिहार, लालगढ बिहार, बहादुरपुर बंगाल, श्रीरामपुर आसाम, चन्द्रपुर महाराष्ट्र, सीहोर गुजरात, ऊना गुजरात आदि। लेकिन कभी सीधे राज्य के नाम का स्टेशन नहीं देखा होगा। आज आपकी यह हसरत भी पूरी होने वाली है। अगर आप दिल्ली को राज्य मानते हैं तो थोडी देर के लिये इसे साइड में रख दीजिये।
भारत के केरल राज्य को पहाडियों और हरियाली और इसकी प्राकृतिक सुन्दरता के लिये इतना ज्यादा जाना जाता है कि इसे देवताओं का अपना देश कहा जाता है। लेकिन मैं जिस केरला के बारे में बताने वाला हूं, वहां थोडी दूर एक छोटी सी पहाडी तो है लेकिन हरियाली? नहीं। प्राकृतिक सुन्दरता? नहीं। 

यह राजस्थान के अन्दर है। यानी राजस्थान के अन्दर केरला। यह मात्र एक छोटा सा स्टेशन है। चलिये, ज्यादा नहीं घुमाते। यह है पाली जिले में और जोधपुर – मारवाड लाइन पर। जब मारवाड से जोधपुर की तरफ चलेंगे, तो पाली मारवाड स्टेशन से अगला ही है- केरला (Kairla/KAI)। यहां से दिनभर में पचास के करीब ट्रेनें गुजरती हैं, लेकिन रुकती हैं केवल दो। दोनों की दोनों पैसेंजर हैं- जोधपुर-अजमेर पैसेंजर और जोधपुर-अहमदाबाद पैसेंजर।  

केरला स्टेशन



मैं अपनी मावली – मारवाड मीटर गेज रेलयात्रा पूरी करके मारवाड पहुंच गया था। अब जाना था मुझे जोधपुर। मेरा रिजर्वेशन जोधपुर से था। अपनी गाडी जोधपुर से रात ग्यारह बजे के बाद चलनी थी, इसलिये मुझे जोधपुर पहुंचने की जल्दी नहीं थी। तभी मारवाड स्टेशन पर अजमेर-जोधपुर पैसेंजर आई। इसे यहां रिवर्स होना था, यानी इंजन आगे से हटाकर पीछे लगाया जाना था, तो यह निश्चित था कि ट्रेन अभी करीब बीस-तीस मिनट जरूर रुकेगी। मैं भागकर टिकट ले आया। इसके चलने से पहले बराबर वाले प्लेटफार्म पर अहमदाबाद-जोधपुर पैसेंजर आ लगी। इन दोनों पैसेंजर गाडियों को पन्द्रह मिनट के अन्तराल पर ही जोधपुर के लिये निकल लेना था। अच्छा हां, एक बात जरूर हुई कि अहमदाबाद वाली की लगभग सभी सवारियां अजमेर वाली में आ गईं क्योंकि सवारियों को पता था कि अजमेर वाली गाडी पहले चलेगी। तो अहमदाबाद वाली पैसेंजर बिल्कुल खाली हो गई थी। मैं इसी से जाने की सोचने लगा। आराम से ढाई तीन घण्टे तक सोता हुआ जाऊंगा। 

लेकिन पता नहीं क्यों, जब अजमेर-जोधपुर पैसेंजर चली तो मैं उसमें चढ लिया। राजकियावास, बोमादडा के बाद पाली मारवाड आता है। पाली में पूरी ट्रेन खाली। पाली से अगला स्टेशन केरला है ही। जैसे ही मैंने इसे देखा, तो इसका फोटू खींचना बनता था। उतर गया कि आराम से फोटो खींचूंगा। पीछे पीछे अहमदाबाद वाली आ ही रही है। यह ट्रेन चली गई, मैं अकेला केरला स्टेशन पर रह गया। आराम से फोटो खींचा। फिर स्टेशन मास्टर के कार्यालय के सामने पडी बेंचों पर जा बैठा। इन बेंचों से कार्यालय के अन्दर सबकुछ दिख रहा था। और पास भी इतना था कि अन्दर लोगबाग क्या बातें कर रहे हैं, सबकुछ सुनाई पड रहा था। और कुछ शाम का समय, गांव का माहौल। 

केरला के एक तरफ पाली है तो दूसरी तरफ रोहट। केरला मास्टर साहब ने जब पाली मास्टर से नम्बर एक्सचेंज किया तो मैं समझ गया कि मेरी वाली पैसेंजर को रोककर यशवंतपुर-जोधपुर एक्सप्रेस को निकाला जायेगा। असल में रेलवे का इतना बडा तामझाम यानी नेटवर्क है कि ट्रेनों को चलाना कोई आसान काम नहीं है। मैंने इंग्लिश फिल्मों में देखा है कि विदेशों में पूरी की पूरी लाइन का कंट्रोल एक केन्द्रीय हाथ में रहता है। मुम्बई लोकल में भी ऐसा ही है। कौन सी गाडी किस लाइन पर चलानी है, किस पर डायवर्ट करनी है, यह निर्णय स्टेशन मास्टर का नहीं होता बल्कि वही केन्द्रीय हाथ करता है। लेकिन रेलवे में अपने स्टेशन से किसी ट्रेन को सही सलामत निकालने की सारी जिम्मेवारी मास्टर की होती है। इससे भी बडी बात यह है कि उसे अपने दोनों तरफ वाले मास्टरों से भी तालमेल बिठाना पडता है। कहीं ऐसा ना हो कि एक ने अपने इधर से भी गाडी निकाल दी और दूसरे ने अपने इधर से। सिंगल लाइन ट्रेक हो तो दोनों की भिडन्त हो जायेगी। हालांकि रेलवे में सिग्नलिंग सिस्टम बहुत भरोसेमंद है, ऐसा होता नहीं है। फिर भी दोनों मास्टरों में तालमेल होना जरूरी है। इसी तालमेल के लिखित सबूत के लिये प्राइवेट नम्बर की अदला-बदली जैसा कुछ सिस्टम होता है। जिस तरह न्यायालय में अपराधी गीता पर हाथ रखकर कसम खाता है कि मेरा भरोसा करना, उसी तरह यहां गीता तो नहीं होती, प्राइवेट नम्बर होते हैं। चलो, इसके बारे में ज्यादा नहीं सोचते। 

यशवन्तपुर-जोधपुर एक्सप्रेस निकल गई। फिर कुछ देर बाद खबर आती है कि सूर्य नगरी एक्सप्रेस को निकालेंगे। यह ट्रेन जोधपुर से आयी और बान्द्रा चली गई। अब तक मेरी अहमदाबाद पैसेंजर एक घण्टे लेट हो गई थी। आखिरकार वो भी आई। प्लेटफार्म पर लगी, तो मैं चढ लिया। वो बेचारी पहले से ही खाली थी, अब भी खाली ही थी। शायद उस पूरे डिब्बे में मैं ही अकेला यात्री था। फिर तो हां, याद आया। लूनी जंक्शन जाकर साठ रुपये किलो वाले रसगुल्ले भी लिये थे। दिल्ली आकर खाये तो मजा आ गया मारवाडी रसगुल्ले खाने में। मैं पहले कभी लूनी गया था तो बेचने वाले एक-एक किलो के डिब्बों को पूरे जोर-शोर से बेच रहे थे। तब भाव पचास रुपये किलो था। मैं तभी समझ गया था कि जरूर यहां रसगुल्ले बनाने का काम लघु उद्योग का रूप ले चुका होगा। 

और बस फिर क्या? जोधपुर और जोधपुर से दिल्ली।

10 comments:

  1. स्‍पेलिंग भी अलग तरह की है.

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  2. सुन्दर प्रस्तुति ||

    दिनेश की टिप्पणी : आपका लिंक
    dineshkidillagi.blogspot.com
    होली है होलो हुलस, हुल्लड़ हुन हुल्लास।
    कामयाब काया किलक, होय पूर्ण सब आस ।।

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  3. बढ़िया वृतांत ...
    शीर्षक से लगा कि चौधरी केरल में है !
    रंगोत्सव की शुभकामनायें !

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  4. राजस्थान में केरला के दर्शन, वाह!

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  5. सुंदर प्रस्तुति जी ,,
    आप को होली की हार्दिक सुभकामनाएँ ..

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  6. कैर्ला लिखा जाना चाहिये था..

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  7. रसगुल्ले खा कर मिठास आ गई
    केरला की पहरी नहीं दिखाई
    अपुन का फोटू भी नहीं लिया
    sarvesh n vashistha

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  8. केरला पर रोचक जानकारी और दिलचश्प यात्रा विवरण भी.

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  9. नीरज जी आप दक्षिण भारत की यात्रा क्यों नहीं करते

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  10. http://indiarailinfo.com/blog/post/592123 , yeh dekhiyr karaila

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