Skip to main content

हर्षिल-गंगोत्री यात्रा (शिवराज सिंह)

1441428882429


रेलवे में सीनियर इंजीनियर शिवराज सिंह जी ने अपनी हर्षिल और गंगोत्री यात्रा का वर्णन भेजा है। हो सकता है कि यह वृत्तान्त आपको छोटा लगे लेकिन शिवराज जी ने पहली बार लिखा है, इसलिये उनका यह प्रयास सराहनीय है।
मेरा नाम शिवराज सिंह है। उत्तर प्रदेश के शामली जिले से हूँ। शिक्षा-दीक्षा मुजफ्फरनगर के डीएवी कालेज व गाँधी पॉलीटेक्निक में हुई। वर्तमान मे उत्तर रेलवे के जगाधरी वर्कशॉप में सीनियर सेक्शन इंजीनियर के पद पर कार्यरत हूँ। बचपन से ही घूमने फिरने का शौक रहा है। रेलवे मे काम करते समय घूमने का काफ़ी मौका मिलता है। यात्रा ब्लॉग पढ़ने की शुरुआत आपके ब्लॉग से की। मजा आया क्योंकि अपनी जानी-पहचानी भाषा में लिखा था। पहले कभी लिखने के विषय में नही सोचा, परन्तु आपके ब्लॉग को पढ़कर कोशिश कर रहा हूँ।
जून 2015 मे गंगोत्री घूमने गया था। साथ मे बेटा व तीन नौजवान भानजे भी थे। शुरुआत मे केवल मसूरी तक जाने का प्रोग्राम था, परंतु वहाँ की भीड़-भाड़ मे मजा नही आया औऱ एक भानजे ने जो कि नियमित रूप से उत्तराखण्ड के पहाडी इलाकों मे घूमता रहता है, हर्षिल का जिक्र किया जिसके विषय मे नेट पर पढ़ा था कि वहाँ पर राजकपूर की ‘राम तेरी गंगा मैली’ फिल्म की शूटिंग हुई थी तथा वहाँ पर सेब के बगीचो के विषय मे भी सुना था। बस तो फिर हर्षिल का प्रोग्राम बन गया। कार औऱ ड्राइवर अपने थे इसलिये कोई समस्या नही आयी। सुबह ही हम पाँच यात्री हर्षिल के लिये चल पड़े। रास्ते मे एक जगह जिसका नाम शायद चिन्यालीसौड था, जमकर आलू के स्वादिष्ट परांठे खाए। उत्तरकाशी से पहले तथा बाद में कई जगह सड़क काफी ख़राब मिली।

1438096715459पहली बार इतनी ऊँचाई पर कार से यात्रा कर रहे थे, इसलिए एक तरफ़ ऊँचे-ऊँचे पहाड़ औऱ एक तरफ़ गहरी घाटी में बहती भागीरथी नदी को देखकर हालत खराब थी, परंतु अलग नजारों को देखकर मजा भी आ रहा था। रास्ते मे एक जगह निरस्त जल-विद्युत परियोजना (जगह का नाम शायद मनेरी था) स्थल के आसपास बिखरी बहुमूल्य मशीनों औऱ वहाँ हुए निर्माण को देखकर मन बड़ा दुखी हुआ। ये सब शायद अनंत काल तक ऐसे ही पड़ा रहेगा। खैर, शाम को लगभग चार बजे हम हर्षिल पहुँचे। ऐसा लगा जैसे किसी फिल्म के सेट पर पहुँच गये हो। वहाँ वो सब था जोकि या तो फिल्मों मे देखते है या फोटो मे देखते हैं। चारों तरफ़ पहाडियों से आते झरने औऱ कल-कल बहती जलधारायें एक स्वर्ग-सा नजारा पेश कर रही थी। साथ मे भोटिया जनजाति की बस्ती भी देखी, जो कि एक अलग ही दुनिया के प्राणी लगे। आज भी शहरी सभ्यता से कोसों दूर अपने मे मगन। बुजुर्ग औऱ औरते अलग-अलग समूह मे बैठे हुए कहकहे लगा रहे थे। ये नजारा अब हमारे यहाँ मिलना दुर्लभ है। अगर मिलता भी हैं तो बाकी लोग उन्हे पागल घोषित कर देते हैं।

हर्षिल आने के बाद गंगोत्री तो जाना ही था जोकि यहाँ से लगभग 30 किलोमीटर है। लगभग आठ बजे गंगोत्री पहुँच गये। पहुँचते ही कमरे वालो ने घेर लिया। ऐसा लगा वे हमारी ही प्रतीक्षा कर रहे थे। 2013 मे आई त्रासदी का असर अभी तक था। जून के पीक सीजन मे भी बहुत कम यात्री थे। शुरुआत पाँच सौ रुपये से हुई औऱ तीन सौ रूपये मे एक अच्छा कमरा मिल गया वो भी साफ सुथरा औऱ मोटे कम्बलो के साथ। वह शायद बिड़ला की धर्मशाला थी। सामान रखकर भोजन के लिये निकले। मंदिर के गेट के पास ही एक साफ सुथरा ढाबा मिला। गंगोत्री यात्रा की शायद यही सबसे घटिया याद थी, क्योंकि काफी महँगा होने के बावजूद एकदम घटिया खाना था। थोड़ा घूम फिर कर कमरे पर पहुंच गये औऱ अपने-अपने कम्बल तान लिये। बाकी का तो मुझे पता नही परन्तु मेरी आँख बार-बार खुलती रही। रात के सन्नाटे मे भागीरथी का शोर डरा रहा था।
सुबह नहा-धोकर मंदिर के दर्शन किये। सूर्योदय के समय दूर बर्फ़ ढके पहाडो का रंग प्रतिक्षण बदल रहा था। दर्शन के बाद गोमुख वाले रास्ते पर लगभग तीन किलोमीटर तक गये। हालत ख़राब हो गयी। शाम तक वापिस देहरादून भी पहुँचना था। इसलिये लगभग दस बजे गंगोत्री से वापिस चल पड़े। रास्ते मे एक बार फिर हर्षिल रुके औऱ एक हेलीकॉप्टर के साथ फोटो खिंचवाए। जाते समय जो डर लग रहा था, वो ख़त्म हो चुका था औऱ दुबारा आने की मन मे लेकर लगभग आठ बजे देहरादून पहुँच गये।

1441428881032


1441428884696


1441428885138

1441428886696 1441428887204








Comments

  1. हर्षिल के बारे में पहली बार सुना। पहली कोशिश बहुत ही शानदार है, इसे जारी रखियेगा।

    ReplyDelete
  2. short but nice and well written and equally supported by picturs
    keep sharing your uttrakhand travel story.

    ReplyDelete
  3. बहुत अच्छा मामा जी। यादे ताजा हो गई।

    ReplyDelete
  4. अपनी चूड़धार वाली यात्रा पर भी लिखो

    ReplyDelete

Post a Comment

Popular posts from this blog

ट्रेन में बाइक कैसे बुक करें?

अक्सर हमें ट्रेनों में बाइक की बुकिंग करने की आवश्यकता पड़ती है। इस बार मुझे भी पड़ी तो कुछ जानकारियाँ इंटरनेट के माध्यम से जुटायीं। पता चला कि टंकी एकदम खाली होनी चाहिये और बाइक पैक होनी चाहिये - अंग्रेजी में ‘गनी बैग’ कहते हैं और हिंदी में टाट। तो तमाम तरह की परेशानियों के बाद आज आख़िरकार मैं भी अपनी बाइक ट्रेन में बुक करने में सफल रहा। अपना अनुभव और जानकारी आपको भी शेयर कर रहा हूँ। हमारे सामने मुख्य परेशानी यही होती है कि हमें चीजों की जानकारी नहीं होती। ट्रेनों में दो तरह से बाइक बुक की जा सकती है: लगेज के तौर पर और पार्सल के तौर पर। पहले बात करते हैं लगेज के तौर पर बाइक बुक करने का क्या प्रोसीजर है। इसमें आपके पास ट्रेन का आरक्षित टिकट होना चाहिये। यदि आपने रेलवे काउंटर से टिकट लिया है, तब तो वेटिंग टिकट भी चल जायेगा। और अगर आपके पास ऑनलाइन टिकट है, तब या तो कन्फर्म टिकट होना चाहिये या आर.ए.सी.। यानी जब आप स्वयं यात्रा कर रहे हों, और बाइक भी उसी ट्रेन में ले जाना चाहते हों, तो आरक्षित टिकट तो होना ही चाहिये। इसके अलावा बाइक की आर.सी. व आपका कोई पहचान-पत्र भी ज़रूरी है। मतलब

46 रेलवे स्टेशन हैं दिल्ली में

एक बार मैं गोरखपुर से लखनऊ जा रहा था। ट्रेन थी वैशाली एक्सप्रेस, जनरल डिब्बा। जाहिर है कि ज्यादातर यात्री बिहारी ही थे। उतनी भीड नहीं थी, जितनी अक्सर होती है। मैं ऊपर वाली बर्थ पर बैठ गया। नीचे कुछ यात्री बैठे थे जो दिल्ली जा रहे थे। ये लोग मजदूर थे और दिल्ली एयरपोर्ट के आसपास काम करते थे। इनके साथ कुछ ऐसे भी थे, जो दिल्ली जाकर मजदूर कम्पनी में नये नये भर्ती होने वाले थे। तभी एक ने पूछा कि दिल्ली में कितने रेलवे स्टेशन हैं। दूसरे ने कहा कि एक। तीसरा बोला कि नहीं, तीन हैं, नई दिल्ली, पुरानी दिल्ली और निजामुद्दीन। तभी चौथे की आवाज आई कि सराय रोहिल्ला भी तो है। यह बात करीब चार साढे चार साल पुरानी है, उस समय आनन्द विहार की पहचान नहीं थी। आनन्द विहार टर्मिनल तो बाद में बना। उनकी गिनती किसी तरह पांच तक पहुंच गई। इस गिनती को मैं आगे बढा सकता था लेकिन आदतन चुप रहा।

नेपाल यात्रा- गोरखपुर से रक्सौल (मीटर गेज ट्रेन यात्रा)

इस यात्रा वृत्तान्त को शुरू से पढने के लिये यहां क्लिक करें । 11 जुलाई की सुबह छह बजे का अलार्म सुनकर मेरी आंख खुल गई। मैं ट्रेन में था, ट्रेन गोरखपुर स्टेशन पर खडी थी। मुझे पूरी उम्मीद थी कि यह ट्रेन एक घण्टा लेट तो हो ही जायेगी लेकिन ऐसा नहीं हुआ। ठीक चार साल पहले मैं गोरखपुर आया था, मेरी ट्रेन कई घण्टे लेट हो गई थी तो मन में एक विचारधारा पैदा हो गई थी कि इधर ट्रेनें लेट होती हैं। इस बार पहले ही झटके में यह विचारधारा टूट गई। यहां से सात बजे एक पैसेंजर ट्रेन (55202) चलती है- नरकटियागंज के लिये। वैसे तो यहां से सीधे रक्सौल के लिये सत्यागृह एक्सप्रेस (15274) भी मिलती है जोकि कुछ देर बाद यहां आयेगी भी लेकिन मुझे आज की यात्रा पैसेंजर ट्रेनों से ही करनी थी- अपना शौक जो ठहरा। इस रूट पर मैं कप्तानगंज तक पहले भी जा चुका हूं। आज कप्तानगंज से आगे जाने का मौका मिलेगा।