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मोटरसाइकिल यात्रा- ऋषिकेश, नीलकण्ठ और कद्दूखाल

इस यात्रा-वृत्तान्त को आरम्भ से पढने के लिये यहां क्लिक करें
सवा ग्यारह बजे हम बरनावा से निकल गये। अब हमें सीधे ऋषिकेश जाना था। यहां से सरधना लगभग 20 किलोमीटर है। बरनावा की सीमा से निकलते ही हिण्डन नदी पार की और हम बागपत जिले से मेरठ जिले में प्रवेश कर गये। सडक की जितनी तारीख की जाये, कम है। यूपी में ऐसी सडकें मिलती नहीं हैं। भूनी चौराहा पार करते करते सरधना पांच किलोमीटर रह जाता है। भूनी में मेरठ-शामली सडक इस बडौत-सरधना सडक को काटती है। भूनी से मेरा गांव दबथुवा लगभग 8 किलोमीटर मेरठ रोड पर है।
सरधना में बेतरतीब भीड ने हमारा स्वागत किया। सरधना से भी हमारा गांव आठ किलोमीटर दूर ही है। यहां एक बडा प्रसिद्ध चर्च है। सरधना से इतना नजदीक होने के बावजूद भी मैं आज तक यह चर्च नहीं देख सका। इस बार भी नहीं देखा।
सचिन को गूगल मैप के अनुसार चलने का शौक है। मैं चाहता था कि सरधना से दौराला जाया जाये और फिर नेशनल हाईवे से होते हुए मुजफ्फरनगर और रुडकी होते हुए हरिद्वार। लेकिन सचिन ने कहा कि गंगनहर के रास्ते चलेंगे। मैं इस रास्ते से नहीं जाना चाहता था क्योंकि यह सिंगल रोड है। इस पर अब काफी ट्रैफिक भी रहने लगा है और गन्ने से लदी बुग्गियां व ट्रैक्टर ऐसे रास्तों पर बडा परेशान करते हैं। दौराला के रास्ते आठ-दस किलोमीटर का चक्कर जरूर पडेगा लेकिन ऐसी कोई समस्या नहीं आयेगी। लेकिन सचिन की जिद व अरुण की स्वीकृति के कारण गंगनहर के रास्ते चलने की मंजूरी देनी पडी।

सरधना से बाहर निकलकर गंगनहर आती है। इसे पार करके इसके बायें किनारे वाली सडक हमें पकडनी थी। पुल के इस तरफ एक और सडक सरधना शहर में जाती है। इस तरह यहां एक तिराहा बना है। सचिन और अरुण हमेशा की तरह आगे थे। मैं पहुंचा तो वे इसी तिराहे पर सरधना वाली दूसरी सडक पर चलने को तैयार खडे थे। मैंने पूछा कि वापस सरधना जा रहे हो? सचिन ने कहा कि यह गंगनहर वाली सडक है, गूगल मैप में देखा है मैंने। मैंने कहा ढंग से देख। गंगनहर वाली सडक पुल पार करके है।
पहले तो खतौली बाईपास तक ही गंगनहर से जाने का इरादा था। लेकिन जब देखा कि यहां ट्रैफिक बहुत ही कम था और मेरी जो आपत्तियां थीं, ऐसा भी कुछ नहीं था तो आगे मंगलौर तक इसी रास्ते चलने का निर्णय ले लिया।
गंगनहर पर जगह जगह पुलिस वाले खडे थे। एक जगह अरुण को रोक लिया, उसके पीछे पीछे मैं था, मुझे जाने दिया। सचिन को भी नहीं रोका। असल में मेरी मोटरसाइकिल दिल्ली की थी और सचिन की हरियाणा की लेकिन अरुण स्थानीय था यानी बडौत। शायद इसीलिये उसे रोका होगा, कागजात चेक करके जाने दिया।
खतौली के बाद एक पुल के पास पुलिसवाले ने मुझे रोका। संयोग से उस समय मैं आगे था। पुलिसवाले ने एक और आदमी की तरफ इशारा करके कहा कि इन्हें ले जाओ। फलानी जगह तक जाना है इन्हें। उधर मैं नहीं चाहता था कि अपनी पहली बाइक यात्रा में किसी को पीछे बैठाऊं। नई नई बाइक चलानी सीखी थी, इतना आत्मविश्वास नहीं था। लेकिन उसकी बात माननी पडी। पुलिस कभी भी भरोसेमन्द नहीं हो सकती।
लेकिन वो पट्ठा उतरा ही नहीं। पुल पर पुल गुजरते गये। मैं इस जगह के बारे में नहीं जानता, इसलिये मुझे नहीं पता था कि जहां उसे उतरना था, वो कितनी दूर है। फिर गन्ने की पत्तियों के लदे ट्रैक्टर-ट्राली बहुत परेशान कर रहे थे। इनमें भयंकर तरीके से पत्तियां लादी जाती हैं जिससे ये पूरी सडक को घेर लेते हैं। गंगनहर होने के कारण ओवरटेक करने की बहुत ही सीमित जगहें थीं। इसी तरह एक ट्रैक्टर के पीछे मैंने ओवरटेक के लिये जगह मांगने को होर्न बजाया तो वह जरा सा साइड में हो गया। जगह बहुत कम थी। जब ओवरटेक करने लगा तो एक गड्ढा आ गया जो मुझे ठीक उसी समय दिखाई दिया जब मैं उस पर चढने वाला था। यह फुट भर चौडा और काफी गहरा गड्ढा था। ब्रेक मारने का फायदा नहीं था, पीछे बैठा आदमी भी सावधान था। एक झटका लगा और सही-सलामत पार हो गये।
एक जगह सचिन रुककर हमारी प्रतीक्षा कर रहा था। मैं पांचवे गेयर में चल रहा था। सचिन को दूर से ही देखकर मैंने क्लच दबाया और गेयर कम करते करते बाइक न्यूट्रल में कर दी। सचिन सीख देने लगा कि चलती बाइक में इस तरह गेयर मत बदला कर। मैंने कहा कि क्लच दबाकर आप चलती बाइक में कोई भी गेयर बदल सकते हैं। समस्या तब आयेगी जब आप गति के अनुसार गेयर सेट नहीं करेंगे और क्लच छोड देंगे। सचिन फिर भी नहीं समझा और समझाने लगा कि इससे इंजन फट जायेगा और पता नहीं क्या क्या। उसे शायद नहीं पता कि भले ही जाटराम ने पहली बार बाइक पकडी हो लेकिन इसके एक-एक पुर्जों की कार्यप्रणाली अच्छी तरह जानता है और उन्हें ठीक करने का माद्दा भी रखता है। मैकेनिकल इंजीनियरिंग जिन्दाबाद!
सचिन ने कहा कि हम लक्सर के रास्ते जायेंगे। क्यों? रुडकी से सीधे हरिद्वार निकलेंगे, रुडकी से अगर लक्सर जायेंगे तो कम से कम बीस किलोमीटर ज्यादा पडेगा। फिर हमारा गंगनहर से आने का क्या फायदा रह जायेगा? बोला कि रुडकी नहीं जायेंगे, उससे पहले ही एक और रास्ता लक्सर जाता है। मैंने सोचा मंगलौर से जाता होगा। उसने अपने मोबाइल में गूगल मैप खोलकर दिखाया- यह पुरकाजी-लक्सर सडक थी। मैं गूगल मैप को अच्छी तरह जानता हूं। यह सडकों के बारे में जानकारी तो दे देता है लेकिन यह नहीं बताता कि वो सडक कैसी है- कितनी लेन हैं, कैसी बनी है? मैंने मना कर दिया।
फिर वह पुरकाजी-लक्सर सडक के पुल पर खडा मिला। मैंने वहीं खडे पुलिसवालों से पूछा कि यह सडक कैसी है तो बोले कि मस्त, एक नम्बर की। फिर पूछा कि कहां तक- लक्सर तक या केवल बॉर्डर तक? बोले लक्सर तक। आखिरकार हम लक्सर की तरफ मुड गये। एक किलोमीटर भी नहीं चले कि एक ढाबा मिला। हमने सुबह से कुछ नहीं खाया था। दो बजने वाले थे। रुक गये। आलू के परांठे बनवा लिये। कोल्ड ड्रिंक के साथ खाकर तृप्त हो गये।
फिर लक्सर की ओर बढ चले। सडक शानदार बनी है और ट्रैफिक भी कम था। शीघ्र ही उत्तर प्रदेश छोडकर उत्तराखण्ड में प्रवेश कर गये। लक्सर उत्तराखण्ड में है और हरिद्वार जिले में है। हरिद्वार मुख्यतः मैदानी जिला है, इसलिये लक्सर भी मैदानी है और यहां से पहाड दिखते भी नहीं हैं।
लक्सर से तकरीबन बीस किलोमीटर पहले एक पुलिसवाले ने बाइक रुकवाई और लक्सर तक के लिये लिफ्ट मांग ली। रेलवे के पुल के पास वो उतर गया। पुल पार करके एक तिराहा है जहां से बायें सडक रुडकी जाती है और सीधे हरिद्वार। दूर से कोई सूचना-पट्ट नहीं दिखा इसलिये मैं बायें ही रहा और पूछताछ करने रुक गया। इसी दौरान मुझे भी बायें जाता देखकर अरुण रुडकी रोड पर फर्र से निकल गया। सचिन का कोई पता नहीं था, हालांकि वह हमसे आगे ही था। पता नहीं अरुण के पीछे बैठे दीपक को क्या हुआ कि उसने पीछे मुडकर देख लिया। अब तक मुझे पता चल चुका था कि यह रुडकी रोड है, इसलिये हाथ से इशारा करके उन्हें रोका और हरिद्वार रोड पर चलने को कहा।
लक्सर हरिद्वार रोड अच्छी नहीं थी। लगभग तीस किलोमीटर की इस सडक ने थका डाला। जब कनखल दस किलोमीटर रह गया तो सचिन का फोन आया। वो कनखल पहुंच चुका था और बर्गर खा रहा था। मैंने कहा कि मेरे लिये भी बर्गर बनवा। कुछ ही देर में हम तीनों फिर साथ थे। बर्गर खाई और फिर आगे बढ चले।
हरिद्वार तो हमें रुकना ही नहीं था, अब सीधे ऋषिकेश जाना था। यह नेशनल हाईवे सीधे ऋषिकेश ही जाता है इसलिये मुझे यकीन था कि ये सब अगर मुझसे आगे निकल जायेंगे तो सीधे ही जायेंगे जबकि मैं चीला रोड से जाना चाहता था। मैंने इनसे बताया तो नहीं कि चीला रोड से जायेंगे, बस इतना ही कहा कि कुछ दूर तक मेरे पीछे पीछे ही रहो। वे मेरे पीछे पीछे रहे और मैं चण्डी घाट पुल से गंगा पार करके चीला रोड पर रुक गया। हरिद्वार ऋषिकेश तो हमारे लिये स्थानीय ही हैं इसलिये उन तीनों को भी पता था कि हम ऋषिकेश रोड पीछे छोड आये हैं। तीनों सलाह देने लगे कि वापस चलो, ऋषिकेश रोड पीछे है। मैंने भी अनजान बनने का अभिनय किया। आखिरकार सचिन को कुछ समझ आया- कहीं यह चीला रोड तो नहीं है?
हरिद्वार से ऋषिकेश जाने के लिये यह चीला रोड सर्वोत्तम सडक है। है तो सिंगल लेन ही लेकिन शानदार बनी है और कोई ट्रैफिक नहीं। शुरू में एक दो किलोमीटर पहाडी है, फिर समतल। राजाजी नेशनल पार्क से होती हुई यह सडक जाती है। बाद में यह एक नहर के साथ साथ चलती है। खाली सीधी सडक और बाइक अस्सी की रफ्तार से दौड रही थी।
अन्धेरा होने लगा था। वैसे तो हमारा आज ही नीलकण्ठ जाने का इरादा था लेकिन अन्धेरे में नहीं चलना, यह सोचकर बैराज से ऋषिकेश शहर ही तरफ मुड गये। होटल ताज था और ऐसा ही कोई और; पांच सौ रुपये में एक कमरा लिया, सौ रुपये में दो अतिरिक्त बिस्तर लिये, खाना मंगाया और खाकर सो गये।
आज कुल 263 किलोमीटर बाइक चलाई। यह यात्रा केवल बाइक चलाने के अनुभव के लिये की गई थी। कई तरह के अनुभव हुए। सबसे बडा अनुभव थकान का।
नीलकण्ठ की ओर
अगले दिन आठ बजे के आसपास सोकर उठे। अब हमें नीलकण्ठ जाना था। योजनानुसार कल ही नीलकण्ठ देखकर वापस ऋषिकेश लौट आना था लेकिन देर हो जाने के कारण नहीं गये। फिर इस यात्रा का नाम रखा था- लाक्षागृह से लाखामण्डल तक। इसलिये लाखामण्डल भी जाना था। पहले तो सोचा कि चम्बा धनौल्टी के रास्ते चलेंगे लेकिन समय कम होने के कारण देहरादून मसूरी के रास्ते के बारे में सोचा जाने लगा। लेकिन यह बाद की बात थी। एक नया विवाद हो गया कि ऋषिकेश से नीलकण्ठ कैसे जायें। सचिन लक्ष्मणझूला पुल के रास्ते जाना चाहता था और मैं इस पुल को बाइक से पार करने में डर रहा था। एक तो यह पैदल यात्रियों के लिये ही बना है। फिर इस पर पैदल चलने में ही सन्तुलन बिगड जाता है, बाइक से तो और भी बिगडेगा; मेरा सन्तुलन और भी ज्यादा। मैंने रामझूला व लक्ष्मणझूला को सिरे से नकार दिया और बैराज के रास्ते ही चलने को कहने लगा। वैसे तो एक पुल और भी आगे गरुडचट्टी के पास बना है लेकिन उस पुल से हम वापस आयेंगे।
सचिन के साथ कभी आप यात्रा करो तो वह अपनी भारी आवाज और जोरदार तर्कों से मात दे सकता है लेकिन अगर आप अपनी चलाना चलाने चाहते हैं तो उसकी सुने बिना चलानी पडेगी। सचिन आपका अनुसरण करेगा। हालांकि हमें बैराज के रास्ते जाने में कई किलोमीटर का अतिरिक्त चक्कर लगाना पडा लेकिन मैं चाहता था कि इसी रास्ते से जाऊं।
बैराज पार करते ही पहाडी मार्ग शुरू हो जाता है। घुमावदार सडक और थोडी सी चढाई भी। दो साल पहले मैं इसी रास्ते नीलकण्ठ से साइकिल से आया था तो इस पूरी सडक पर एक भी जगह पैडल नहीं मारना पडा था। जल्दी ही लक्ष्मणझूला से आगे निकल गये और अब खराब सडक शुरू हो गई। सडक इतनी खराब कि लगभग 25 किलोमीटर दूर नीलकण्ठ पहुंचने में एक घण्टे से ज्यादा लग गया। सवा दस बजे नीलकण्ठ पहुंचे।
अरुण और दीपक पहली बार यहां आये थे इसलिये उन्होंने 101-101 का प्रसाद लिया जबकि मैंने और सचिन ने 21-21 का। इस मौसम में यहां बहुत कम लोग आते हैं इसलिये बिल्कुल भीड नहीं थी। भूख भी लगी थी। यहीं एक दुकान पर आलू के परांठे खाये। मेरी उम्मीद के विपरीत परांठे बेहद स्वादिष्ट थे।
नीलकण्ठ से चलने लगे तो सचिन व अरुण जल्दी ही आगे बढ गये और मैं एक मोड पर धडाम से गिर पडा। असल में इस स्थान पर ऊपर पहाड से पानी आ रहा था जिसमें कीचड ज्यादा थी। वह कीचड सडक पर फैल गया और सडक को चिकना बना दिया। फिर नब्बे डिग्री से भी ज्यादा का मोड, अगला पहिया थोडा सा फिसल गया और मैं गिर गया। मुझे गिरने का डर पहले ही था, इसलिये बडी सावधानी से धीरे धीरे चल रहा था। गिरा तो कोई चोट नहीं आई और न ही मोटरसाइकिल को कोई खरोंच तक लगी। बाद में साथियों को बताया तो सचिन ने कहा- मुझे लग रहा था कि तू वहां गिरेगा जरूर। लेकिन ताज्जुब इस बात का है कि जाते समय कैसे बच गया?
इस बार गरुड चट्टी से ही गंगा पार कर गये। इस तरफ नेशनल हाईवे है, शानदार बना है। अब तक तय हो गया था कि देहरादून के रास्ते मसूरी नहीं जायेंगे बल्कि चम्बा-धनौल्टी के रास्ते जायेंगे। थोडा लम्बा जरूर पडेगा लेकिन अच्छा लगेगा। अब जब हम गरुड चट्टी पुल पर थे तो मैंने बताया कि आगे लक्ष्मणझूला के पास एक तिराहा मिलेगा जहां से बायें वाली सडक ऋषिकेश शहर में जाती है और सीधे बाईपास है। हमें उसी बाईपास पर चलना है। वह आगे जाकर गंगोत्री मार्ग में मिल जाता है।
लेकिन जैसा कि मुझे पूरी उम्मीद थी कि वे ऋषिकेश शहर में चले गये। मैं बाईपास से होता हुआ शीघ्र ही गंगोत्री रोड पर पहुंच गया और नरेन्द्रनगर की तरफ बढ चला। पता कैसे चला कि वे शहर में चले गये हैं? असल में इस तिराहे से आगे भी एक तिराहा है और मुझे उम्मीद थी कि वे वहां जरूर खडे मिलेंगे। वे नहीं मिले तो इसका अर्थ था कि वे अभी तक यहां नहीं आये हैं। मैं सोच रहा था कि नरेन्द्रनगर बाईपास पर पहुंचकर उन्हें बताऊंगा कि मैं नरेन्द्रनगर पहुंच गया हूं और तुम अभी ऋषिकेश में ही हो। ऐसा कभी नहीं होता कि मैं आगे होऊं और वे पीछे। हमेशा मुझे ही पीछे रहना पडता था और इस बार मैं आगे हो गया था।
लेकिन नरेन्द्रनगर से पांच छह किलोमीटर पहले सचिन सर्र से आगे निकल गया। मेरा नरेन्द्रनगर पहुंचकर ‘जश्न’ मनाने का ख्वाब खत्म हो गया। मुझे लग रहा था कि कहीं न कहीं वे मुझे फोन करेंगे और शायद रास्ता भी पूछें। खैर।
मेरी उम्मीद के अनुकूल बाईपास पर सचिन खडा मिला। मैं बाईपास वाली सडक पर जाकर रुक गया और आराम करने बाइक से उतर गया। कुछ देर बाद अरुण व दीपक भी आ गये। और दीपक बडा हैरान हुआ मुझे यहां देखकर।
यहां से चम्बा लगभग पचास किलोमीटर दूर है। और सडक के तो कहने ही क्या! शानदार सडक और कोई ट्रैफिक नहीं। फिर भी दो घण्टे लग गये वहां पहुंचने में। मैं तेजी पर ध्यान नहीं दे रहा था। दो दिनों से लगातार यात्रा करने से थकान भी हो गई थी व पिछवाडा भी दुखने लगा था। इस वजह से जल्दी जल्दी रुकना पड रहा था। सचिन आगे ही था और नरेन्द्रनगर के बाद मिला भी नहीं। उसने गरुडचट्टी पर मुझसे कहा भी था कि बहुत धीरे धीरे चल रहा है लेकिन मैंने उसे डांट दिया था कि अब के बाद मेरी रफ्तार पर कोई टिप्पणी नहीं करेगा। उसके बाद उसने मुझे कुछ नहीं कहा और मैंने भी उसकी तेज रफ्तार पर कुछ नहीं कहा।
चम्बा में टंकी फुल करवा ली। दिल्ली में ही फुल करवाई थी और अभी तक 377 किलोमीटर तक चल चुकी है। साढे सात लीटर पेट्रोल डला। 150 सीसी की बाइक में पचास का औसत... ठीक ही है।
चम्बा में नहीं रुके। लक्ष्य था कानाताल का। चम्बा से निकलकर जब हिमालयी नजारे दिखने लगे तो तय हो गया था कि कानाताल में कुछ खाना-पीना करेंगे। सचिन आगे था, उसे फोन करके बता दिया कि कानाताल रुकना है।
चम्बा से चढाई शुरू हो गई। जब 2000 मीटर का लेवल पार कर गये तो वो पहाडों वाली ठण्ड भी लगने लगी और दस्ताने निकालने पड गये। हालांकि नवम्बर का महीना होने के कारण वैसे भी काफी ठण्ड थी। और कानाताल कब निकल गया, पता ही नहीं चला। एक से पूछा तो बताया कि तीन किलोमीटर आगे है, फिर एक किलोमीटर आगे जाकर पता किया तो बताया कि तीन किलोमीटर पीछे है। कद्दूखाल छह सात किलोमीटर पर ही था, इसलिये कानाताल का लोभ छोड दिया। आगे चल पडा तो सामने से सचिन आता दिखा। बोला- अरे यार, बडा अजीब मामला है। वहां पूछा तो बताया कि तीन किलोमीटर आगे है, तीन किलोमीटर आगे जाकर पूछा तो बताया कि चार किलोमीटर पीछे है। मैं तो इसी वजह से पीछे भागा जा रहा था कि कहीं तुम लोग ही कानाताल का सारा मजा ना लूट लो।
पता नहीं कानाताल कहां था, कहां गया? हम सवा चार बजे कद्दूखाल पहुंच गये। कद्दूखाल से ही सुरकण्डा देवी के लिये रास्ता जाता है। पहाड पर कुछ ऊपर मन्दिर दिख रहा था। मैंने इसे देख रखा है, बाकी तीनों देखने चल दिये। सारा सामान एक दुकान में रख दिया और मैं चाय पीने लगा। दुकानवाला इनकी शुरूआती रफ्तार को देखकर बोला- ये लोग तो आधे घण्टे में ही वापस लौट आयेंगे। मैंने कहा- इन्हें कम से कम दो घण्टे लगेंगे। आप खाना बनाने की तैयारी शुरू कर दो। डिनर आपके यहीं करेंगे।
एक घण्टे बाद सचिन को फोन किया तो हांफते हुए बोला- अरे भाई, मरा पडा हूं। मन्दिर बस पहुंचने ही वाले हैं।
अन्धेरा होते ही मैंने कमरे की खोजबीन शुरू कर दी। यहां गढवाल मण्डल विकास निगम का एक रेस्ट हाउस है। इसके अलावा थोडा ही नीचे स्थानीयों ने भी कुछ कमरे बना रखे हैं। एक स्थानीय के साथ मैं उन कमरों को देखने गया। दो कमरे लेने थे। दो का किराया बताया- बारह सौ रुपये। मैंने मना किया तो एकदम एक हजार पर आ गया। मैंने फिर भी मना किया तो वह और कम करने को राजी नहीं हुआ।
सवा छह बजे सभी सुरकण्डा देवी के दर्शन करके वापस लौट आये। मैंने अभी तक यहीं बराबर में स्थित गढवाल मण्डल का रेस्ट हाउस नहीं देखा था। आते ही सचिन व अरुण को भेज दिया। यहां एक कमरे का तीन सौ रुपये किराया था। अब हम क्यों उस पांच सौ रुपये वाले में जाने लगे? खाने के लिये उस दुकान वाले से बात की। अगर हम न होते तो वह कभी की दुकान बन्द चुका होता। ठण्ड बहुत थी, हमने अण्डे की बात की। दुकान पर एक और आदमी बैठा था, बिल्कुल नशे में धुत्त। अण्डे की सुनते ही चिल्लाया- यह देवी का दरबार है, यहां अण्डा नहीं बना करता। दुकानदार उसे चुप कराते हुए बोला- तो तूने क्यों देवी के दरबार में दारू पी रखी है? भाग यहां से। उनकी लडाई हो गई। दुकानदार अण्डे के माध्यम से कुछ कमाई करना चाहता था और नशेडी को जलन हो रही थी। मैंने दुकानदार के कान में फुसफुसा दिया कि अण्डे समेत सारा खाना तैयार करके रेस्ट हाउस में लेकर आ जाना। यह सुनते ही दुकानदार ने नशेडी से कहा- अबे अब मैं अण्डा नहीं बनाऊंगा और तू भाग अब यहां से। नशेडी सन्तुष्ट होकर चला गया, दुकानदार ने दुकान अन्दर से बन्द कर ली और एक घण्टे में स्वादिष्ट अण्डा-तरी, दाल व रोटी लेकर हाजिर हो गया।


गंगनहर पर


नीलकण्ठ की ओर




अरुण, दीपक और सचिन- नीलकण्ठ के दरबार में


ऋषिकेश से नीलकण्ठ की सडक

बाइक पर लम्बी दूरी की यात्रा करने में बडा दर्द होता है।

नीचे ऋषिकेश, ऊपर नरेन्द्रनगर शहर और हम खडे हैं बाईपास पर


चम्बा रोड


चम्बा से दूरियां




चम्बा-धनौल्टी के बीच यह पता नहीं कौन सा स्थान है।





फोटो: सचिन। सुरकण्डा के रास्ते से लिया गया।






अगला भाग: लाखामण्डल

लाक्षागृह-लाखामण्डल बाइक यात्रा
1. लाक्षागृह, बरनावा
2. मोटरसाइकिल यात्रा- ऋषिकेश, नीलकण्ठ और कद्दूखाल
3. लाखामण्डल
4. लाखामण्डल से चकराता- एक खतरनाक सफर
5. चकराता से दिल्ली मोटरसाइकिल यात्रा




Comments

  1. Excellent photos, good description. Congratulations for new bike

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  2. Neeraj ji raam raam...achcha likha..padh ke achcha laga..mager devi ke sthan pe anda nahi khana chaiye tha..hahahah..chalo koi nai ji..kabhi kabhi jo khate ho unki bhi photo dalo to alag alag jagah ka khana bhi pata chalega or kuch variety bhi aaigi blog mai.

    Aapka mitra
    Ashish Gutgutia

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    Replies
    1. अण्डा क्यों नहीं खाना चाहिये था???
      खैर, आपने अच्छी बात बताई कि खाने के फोटो भी लगाया करो, अब से ध्यान रखूंगा।

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  3. kya photo hai bhai aap ka kya khna
    maja aa gya

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  4. मैकेनिकल engg.kon si chidiya ka naam hai jo sab khuch samar dava hai ???बर्गर खाई !

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    1. बन्दर क्या जाने अदरक का स्वाद?? हां, कनखल में बर्गर खाई।

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    2. हा मुझे धयान अाया कि मैने तो बरगर खाया था पर एक बदंर ने खाई थी।

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  5. yatra bahut acchi chal rahi hai Bhai ji.bahut maja aa raha hai padhne main.shandar photo.

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  6. बाइक शानदार !… चलानेवाला दिलदार !!.........

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  7. एक बात तो पक्की है । 'पूना' मैं आओगे तो मुझे आलू के पराठे ही खिलाने पड़ेंगे।

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  8. Neeraj bhai please bike ki Achchi photo lagao or dikhao no.plate dikhao aage kuch likha huaa dikhta he . Umid ke barabar photo nahi

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    1. कैसे होते हैं अच्छे फोटो? बताओ भाई, अगली बार ध्यान रखूंगा।

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  9. सडक की जितनी तारीख की जाये, कम है। mazza aa gyaa,, tarikh pe tarikh

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  10. बाइक के फोटो ही फोटो। मज़ा आ गया। बाइक दिखने में भी डैशिंग (स्ट्रांग) लग रही है। धन्यवाद!

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  11. आजकल तो नीरज हीरो हो गया है.. . शानदार गाडी ! बढियां कपड़े ! अब वो मामूली लड़का नहीं रहा जो केवल एक चेक की शर्ट में सारा हिमालय नाप आता था और जिसे लक्की शर्ट कहता था

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    1. aaap bhi moderen ho gaye ho... badiya badiya comment maar rahe ho...

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  12. I always love reading your posts .Very good .I wish I could travel with you but I am too old for such travelling that is why i enjoy reading your posts .Thanks keep up the good work .

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  13. I always love reading your posts .Very good .I wish I could travel with you but I am too old for such travelling that is why i enjoy reading your posts .Thanks keep up the good work .

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