Thursday, June 28, 2018

“मेरा पूर्वोत्तर” - चराईदेव: भारत के पिरामिड

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10 नवंबर 2017
हम जब सत्‍तर की रफ्तार से दौड़े जा रहे थे, तो दाहिनी तरफ पुरातत्व विभाग का एक सूचना-पट्‍ट लगा दिखा - चराइदेव मैदाम। स्पीड़ सत्‍तर ही रही, लेकिन यह नाम दिमाग में घूमने लगा - पढ़ा है इस नाम को कहीं। शायद कल इंटरनेट पर पढ़ा है। शायद इसे देखने का इरादा भी किया था। बाइक रोक ली। दीप्‍ति से पूछा - “वो पीछे चराइदेव ही लिखा था ना?”
“कहाँ? कहाँ लिखा था? क्या लिखा था?”
“चराइदेव।”
“मैंने ध्यान नहीं दिया।”
मोबाइल निकाला। इंटरनेट चलाया - “हाँ, यह चराइदेव ही है। अहोम राजाओं की पहली राजधानी।”
बाइक वापस मोड़ी और चराइदेव मैदाम वाली सड़क पर चल दिए।

Monday, June 25, 2018

“मेरा पूर्वोत्तर” - शिवसागर

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10 नवंबर 2017
हम शिवसागर में थे। मुझे और दीप्‍ति किसी को भी असम के बारे में कुछ नहीं पता था। शिवसागर का क्या महत्व है, वो भी नहीं पता। चार साल पहले लामडिंग से सिलचर जाते समय ट्रेन में एक साधु मिले थे। वे शिवसागर से आ रहे थे। उन्होंने शिवसागर की धार्मिक महत्‍ता के बारे में जो बताया था, तब से मन में अंकित हो गया था कि शिवसागर असम का हरिद्वार है। आज हम ‘हरिद्वार’ में थे। सोने से पहले थोड़ी देर इंटरनेट चलाया और हमें शिवसागर के बारे में काफी जानकारी हो गई। साथ ही यह भी पता चल गया कि कल हमें कहाँ-कहाँ जाना है और क्या-क्या देखना है।
हमें असम के बारे में कभी नहीं पढ़ाया गया। असम का इतिहास हमारे पाठ्यक्रम में कभी रहा ही नहीं। असम के नाम की उत्पत्‍ति बताई गई कि यहाँ की भूमि असमतल है, इसलिये राज्य का नाम अ-सम है। जबकि ऐसा नहीं है। यह असल में असोम है, जो अहोम से उत्पन्न हुआ है। सन् 1228 से सन् 1826 तक यानी लगभग 600 सालों तक यहाँ अहोम राजवंश का शासन रहा है। जब मुगल पूर्वोत्‍तर में पैर पसारने की जी-तोड़ कोशिश कर रहे थे, तो अहोम राजवंश ही था जिसने मुगलों को असम में घुसने भी नहीं दिया। लेकिन हमें मुगलों के बारे में सबकुछ बता दिया जाता है, अहोमों के बारे में कुछ नहीं बताया जाता।

Thursday, June 21, 2018

“मेरा पूर्वोत्तर”... गुवाहाटी से शिवसागर

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9 नवंबर 2017
यहाँ दिन जल्दी निकलता है और जल्दी छिपता भी है। दिल्ली से एक घंटा पहले ही दिन निकल आता है। हमें वही दिल्ली वाली आदत थी उठने की, लेकिन आज जल्दी उठ गए। आज हमें कम से कम तिनसुकिया तो पहुँचना ही था, जो यहाँ से 470 किलोमीटर दूर है। मुझे जानकारी थी कि 100 किलोमीटर दूर नगाँव तक चार-लेन का हाईवे है और उसके बाद दो-लेन का। दो-लेन वाली सड़क पर थोड़ी मुश्किल तो होती है, लेकिन फिर भी उम्मीद थी कि दिन ढलने तक तिनसुकिया तो पहुँच ही जाएँगे।
आज ही तिनसुकिया पहुँचने का एक मुख्य कारण था कि कल अरुणाचल में पांगशू पास आम लोगों के लिये खुला रहेगा। सुनने में आया था कि हर महीने की 10, 20 और 30 तारीख को भारत और म्यांमार के बीच स्थित पांगशू पास आम लोगों के लिये खुलता है और दोनों देशों में एक दिन के लिए दोनों देशों के नागरिक आ-जा सकते हैं। हम कल पांगशू पास भी अवश्य जाना चाहते थे।

Monday, June 18, 2018

“मेरा पूर्वोत्तर”... यात्रारंभ

1.
हम पूर्वोत्‍तर से इतना क्यों डरते हैं?
अपनी अवधारणाओं के कारण।
हम तक छँटी हुई खबरें मिर्च-मसाला लगकर पहुँचती हैं और हम उन पर भरोसा कर लेते हैं और भारत के इतने खूबसूरत हिस्से से डरने लगते हैं। हमने अपने मन में अवधारणा बना ली है कि पूर्वोत्‍तर सुरक्षित नहीं है।
जबकि ऐसा नहीं है। यह भारत के ज्यादातर हिस्सों से ज्यादा सुरक्षित है।
इस यात्रा में हम पूर्वोत्‍तर के उन स्थानों पर होकर आए, जहाँ अमूमन कोई नहीं जाता। इस किताब को एक ‘ट्रैवल गाइड’ की तरह नहीं लिखा गया है। इसमें केवल हमारे कुछ अनुभव हैं और वे बातें हैं, जो हमने देखीं और महसूस कीं। पूरी यात्रा के दौरान हमारे मन में किसी भी तरह की असुरक्षा की भावना नहीं थी; हम सकारात्मक ऊर्जा से भरे थे और स्थानीय लोगों का व उनके रिवाजों का, खान-पान का सम्मान भी करते थे। यही कारण रहा कि हमें भी अच्छे लोग ही मिले।

Sunday, June 3, 2018

चौथी किताब: मेरा पूर्वोत्तर

साल 2017 के दसवें महीने में मन में आया कि चलो, अपनी मोटरसाइकिल से पूर्वोत्तर घूमने चलते हैं। पूर्वोत्तर में कहाँ? कहीं भी। कुछ भी नहीं देखा हमने पूर्वोत्तर में अभी तक। तो जहाँ भी निकल जाएँगे, सब नया ही होगा।
यात्रा ठीकठाक हो जाएगी तो इस बहाने एक किताब भी तैयार हो जाएगी।


जब लिखने का चस्का पड़ जाता है तो मन करता है कि और अच्छा लिखें; और रोचक लिखें; और नए तरीके से लिखें। ब्लॉग लेखक में भी ऐसी ही सोच थी और अब किताब लेखन में भी। उस समय तक मेरी तीन किताबें प्रेस में थीं - ‘सुनो लद्दाख!’ और ‘पैडल पैडल’ को अंजुमन प्रकाशन प्रकाशित कर रहा था और ‘हमसफर एवरेस्ट’ को हिंदयुग्म। तीनों किताबें लगभग एक साथ ही आने वाली थीं, इसलिए मेरा काम बहुत बढ़ा हुआ था। इस वजह से मैं पूर्वोत्तर की यात्रा के लिए कोई तैयारी नहीं कर पाया।