Wednesday, November 22, 2017

मेरी दूसरी किताब: हमसफ़र एवरेस्ट

 जून 2016 में एवरेस्ट बेसकैंप की यात्रा से लौटने के बाद बारी थी इसके अनुभवों को लिखने की। अमूमन मैं यात्रा से लौटने के बाद उस यात्रा के वृत्तांत को ब्लॉग पर लिख देता हूँ, लेकिन इस बार ऐसा नहीं किया। इरादा था कि इसे पहले किताब के रूप में प्रकाशित करेंगे।
लिखने का काम मार्च 2017 तक पूरा हुआ। अब बारी थी प्रकाशक ढूँढ़ने की। सबसे पहले याद आये हिंदयुग्म के संस्थापक शैलेश भारतवासी जी। पिछले साल जब मैं ‘लद्दाख में पैदल यात्राएँ’ लिख चुका था, तब भी शैलेश जी से ही संपर्क किया था। तब हिंदयुग्म नया-नया शुरू हुआ था और बुक पब्लिशिंग में ज्यादा आगे भी नहीं था। तब उन्होंने कहा था - “नीरज, अभी हमारा मार्केट बहुत छोटा-सा है। अच्छा होगा कि तुम किसी बड़े प्रकाशक से किताब प्रकाशित कराओ।” और ‘लद्दाख में पैदल यात्राएँ’ दस हज़ार रुपये देकर सेल्फ पब्लिश करानी पड़ी थी।
तो इस बार भी शैलेश जी से ही सबसे पहले संपर्क किया। अब तक हिंदयुग्म एक बड़ा प्रकाशक बन चुका था और बाज़ार में अच्छी पकड़ भी हो चुकी थी। इनकी कई किताबें तो बिक्री के रिकार्ड तोड़ रही थीं।

Monday, November 20, 2017

फूलों की घाटी से वापसी और प्रेम फ़कीरा

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17 जुलाई 2017
आज का दिन कहने को तो इस यात्रा का आख़िरी दिन था, लेकिन छुट्टियाँ अभी भी दो दिनों की बाकी थीं। तो सोचने लगे कि क्या किया जाये? एक दिन और कहाँ लगाया जाये? इसी सोच-विचार में मुझे उर्गम और कल्पेश्वर याद आये। दीप्ति से कहा - “चल, आज तुझे एक रमणीक स्थान पर ले चलता हूँ।”
पेट भरकर नौ बजे के आसपास घांघरिया से वापस चल दिये। मौसम एकदम साफ था।
कुछ सरदार घांघरिया की तरफ जा रहे थे। आपस में बात कर रहे थे - “हिमालय परबत इदरे ही है क्या?” दूसरे ने उत्तर दिया - “नहीं, मनाल्ली की तरफ है। इदर केवल हेमकुंड़ जी हैं।”

Monday, November 13, 2017

फूलों की घाटी के कुछ फोटो व जानकारी

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फूलों की घाटी है ही इतनी खूबसूरत जगह कि मन नहीं भरता। आज कुछ और फोटो देखिये, लेकिन इससे पहले थोड़ा-बहुत पढ़ना भी पड़ेगा:
बहुत सारे मित्र फूलों की घाटी के विषय में पूछताछ करते हैं। असल में अगस्त वहाँ जाने का सर्वोत्तम समय है। तो अगर आप भी अगस्त के महीने में फूलों की घाटी जाने का मन बना रहे हैं, तो यह आपका सर्वश्रेष्ठ निर्णय है। लेकिन अगस्त में नहीं जा पाये, तब भी कोई बात नहीं। सितंबर में ब्रह्मकमल के लिये जा सकते हैं। और जुलाई भी अच्छा समय है। बाकी समय अच्छा नहीं कहा जा सकता। तो कुछ बातें और भी बता देना उचित समझता हूँ:
1. जोशीमठ-बद्रीनाथ मार्ग पर जोशीमठ से 20 किलोमीटर आगे और बद्रीनाथ से 30 किलोमीटर पीछे गोविंदघाट है। यहाँ से फूलों की घाटी का रास्ता जाता है। हरिद्वार और ऋषिकेश से गोविंदघाट तक बेहतरीन दो-लेन की सड़क बनी है। दूरी, समय और जाने के साधन के बारे में आप स्वयं निर्णय कर लेना।

Thursday, November 9, 2017

पुस्तक-चर्चा: बादलों में बारूद

मज़ा आ गया। किताब का नाम देखने से ऐसा लग रहा है, जैसे कश्मीर का ज़िक्र हो। आप कवर पेज पलटोगे, लिखा मिलेगा - यात्रा-वृत्तांत। लेकिन अभी तक मुझे यही लग रहा था कि कश्मीर का यात्रा-वृत्तांत ही होगा। लेकिन जैसे ही ‘पुस्तक के बारे में’ पढ़ा, तो मज़ा आ गया। इसमें तो झारखंड़ के जंगलों से लेकर लद्दाख और सुंदरवन तक के नाम लिखे हैं।

पहले सभी यात्राओं का थोड़ा-थोड़ा परिचय करा दूँ:
1. जंगलों की ओर
झारखंड़ में छत्तीसगढ़ सीमा के एकदम पास गुमला जिले में बिशुनपुर के पास जंगलों की यात्रा का वर्णन है।

Monday, November 6, 2017

फूलों की घाटी

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16 जुलाई 2017
आज का दिन तो बड़ा ही शानदार रहा। कैसे शानदार रहा? बताऊंगा धीरे-धीरे। बताता-बताता ही बताऊंगा।
रात 2 बजे आँख खुली। बाहर बूंदों की आवाज़ आ रही थी। बारिश हो रही थी। सोचा कि सुबह तक मौसम अच्छा हो जाएगा। सो गया। फिर 6 बजे आँख खुली। बारिश अभी भी हो रही थी। उठकर दरवाजा खोलकर देखा। बादल और रिमझिम बारिश। इसके बावजूद भी यात्रियों का आना-जाना। कुछ यात्री नीचे गोविंदघाट भी जा रहे थे और कुछ ऊपर हेमकुंड भी जाने वाले थे। हमें किसी भी तरह की जल्दी नही थी। कल ही सोच लिया था कि बारिश में कहीं भी नही जाएंगे। न फूलों की घाटी और न गोविंदघाट। वापस दरवाजा लगाया और सो गया।
आठ बजे आँख खुली। उतनी ही बारिश थी, जितनी दो घंटे पहले थी। लेकिन इस बार मैं नीचे चला गया और एक बाल्टी गर्म पानी को कह आया। साथ ही यह भी कह दिया कि आज भी हम यहीं रुकेंगे। होटल मालिक बड़ी ही विचित्र प्रकृति का है। आप कुछ भी कहें, वह आपका उत्साह ही बढ़ाएगा। मसलन आप बारिश में हेमकुंड जाना चाह रहे हैं, वह आपको जाने को कहेगा। और बारिश की वजह से नहीं जाना चाह रहे हैं, तो आपसे रुक जाने को कह देगा। तो मुझसे भी उसने कह दिया कि बारिश में नहीं जाना चाहिए।

Thursday, November 2, 2017

ट्रेन में बाइक कैसे बुक करें?

अक्सर हमें ट्रेनों में बाइक की बुकिंग करने की आवश्यकता पड़ती है। इस बार मुझे भी पड़ी तो कुछ जानकारियाँ इंटरनेट के माध्यम से जुटायीं। पता चला कि टंकी एकदम खाली होनी चाहिये और बाइक पैक होनी चाहिये - अंग्रेजी में ‘गनी बैग’ कहते हैं और हिंदी में टाट। तो तमाम तरह की परेशानियों के बाद आज आख़िरकार मैं भी अपनी बाइक ट्रेन में बुक करने में सफल रहा। अपना अनुभव और जानकारी आपको भी शेयर कर रहा हूँ। हमारे सामने मुख्य परेशानी यही होती है कि हमें चीजों की जानकारी नहीं होती।
ट्रेनों में दो तरह से बाइक बुक की जा सकती है: लगेज के तौर पर और पार्सल के तौर पर।
पहले बात करते हैं लगेज के तौर पर बाइक बुक करने का क्या प्रोसीजर है। इसमें आपके पास ट्रेन का आरक्षित टिकट होना चाहिये। यदि आपने रेलवे काउंटर से टिकट लिया है, तब तो वेटिंग टिकट भी चल जायेगा। और अगर आपके पास ऑनलाइन टिकट है, तब या तो कन्फर्म टिकट होना चाहिये या आर.ए.सी.। यानी जब आप स्वयं यात्रा कर रहे हों, और बाइक भी उसी ट्रेन में ले जाना चाहते हों, तो आरक्षित टिकट तो होना ही चाहिये। इसके अलावा बाइक की आर.सी. व आपका कोई पहचान-पत्र भी ज़रूरी है। मतलब इनकी मूल प्रति के साथ फोटोकॉपी भी। इसके अलावा बाइक आपके ही नाम पर होनी चाहिये।
ट्रेन के प्रस्थान समय से पर्याप्त समय पहले आप अपने प्रस्थान स्टेशन के पार्सल कार्यालय पहुँचिये। बाइक को पैक कराईये। आपका चेहरा देखते ही पार्सल कार्यालय के बाहर जमा दलाल आपको पहचान लेंगे। आप उनसे अपनी बाइक को पैक करा सकते हैं। नई दिल्ली पर इस काम के 150-200 रुपये लगते हैं। मोलभाव करने पर शायद कुछ कम हो जायें। टंकी में अगर थोड़ा-बहुत पेट्रोल भी होगा, उसे ये लोग अपने-आप निकाल देंगे। आप पेट्रोल और पैकिंग की तरफ़ से निश्चिंत रहिये। लेकिन दलाल आपको इतने तर्क देंगे कि आप विचलित हो जायेंगे और इनके चक्कर में भी आ जायेंगे। लेकिन आप सीधे पार्सल कार्यालय से एक फॉर्म लेकर इसे भरिये। अपने पहचान-पत्र व आर.सी. की फोटोकॉपी लगाकर कार्यालय में जमा कर दीजिये। आपसे पी.एन.आर. पूछा जायेगा, निर्धारित राशि ली जायेगी और आपको रसीद थमा दी जायेगी। इसका मतलब आपकी बाइक बुक हो गयी।
लेकिन बाइक बुक होने का अर्थ यह नहीं है कि जिस ट्रेन में आप यात्रा करने वाले हैं, बाइक भी उसी ट्रेन में भेजी जायेगी। प्रत्येक ट्रेन में लगेज के अमूमन दो डिब्बे होते हैं - एक सबसे आगे और दूसरा सबसे पीछे। एक डिब्बे में अधिकतम दो बाइकें ही लादी जा सकती हैं। यानी एक ट्रेन में अधिकतम चार बाइकें। यहाँ मुझे थोड़ा संदेह है। या तो एक डिब्बे में दो बाइकें जा सकती हैं या पूरी ट्रेन में दो बाइकें। चाहे कुछ भी हो, इसका अर्थ यह है कि अगर पहले ही पर्याप्त बाइकें इस ट्रेन के लिये बुक हो चुकी हैं, तो आपकी बाइक को इस ट्रेन से नहीं भेजा जायेगा। मुझे बताया गया कि कई बार तो बुकिंग इतनी ज्यादा हो जाती हैं कि नई दिल्ली पर एक-एक महीने बाद बाइकों को ट्रेन में चढ़ाने का नंबर आता है।
अब आते हैं दूसरे तरीके पर - बाइक को पार्सल में बुक करने का क्या प्रोसीजर है। इसमें आपके पास टिकट होना आवश्यक नहीं है। सीधे पार्सल कार्यालय जाइये। बाइक की पैकिंग कराईये। फॉर्म भरिये, आर.सी. और अपने पहचान-पत्र की फोटोकॉपी लगाईये। निर्धारित शुल्क अदा कीजिये और बाइक बुक हो गयी। प्रोसीजर तो दोनों का लगभग एक-सा ही है। लेकिन आप आगे पढ़ेंगे तो लगेज व पार्सल में अंतर पता चल जायेगा।
आगे बढ़ने से पहले एक बात और बता दूँ। कोई ट्रेन दिल्ली से हावड़ा जा रही है। इसमें दिल्ली से हावड़ा के लिये दो बाइक लोड़ कर दी गयीं। यानी अब इस ट्रेन में और ज्यादा बाइकें नहीं चढ़ायी जा सकतीं। आप अगर कानपुर से अपनी बाइक की बुकिंग करेंगे तो पता नहीं हावड़ा पहुँचने में कितना समय लग जायेगा। इलाहाबाद से बुक करेंगे, तब भी पता नहीं। क्योंकि लगेज वाला डिब्बा पीछे से ही पूरा भरा आ रहा है। नंबर दो बात - यदि आपने हावड़ा जा रही ट्रेन में अपनी बाइक पटना तक ही बुक की, तो शायद इसे पटना में न उतारा जाये। धनबाद तक बुक की है तो शायद धनबाद में न उतारा जाये। क्योंकि ट्रेन का ठहराव 5 मिनट का है, और इतने समय में लगेज वाले डिब्बे का केवल दरवाजा ही खुलता है। तो काफी संभावना है कि आपकी बाइक आगे कहीं उतारी जायेगी और दूसरी किसी ट्रेन से या लोकल ट्रेन से वापस धनबाद लायी जायेगी। इसलिये बेहतर है कि बाइकों की बुकिंग हमेशा एंड-टू-एंड ही करें। भले ही आपको अपनी योजना में कुछ फेरबदल ही क्यों न करना पड़े। आपको बाइक पटना ले जानी है तो हावड़ा जाने वाली या गुवाहाटी जाने वाली किसी भी ट्रेन में बुकिंग न करें, केवल पटना तक जाने वाली ट्रेन में ही बुकिंग करें।
मुझे भी अपनी बाइक ले जाने से पहले इतनी ही जानकारी थी। आप इंटरनेट पर सर्च करेंगे तो यही जानकारी मिलेगी। मेरा दिल्ली से गुवाहाटी का हवाई टिकट बुक है - 7 नवंबर 2017 का। आज थी 1 नवंबर 2017। यानी मैं गुवाहाटी तक ट्रेन से नहीं जाऊंगा। तो योजना बनायी कि बाइक को नई दिल्ली से डिब्रूगढ़ तक भेजते हैं। डिब्रूगढ़ तक केवल तीन ही ट्रेनें हैं - राजधानी, ब्रह्मपुत्र मेल और अवध असम। अवध असम पीछे से आती है, इसलिये इससे बाइक भेजना मैंने सोचा तक नहीं। बची राजधानी और ब्रह्मपुत्र मेल। ब्रह्मपुत्र मेल के मुकाबले राजधानी में बाइक भेजना 25 प्रतिशत महंगा पड़ता है, लेकिन मैंने राजधानी से ही फाइनल किया। ब्रह्मपुत्र मेल बहुत ज्यादा स्टेशनों पर रुकती है। बहुत ज्यादा सामान चढ़ाया भी जायेगा और बहुत ज्यादा सामान उतारा भी जायेगा। इससे बाइक को नुकसान पहुँच सकता है। दूसरी बात, भूलवश बाइक को बीच में किसी स्टेशन पर उतारा भी जा सकता है। बाद में भूल-सुधार करके अगले दिन या चार दिन बाद भेज देंगे। इसके विपरीत राजधानी कम स्टेशनों पर रुकती है। महंगा सामान ही इससे ट्रांसफर किया जाता है, तो बाइक भली प्रकार डिब्रूगढ़ पहुँच जायेगी।
हमें हमेशा हर परिस्थिति के लिये तैयार रहना चाहिये। दूसरों को दोष देने से बेहतर है परिस्थिति को स्वीकार करना।
...
एक घनिष्ठ मित्र के माध्यम से नई दिल्ली पार्सल कार्यालय में जान-पहचान हो गयी। पार्सल कार्यालय जाते ही बाइक पैक हो गयी। इसी में हमने टंकी पर चिपकाया जाने वाला टैंक बैग और हवा भरने वाला पंप भी पैक कर दिया। साथ ही पंचर किट व ज़रूरी टूल भी। हेलमेट भी पैक करने का मन था, लेकिन मना कर दिया गया।
लेकिन सभी काम हमारे चाहने भर से नहीं हुआ करते। हमारे सामने भी एक समस्या आ गयी। बात ये है कि दिल्ली एन.सी.आर. में पार्सल की बुकिंग रेलवे नहीं करता, केवल लगेज की ही बुकिंग करता है। पार्सल और लगेज क्या होता है, वो आपको बता ही चुका हूँ। हमें अपनी बाइक पार्सल में ही बुक करनी थी। यहाँ से देशभर के लिये बहुत ज्यादा सामान बुक होता है, तो रेलवे ने पार्सल बुकिंग को लीज़ पर दे रखा है। इसके लिये रेलवे टेंडर निकालता है। जो ठेकेदार सबसे ज्यादा बोली लगाता है, उसे ही ठेका मिलता है। कई बार तो केवल एक डिब्बे का ठेका डेढ़ लाख रुपये तक लग जाता है।
मैंने पूछा - “डेढ़ लाख रुपये वार्षिक या मासिक?”
उत्तर मिला - “दैनिक।”
मेरी आँखें फटी रह गयीं। डेढ़ लाख रुपये एक डिब्बे का एक दिन का ठेका! अमूमन दो डिब्बे होते हैं - एक डिब्बा ठेकेदार को दे दिया जाता है और दूसरे डिब्बे में रेलवे स्वयं लगेज बुकिंग करता है। ज़ाहिर है कि ठेकेदार के रेट रेलवे के रेट से ज्यादा ही होंगे। यानी लगेज बुकिंग के मुकाबले पार्सल बुकिंग महंगी पड़ती है। यह नियम दिल्ली एन.सी.आर. में है, देश के दूसरे हिस्सों में कहीं है, कहीं नहीं है।
“तो जी, हम आपकी बाइक की बुकिंग नहीं कर सकते। एक बार ठेकेदार से बात करके उसके रेट पता कर लेते हैं।”
कुछ ही देर में ठेकेदार के रेट आ गये - नई दिल्ली से डिब्रूगढ़ तक राजधानी एक्सप्रेस में - दस हज़ार रुपये।
हमारे रेलवे वाले मित्र ने ठेकेदार से पूछा - “यार, तुम स्टाफ की बाइक को भी इसी रेट पर ही भेजोगे? कुछ तो डिस्काउंट दो यार।”
ठेकदार ने बताया - “साब, डेढ़ लाख रुपये की लीज़ है और हमारे पास माल की लाइन लगी पड़ी है। दस हज़ार से पंद्रह हज़ार तो कर सकता हूँ, लेकिन कम नहीं कर सकता।”
सन्नाटा।
अब क्या करें? क्या कहा आपने? कोई रास्ता ही नहीं है?
जनाब, दो रास्ते थे मेरे सामने उस समय। आप इस समय उस इंसान को पढ़ रहे हैं, जिसने अपनी ज़िंदगी समाधान-प्रधान बना रखी है, समस्या-प्रधान नहीं।
मोबाइल में फटाफट अंगूठा घुमाया। कुछ टाइप किया और एंटर मार दिया। संपर्क क्रांति, 200+ वेटिंग, 755 रुपये। सामने ही एक चार्ट था जिसमें विभिन्न स्थानों पर सामान भेजने की स्टैंडर्ड रेट-लिस्ट लगी थी। गुवाहाटी के रेट थे 2700 रुपये। 2700 में 755 जोड़ दिये - 3455 रुपये। 3500 मान लेते हैं।
“पार्किंग शुल्क कितना है?”
“10 रुपये घंटा।”
“यानी एक दिन के 240 रुपये और चार दिनों के 960 रुपये। 1000 मान लेते हैं। मैं अभी काउंटर से जाकर आज की संपर्क क्रांति का वेटिंग टिकट बनवाकर लाता हूँ। परसों यानी 3 तारीख़ को बाइक गुवाहाटी पहुँच जायेगी। हम 7 को पहुँचेंगे। गुवाहाटी में चार दिनों के 1000 रुपये पार्किंग शुल्क दे देंगे। कुल मिलाकर 4500 रुपये में बाइक गुवाहाटी पहुँच जायेगी।”
सन्नाटा।
दूसरा रास्ता था - बाइक नहीं ले जानी। तब क्या करते, वो बाद में सोचते।
“लेकिन आपको तो डिब्रूगढ़ भेजनी थी।”
“अब डिब्रूगढ़ तो भेजना संभव नहीं है। गुवाहाटी से ही काम चला लेंगे।”
“हाँ, यह भी ठीक है। लेकिन एक मिनट रुको। तब तो मैं संपर्क क्रांति के ठेकेदार से बात करके देखता हूँ।”
और बात बन गयी। ठेकेदार ने कहा - “साब, हम आपसे भी पैसे लेंगे क्या? जो मन करे, दे देना।”
2500 रुपये दे दिये।
“लेकिन संपर्क क्रांति तो 5 तारीख को भी है। बाइक को 5 वाली ट्रेन में ही चढ़ा देंगे, 7 को पहुँच जायेगी। क्यों 1000 रुपये पार्किंग शुल्क देना?”
“भूल तो नहीं जाओगे? ट्रेन में कहीं पहले से ही दो बाइक लद गयीं तो?”
“अरे नहीं, ऐसा नहीं होगा।”
और 5 तारीख़ की रसीद मिल गयी। 5 को बाइक पूर्वोत्तर संपर्क क्रांति में लाद दी जायेगी। यह 7 को गुवाहाटी पहुँचेगी। उसी दिन हम भी पहुँच जायेंगे और हाथोंहाथ बाइक छुड़ा लेंगे।
...
हम डेढ़ घंटे तक यहाँ बैठे रहे। इस दौरान बहुत-से यात्री आये, जिन्हें बाइक भेजनी थी। एक एक्स-सर्विसमैन थे। वे बंगलुरू से आये थे और पठानकोट जाना था। अपने बेटे की बाइक भी उनके साथ थी। बंगलुरू से पठानकोट की एक भी सीधी ट्रेन नहीं है, तो उस बाइक की बुकिंग नहीं हो सकी। बंगलुरू से नई दिल्ली तक की बुकिंग हो गयी और अब नई दिल्ली से पठानकोट के लिये उन्हें दोबारा बुकिंग करानी थी। लेकिन उनके पास ट्रेन का टिकट नहीं था। रही होगी कोई बात। ज़ाहिर है कि उन्हें भी बाइक की बुकिंग पार्सल में करानी पड़ेगी। और आप जान ही गये हैं कि नई दिल्ली से किसी भी ट्रेन में पार्सल बुकिंग नहीं होती।
“लेकिन मेरे बेटे ने बंगलुरू से नई दिल्ली तक इसे पार्सल में ही भेजा है। वहाँ तो यह आराम से हो गयी। और बेटे ने ही बताया था कि नई दिल्ली से भी इसी तरह हो जायेगी।”
“आपके बेटे ने ठीक किया था और आपको भी ठीक ही बताया है। लेकिन दिल्ली एन.सी.आर. में रेलवे पार्सल बुकिंग नहीं करता। आपको एजेंट के माध्यम से ही करना पड़ेगा।”
“यार, आप भी अज़ीब बात करते हो। एक ही विभाग है और अलग-अलग स्थानों के लिये अलग-अलग नियम।”
“सर, हम मज़बूर हैं। नहीं कर सकते।”
अब मैं बीच में बोल पड़ा - “सर, आप पठानकोट का सबसे सस्ता टिकट बुक कर लो। उसे यहाँ लाकर दिखा देना, आपका काम हो जायेगा।”
“हाँ जी, तब आपका काम हो जायेगा।”
उन्होंने बंगलुरू अपने बेटे से बात की, फिर क्लर्क से बात की, फिर बेटे से बात की और आख़िरकार वेटिंग टिकट लेने बुकिंग विंडो की तरफ चले गये।
...
एक आदमी ने आज ही नयी बाइक खरीदी थी और उसे लखनऊ भेजना था।
“आर.सी. दिखाओ।”
“सर, आज ही ली है। इसकी आर.सी. अभी नहीं बनी।”
“टेंपरेरी आर.सी. बन जाती है। अगर एजेंसी ने नहीं बनायी तो आपको बनवानी चाहिये थी। हम बिना आर.सी. के नहीं भेज सकते।”
“सर, देख लो। कुछ ले-दे कर काम बन जाये तो।”
“अरे, भगाओ इस आदमी को यहाँ से। नहीं होगा तेरा काम।”
...
एक आदमी और आया।
“टिकट है?”
“हाँ जी।”
“आर.सी. दिखाओ।”
“ये लो जी।”
“आई.डी. दिखाओ।”
“ये लो जी।”
“ये तो अलग-अलग नाम हैं। ये तुम्हारे क्या लगते हैं?”
“दोस्त हैं जी। उसकी बाइक को मैं ले जा रहा हूँ।”
“नहीं जा सकती। आप केवल अपनी ही बाइक ले जा सकते हो या ब्लड रिलेशन की। दोस्त की बाइक नहीं ले जा सकते।”
“दोस्त ने यह शपथ-पत्र भी दिया है।”
“दिखाओ।”
एक एप्लीकेशन निकालकर आगे कर दी। जिसमें उसके दोस्त ने कुछ लिखा था। मैंने ज्यादा ताक-झाँक नहीं की।
“हाँ, ठीक है। लोगबाग चोरी की बाइक न ले जा पायें, इसलिये ऐसा नियम है। अब आपने शपथ-पत्र दे दिया है तो अब आपका काम हो जायेगा। लाओ, टिकट लाओ।”
“ये लो जी।”
“लेकिन यह तो चार तारीख़ का है। चौबीस घंटे पहले ही बुकिंग होती है। आप तीन को आना या फिर चार को आना, ट्रेन चलने से कम से कम दो घंटे पहले।”
“आज ही कर दो सर। नहीं तो परसों फिर चक्कर लगाना पड़ेगा।”
“उधर देखो। कहीं जगह दिख रही है क्या? यह सब आज ही बुक हुआ सामान है। अगर हम कई दिन पहले ही बुकिंग करने लगेंगे तो हमारे पास इतनी जगह नहीं है कि इतना सामान रख सकें। आप तीन या चार को ही आना।”
...
और भी बुकिंग वाले आये, सबका वर्णन करना ठीक नहीं। जो ज्ञान आज मिला, वो आपके साथ बाँट दिया। अभी तक हमने डिब्रूगढ़ से बाइक यात्रा आरंभ करने की योजना बनायी थी, अब गुवाहाटी से यात्रा आरंभ होगी। योजना दोबारा बनानी पड़ेगी। अब अपने पथ में माज़ुली और काज़ीरंगा भी जोड़े जा सकते हैं। वापसी में जैसा भी मौका होगा, वैसी ही बुकिंग कर देंगे। डिब्रूगढ़ से भी बुकिंग कर देंगे, या फिर गुवाहाटी से भी। रेलवे पार्सल में बुक कर देगा तो ठीक, अन्यथा 755 रुपये का वेटिंग टिकट लेकर लगेज में रखवा देंगे। यह दिल्ली कभी भी आये, हमें कोई चिंता नहीं।
...
इस मामले में आपकी कोई जिज्ञासा हो, अवश्य पूछिये। मुझे पता होगा, ज़रूर बताऊंगा।

Monday, October 30, 2017

यात्रा श्री हेमकुंड साहिब की

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15 जुलाई 2017
सुबह उठे तो मौसम ख़राब मिला। निश्चय करते देर नहीं लगी कि आज फूलों की घाटी जाना स्थगित। क्या पता कल सुबह ठीक मौसम हो जाये। तो कल फूलों की घाटी जाएंगे। आज हेमकुंड साहिब चलते हैं। कल भी मौसम ख़राब रहा तो परसों जायेंगे। यह यात्रा मुख्यतः फूलों की घाटी की यात्रा है, जल्दी कुछ भी नहीं है। तो हम केवल साफ मौसम में ही घाटी देखेंगे। वैसे जुलाई तक मानसून पूरे देश में कब्जा जमा चुका होता है, तो साफ मौसम की उम्मीद करना कुछ ज्यादा ही था, लेकिन हिमालय में अक्सर मौसम साफ ही रहता है। दोपहर बाद बरस जाये तो उसे खराब मौसम नहीं कहते। सुबह ही बरसता मिले तो खराब कहा जायेगा। अभी खराब मौसम था।
इंतज़ार करते रहे। इसका यह अर्थ न लगाया जाये कि हमने बालकनी में कुर्सियाँ डाल लीं और चाय की चुस्कियों के साथ बारिश देखते रहे। इंतज़ार करने का अर्थ होता है रजाईयों में घुसे रहना और जगे-जगे सोना व सोते-सोते जगना। नींद आ गयी तो आँख कुछ मिनटों में भी खुल सकती है और कुछ घंटों में भी। हाँ, एक बार बाहर झाँककर अवश्य देख लिया था। सिख यात्री नीचे गोविंदघाट से आने शुरू हो गये थे। सुबह कब चले होंगे वे? और हो सकता है कि इनमें से कुछ आज ही हेमकुंड भी पहुँच जायें। ज्यादातर यात्री नीचे लौटने की तैयारियों में थे। घोड़ों, खच्चरों व कंडी वालों से मोलभाव कर रहे थे। बारिश में ही।