Thursday, September 28, 2017

पुस्तक-चर्चा: पिघलेगी बर्फ

पुस्तक मेले में घूम रहे थे तो भारतीय ज्ञानपीठ के यहाँ एक कोने में पचास परसेंट वाली किताबों का ढेर लगा था। उनमें ‘पिघलेगी बर्फ’ को इसलिये उठा लिया क्योंकि एक तो यह 75 रुपये की मिल गयी और दूसरे इसका नाम कश्मीर से संबंधित लग रहा था। लेकिन चूँकि यह उपन्यास था, इसलिये सबसे पहले इसे नहीं पढ़ा। पहले यात्रा-वृत्तांत पढ़ता, फिर कभी इसे देखता - ऐसी योजना थी।
उन्हीं दिनों दीप्ति ने इसे पढ़ लिया - “नीरज, तुझे भी यह किताब सबसे पहले पढ़नी चाहिये, क्योंकि यह दिखावे का ही उपन्यास है। यात्रा-वृत्तांत ही अधिक है।” 
तो जब इसे पढ़ा तो बड़ी देर तक जड़वत हो गया। ये क्या पढ़ लिया मैंने! कबाड़ में हीरा मिल गया! बिना किसी भूमिका और बिना किसी चैप्टर के ही किताब आरंभ हो जाती है। या तो पहला पेज और पहला ही पैराग्राफ - या फिर आख़िरी पेज और आख़िरी पैराग्राफ।
उपन्यास का मुख्य पात्र जो भी कोई हो, उसके नाम से हमें मतलब नहीं। आज़ादी से कुछ साल पहले का कथानक है। लाहौर का निवासी था और अपने बाप की मारपीट से तंग आकर घर से भागकर ब्रिटिश फौज में भर्ती हो गया। दूसरा विश्वयुद्ध था और सिंगापुर का मोर्चा मिला। अंग्रेज हार गये तो युद्धबंदी बन गया। इन्हीं लोगों से आज़ाद हिंद फौज बनी। इंफाल की लडाई लड़ी और जब मामला कमजोर पड़ने लगा तो पीछे हटने लगे। इंफाल भारत में था और इतने साल भारत से दूर रहकर जब फिर से भारत से दूर हटने की बात आयी तो अपने एक साथी को लेकर भगोड़ा बन गया। बर्मा और पूर्वोत्तर भारत के जंगल, बारिश का मौसम और जंगल की तमाम तरह की मुश्किलें... इनका साथी एक नदी में बह गया। हमारा मुख्य पात्र भी जोंकों और मच्छरों का शिकार होते-होते मर ही चुका था, लेकिन तब तक वह चलता-चलता तिब्बत की सीमा के नज़दीक पहुँच गया था और एक तिब्बती व्यापारी दल ने इसे बचा लिया।
हमारा नायक ल्हासा में अपने प्राणदाता के घर में रहने लगा और उसकी बेटी के प्यार में पड़ गया। लेखक ने यहाँ एकदम जादू-सा बिखेर दिया है। अगर आपको लेखन में जादू पढ़ना है, तो इस किताब के ये पेज आपको पढ़ने ही होंगे। मैंने शुरू-शुरू में लेखक को कोसा भी कि इतनी अच्छी यात्रा चल रही थी हमारे नायक की, लेकिन यह प्यार का चक्कर क्यों घुसाया बीच में? लेकिन जैसे-जैसे किताब समाप्त होने को आयी, मुझे पता चलता गया कि यह प्यार का चक्कर नहीं था, बल्कि लेखन का जादू था। 
बाद के पन्नों में चीनी सेना तिब्बत पर कब्जा कर लेती है, दलाई लामा तिब्बत छोड़ देते हैं और लेखक को भी सपरिवार तिब्बत छोड़ना पड़ता है। एक बार फिर से यात्रा-वृत्तांत जैसा आनंद आता है, लेकिन भारत पहुँचते-पहुँचते लेखक फिर से अकेला रह जाता है। क्यों अकेला रह जाता है, क्या हुआ था; यह बताकर मैं आपको किताब के असली आनंद से वंचित नहीं करना चाहता। 

लेखक: कामतानाथ
प्रकाशक: भारतीय ज्ञानपीठ
आई.एस.बी.एन. 81-263-1144-4
अधिकतम मूल्य: 155 रुपये (हार्ड कवर)



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