Monday, November 14, 2016

देवरिया ताल

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1 नवंबर, 2016
सुबह पौड़ी से बिना कुछ खाये-पीये चले थे, अब भूख लगने लगी थी। लेकिन खाना खायेंगे तो नींद आयेगी और मैं इस अवस्था में बाइक नहीं चलाना चाहता था। पीछे बैठी निशा को बड़ी आसानी से नींद आ जाती है और वह झूमने लगती है। इसलिये उसे भी भरपेट भोजन नहीं करने दूँगा। इसलिये हमारी इच्छा थी थोड़ी-बहुत पकौड़ियाँ चाय के साथ खाना। रुद्रप्रयाग में हमारी पकौड़ी खाने की इच्छा पूरी हो जायेगी।
लेकिन रुद्रप्रयाग से आठ किलोमीटर पहले नारकोटी में कई होटल-ढाबे खुले दिखे। चहल-पहल भी थी, तो बाइक अपने आप ही रुक गयी। स्वचालित-से चलते हुए हम सबसे ज्यादा भीड़ वाले एक होटल में घुस गये और 60 रुपये थाली के हिसाब से भरपेट रोटी-सब्जी खाकर बाहर निकले। यहाँ असल में लंबी दूरी के जीप वाले रुकते हैं। जीप के ड्राइवरों के लिये अलग कमरा बना था और उनके लिये पनीर-वनीर की सब्जियाँ ले जायी जा रही थीं। बाकी अन्य यात्रियों के लिये आलू-गोभी की सब्जी, दाल-राजमा, कढी और चावल थे। हाँ, खीर भी थी। खीर एक कटोरी ही थी, बाकी कितना भी खाओ, सब 60 रुपये में। 



अब रुद्रप्रयाग में पकौड़ियाँ खाने के लिये रुकने की कोई आवश्यकता नहीं थी। इसलिये बाईपास से निकल पड़े। यह शुरू में एकाध किलोमीटर ख़राब है, फिर ठीक है। श्रीनगर से आने वाली और मंदाकिनी घाटी में जाने वाली गाड़ियों के लिये यह बाईपास बहुत काम का है। रुद्रप्रयाग की भीड़ से बच जाते हैं। इसी मार्ग पर महाराष्ट्र की एक गाड़ी मिली। उन्होंने हमें रुकवाया - यह सड़क ऋषिकेश जाती है क्या? हमने भी कह दिया - हाँ जी, जाती है। सीधे चलते जाओ। 
रुद्रप्रयाग से मंदाकिनी घाटी में सड़क अच्छी बनी है और दो लेन की है। पहले तिलवाड़ा आता है, फिर अगस्त्यमुनि, फिर चंद्रापुरी और फिर कुंड़। हमें नारकोटी से यहाँ आने में डेढ़ घंटा लगा। अभी डेढ़ ही बजा था। हमें आज चोपता तक ही जाना था, जो कि यहाँ से केवल 30 किलोमीटर दूर था। आराम से एक-एक कप चाय पी और आधे घंटे तक बैठे रहे। यहाँ से बायें मंदाकिनी पार करके रास्ता गुप्तकाशी चला जाता है, जिससे आगे केदारनाथ जाया जा सकता है। सीधा रास्ता ऊखीमठ जाता है। यहाँ निशा का मन डोल गया - केदारनाथ इतना नज़दीक है, तो केदार ही चलते हैं। मैंने कहा - लेकिन डेढ़ किलो का लैपटॉप हम साथ लिये फिर रहे हैं, इसे किसके यहाँ पटकेंगे? 18 किलोमीटर एक तरफ़ का रास्ता है। सुनते ही निशा बोली - चोपता ही चलो।
दो बजे कुंड़ से चल दिये। अभी तक तो निशा को पता नहीं था कि देवरिया ताल भी इधर ही कहीं है, लेकिन अब पता चल गया। ऊखीमठ के पास सड़क किनारे एक बोर्ड़ पर इसके बारे में लिखा था। मेरी योजना चोपता-तुंगनाथ से लौटते में देवरिया ताल जाने की थी। निशा कहने लगी कि आज समय भी है, देवरिया ताल ही चलते हैं। अंधेरा होने तक आराम से चोपता पहुँच जायेंगे। उधर मैं चाहता था कि उजाले-उजाले में चोपता जायें। कल तुंगनाथ देखकर शाम तक देवरिया ताल के आधार-स्थल सारी गाँव में रुक जायें और परसों देवरिया ताल देखकर वापस हरिद्वार और दिल्ली की तरफ़ प्रस्थान कर जायें। 
लेकिन निशा नहीं मानी - आज ही देवरिया ताल चलो। मैंने पीछा छुड़ाने की गरज से कहा - आगे जहाँ भी देवरिया ताल का रास्ता अलग होगा, बता देना। उसने हामी भर ली और सड़क किनारे के सभी बोर्ड़ों को गौर से पढ़ने लगी।
मैं जानता था कि उसे देवरिया ताल यानी सारी के रास्ते के बारे में कभी भी पता नहीं चलेगा। मस्तूरा से आगे जहाँ सारी जाने वाला तिराहा है, मैंने बाइक सारी की तरफ़ मोड़ ली। जब सारी गाँव में प्रवेश कर रहे थे, मैंने निशा से पूछा - कौन-सा गाँव है यह? मैं अक्सर उससे यह सब पूछता रहता हूँ। मसलन सामने से जो बस आ रही है, वह कहाँ जा रही है या यह कौन-सा गाँव है। इससे उसका ध्यान बँटा रहता है और नींद आने की संभावना कम हो जाती है। हालाँकि मुझे तो पता था कि यह सारी है, फिर भी उससे पूछ लिया। और जैसे ही उसने एक होटल के बोर्ड़ पर सारी, देवरिया ताल लिखा देखा तो खुशी से झूम उठी - ओ! यह तो देवरिया ताल है।
समुद्र तल से सारी की ऊँचाई 2000 मीटर है और देवरिया ताल की 2400 मीटर। सारी से देवरिया ताल 2.3 किलोमीटर का पैदल रास्ता है। बाइक एक होटल के सामने खड़ी की, एक-एक कप चाय पी और चढ़ाई शुरू कर दी। पूरा एक घंटा लगा हमें ऊपर तक जाने में। झील से थोड़ा-सा पहले कुछ दुकानें भी मिलीं। झील पर दुकान लगाने की अनुमति नहीं है। हाँ, तंबू लगा सकते हैं। कुछ तंबू लगे हुए थे। कुछ विदेशी थे और कुछ बंगाली थे। शाम का समय था। उधर चौखंबा समेत सभी चोटियाँ बादलों के पीछे छुपी थीं, लेकिन झील बेहद खूबसूरत लग रही थी। साफ़ पानी में अच्छा प्रतिबिंब बन रहा था।
मैं पहले भी यहाँ आ चुका था और सारी से चढ़कर उधर मदमहेश्वर की तरफ़ मनसूना में उतरा था। फिर हमें आज ही चोपता भी पहुँचना था, इसलिये हम यहाँ ज्यादा देर नहीं रुके। एक बंगाली बुजुर्ग को पकड़कर अपने फोटो खिंचवाये और वापसी की दौड़ लगा दी। वन विभाग के ‘दफ़्तर’ में एक लड़का मोबाइल में लगा हुआ था, अन्यथा हम दोनों की 300 रुपये की पर्ची कट जाती। यहाँ आने वाले प्रत्येक यात्री की 150 रुपये की पर्ची कटती है। हालाँकि चार-पाँच साल पहले उत्तराखंड़ वालों को इसमें छूट थी, मैं ‘हरिद्वार-निवासी’ कहकर बच गया था। इस बार भी मन बना लिया था कि हरिद्वार, शिवालिक नगर, सेक्टर एक बताऊँगा। 300 रुपये बचेंगे, तो बल्ले-बल्ले हो जायेगी।
लेकिन हमें झूठ बोलने की आवश्यकता नहीं पड़ी। लड़के ने हमारी तरफ़ देखा तक नहीं। पौन घंटा नीचे उतरने में लगा। सामने चोपता का डांडा दिख रहा था और उसके बायें तुंगनाथ और उसके पीछे सिर उठाती चंद्रशिला। निशा को भी अवगत करा दिया कि हमें वहाँ पहुँचना है। बीच में घना जंगल भी दिख रहा था।
सवा पाँच बजे सारी पहुँचे। अब मेरा मन चोपता जाने का नहीं था। कुछ ही देर में अंधेरा हो जायेगा। मैं अंधेरे में बाइक चलाना पसंद नहीं करता। दूरी बीस किलोमीटर से ज्यादा है, यानी एक घंटा कम से कम लगेगा। ऊपर से जंगल। अंधेरा होते ही जंगली जानवर भी बाहर निकलने लगते हैं। लेकिन एक तो निशा की ज़िद और दूसरे कुछ अन्य लोगों के कारण हमने बाइक स्टार्ट कर ही दी। कुछ और यात्री भी ऊपर देवरिया ताल गये थे। उनका ड्राइवर यहाँ उनकी प्रतीक्षा कर रहा था। उसने बताया कि वे भी आज चोपता ही रुकेंगे। एक बुलेट वाला भी चोपता जाने को तैयार बैठा था। यह सब देखकर हमें भी चलना पड़ा। 
रास्ते भर गाड़ियाँ और बाइकें आती-जाती मिलीं। पूरा एक घंटा लगा हमें चोपता पहुँचने में। यहाँ ठंड़ चरम पर थी। उंगलियों की भयंकर बुरी हालत हो गयी। 300 रुपये में कमरा पक्का करके बाइक और सामान बाहर ही छोड़कर आधे घंटे चूल्हे के पास बैठना पड़ा, तब जाकर उंगलियाँ सामान्य हुईं।

कुंड़ में

देवरिया ताल के रास्ते में

देवरिया ताल की पगडंड़ी से दिखते तुंगनाथ और चंद्रशिला

देवरिया ताल की पगडंड़ी

देवरिया ताल






सारी गाँव


सारी में एक मंदिर


पहुँच गये चोपता










4 comments:

  1. सब 60 रुपये में।
    इतना सस्ता !... कमाल है .... तुम्हारे इस जानकारी के वजह से यात्रा करना आसांन होता है

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  2. आज जरा ध्यान से तुम्हारी फोटोग्राफी देखी .... सच कहता हू .... उच्चंस्तरीय फोटोग्राफी !!...

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