Friday, August 17, 2018

बाइक यात्रा: टाइगर फाल - लाखामंडल - बडकोट - गिनोटी

इस यात्रा-वृत्तांत को आरंभ से पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें

9 जून 2018
रात हंगामा होने के कारण आधी रात के बाद ही सोए थे और देर तक सोए रहे। दस बजे उठे। हिमालय में यात्राएँ करने का एक लाभ भी है - नहाने से छुटकारा मिल जाता है।
बारिश हो रही थी। रेनकोट पहनकर हम बारिश में ही चल देते, लेकिन बिजलियाँ भी गिर रही थीं। और उसी दिशा में गिर रही थीं, जिधर हमें जाना था, यानी लाखामंडल वाली सड़क के आसपास। सुमित बारिश में ही चल देने को बड़ा उतावला था, शायद उसने कभी इन जानलेवा बिजलियों का सामना नहीं किया। सामना तो मैंने भी नहीं किया है, लेकिन डर लगता है तो लगता है।
आलू के पराँठे खाने के बाद पचास रुपये का डिसकाउंट मिल गया। रात मैंने जो हुड़दंग की वीडियो बनाई थीं, वे आज सभी ने देखी। कौन ग्रामीण सड़क पर कितनी जोर से लठ पटक रहा था और उससे उत्पन्न हुई आवाज से उत्साहित होकर शराबियों के खिलाफ बोल रहा था, उसे देखकर और सुनकर सब बड़े हँसे। और एक-दूसरे की टांग-खिंचाई भी की। आखिर में तय हुआ कि हम इन वीडियो को सार्वजनिक नहीं करेंगे और आधी रात को होटल से भगाए जाने से आहत होकर वकील साहब अगर कोई कार्यवाही करते हैं, तब ये वीडियो काम आएँगी।
न वकील साहब ने कार्यवाही करी, न वीडियो काम आईं।
तो इसलिए पचास रुपये का डिसकाउंट मिला।

Monday, August 13, 2018

टाइगर फाल और शराबियों का ‘एंजोय’

इस यात्रा-वृत्तांत को आरंभ से पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें

8 जून 2018
सुमित ने तार लगाकर अपनी बुलेट स्टार्ट की। अब जब भी इसे वह इस तरह स्टार्ट करता, हम खूब हँसते।
“भाई जी, एक बात बताओ। त्यूणी वाली रोड कैसी है?”
“एकदम खराब है जी।”
“कहाँ से कहाँ तक खराब है?”
“बस यहीं से खराब स्टार्ट हो जाती है और 15 किलोमीटर तक खराब ही है।”
हमें यही सुनना था और हम चकराता की ओर चल पड़े। अगर त्यूणी वाली सड़क अच्छी हालत में होती, तो हम आज हनोल और वहाँ का चीड़ का जंगल देखते हुए पुरोला जाते। आपको अगर वाकई चीड़ के अनछुए जंगल देखने हैं तो त्यूणी से पुरोला की यात्रा कीजिए। धरती पर जन्म लेना सफल न हो जाए, तो कहना! और अगर देवदार देखना है, तो लोखंडी है ही।
लोखंडी से त्यूणी की ओर ढलान है। कल विकासनगर में उदय झा साहब ने बता ही दिया था कि यह ढलान काफी तेज है और पथरीला कच्चा रास्ता और कीचड़ मोटरसाइकिल के लिए समस्या पैदा करेगा। फिर हमारा जाना भी कोई बेहद जरूरी तो था नहीं। क्यों कीचड़ में गिरने का रिस्क उठाएँ? टाइगर फाल ही चलो। आखिर में जाना तो गंगोत्री है, चाहे पुरोला से जाओ या लाखामंडल से।
चकराता न जाकर टाइगर फाल वाली सड़क पर मुड़ गए। जून का महीना था और टूरिस्टों से यह सड़क भरी पड़ी थी।

Saturday, August 11, 2018

मोइला डांडा, बुग्याल और बुधेर गुफा

इस यात्रा-वृत्तांत को आरंभ से पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें

8 जून 2018

नाम रोहन राणा। इस होटल के मालिक का नाम। शानदार व्यक्तित्व। रौबीली मूँछें। स्थानीय निवासी।
“भाई जी, आज हमें बुधेर केव जाना है।”
“बुधेर केव? मतलब मोइला डांडा?”
“मतलब?”
“मतलब उसे हम मोइला डांडा कहते हैं।”
मुझे यह जानकारी नहीं थी। अभी तक वो जगह मेरी नजरों में बुधेर केव ही थी, लेकिन अब इसे मैं मोइला डांडा कहूँगा। यह एक ‘डांडा’ है, इतना तो मुझे पता था, लेकिन इसका नाम मोइला है, यह नहीं पता था।
“भाई जी, हम 12 बजे तक आ जाएँगे और तभी चेक-आउट करेंगे।”
“नहीं भाई जी। आज होटल की कम्पलीट बुकिंग है। गुजराती लोगों ने इसे बुक किया हुआ है। अभी चेक-आउट कर देंगे, तो अच्छा रहेगा।
सारा सामान हमने नीचे रेस्टोरेंट में रख दिया और बिस्कुट, नमकीन, पानी लेकर मोइला डांडे की ओर बढ़ चले।
लोखंडी से तीन किलोमीटर तक कच्चा मोटर रास्ता है, जो फोरेस्ट रेस्ट हाउस के पास समाप्त हो जाता है। चौकीदार ने बताया कि इस रेस्ट हाउस की बुकिंग कालसी से होती है। यहाँ तक आने का रास्ता देवदार के घने जंगल से होकर है। वैसे यह जंगल देवदार का ही है या किसी और का, इसमें मुझे डाउट है। क्योंकि मेरा जैव-वनस्पति ज्ञान शून्य है। चीड़ और देवदार की पहचान मैं कर लेता हूँ, लेकिन चीड़ जैसे दिखने वाले अन्य पेड़ भी होते हैं और देवदार जैसे दिखने वाले भी। इसलिए इन ‘उप-चीड़ों’ और ‘उप-देवदारों’ में हमेशा डाउट रहता है। फिर भी यह चीड़-प्रजाति के पेड़ों का जंगल नहीं था। चीड़ का जंगल सूखा-सूखा होता है और उसमें केवल चीड़ ही पनपता है। वह किसी अन्य को नहीं पनपने देता। जबकि देवदार प्रजाति का जंगल ‘अतिथि देवो भवः’ का पालन करता दिखता है और इसके नीचे बाकी सब पेड़ और झाड़ियाँ जमकर पनपते हैं।
तो यह देवदार प्रजाति का जंगल था। हम कहेंगे कि देवदार का जंगल था। देवदार के जंगल में पलक भी झपकाने का मन नहीं करता, कहीं कोई नजारा ‘मिस’ न हो जाए।

Monday, August 6, 2018

विकासनगर-लखवाड़-चकराता-लोखंडी बाइक यात्रा

इस यात्रा-वृत्तांत को आरंभ से पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें

7 जून 2018

“क्या!!!"
“हाँ, मैं सच कह रहा हूँ।”
“टाइगर फाल से भी जबरदस्त जलप्रपात!”
“हाँ, यकीन न हो, तो शिव भाई से पूछ लो।”
और शिव सरहदी ने भी पुष्टि कर दी - “हाँ, उदय जी सही कह रहे हैं। उसकी ज्यादा लोगों को जानकारी नहीं है। लोकल लोगों को जानकारी है, तो हम वहाँ अक्सर दारू पीने चले जाते हैं।”
रास्ता हमने समझ लिया और कल्पना करने लगे टाइगर फाल से भी जबरदस्त झरने की। अगर ऐसा हुआ तो कमाल हो जाएगा। लोगों को जब मेरे माध्यम से इसका पता चलेगा तो बड़ा नाम होगा। अखबार में भेजूंगा। टी.वी. पर भेजूंगा। टाइगर फाल क्या कम जबरदस्त है! लेकिन यह तो उससे भी जबरदस्त होगा।
“नाम क्या है इसका?”
“नाम कुछ नहीं है।”

Thursday, August 2, 2018

मोटरसाइकिल यात्रा: सुकेती फॉसिल पार्क, नाहन

जून का तपता महीना था और हमने सोच रखा था कि 2500 मीटर से ऊपर ही कहीं जाना है। मई-जून में घूमने के लिए सर्वोत्तम स्थान 2500 मीटर से ऊपर ही होते हैं। और इसमें चकराता के आगे वह स्थान एकदम फिट बैठता है, जहाँ से त्यूनी की उतराई शुरू हो जाती है। इस स्थान का नाम हमें नहीं पता था, लेकिन गूगल मैप पर देवबन लिखा था, तो हम इसे भी देवबन ही कहने लगे। इसके पास ही 2700 मीटर की ऊँचाई पर एक बुग्याल है और इस बुग्याल के पास एक गुफा भी है - बुधेर गुफा। बस, यही हमें देखना था।
उधर इंदौर से सुमित शर्मा अपनी बुलेट पर चल दिया था। वह 5 जून की शाम को चला और अगले दिन दोपहर बाद दिल्ली पहुँचा। पूरा राजस्थान उसने अंधेरे में पार किया, क्योंकि लगातार धूलभरी आँधी चल रही थी और वह दिन में इसका सामना नहीं करना चाहता था। लेकिन उसे क्या पता था कि इन आँधियों ने दिल्ली का भी रास्ता देख रखा है। दिल्ली पूरी तरह इनसे त्रस्त थी।
जब मैं ऑफिस से लौटा तो सुमित बेसुध पड़ा सो रहा था। एक टांग दीवार पर इस तरह टिकी थी कि अगर वह जगा होता तो कोशिश करने पर भी इस स्टाइल में नहीं लेट सकता था। उसे रात मैंने सलाह भी दी थी कि चित्तौड़गढ़, अजमेर या जयपुर कहीं भी वातानुकूलित कमरा लेकर आठ-दस घंटे की नींद लेकर ही आगे बढ़ना, लेकिन उसने वही पिटा-पिटाया जवाब दोहरा दिया - “घुमक्कड़ी कम खर्चे में करनी चाहिए।”
“लेकिन मोटरसाइकिल चलाते समय कभी भी नींद से समझौता नहीं करना चाहिए। यह जीवन-मरण का सवाल है।”

Monday, July 30, 2018

“मेरा पूर्वोत्तर” - काजीरंगा नेशनल पार्क

इस यात्रा-वृत्तांत को आरंभ से पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें
17 नवंबर 2017
चाउमीन खाकर हम कोहोरा फोरेस्ट ऑफिस के बाहर बैठकर काजीरंगा और कर्बी आंगलोंग के बारे में तमाम तरह की सूचनाएँ पढ़ने में व्यस्त थे, तभी तीन आदमी और आए। यात्री ही लग रहे थे। आते ही पूछा – “क्या आप लोग भी काजीरंगा जाओगे?”
मैंने रूखा-सूखा-सा जवाब दिया – “हाँ, जाएँगे।”
बोले – “हम भी जाएँगे।”
मैंने जेब से मोबाइल निकाला और इस पर नजरें गड़ाकर कहा – “हाँ, ठीक है। जाओ। जाना चाहिए।”
बोले – “तो एक काम करते हैं। हम भी तीन और आप भी तीन। मिलकर एक ही सफारी बुक कर लेते हैं। पैसे बच जाएँगे।”
और जैसे ही सुनाई पड़ा “पैसे बच जाएँगे”; तुरंत मोबाइल जेब में रखा और सारा रूखा-सूखा-पन त्यागकर सम्मान की मुद्रा में आ गया – “अरे वाह सर, यह तो बहुत बढ़िया बात रहेगी। मजा आ जाएगा। आप लोग कहाँ से आए हैं?”
“इंदौर, मध्य प्रदेश से।”

Thursday, July 26, 2018

“मेरा पूर्वोत्तर” - माजुली से काजीरंगा की यात्रा

इस यात्रा-वृत्तांत को आरंभ से पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें
17 नवंबर 2017
आज शाम तक हमें गुवाहाटी पहुँचना है। कल हमारी दिल्ली की फ्लाइट है। बीच में काजीरंगा नेशनल पार्क पड़ेगा। देखते हुए चलेंगे। उधर ब्रह्मपुत्र पार करके कुछ ही दूर गोलाघाट में एक मित्र कपिल चौधरी रेलवे में नौकरी करते हैं। कल ही वे उत्तराखंड से घूमकर आए थे। आज जैसे ही उन्हें पता चला कि हम माजुली में हैं और काजीरंगा देखते हुए जाएँगे तो हमारे साथ ही काजीरंगा घूमने का निश्चय कर लिया। तो हम इधर से चल पड़े, वे उधर से चल पड़े।
फिर से ब्रह्मपुत्र नाव से पार करनी पड़ेगी। कमलाबाड़ी घाट। बड़ी चहल-पहल थी। ढाबे वाले झाडू वगैरा लगा रहे थे। पहली नाव सात बजे चलेगी। वह पहले उधर से आएगी, तब इधर से जाएगी। समय-सारणी लगी थी। ज्यादातर लोग दैनिक यात्री लग रहे थे। कोई चाय पी रहा था, कोई आराम से बे-खबर बैठा था। बहुत सारी मोटरसाइकिलें भी उधर जाने वाली थीं।
जैसे ही उधर से नाव आई और मोटरसाइकिलों का रेला नाव पर चढ़ने लगा तो हमें लगने लगा कि कहीं जगह कम न पड़ जाए और हमारी मोटरसाइकिल यहीं न छूट जाए। लेकिन नाववालों का प्रबंधन देखकर दाँतों तले उंगली दबानी पड़ गई। पचास-साठ मोटरसाइकिलें तो नाव की छत पर ही आ गईं। छत पर ऐसा इंतजाम किया गया था कि मोटरसाइकिलें फिसलकर ब्रह्मपुत्र में न गिर पड़ें। और जब नाव चलने लगी तो इसमें मोटरसाइकिलों के अलावा चार गाड़ियाँ, ढेरों साइकिलें, नीचे यात्री, ऊपर छत पर भी यात्री और मोटरसाइकिलों पर भी यात्री। और किराया नाम-मात्र का – बीस-पच्चीस रुपये।