Thursday, July 19, 2018

“मेरा पूर्वोत्तर” - ढोला-सदिया पुल - 9 किलोमीटर लंबा पुल

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15 नवंबर 2017
सदिया शहर पहले सूतिया राज्य की राजधानी था। यह लोहित और दिबांग के संगम पर बसा हुआ था। एक बार भयानक बाढ़ आई और पूरा शहर समाप्‍त हो गया। उस पुराने शहर के अवशेष अब कहीं नहीं मिलते। या शायद कहीं एकाध अवशेष बचे हों। लेकिन इस स्थान को अभी भी सदिया ही कहते हैं। असम का यही छोटा-सा इलाका है, जो लोहित के उत्‍तर में स्थित है। एक तरफ लोहित और एक तरफ दिबांग व सियांग नदियाँ। बाकी तरफ अरुणाचल, जहाँ के लिए असम वालों को भी इनर लाइन परमिट लेना होता है। इनर लाइन परमिट के लिए भी लोहित पार करके डिब्रुगढ़ जाना पड़ता था। कुल मिलाकर असम के इस क्षेत्र के लोग इस छोटे-से इलाके में ‘बंद’ थे। बरसात में बाढ़ आने पर और भी बंद हो जाते होंगे।
लेकिन अब यहाँ 9 किलोमीटर से भी लंबा पुल बन गया है। भारत का सबसे लंबा सड़क पुल। पिछले दिनों प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसका उद्‍घाटन किया था। सदिया और सदिया के परे अरुणाचल देखने की उतनी इच्छा नहीं थी, जितनी इस पुल को देखने और इस पर मोटरसाइकिल चलाने की थी। आज वो इच्छा पूरी हो रही थी।

Monday, July 16, 2018

“मेरा पूर्वोत्तर” - गोल्डन पैगोडा, नामसाई, अरुणाचल

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15 नवंबर 2017
अभी इनकी आरा मशीन में कोई काम नहीं हो रहा था। सभी कई दिनों से बंद थीं। असल में ये जो ‘प्रोडक्ट’ बनाते हैं, उनकी असम में घर बनाने के लिए बड़ी मांग है, तो इनका सारा माल असम में खप जाता है। दो महीनों बाद ‘पीक सीजन’ आएगा। बारिश से पहले सभी अपने-अपने घरों की मरम्मत और निर्माण पूरा कर लेना चाहेंगे।
“अरुणाचल में पैदा हुई चाय, असम चाय के नाम से बिकती है या अरुणाचल चाय के नाम से?”
“असम चाय के नाम से।”
“अरुणाचल चाय के नाम से बिकनी चाहिए।”
“कौन करेगा ऐसा? किस अरुणाचली को इतनी समझ है? चाय बागानों के मालिक सब बाहरी हैं। उन्हें क्या पड़ी है कि चाय अरुणाचल के नाम से बिके?”

Thursday, July 12, 2018

“मेरा पूर्वोत्तर” - तेजू, परशुराम कुंड और मेदू

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14 नवंबर 2017
आज का लक्ष्य था परशुराम कुंड देखकर शाम तक तेजू पहुँचना और रात तेजू रुकना। रास्ते में कामलांग वाइल्डलाइफ सेंचुरी है। थोड़ा-बहुत सेंचुरी में घूमेंगे और ‘ग्लाओ लेक’ जाने के बारे में जानकारी हासिल करेंगे। अभी तक मुझे आलूबारी पुल के खुलने की जानकारी नहीं हुई थी। बल्कि मुझे कुछ पता ही नहीं था कि लोहित नदी पर आलूबारी पुल बनाने जैसा भी कोई काम चल रहा है। मैं सोचा करता था कि तिनसुकिया से तेजू जाने के लिए प्रत्येक गाड़ी को नामसाई, वाकरू, परशुराम कुंड होते हुए ही जाना पड़ेगा। कुछ समय पहले 9 किलोमीटर लंबा धोला-सदिया पुल खुला, तो तेजू की गाड़ियाँ उधर से जाने लगी होंगी - ऐसा मैंने सोचा।
नामसाई से आगे एक जगह दूरियाँ लिखी थीं - चौखाम 26 किलोमीटर, परशुराम कुंड 82 किलोमीटर और तेजू 126 किलोमीटर। यानी चौखाम से तेजू 100 किलोमीटर है, लेकिन आलूबारी पुल बनने से पहले। अब यह दूरी केवल 30 किलोमीटर रह गई है। लेकिन हमें तो इस पुल का पता ही नहीं था।
शानदार सड़क थी और हम 70-80 की स्पीड़ से दौड़े जा रहे थे। ध्यान था कि वाकरू में कामलांग सेंचुरी के पास एक पुल पार करना है। एक जगह एक बोर्ड लगा था - कामलांग सेंचुरी दाहिने। मैं समझा कि वाकरू आने वाला है और अब हम वाकरू पुल पार करेंगे। दीप्ति से कहा - “अब हम एक पुल पार करेंगे और थोड़ा विश्राम भी करेंगे।”

Monday, July 9, 2018

“मेरा पूर्वोत्तर” - नामदफा से नामसाई तक

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13 नवंबर 2017
गूगल मैप में नो-दिहिंग नदी के उस तरफ एक सड़क दिख रही थी। पूछताछ से पता चला कि वहाँ सड़क है, लेकिन घना जंगल भी है। हमें अब परशुराम कुंड जाना था और वह सड़क इस समय सर्वोत्तम थी। यहाँ से उसकी सीधी दूरी बमुश्किल एक किलोमीटर थी। लेकिन देबान रेस्ट हाउस नदी से तकरीबन पचास मीटर ऊपर किनारे पर स्थित है। और किनारा एकदम खड़ा है। नीचे उतरने के लिये ऊँची-ऊँची सीढ़ियाँ बनी हैं। किसी भी हालत में मोटरसाइकिल नीचे नदी तक नहीं उतर सकती थी। अगर यह नदी तक उतर भी जाती, तो हम नाव से इसे उस पार पहुँचा देते। फिर दूसरे किनारे पर ऊपर चढ़ाने में उससे भी ज्यादा समस्या आती।
अच्छा, हम क्यों ऐसा करना चाह रहे थे? क्योंकि नदी के उस पार से परशुराम कुंड केवल 65 किलोमीटर दूर था। लेकिन अगर मियाओ, बोरदुमसा से होकर जाते हैं, तो यह 180 किलोमीटर होगा। सलाह मिली कि मियाओ में नावघाट से नदी पार हो जाएगी और आप इसी सड़क पर आ सकते हो। यानी 25 किलोमीटर नदी के इस तरफ मियाओ जाना और फिर पार करके उतना ही दूसरी तरफ आना - कुल मिलाकर 50 किलोमीटर होगा। और यह सारा रास्ता खराब ही है। इससे लाख गुना अच्छा होता कि बाइक किसी तरह यहीं से नदी पार कर लेती। एक किलोमीटर में ही काम हो जाता।
लेकिन ऐसा नहीं हो सका। हमें मियाओ ही जाना पड़ा। 25 किलोमीटर तय करने में दो घंटे लगे।

Thursday, July 5, 2018

“मेरा पूर्वोत्तर” - नामदफा नेशनल पार्क

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12 नवंबर 2017
हमारे उठते ही चाय आ गई और एक फोरेस्ट गार्ड भी आ गया - “आज आप लोग कहाँ घूमने जाएँगे?”
“हमें तो इधर का कुछ भी नहीं पता।”
“उधर पाँच किलोमीटर आगे एक व्यू पॉइंट है। बाकी सभी लोग उधर ही जा रहे हैं।”
“उधर मतलब विजयनगर वाली सड़क की तरफ?”
“हाँ जी, हमें उस सड़क पर ही चलना होगा। बहुत तरह की चिड़ियाँ मिलेंगी और तमाम तरह की तितलियाँ भी।”
“फिलहाल उस तरफ जाने की इच्छा नहीं है। नदी के दूसरी तरफ भी कोई रास्ता है क्या?”
“हाँ जी, उधर हल्दीबाड़ी है।”
“तो हम उधर ही चलेंगे।”
पानी, बिस्कुट और कैमरे लेकर हम नदी की ओर चल दिए। एक मल्लाह भी साथ था। नाव इस तरफ ही बँधी थी। एकदम पारदर्शी पानी और उस पर नाव से नदी पार करने में आनंद आ गया।

Monday, July 2, 2018

“मेरा पूर्वोत्तर” - अरुणाचल में प्रवेश

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11 नवंबर 2017
“हम जब लौटेंगे तो हमें परशुराम कुंड की तरफ जाना है, लेकिन गूगल मैप पर मियाओ के पास नो-दिहिंग के उस पार से एक सड़क जाती दिख भी रही है; और समस्या ये है कि नो-दिहिंग पर कोई पुल नहीं है। इसे पार कैसे करेंगे? नहीं तो फिर वापस जागुन होते हुए ही डिगबोई और फिर बोरदुमसा वाला रास्ता लेना होगा, जो कि बहुत ज्यादा लंबा पड़ेगा।”
गीताली ने उत्तर दिया - “नहीं, आपको डिगबोई जाने की जरूरत नहीं पड़ेगी। हमारे घर के पीछे ही दिहिंग नदी बहती है। उसके उस तरफ अरुणाचल है और एक सड़क भी सीधे बोरदुमसा जाती है।”
“इसे पार कैसे करेंगे?”
“हो जाएगा सब।”
तो सुबह नौ बजे जागुन से निकल पड़े। ‘फिर आना’, ‘दो दिन रुकना’ समेत ढेरों आशीर्वाद भी मिले। गीताली की माताजी और भतीजे पुचकू समेत सभी हमें बाहर तक छोड़ने आए। हम अभिभूत हो गए, इतने सुदूर में ऐसा प्यार पाकर!

Thursday, June 28, 2018

“मेरा पूर्वोत्तर” - चराईदेव: भारत के पिरामिड

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10 नवंबर 2017
हम जब सत्‍तर की रफ्तार से दौड़े जा रहे थे, तो दाहिनी तरफ पुरातत्व विभाग का एक सूचना-पट्‍ट लगा दिखा - चराइदेव मैदाम। स्पीड़ सत्‍तर ही रही, लेकिन यह नाम दिमाग में घूमने लगा - पढ़ा है इस नाम को कहीं। शायद कल इंटरनेट पर पढ़ा है। शायद इसे देखने का इरादा भी किया था। बाइक रोक ली। दीप्‍ति से पूछा - “वो पीछे चराइदेव ही लिखा था ना?”
“कहाँ? कहाँ लिखा था? क्या लिखा था?”
“चराइदेव।”
“मैंने ध्यान नहीं दिया।”
मोबाइल निकाला। इंटरनेट चलाया - “हाँ, यह चराइदेव ही है। अहोम राजाओं की पहली राजधानी।”
बाइक वापस मोड़ी और चराइदेव मैदाम वाली सड़क पर चल दिए।