Monday, May 6, 2013

सराहन की ओर

23 अप्रैल 2013
कई दिनों की जद्दोजहद के बाद तय हुआ कि किन्नौर चला जाये। बीस दिन पहले की गई कांगडा यात्रा के दौरान दिल्ली से कांगडा जाने की बस यात्रा में बुरी हालत हो गई थी। उससे सबक लिया गया और कालका तक रेल से जाने के लिये हिमालयन क्वीन में आरक्षण भी करा लिया था। यह ट्रेन सराय रोहिल्ला से सुबह पौने छह बजे चलती है। डिपो से पांच बजे निकलने वाली पहली मेट्रो पकडी और कुछ ही देर में शास्त्री नगर और वहां से पैदल दस मिनट में सराय रोहिल्ला। जब मैं स्टेशन पहुंचा, तब तक ट्रेन प्लेटफार्म पर लगी भी नहीं थी।
पहले यह गाडी निजामुद्दीन से चलती थी और नई दिल्ली, सब्जी मण्डी रुकते हुए आगे की यात्रा करती थी। मैंने पहले भी इसे एक बार सब्जी मण्डी से पकडा है। उस समय यह ज्यादा मित्रवत प्रतीत होती थी। अब सराय रोहिल्ला से चलती है तो लगता है जैसे विदेश से चलती हो। इतनी सुबह नई दिल्ली के मुकाबले सराय रोहिल्ला विदेश जाने के बराबर ही है।
गाडी प्लेटफार्म पर लगी। इसमें बैठने की सीटें होती हैं। मेरी सीट खिडकी वाली थी, बराबर में किसी का आरक्षण नहीं था। तुरन्त लेट गया और सो गया। एक जगह टीटी आया टिकट चेक करने बस।
सोनीपत में हल्ला सुनकर आंख खुली तो देखा कि डिब्बे में भीड चढती जा रही है। इससे पहले कि कोई मुझे उठाता, मैं अपने ही आप बैठ गया। ट्रेन पूरी तरह भर गई और कुछ यात्री खडे भी रह गये। ये यात्री आरक्षित नहीं थे। टीटी को आकर पन्द्रह पन्द्रह रुपये लेकर आरक्षण की पर्ची काटनी थी, लेकिन वो नहीं आया।
पानीपत में गाडी का बीस मिनट का ठहराव है। भिवानी से आने वाली एकता एक्सप्रेस भी इसमें जुड जाती है। ब्रेड पकौडे बिक रहे थे, लेकिन बिना आलू के कैसे पकौडे? आखिरकार जब ब्रेड आमलेट वाला आया तो झट से चालीस रुपये देकर ले लिये।
फिर कब करनाल गुजरा, कब कुरुक्षेत्र गुजरा, पता ही नहीं चला, नींद आ गई। अम्बाला में आंख खुली। काफी सवारियां उतर गईं लेकिन फिर भी सभी सीटें भरी रहीं। चण्डीगढ जाकर गाडी खाली हुई। ग्यारह बजे कालका पहुंचे।
कालका उतरकर सबसे पहला काम किया गया नहाने का। रात भर का जगा था, आलस भी आ रहा था, नहाने से तरोताजा हो गया। स्टेशन पर शताब्दी एक्सप्रेस की प्रतीक्षा हो रही थी, ताकि उसके आने के बाद छोटी ट्रेन शिमला जा सके। मुझे इस ट्रेन से नहीं जाना था। छह घण्टे लगाती है, बस से तीन घण्टे लगते हैं।
स्टेशन के सामने से सीधी जाती सडक बाजार में चली जाती है और आखिरकार शिमला रोड में जा मिलती है। भोजन करके शिमला की बस पकडी। 102 रुपये लगे। दो घण्टे में सोलन पहुंचे जबकि उसके बाद एक ही घण्टे में शिमला।
शिमला में शहर से बाहर नया बस अड्डा है। शहर के अन्दर अत्यधिक भीड वाली जगह पर पुराना अड्डा है, जबकि एक बस अड्डा लक्कड बाजार में नारकण्डा रोड पर भी है। सभी बसें अब नये बस अड्डे से संचालित होती हैं।
शिमला में मुझे यूपी रोडवेज की सहारनपुर डिपो की बस खडी दिखाई दी। यूपी रोडवेज व उत्तराखण्ड रोडवेज की मैदानों में चलने वाली बसें अत्यधिक लम्बी होती हैं। उत्तराखण्ड के पहाडों पर ये बसें नहीं चला करतीं। इसलिये भी इस बस को यहां शिमला में खडी देखकर मुझे आश्चर्य हुआ।
शीघ्र ही नारकण्डा की बस मिल गई। हिमाचल की बसों में आरक्षण प्रथा है। इस बस की सीटों का आरक्षण लक्कड बाजार से होता है। कंडक्टर ने मुझसे कहा कि वहां जाकर नीचे उतरकर सीट का आरक्षण कराना होगा। मुझे डर था कि मुझसे पहले ही वहां काफी भीड होगी, इसलिये मुझे यह खिडकी वाली सीट मिले न मिले। यह जिम्मेदारी मैंने कंडक्टर को ही दे दी। कंडक्टर मान गया।
मैं पहले श्रीखण्ड महादेव की यात्रा के समय इस मार्ग से गुजर चुका हूं लेकिन उस समय यात्रा मोटरसाइकिल से की थी। तब हम दिल्ली से सुबह चार बजे चलकर शाम तक नारकण्डा पहुंचे थे। आगे जा सकते थे लेकिन नारकण्डा तक आने में ही इतनी बुरी हालत हो गई कि यहीं रुकना पडा। वहीं हालात अब भी होने लगे। शाम के छह बजे बस नारकण्डा पहुंची। पिछले सात घण्टों से लगातार पहाडों पर गोल-गोल घूमकर मेरी हालत पतली सी हो गई थी। जाने को तो अगले दो घण्टों में रामपुर जाया जा सकता था, यहां तक कि रात दस बजे तक सराहन भी, लेकिन नारकण्डा में जब बस से उतरा तो लगा जैसे जेल से निकला हूं। रामपुर की बस पकडने की हिम्मत नहीं हुई।
सीधे उसी रेस्ट हाउस में पहुंचा, जहां दो साल पहले श्रीखण्ड यात्रा के समय गये थे- पीडब्ल्यूडी के रेस्ट हाउस में। जाते ही कमरा मिल गया।
नारकण्डा के साथ एक याद और जुडी है- जलेबी की। जलेबी की तलाश में निकला तो नहीं मिली। और मिलेगी भी कैसे, चाउमीन तो खाई ही नहीं थी। आखिरकार पाव भर बर्फी और आधा किलो बंगाली रसगुल्ले लेकर ही संतोष करना पडा।
नारकण्डा समुद्र तल से लगभग 2700 मीटर ऊपर है, मौसम हमेशा ठण्डा रहता है। रजाईयों की आवश्यकता पडती है। इस बार सर्दियों में शिमला-नारकण्डा सडक भारी बर्फबारी के कारण कई कई दिनों तक बन्द रही थी। थानाधार-कोटगढ के साथ मिलकर यह सेब का जबरदस्त उत्पादन करता है। अभी सेब के पेड बौराये हुए हैं। बौर को औलों से बचाने के लिये इनपर विशेष प्रकार का त्रिपाल डाल रखा है। दूर दूर तक पहाडों का बडा हिस्सा इन त्रिपालों से ढका हुआ है।
इस यात्रा पर चलने से पहले मेरी अपने मित्र डॉ करण से बात हुई थी। वे एक बार सर्दियों में काजा तक जा चुके हैं। उन्होंने कहा कि तुझे शायद सेब नहीं मिलेंगे। मैंने कहा कि नहीं, बिल्कुल नहीं मिलेंगे क्योंकि यह मानसून के दौरान पकता है। बोले कि नहीं, यह सर्दियों में पकता है, अब तक खत्म हो गया होगा। मैंने कहा कि भाई, यह मानसून में पकता है। सर्दियों में तो सेब के पेड पर पत्तियां तक नहीं दिखतीं। बोले कि पहले वहां जाओ, तुम्हें सब पता चल जायेगा। हो सकता है डाक्टर साहब ठीक कह रहे हों। वे काजा तक जा चुके हैं, मैं इधर रामपुर तक ही गया हूं। फरक तो पडता ही है। किन्नौर में या स्पीति में सर्दियों में पकते होंगे सेब। लेकिन मुझे इस बात पर बिल्कुल भी यकीन नहीं है। आखिर लद्दाख तो मैं भी गया हूं जनवरी में।
आज वैसे रामपुर में भी रुका जा सकता था लेकिन ठण्डे मौसम को देखते हुए नारकण्डा ज्यादा उपयुक्त लगा। दिल्ली में तो दो महीने पहले ही रजाईयां गायब हो गई हैं। नारकण्डा में कभी गायब नहीं होतीं। रामपुर में भी रजाईंयां गायब हो गई होंगी, पंखे चलते होंगे। खैर, सुबह जल्दी उठकर सूरज उगने तक रामपुर पहुंच जाऊंगा।

24 अप्रैल 2013
लेकिन सुबह जल्दी उठना सीखा किसने है? आठ बजे आंख खुली। कल की मिठाईयां बची थीं, दो चार मुंह में डालीं और निकल पडा। योजना थी कि आज सराहन में भीमाकाली मन्दिर देखकर सांगला के लिये निकल जाऊंगा।
नारकण्डा में वैसे तो हमेशा एक तरफ रामपुर और दूसरी तरफ शिमला की बसें खडी रहती हैं लेकिन साढे आठ बजे जब मैं बस अड्डे पहुंचा, रामपुर की कोई भी बस नहीं खडी थी। थानाधार की कई बसें आईं। आधे घण्टे बाद यानी नौ बजे रामपुर की बस आई। प्राइवेट बस थी। फिर भी ज्यादा देर रुकी नहीं। पन्द्रह किलोमीटर ही चले होंगे कि बस के पिछले एक टायर में पंक्चर हो गया। ढलान था, फिर भी ड्राइवर बस को धीरे धीरे चलाता हुआ किंगल तक ले आया। यहां तसल्ली से खडे हुए और पंक्चर लगाया गया। उस समय दिमाग नहीं था मेरे पास नहीं तो बस बदलकर घण्टे भर पहले रामपुर जा पहुंचता।
बारह बजे रामपुर पहुंचा। यहां भी दो बस अड्डे हैं। एक शहर से बाहर है, लेकिन सभी बसें पुराने अड्डे पर अवश्य आती हैं। सवारियों को उतार-चढाकर नये अड्डे पर विश्राम करने चली जाती हैं। उम्मीद थी कि सराहन की बस जाते ही खडी मिलेगी लेकिन बस आई पौने एक बजे। भूख लग रही थी, इस समय का फायदा उठाकर नाश्ता कर लिया। हालांकि खाना खाना चाहिये था लेकिन बस की चिन्ता के मारे दो समोसे ही खा पाया।
पौने दो बजे ज्यूरी पहुंचे। यहां से मुख्य सडक सीधे किन्नौर चली जाती है जबकि सराहन वाली सडक अलग होती है। रास्ते में झाकडी पडा जहां सतलुज पर जल-विद्युत परियोजना है।
ज्यूरी में कम से कम घण्टे भर तक खडे रहे। इसके बाद आइटीबीपी कैम्प के पास सडक पर काम चल रहा था, वहां आधा घण्टा लग गया। चार बजे सराहन पहुंचे।
नारकण्डा से सराहन का रास्ता वैसे तो चार घण्टे का है लेकिन पहले पंक्चर, फिर रामपुर में प्रतीक्षा, ज्यूरी में ठहराव और सडक के कारण सात घण्टे लगे। काश! मैं सुबह जल्दी उठ पाता, तो दोपहर तक सराहन घूमकर सांगला की तरफ जा रहा होता इस समय।
इस इलाके को बुशहर कहते हैं- बुशहर रियासत। पहले कभी इसकी राजधानी कामरू होती थी जो सांगला के पास है। कामरू में बुशहर राजाओं का किला भी है। वहां से राजधानी स्थानान्तरित करके सराहन लाई गई, जो बाद में रामपुर चली गई। बुशहर राजवंश की कुलदेवी भीमाकाली है, जिसके कारण आज सराहन प्रसिद्ध है।
मन्दिर हिन्दू और बौद्ध शैली में बना है। मन्दिर की लकडी की दीवारों पर भगवान बुद्ध के भी चित्र हैं। यहां पगोडा शैली में अगल-बगल दो मन्दिर हैं। एक पुराना और दूसरा नया। पुराना मन्दिर ज्यादातर समय बन्द रहता है। नये में पूजा-पाठ चलता रहता है।
मन्दिर प्रांगण काफी बडा है। बल्कि कहना चाहिये कि हिमालयी परिवेश के लिहाज से अत्यधिक बडा है। प्रांगण में ही यात्रियों के ठहरने के लिये कमरे बने हैं। दाम बताया ढाई सौ से लेकर चार सौ तक। मैंने ढाई सौ रुपये का एक कमरा ले लिया। कमरा मुख्य मन्दिर के प्रवेश द्वार के बिल्कुल सामने था। वैसे यहां ठहरने के लिये होटल भी हैं।
मन्दिर स्लेटी पत्थरों और लकडी का बना है। कहीं भी मुझे घण्टी नहीं दिखाई दी। बाजार में और मन्दिर की कैंटीन में प्रसाद की दुकानें अवश्य हैं। अगरबत्ती और धूपबत्ती भी कहीं नहीं मिली। यहां तक कि माता की प्रतिमा के सामने भी नहीं। सब कुछ नैसर्गिक। मुख्य मन्दिर में प्रवेश से पहले लॉकर भी हैं, जहां श्रद्धालु स्वयं बिना किसी खर्चे के मोबाइल और कैमरा आदि कीमती चीजें रख सकते हैं। मन्दिर में ये चीजें ले जाने की मनाही है।
पहले ही बताया है कि दो मन्दिर हैं- एक नया दूसरा पुराना। पुराने मन्दिर में जाना मना है। नये में जैसे ही कदम रखा, तो मखमली कालीन से स्वागत हुआ। देवी मन्दिर के शिखर पर विराजमान हैं। ऊपर जाने के लिये सीढियां चढनी होती हैं। जब मैं पहुंचा, पुजारी झाडू लगा रहा था। कोई श्रद्धालु नहीं था। मेरे जाते ही पुजारी ने झाडू छोड दी और मुझे तिलक लगाया तथा प्रसाद दिया।
मन्दिर एक शक्तिपीठ है। भीमाकाली नाम से ही विदित हो रहा है कि यह काली का एक रूप है।
आज मौसम खराब था। गडगडाहट के साथ बूंदाबांदी भी हुई। रात को खाने से निवृत्त होकर जब कमरे में पहुंचा तो सोचने लगा कि कल कहां? दो दिनों की बस यात्रा से थकान भी काफी हो गई थी। सांगला जाना रद्द कर दिया। कल भी यहीं रुकूंगा। विश्रामघर के इंचार्ज से पूछा तो उसने बताया कि कल आप यहां नहीं रुक सकते। कल सारे कमरे बुक हैं। सलाह दी कि मन्दिर से बाहर निकलते ही बुशहर होटल है, जहां आप सस्ते में रुक सकते हैं।
यहां कमरे में अटैच बाथरूम तो है ही, गीजर भी है और एलसीडी टीवी भी। रिमोट इंचार्ज के पास रहता है। जब उन्होंने मुझे रिमोट देने की पेशकश की तो मैंने मना कर दिया। लैपटॉप साथ था ना।
नारकण्डा की तरह सराहन में भी सेब खूब होते हैं। लेकिन यहां कोई भी सेब का पेड ढका नहीं दिखा। नारकण्डा के आसपास ज्यादातर पेड त्रिपाल से ढके थे। क्या यहां ओलों का डर नहीं?
हालांकि बादल थे लेकिन सुदूर पर्वतों में श्रीखण्ड चोटी दिख गई। दिख तो नन्हीं सी रही थी लेकिन मैंने पहचान ली। दो साल पहले मैं 5200 मीटर ऊंची उस चोटी तक गया था, बडी जान खाई थी उसने। हिमालय में स्थित सात कैलाशों में से एक है वह। वहां जाने का दूसरा रास्ता ज्यूरी से भी है लेकिन बागीपुल वाला यानी जिस रास्ते से हम गये थे, वह ज्यादा आसान बताया गया। एक तीसरा रास्ता भी बन रहा है जो बागीपुल वाले से भी आसान होगा और पार्वती बाग में जाकर मिलेगा।

ज्यूरी


जय भीमाकाली










श्रीखण्ड महादेव का यह फोटो 30X ऑप्टिकल जूम वाले कैमरे की रेंज से बाहर की बात थी, बाद में डिजीटल जूम का भी सहारा लेना पडा।



अगला भाग: सराहन से बशल चोटी तथा बाबाजी

1. सराहन की ओर
2. सराहन से बशल चोटी तथा बाबाजी
3. सराहन में जानलेवा गलती
4. शिमला-कालका रेल यात्रा

9 comments:

  1. जय माँ भीमाकाली...नीरज जी बहुत खूबसूरत पोस्ट हैं. वर्णन बहुत अच्छे तरीके से किया हैं. दूर से श्रीखंड महादेव का चित्र बड़ा प्यारा हैं. बादलों के फोटो आकर्षक हैं. और मंदिर के चित्र और निर्माण गज़ब हैं.धन्यवाद, दर्शन कराने के लिए. आपके लिखे हुए वृत्तान्त को पढ़ने में मज़ा आता हैं.. वन्देमातरम...

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  2. आपकी पोस्ट खोलने के साथ ही गूगल मैप भी खोलने की आदत पड गई है

    प्रणाम

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  3. धीरे धीरे घुमक्कड़ी फैलती जा रही है।

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  4. कोई शब्द नहीं मिल रहे है, फैंटास्टिक लोकेशन और ऐसे सुन्दर अवं मनोरम्य द्रश्य अपनी जादुई लिखावट के द्वारा दिखाने के लिए आपका बहोत बहोत धन्यवाद

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  5. Bahut khoob... mein bhee ghumakkad haun.

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  6. नारकण्डा की तरह सराहन में भी सेब खूब होते हैं। लेकिन यहां कोई भी सेब का पेड ढका नहीं दिखा। नारकण्डा के आसपास ज्यादातर पेड त्रिपाल से ढके थे। क्या यहां ओलों का डर नहीं?

    जब हमने पूछा था तो हमें बताया गया था कि त्रिपाल ढके पेड़ों का संबंध ओलों से नहीं बंदरों से है। शिमला, फागू, नारकंडा में ये बीमारी ज्‍यादा पाई जाती है... सरहन में शायद कम।

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  7. man karne laga hai ki abhi sarahan pahunch jaun..badhiya aalekh

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  8. yatra vritant bahut hi sundar laga , mann prassann ho gaya . photo bhi bahut saaf aur achchhe aaye hai , bahut badia jagah hai , lagta hai mujhe bhi jaana chahiye . bahut hi badia .

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