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पुस्तक-चर्चा: चुटकी भर नमक, मीलों लंबी बागड़

पुस्तक मेले में घूमते हुए एक पुस्तक दिखायी पड़ी - चुटकी भर नमक, मीलों लंबी बागड़। कवर पेज पर भारत का पुराना-सा नक्शा भी छपा था, तो जिज्ञासावश उठाकर देखने लगा। और खरीद भी ली।
ब्रिटिश राज में नमक पर कर लगा करता था। बंगाल रेजीडेंसी में यह सर्वाधिक था - साल में आम जनता की लगभग दो महीने की आमदनी के बराबर। तो बंबई रेजीडेंसी व राजपूताना की तरफ से इसकी तस्करी होने लगी। इस तस्करी को रोकने के लिये अंग्रेजों ने 1500 मील अर्थात 2400 किलोमीटर लंबी एक बाड़ बनवायी। यह बाड़ इतनी जबरदस्त थी कि कोई इंसान, जानवर इसे पार नहीं कर सकता था। यह बाड़ मिट्टी और कँटीली झाड़ियों की बनायी गयी। बीच-बीच में द्वार बने थे। केवल द्वारों से होकर ही इसे पार करना होता था - वो भी सघन तलाशी के बाद।





लेकिन 1879 के आसपास पूरे देश में समान नमक कर लागू कर दिया गया, जिससे तस्करी रुक गयी। तस्करी रुक गयी तो बाड़ की कोई आवश्यकता नहीं रही। इस बाड़ अर्थात बागड़ को समाप्त कर दिया गया। इसका भारतीय इतिहास में कहीं कोई उल्लेख नहीं मिलता। मुझे भी नहीं पता था। वो तो भला हो पुस्तक के ब्रिटिश लेखक रॉय मॉक्सहैम का, जिन्हें लंदन में किसी पुस्तकालय में अचानक ही इसका पता चला। फिर जो उन्होंने इसकी खोजबीन की, 1990 के दशक में भारत की कई यात्राएँ कीं और उस बाड़ के अवशेषों को देखा भी। बड़ी ही रोचक पुस्तक है।
दिलीप चिंचालकर ने शानदार अनुवाद किया है। हालाँकि एक-दो बार पूर्व की बजाय पश्चिम और पश्चिम की बजाय पूर्व लिखा; एक बार नवंबर में गेहूँ की फसल कटवा दी। ये गलतियाँ अनुवादक ने ही की होंगी, फिर भी 5 में से 5 नंबर।

अब कुछ बात इसके विभिन्न चैप्टर्स के बारे में:
1. एक बागड़?: बागड़ की खोज में लेखक ने भारत यात्रा की। जालौन जिले और झाँसी में इसकी खोज की असफल कोशिश की।
2. नमक पर कर: नमक कर क्या था; क्यों लगाया गया; जनता पर क्या फर्क पड़ा और बागड़ क्यों बनायी गयी; इसका विस्तृत रोचक वर्णन किया।
3. नक्शे: लेखक इंग्लैंड चला गया। अब उसे ऐसे नक्शे ढूँढने थे, जिनमे चुंगी रेखा अर्थात बागड़ भी हो। 1879 में नमक कर पूरे देश मे एक समान कर दिया गया था, तो बागड़ की जरूरत नही रही। किन-किन मशक्कतों के बाद लेखक को ऐसे नक्शे मिले, फिर उसने क्या-क्या तैयारियाँ कीं, यह सब पढ़ना बेहद रोचक है।
4. चुंगी रेखा: चुंगी रेखा क्या थी, कैसी थी, क्या-क्या कब-कब बदलाव हुए; लोगों पर क्या फर्क पड़ा। इसके आसपास कौन-से राज्य थे; किस तरह तस्करी होती थी। सब लिखा है। और हाँ, इस बाड़ को स्थानीय लोग परमिट लैन भी कहते थे।




5. आगरा: लेखक चुंगी रेखा की खोज में फिर आता है भारत। अपने नक्शों के आधार पर आगरा व झाँसी में खोज करता है। तमाम निराशाओं के बाद आखिरकार आंशिक सफलता मिल ही जाती है।
6. सीमा शुल्क बागड़: सीमा शुल्क बागड़ के बारे में कुछ आँकड़े और इस विभाग के आयुक्तों के कुछ अनुभव लिखे हैं।
7. नमक: नमक की जरूरत क्यों है; नमक से शरीर में क्या होता है। नमक की कमी से मौत भी हो सकती है। सब बड़े विस्तार से रोचक तरीके से बताया।
8. एक बेतुका फितूर: लेखक फिर से भारत आता है 1998 में। हैदराबाद अंतरिक्ष संस्थान से सैटेलाइट फोटो लेने की असफल कोशिश करता है। सांभर लेक भी जाता है और झाँसी बबीना में खोज करता है।
9. बगावत: नमक कर का अन्य देशों में वजूद व इतिहास। भारत में नमक सत्याग्रह का विवरण।
10. इमली के पेड़: ऐरच में बेतवा के पास इन्हें चुंगी रेखा के अवशेष मिले - पुराने समय में डाकू रहे और वर्तमान में मंदिर के पुजारी की सहायता से। साथ ही कांग्रेस के स्थापक ए.ओ. ह्यूम के बारे में भी लिखा कि वे शुरू में इटावा में दंडाधिकारी थे।
11. चंबल: और आखिरकार बागड़ का एक टुकड़ा इन्हें मिल ही गया। इटावा में चकरनगर के पास।
बेहद रोचक पुस्तक।





चुटकी भर नमक, मीलों लंबी बागड़ (नेशनल बुक ट्रस्ट)
लेखक: रॉय मॉक्सहैम
अनुवादक: दिलीप चिंचालकर
आई.एस.बी.एन. 978-81-237-6438-2
मूल्य: 80 रुपये (पेपरबैक)
पृष्ठ: 160





Comments

  1. बढ़िया जानकारी सरजी

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  2. किसी पुस्तक के बारे मे ढूँढते हुए यहाँ पहुँची तो पता चला आप पुस्तक समीक्ष भी लिखते हैं. बहुत समय बाद आप से पुनः मिलना अच्छा रहा.
    और यह जानना भी अच्छा लगा कि आप भी पुस्तक प्रेमी यायावर हैं. हमारी यात्राओं मे आजकल किंडल और दो पुस्तको का स्थान समान मे निश्चित रहता है.

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