Skip to main content

पुस्तक-चर्चा: पग पग सनीचर

एक व्हाट्सएप घुमक्कड़ी ग्रुप है। और जैसा कि व्हाट्सएप के सभी ग्रुपों में होता है, इसमें भी देशभर के कुछ घुमक्कड़ मिलकर एक-दूसरे की टांग-खिंचाई में तल्लीन रहते थे। किसी जमाने में मैं भी इस ग्रुप का सदस्य था और दूसरों की खूब टांग खींचा करता था और जब दूसरा कोई मेरी खिंचाई कर देता, तो मैं ग्रुप छोड़कर भाग जाता था। तो ऐसे ही यह ग्रुप चल रहा था। चूँकि इसके सदस्य देशभर में रहते हैं तो कोई कहीं भी घूमने जाता, कंपनी मिल ही जाती थी।
फिर इस ग्रुप में प्रवेश हुआ ललित शर्मा जी का। और उन्होंने नारा दिया - “कुछ अलग-सा करते हैं।” और अलग-सा करते-करते यह किताब बन गयी - पग पग सनीचर। इसमें उस ग्रुप के तीस सदस्यों के यात्रा-वृत्तांत व यात्रा-लेख हैं। यह संग्रह इसलिये भी खास है, क्योंकि दो-तीन लेखक ही इससे पहले ब्लॉग या समाचार-पत्रों में नियमित लिखते थे। बाकी ज्यादातर ने कभी भी सीरियसली नहीं लिखा। और इस किताब में सभी ने वाकई सीरियसली लिखा है। उम्मीद है कि इसके सभी लेखक आगे भी इसी तरह लिखते रहेंगे और हमें भविष्य में बहुत सारे यात्रा-वृत्तांत पढ़ने को मिलेंगे।
तो चर्चा करते हैं एक-एक करके सभी की...

1. ललित शर्मा: रोम-रोम में बसने वाले राम - छत्तीसगढ़
इसमें किताब के संपादक ललित शर्मा जी ने छत्तीसगढ़ में प्रचलित राम के विभिन्न रूपों और स्थानों के बारे में बताया है।

2. अभ्यानंद सिन्हा: मगध का गौरव - राजगीर
बिहार के रहने वाले सिन्हा साहब ने अपनी राजगीर की एकदिवसीय यात्रा का वर्णन किया है।

3. आलोक जोशी: भारत के स्विट्ज़रलैंड़ की सैर
अर्थात चोपता बुग्याल की यात्रा, मार्च के महीने में। भारी बर्फ़बारी में इन्होंने किस तरह अपनी यात्रा की, पढ़ना दिलचस्प है।



4. अल्पा डगली: किंग कोबरा के घर अगुम्बे में कुछ रातें
शानदार यात्रा-वर्णन। मज़ा आ गया। मुंबई की रहने वाली अल्पा जी ने कर्नाटक के घने वर्षावन की यात्रा के बारे में लिखा है। शैली बड़ी ही रोचक है। केवल चार ही पेज लिखे हैं, चालीस लिखने चाहिये थे।
“एक मेंढक ने तो मुझे बाथरूम में फ्लाइंग किस दे दी...”

5. अमन मल्लिक: जहाँ मुर्दे होते हैं ज़िंदा - तारापीठ
यह यात्रा-वृत्तांत तो नहीं है, लेकिन पश्चिमी बंगाल में स्थित तारापीठ के बारे में विस्तार से बताया गया है।

6. अनिल दीक्षित: बादलों के देश में - कल्पनाथ रुद्रेश्वर ट्रैकिंग
यह असल में ‘कल्पेश्वर रुद्रनाथ ट्रैकिंग’ है, जो कि उत्तराखंड़ में पाँच केदारों में क्रमशः पाँचवें और चौथे केदार हैं। कल्पेश्वर से रुद्रनाथ की ट्रैकिंग और जंगल में रात भटकने का अच्छा वर्णन है।

7. चंद्रेश कुमार: सिक्किम - धरती का स्वर्ग
सिक्किम यात्रा का वर्णन है। गुरदोंगमर झील और नाथु-ला समेत।

8. दर्शन कौर धनोय: जहाँ होते हैं गुरू के दर्शन - तपोभूमि हेमकुंड़ साहिब
शीर्षक से आप भी समझ ही गये होंगे कि श्री हेमकुंड़ साहिब की यात्रा का वर्णन है। ये जितने भी हिमालय के वृत्तांत होते हैं ना, सभी अच्छे ही होते हैं।

9. देवेंद्र कोठारी: हिमालय की वादियों से
मैंने नवंबर 2015 में एक कार्यक्रम बनाया था - बाइक से हिमाचल भ्रमण का। मैं तो वहाँ नहीं जा पाया, लेकिन जयपुर से देवेंद्र कोठारी जी और ऊधमपुर से रमेश शर्मा जी वहाँ हो आये। इन्होंने नारकंडा, हाटू चोटी, जलोडी जोत, सेरोलसर झील, गुशैणी और पराशर झील की यात्रा का अच्छा वर्णन किया है।




2010 में दैनिक जागरण में एक लेख आया था - हर मौसम में बुलाती पराशर। इसके लेखक का नाम फिलहाल तो मुझे याद नहीं, लेकिन इस लेख की कई पंक्तियाँ भी कोठारी जी ने ज्यों की त्यों इस किताब में लगा दी हैं। ऐसा नहीं होना चाहिये था।

10. हर्षिता जोशी: प्रकृति की अनुपम सौगात - ऊटी
लेखिका ने अपनी ऊटी और कन्नूर यात्रा के बारे में लिखा है।

11. कपिल चौधरी: प्रकृति का अनमोल रत्न - प्रागज्योतिषपुर
कपिल जी वैसे तो धनबाद के रहने वाले हैं, लेकिन नौकरी के चलते असम में रहते हैं, वह भी नागालैंड़ सीमा के पास फरकाटिंग में। उन्होंने कामाख्या, शिवसागर और माजुली के बारे में कई रोचक जानकारियाँ प्रदान की हैं।

12. किशन कुमार बाहेती: उगते सूरज का देश - अरुणाचल
तवांग, बुम-ला आदि की यात्रा का रोचक वर्णन।

13. महेश सेमवाल: ईश्वर का निवास - केरल
एक छोटा-सा यात्रा-वृत्तांत, कोच्चि के दर्शनीय स्थलों पर केंद्रित।

14. मनोज धाड़से: डर के आगे जीत है - हरिहर फोर्ट ट्रैकिंग
गज़ब का रोचक लेखन। महाराष्ट्र में हरिहर फोर्ट की ट्रैकिंग काफ़ी दुर्गम मानी जाती है। उन्होंने ट्रैक तो कर लिया, लेकिन लिखने का अंदाज़!... आप बार-बार इस लेख को पढ़ना चाहेंगे।

15. मुकेश पांडेय: जहाँ आज भी राम की सरकार है - ओरछा
हमारी मित्र-मंडली में मुकेश पांडेय नाम अगर कोई भूल-चूक से भूल जाता है, तो ‘ओरछा वाले’ कहकर काम चलाया जाता है। ओरछा मतलब मुकेश पांडेय और मुकेश पांडेय मतलब ओरछा। और जब भी इनके मुँह से किसी दर्शनीय स्थान की बात निकलती है, तो वो दर्शनीय स्थान ओरछा ही होता है। पूरे अधिकार से इस लेख में इन्होंने ओरछा के बारे में लिखा है।

16. नरेंद्र कुमार चौहान: पक्षियों का अदभुत संसार - केवलादेव घाना पक्षी विहार
राजस्थान में भरतपुर के पास स्थित है यह पक्षी विहार। अच्छा यात्रा-वृत्तांत है।

17. नरेश सहगल: जहाँ होती हैं मुरादें पूरी - माता मनसा, पंचकुला
हरियाणा के पंचकुला जिले में स्थित नाड़ा साहिब गुरुद्वारे और मनसा मंदिर के बारे में इत्मीनान से बताया है।

18. नयन सिंह: देवगढ़ के मंदिर और दर्शनीय शिल्प
यू.पी. में ललितपुर के पास स्थित है देवगढ़। नयन सिंह जी ने इसका विस्तार से वर्णन करके एक अनजाने स्थान के बारे में बताया है।

19. प्रतीक गांधी: चाय, लम्हे, बारिश और यादें - मेरी स्पीति यात्रा
बाइक यात्रा। शिमला, किन्नौर की तरफ से स्पीति घाटी में प्रवेश करके रोहतांग से बाहर निकलने तक का जीवंत वर्णन।

20. प्रकाश यादव: प्रकृति का अनमोल खजाना - जांसकर वैली
और इस यात्रा-वर्णन में मैं भी उपस्थित हूँ। मैं, प्रकाश यादव जी और विधान - हम तीन मित्र जांसकर गये थे। पदुम-दारचा ट्रैक करने। मैंने तो इस वृत्तांत पर आधी किताब - सुनो लद्दाख! - लिखी थी, और प्रकाश जी ने अपने ही अंदाज़ में पूरी यात्रा एक ही चैप्टर में लिख दी। पूरे चैप्टर में प्रकाश जी न कहीं अपना नाम लेते हैं और न हमारा, वे केवल आपको संबोधित करते हुए लिखते हैं - जैसे अब आप सूरू घाटी देखिये, अब आपके सामने नुन-कुन शिखर हैं आदि।

21. प्रतिमा शरण - बचपन के सपनों की उड़ान
इसे कहते हैं उत्कृष्ट लेखन। चेन्नई, तिरुपति और मदुरई भ्रमण का भावुक वर्णन किया है।

22. रचना मोरे: स्वर्णिम सूर्य किरणों का देश - गोवा
यह यात्रा-वृत्तांत तो नहीं है, लेकिन गोवा के दर्शनीय स्थानों के बारे में सबकुछ लिखा है।

23. आर. डी. प्रजापति: सारंडा की वादियों में
झारखंड़ का यात्रा-वृत्तांत हो और जंगलों का ज़िक्र न हो! उडीसा सीमा के नज़दीक सारंडा के जंगलों की यात्रा का विवरण है। किरिबुरू के लौह-अयस्क की खदानों का भी और ‘हो’ जनजाति द्वारा मनाये जा रहे ‘माघे’ पर्व का भी।

24. रीतेश कुमार गुप्ता: एक दिन वृंदावन की कुंज गलियन में
आगरा के रहने वाले रीतेश जी तो पुराने ब्लॉगर ठहरे। अपने ब्लॉग में भी वे यात्रा-वृत्तांत ही लिखते हैं। और इस किताब में उन्होंने वृंदावन की यात्रा का वृत्तांत लिखा है।

25. सचिन कुमार जांगड़ा: बर्फ में बाइकिंग - तुंगनाथ, कार्तिक स्वामी
इसी यात्रा का वर्णन इसी किताब में आलोक जोशी जी ने भी किया है। लेकिन सचिन के अनुभव भी अलग ही रहे।





26. संध्या शर्मा: रेवा एवं शोण की प्रेम कहानी की नगरी - अमरकंटक
अमरकंटक के बारे में वो सब लिखा है, जो आप जानना चाहते हैं। अच्छा यात्रा-वृत्तांत।

27. संजय कौशिक: होइहैं वही जेहि राम रचि राखा...
सन 2010 में केदारनाथ की यात्रा का रोमांचक वर्णन है।

28. संतोष कुमार मिश्रा: मंदिर दर्शन यात्रा - आंध्र प्रदेश
मिश्रा जी लखनऊ से अपनी कार से तिरुपति तक गये। साथ ही श्री कालहस्ती, विजयवाड़ा और विशाखापटनम की भी यात्रा की।

29. डॉ. सुमित शर्मा: नमक का नखलिस्तान - कच्छ
आपको याद होगा जब मैं दिल्ली से अपनी बाइक से कच्छ गया था, तो काला डोंगर में मंदिर की धर्मशाला में एक कमरा 300 रुपये का था। ठीक इसी समय दो लड़के मेरे पास आये और अपना कमरा शेयर करने का सुझाव दे दिया। तीनों को अब यह 100-100 रुपये का पड़ गया। इनमें से एक था डॉ. सुमित शर्मा। उसने अपनी इसी यात्रा का वर्णन किया है। इंदौर से निकलने से लेकर काला डोंगर में मुझसे मिलने और बाद में भचाऊ में अलग होने तक का रोचक विवरण इसमें है।

30. योगी सारस्वत: सुनहरे किले का शहर - जैसलमेर
योगी जी के यात्रा लेख अब पत्र-पत्रिकाओं में भी आने लगे हैं। इस लेख में उन्होंने जैसलमेर के आसपास के स्थानों का वर्णन किया है।

किताब का ‘कॉन्सेप्ट’ निःसंदेह बहुत अच्छा है, लेकिन इसमें बहुत सारी त्रुटियाँ हैं। लगता है कि प्रकाशक व संपादक ने प्रूफ-रीडिंग नहीं की। लगभग प्रत्येक पृष्ठ पर एक-दो स्थानों पर ‘डबल स्पेस’ हैं। वर्तनी की भी बहुत सारी अशुद्धियाँ हैं। पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार व झारखंड़ के लोग पुल्लिंग-स्त्रीलिंग व एकवचन-बहुवचन का मिश्रण बनाकर बोलते हैं और वह मिश्रण फिर लेखन में भी आ जाता है, ऐसी भी कई त्रुटियाँ हैं।
“टिकट लेकर हम संग्रहालय में प्रवेश किया तो...”
कुल मिलाकर किताब संग्रहणीय और पठनीय है।

पुस्तक: पग पग सनीचर
संपादक: ललित शर्मा
प्रकाशक: आर्यावर्त्त संस्कृति संस्थान, दिल्ली
आई.एस.बी.एन.: 978-93-80943-78-7
पृष्ठ: 160
अधिकतम मूल्य: 150 रुपये (पेपरबैक)




Comments

  1. बढ़िया लिखा है नीरज, बिल्कुल "दिल से"

    ReplyDelete
  2. Arunanchal ka kya hua sir ji......

    ReplyDelete
  3. नीरज भाई, अच्छा लगा आपने पग पग सनीचर के बारे में लिखा । यह पुस्तक एक महीने के रिकॉर्ड समय में प्रकाशित हुई । लेखकों को कम समय मिला, इसलिए जल्दबाजी में गलतियां होना स्वाभाविक है । मैं भी ओरछा पर नही दूसरी जगह की यात्रा लिखना चाहता था , लेकिन ललित जी का आग्रह और मेरे ऊपर लगा ओरछा के लेबल ने ओरछा पर लिखने पर मजबूर हुआ । ओरछा पर भी जल्दबाजी में लिखा । खैर आपने पढ़ा उसके लिए आभार ।

    ReplyDelete

Post a Comment

Popular posts from this blog

ट्रेन में बाइक कैसे बुक करें?

अक्सर हमें ट्रेनों में बाइक की बुकिंग करने की आवश्यकता पड़ती है। इस बार मुझे भी पड़ी तो कुछ जानकारियाँ इंटरनेट के माध्यम से जुटायीं। पता चला कि टंकी एकदम खाली होनी चाहिये और बाइक पैक होनी चाहिये - अंग्रेजी में ‘गनी बैग’ कहते हैं और हिंदी में टाट। तो तमाम तरह की परेशानियों के बाद आज आख़िरकार मैं भी अपनी बाइक ट्रेन में बुक करने में सफल रहा। अपना अनुभव और जानकारी आपको भी शेयर कर रहा हूँ। हमारे सामने मुख्य परेशानी यही होती है कि हमें चीजों की जानकारी नहीं होती। ट्रेनों में दो तरह से बाइक बुक की जा सकती है: लगेज के तौर पर और पार्सल के तौर पर। पहले बात करते हैं लगेज के तौर पर बाइक बुक करने का क्या प्रोसीजर है। इसमें आपके पास ट्रेन का आरक्षित टिकट होना चाहिये। यदि आपने रेलवे काउंटर से टिकट लिया है, तब तो वेटिंग टिकट भी चल जायेगा। और अगर आपके पास ऑनलाइन टिकट है, तब या तो कन्फर्म टिकट होना चाहिये या आर.ए.सी.। यानी जब आप स्वयं यात्रा कर रहे हों, और बाइक भी उसी ट्रेन में ले जाना चाहते हों, तो आरक्षित टिकट तो होना ही चाहिये। इसके अलावा बाइक की आर.सी. व आपका कोई पहचान-पत्र भी ज़रूरी है। मतलब

46 रेलवे स्टेशन हैं दिल्ली में

एक बार मैं गोरखपुर से लखनऊ जा रहा था। ट्रेन थी वैशाली एक्सप्रेस, जनरल डिब्बा। जाहिर है कि ज्यादातर यात्री बिहारी ही थे। उतनी भीड नहीं थी, जितनी अक्सर होती है। मैं ऊपर वाली बर्थ पर बैठ गया। नीचे कुछ यात्री बैठे थे जो दिल्ली जा रहे थे। ये लोग मजदूर थे और दिल्ली एयरपोर्ट के आसपास काम करते थे। इनके साथ कुछ ऐसे भी थे, जो दिल्ली जाकर मजदूर कम्पनी में नये नये भर्ती होने वाले थे। तभी एक ने पूछा कि दिल्ली में कितने रेलवे स्टेशन हैं। दूसरे ने कहा कि एक। तीसरा बोला कि नहीं, तीन हैं, नई दिल्ली, पुरानी दिल्ली और निजामुद्दीन। तभी चौथे की आवाज आई कि सराय रोहिल्ला भी तो है। यह बात करीब चार साढे चार साल पुरानी है, उस समय आनन्द विहार की पहचान नहीं थी। आनन्द विहार टर्मिनल तो बाद में बना। उनकी गिनती किसी तरह पांच तक पहुंच गई। इस गिनती को मैं आगे बढा सकता था लेकिन आदतन चुप रहा।

नेपाल यात्रा- गोरखपुर से रक्सौल (मीटर गेज ट्रेन यात्रा)

इस यात्रा वृत्तान्त को शुरू से पढने के लिये यहां क्लिक करें । 11 जुलाई की सुबह छह बजे का अलार्म सुनकर मेरी आंख खुल गई। मैं ट्रेन में था, ट्रेन गोरखपुर स्टेशन पर खडी थी। मुझे पूरी उम्मीद थी कि यह ट्रेन एक घण्टा लेट तो हो ही जायेगी लेकिन ऐसा नहीं हुआ। ठीक चार साल पहले मैं गोरखपुर आया था, मेरी ट्रेन कई घण्टे लेट हो गई थी तो मन में एक विचारधारा पैदा हो गई थी कि इधर ट्रेनें लेट होती हैं। इस बार पहले ही झटके में यह विचारधारा टूट गई। यहां से सात बजे एक पैसेंजर ट्रेन (55202) चलती है- नरकटियागंज के लिये। वैसे तो यहां से सीधे रक्सौल के लिये सत्यागृह एक्सप्रेस (15274) भी मिलती है जोकि कुछ देर बाद यहां आयेगी भी लेकिन मुझे आज की यात्रा पैसेंजर ट्रेनों से ही करनी थी- अपना शौक जो ठहरा। इस रूट पर मैं कप्तानगंज तक पहले भी जा चुका हूं। आज कप्तानगंज से आगे जाने का मौका मिलेगा।